7.1.20

अपना भला या दूसरों का बुरा...

         हममें से अनेक लोग इस प्रवृत्ति के मिल जाएंगे जिन्हें खुद तो दुःख उठा लेना मंजूर है किन्तु अपने किसी निकटवर्ती मित्र, परिचित या रिश्तेदार की बेहतरी फूटी आंख भी नहीं सुहाती । ऐसे लोग नित नये षडयंत्र रचते भी देखे जा सकते हैं कि वो कौनसा तरीका है जिससे मैं बदनाम भी न होऊं और दूसरे को नुकसान पहुंचा सकूं या नीचा दिखा सकूं । जबकि रुपये के समान ही हमारे पास समय भी सीमित ही होता है । जिस प्रकार हम रुपये की एक इकाई से कोई भी एक ही सामान खरीद सकते हैं उसी प्रकार अपने समय का भी या तो हम स्वयं की बेहतरी के लिये उपयोग कर सकते हैं या फिर उसी समय को दूसरे की टांग खींचने में नष्ट कर सकते हैं ।


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       बेशक इसे ईर्ष्या कहा जा सकता है, फिर भी दोनों में कुछ अंतर है क्योंकि ईर्ष्याजन्य परिस्थिति में हम अपना खून जलाते हुए शारीरिक क्षमताओं को क्षीण करते हैं, जबकि इस दूसरी स्थिति में कई बार ऐसे लोग आनंद महसूस करते हैं । यह अलग बात है कि दोनों ही स्थितियों में हम अपना कुछ न कुछ नुकसान तो करते ही हैं । इसीलिये यह कहावत भी सदियों से सुनी जा रही है कि जब हम दूसरों के लिये कुआं खोदते हैं तो कहीं न कहीं हमारे लिये कोई खाई पहले ही खुद चुकी होती है । इसी संदर्भ में एक दिलचस्प उदाहरण भी देखें-

      एक बार यमराज अपने नियमित प्राण-हरण क्रम में जब निकले तो अपने निर्धारित स्थान तक पहुंचते उन्हें तीव्र प्यास लगने लगी । सामने से आ रहे इकलौते व्यक्ति से जब उन्होंने पानी मांगा तो उसने उन्हें पहचाने बगैर अपने पास उपलब्ध पानी पीने को दे दिया । इधर यमराज ने देखा कि जिस व्यक्ति के प्राणहरण हेतु वे चले थे यह तो वही व्यक्ति है, तब उन्होंने उसे अपना परिचय देते हुए अपने आने का मकसद बताकर कहा कि चूंकि तुमने पानी की मेरी तीव्र प्यास को बुझवाकर मुझे तृप्ति दिलवाई है इसलिये मैं तुम्हें अपनी यह भविष्यदृष्टा डायरी सिर्फ पांच मिनिट के लिये देता हूँ और इस पांच मिनिट में तुम जो कुछ भी इसमें लिखोगे वो सत्य भी होगा, लेकिन ध्यान रहे सिर्फ पांच मिनिट । तब उस व्यक्ति ने सोचा कि ऐसी उपलब्धि के लिये पांच मिनिट कम नहीं हो सकते जबकि सिर्फ आधे मिनिट जैसे समय में तो लोग कौन बनेगा करोडपति जैसे कार्यक्रम में फोन ऑफ फ्रेंड जैसी लाईफलाईन से असमंजस वाली स्थिति भी अपने पक्ष में कर लेते हैं । 

       यही सब सोचते हुए उसने जब डायरी को खोला तो पहले ही पन्ने पर दिखा कि उसका पडौसी कल मंत्री बनने वाला है, उसने तत्काल वहाँ लिख दिया कि वो मंत्री न बन पाए । दूसरे पेज पर लिखा था कि उसका एक अच्छा दोस्त शीघ्र ही लॉटरी में लाखों रुपये का ईनाम जीतने वाला है – तत्काल उसने वहाँ लिखा कि उसके नाम ये लॉटरी न खुले । इस प्रकार बदलते पृष्ठों में वो अपने सामने आते परिचितों के बारे में लिखते हुए जब स्वयं के पृष्ठ तक पहुंचा तभी यमराज ने उसके हाथ से वह डायरी लेते हुए कहा कि तुम्हारे पांच मिनिट का समय समाप्त हो चुका है । यदि तुम दुसरों का लाभ न हो पाए यह देखने व उसे रोकने की कोशिश के स्थान पर अपना भला कैसे कर सकते हो ये देखते तो तुम्हारी प्राणरक्षा भी हो सकती थी, परन्तु अब बस ।

        प्रायः हम भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति में जीते हैं यहाँ तक कि हमें अपने वालों की भलाई भी कुछ ऐसे सोचने में आती है जैसे थ्री इडियट फिल्म में हमने देखी थी कि- यार बडा बुरा लगता है जब अपना कोई दोस्त फैल हो जाए, लेकिन उससे भी ज्यादा बुरा तब लगता है जब हमारा वो ही दोस्त फर्स्ट डिविजन में पास हो जावे ।

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        यदि हम अपनी जानकारी के किसी भी पास या दूर के सफलता की यात्रा संपन्न करने वाले सफल व्यक्ति का इतिहास देखें तो उनकी कार्यप्रणाली में स्वयं के उत्थान की कोशिश के अलावा दूसरों के संबंध में अपनी शक्ति व उर्जा नष्ट करने का कोई भी उदाहरण देखने को नहीं मिल पाएगा । इसलिये जीवन में बजाय इसके कि हम अपने किसी परिचित का बनता काम बिगाडकर उसमें रोडे कैसे अटकाएं यह सोचने में अपना समय व उर्जा खर्च करें हमें निरन्तर यही सोचना चाहिये कि कैसे एकलव्य बनकर अपनी स्वयं की सफलता को हम उसके चरम तक पहुँचाएं ।

वॉट्सएप पर प्रचलित एक कोटेशन-

       "खुद की बेहतरी में इतना समय लगाओ कि दूसरों के बारे में सोचने का वक्त ही न मिले ।"

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