24.10.11

सुख, शान्ति व सफलता के लिये.- वास्तु दीप.


          दीपावली महोतसव की आज धनतेरस से शुरुआत हो चुकी है और आज से लगाकर भाई-दूज तक सभी हिन्दू धर्मावलंबी अपने-अपने घरों को अपनी सामर्थ्य अनुसार दीपक की रोशनी से सुसज्जित कर रहे होंगे । इस अवसर पर मैं आपका परिचय एक ऐसे सुमंगल दीपक से करवाना चाह रहा हूँ जिसका प्रयोग आप अपने घर में साल के 365 ही दिन नियमित रुप से यदि कर सकें तो सामान्य मान्यता के अनुसार आपके घर-परिवार में सुख-शान्ति व सफलता सदा बरकरार रहते हुए घर के सभी सदस्य अनावश्यक बीमारियां, मानसिक तनाव, असन्तोष और आर्थिक समस्याओं से बहुत हद तक बचे रह सकते हैं ।


            इस सुमंगल दीपक की जानकारी निरोगधाम पत्रिका में दिल्ली निवासी वास्तुविद पं. गोपाल शर्माजी के द्वारा करीब 10 वर्ष पूर्व प्रकाशित हुई थी जो इसकी उपयोगिता के अनुसार आपके लिये प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ । इनकी इस जानकारी के अनुसार-
           
          एक कांच या चीनी मिट्टी का लगभग 5" 6" इंच व्यास का कटोरा लें और उसे आधे से कुछ अधिक पानी से भरदें । अब इसमें कांच का एक गिलास उल्टा करके इस प्रकार से रख दें कि वह छोटे दीपक के लिये एक स्टेन्ड सा बन जावे और फिर उसके उपर एक छोटा कटोरा कांच का लेकर उसमें घी, तेल या मोम अपनी सामर्थ्य अनुसार भर कर उसमें रुई की सामान्य बत्ती बनाकर लगा दें । अब उस बडे कटोरे के पानी में लोहे के कुछ छर्रे जो साईकिल की दुकान पर या बाल बेरिंग की दुकान पर उपलब्ध हो सकते हैं उन्हे इसमें डाल दे । कांच की कुछ गोटियां (बच्चों के खेलने की) भी इसी पानी में डाल दे और अन्त में एक फूल की कुछ पंखुडियां भी इस पानी में डालकर सूर्यास्त के बाद इस दीपक को प्रज्जवलित कर अपने घर के बैठक के कमरे में दक्षिण पूर्व दिशा (आग्नेय कोण) में रख दें । यदि इस क्षेत्र में इसे रखने में कुछ असुविधा लग रही हो तो वैकल्पिक स्थान के रुप में आप इसे दक्षिण पूर्व की दिशा में भी रख सकते हैं । यदि घर में विवाह योग्य कन्या हो और उसके विवाह में किसी भी प्रकार की अडचन आ रही हो तो इस दीपक को आप उस कन्या के कमरे में इसी दिशा में रख सकते हैं । मान्यता यह भी है कि इस उपाय से कन्या के विवाह में आ रही बाधाएँ भी दूर हो जाती हैं ।

           हमारा शरीर जिन पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, काष्ठ, धातु और अग्नि) से निर्मित है उन्हीं पंचत्तवों का सन्तुलन इस दीपक के द्वारा हमारे घर-परिवार में कायम रहता है और इसी सामंजस्य से जीवन में नकारात्मकता दूर होकर सकारात्मकता बनी रहती है जो हमारे शान्तिपूर्ण, सुखी व समृद्ध जीवन में मददगार साबित होती है ।

           प्रतिदिन सूर्यास्त के बाद जलाये जाने वाले इस दीपक को आप सोने के पूर्व बन्द भी कर दें और कटोरा रात भर वहीं रखा रहने दें । सुबह इस पानी को किसी गमले में डाल दें व एक कांच की बोतल में पानी भरकर दिन भर उसे धूप में रखा रहने दें । धूप न भी हो तब भी इस बोतल को बाहर खुले में ही रखें और सूर्यास्त के बाद यही पानी इस कटोरे में भरकर यह दीपक इस विधि से जलाकर सोने के पूर्व तक इसे जलता रहने दें ।


           दीपपर्व की अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ...


27.9.11

समय प्रबन्धन में कमजोर मैं.



          पिछले कुछ समय से अपनी उन व्यापारिक गतिविधियों में व्यस्त हो जाने के कारण जिनसे संयोगवश पहले अपने छोटे पुत्र के विवाह फिर मकान बदलने की प्रक्रिया में अपना 35 वर्ष पुराना मकान बेचकर नया मकान बनवाने की मशक्कत और उसके तत्काल बाद इस हिन्दी ब्लाग जगत से जुडाव के कारण 2 वर्ष की लम्बी अवधि से मैं पुरी तरह से विमुख हो गया था उसमें नये सिरे से स्वयं को व्यस्त करने की चाहत के चलते मेरी व्यस्तता उस दिशा में ऐसी बनती चली गई कि चाहते हुए भी मैं इधर समयानुसार अपनी नियमित उपस्थिति दर्ज नहीं करवा पाया । 
 
          ब्लागिंग का यह क्षेत्र भी दिमागी एकाग्रता से ही चल पाना सम्भव हो पाता है और यदि दिन भर शरीर और दिमाग कहीं और व्यस्त हो जावे तो इधर भी अपनी ईमानदार उपस्थिति कैसे दर्शाई जा सकती थी ? समय प्रबन्धन की कला में मैं शायद कभी भी पारंगत नहीं रहा इसीलिये जहाँ भी देखा तवा-परात वहीं बितादी सारी रात की ही तर्ज पर जहाँ भी मैं रहा पूरी तरह से वहीं का होकर रह जाना ही मेरी फितरत बनती चली गई । इसी दौर में हमारे सामाजिक पर्वों की श्रृंखला की व्यस्तताएँ भी जुडती गई जिसके चलते पिछले पन्द्रह-बीस दिनों से तो मेरे ई-मेल अकाउन्ट पर फेस-बुक की ओर से भी गैरहाजिरी के नोटिफिकेशन मुझे हर दूसरे दिन बार-बार मिलते रहे । इसी अवधि में सम्माननीय श्री अनूप शुक्लाजी और सबके जन्मदिन की चिंता रखने वाले श्री बी. एस. पाबलाजी के जन्मदिन भी आकर गुजर गये जिन पर मैं अपनी ओर से उन्हें शुभकामनाएँ भी नहीं दे पाया जिसका अफसोस अब अगले 365 दिनों तक तो रहना ही है । 
 
          अतः इस पोस्ट के द्वारा मैं इस ब्लागवुड के अपने उन सभी मित्रों को सिर्फ यह कारण बताने का प्रयास ही कर रहा हूँ जिनके मन में मेरी इस लम्बी गैरहाजिरी को लेकर नाना प्रकार के कयास चलते रहे हैं । अभी भी मैं यह तो नहीं कह सकता कि अब से मैं प्रतिदिन पूर्व के समान ही अपनी उपस्थिति यहाँ नियमित रुप से दर्शाता रह सकूँगा लेकिन चूंकि अब व्यापार क्षेत्र में भी इस अवधि में कुछ तो गाडी पटरी पर आ ही चुकी है इसलिये ईमानदार कोशिश के द्वारा यहाँ भी अपनी मौजूदगी की अल्पकालीन ही सही नियमितता बनाये रख सकूँ ऐसी कोशिश अवश्य करता रहूँगा । 
 
          शेष आप सभीके स्नेह और शुभकामनाओं की चाहत के साथ
...

1.9.11

अण्णागिरी के सुपरिणाम


          भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा के अनशन को समाप्त हुए अभी एक सप्ताह भी नहीं हुआ है किन्तु जनता के दैनिक जीवन में इसके सुपरिणाम दिखने लगे हैं । इन्दौर शहर में व्यवसायी श्री संजय सिसौदिया ने जल्दी में रेल्वे स्टेशन के बाहर गलत जगह अपना वाहन पार्क कर दिया । वापसी में उनका सामना ट्रेफिक पुलिस के जवान से हुआ । ट्रेफिक कंट्रोलर ने उनसे इस गल्ति के एवज में 50/- रु. की मांग की, श्री सिसौदिया ने जब उस 50/- रु. की रसीद चाही तो ट्रेफिक कन्ट्रोलर ने रसीद के लिये उन्हें मोटे जुर्माने का भय दिखाया । श्री सिसौदिया ने उसे जवाब दिया कि मैं भले ही 500/- रु. का दण्ड भुगत लूंगा किन्तु तुम्हें 50/- रु. रिश्वत के तो नहीं दूंगा । अंततः उन्हें कोर्ट में जाकर अधिक समय व रकम का जुर्माना भरकर ही अपना ड्राईविंग लायसेंस छुडवाना पडा किन्तु सस्ते में रिश्वत देकर बच निकलने का प्रयास उन्होंने नहीं किया ।

          दूसरी घटना में एक इलेक्ट्रानिक दुकान के संचालक अपनी दुकान के 1 किलोवाट के विद्युत लोड को 3 किलोवाट करवाना चाह रहे थे जिसके लिये पिछले कई महिनों से विद्युत मंडल के कर्मचारी उन्हें टालमटोल कर धक्के खिलवा रहे थे । इस आंदोलन के बाद 67 वर्षीय ये दुकान संचालक सीधे विद्युत मंडल के अधिकारी से अपनी समस्या को लेकर मिले और उस अधिकारी ने उनका अरसे से लटका यह कार्य बगैर किसी दान दक्षिणा के तत्काल पूर्ण करवा दिया ।

          बेशक ये बहुत छोटे-छोटे घटनाक्रम चल रहे हैं किन्तु जनजीवन में भ्रष्टाचार को  बढावा देने से रोकने वाले उदाहरण इनके द्वारा शुरु होते दिखने लगे हैं । यदि जनता व शासकीय कर्मचारी अपने-अपने स्तर पर इस अभियान को ऐसी ही प्रेरणा के साथ मूर्त रुप देते चलें तो धीरे-धीरे ही सही देश में निचले स्तर पर निरन्तर बढ रहे भ्रष्टाचार में कमी लाने के सकारात्मक सुधारों की शुरुआत इनके द्वारा बनती व बढती ही जावेगी ।

          देश की बिगडी हुई भ्रष्ट व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाने के लिये आवश्यक भी यही लगता है कि अन्धकार से लडने के लिये ऐसा एक दीपक भी कम नहीं है इसीलिये-

एक दीपक तुम जलाओ, एक दीपक मैं जलाऊँ 
कुछ अन्धेरा तुम मिटाओ, कुछ अन्धेरा मैं मिटाऊँ

29.8.11

अण्णा आंदोलन : सफलता के साथ आशंकाएं


          देश के राजतंत्र में विकराल रुप से बढ चुके भ्रष्टाचार से प्रत्यक्ष जुडी मंहगाई की मार से त्रस्त आम जनता की जो ऐतिहासिक शक्ति अण्णा के आंदोलन को समर्थन देने देश भर में जुटी उससे खौफ खाकर सभी राजनैतिक दलों ने अत्यन्त मजबूरी की स्थिति में अण्णा की मांगों को संसद में ध्वनिमत से पारित तो कर दिया क्योंकि यदि इतने लम्बे अनशन और इतने प्रबल जनसमर्थन के दौरान अण्णा के जीवन के साथ कुछ भी अप्रिय हो जाता तो सत्तापक्ष ही नहीं वरन सभी राजनैतिक दलों के इन प्रतिनिधियों को अगले आमचुनाव में अपने अस्तित्व  के बचाव का खतरा स्पष्ट दिखने लगा था इसलिये अनशन तुडवाने के लिये अण्णा की ये मांगें स्टेंडिंग कमेटी में विचार हेतु भेज दिये जाने की स्थिति स्वीकार कर लेने के बाद एक बार तो ये सभी राजनैतिक दल इस समय तो देश व दुनिया के सामने अपना दामन बचा ले गये किन्तु स्टेंडिंग कमेटी में मसला भेज दिये जाने के बाद गेंद फिर इन्हीं के पाले में पहुंच जानी है और उस कमेटी में भी  इन्हीं धुरंधर राजनीतिज्ञों को इस कानून को लागू करने का फैसला करना है जिन्होंने इतनी विपरित परिस्थितियों में भी इस आंदोलन की खिलाफत करने के प्रयासों में संसद में भी अपनी तरफ से पुरजोर विरोध करने के प्रयासों में कोई कमी नहीं रहने दी ।

          अब जब अण्णा का अनशन समाप्त हो चुका है और धीरे-धीरे इस जनतंत्र का दबाव भी कम से कमतर ही होते चला जाना है, तो येन-केन प्रकारेण अपनी लेटलतीफ शैली में इन मुद्दों को लटकाते चले जाने के बाद कैसे इन्हें अपने निजी स्वार्थों के खिलाफ सख्त कानून बनने से रोका जा सके इस प्रकार के सियासी दांव-पेंच इनकी कार्यप्रणाली में फिर से चालू होते दिख सकते हैं और कानून बनने का मसला जब नियमों और बहुमत की आड में सप्ताहों और महिनों की हदें पार करवाते हुए वर्षों के दायरे तक लम्बित कर देने में यदि ये सफल हो जावेंगे तो इतने बडे व उग्र विरोध को भी आसानी से दबा लेने के प्रयासों में ये विशेषज्ञ अपनी ओर से कोई भी कसर कैसे बाकि रहने देंगे ?
 
          दूसरी ओर अण्णा यह भी स्पष्ट कर ही चुके हैं कि आमजन के अधिकारों की सुरक्षा व सुधार हेतु उनके अगले अभियान क्या-क्या होंगे । कहने की आवश्यकता नहीं है कि उनके द्वारा चलाये जाने वाले सभी अभियान इनके उन्मुक्त अधिकारों के दायरों को सीमित करने के एक के बाद एक प्रयास रुप में ही होंगे और उनके प्रत्येक अभियान की सफलता इनके  निजी स्वार्थपूर्ण मंसूबों को आघात पहुँचाने वाली ही होगी, ऐसी स्थिति में महात्मा गांधी के आधुनिक प्रतीक बन चुके अण्णा की आवाज व प्रयास भी किसी आकस्मिक पल में फिर किसी गोडसे के द्वारा बन्द कर दिये जाने की आशंका के प्रति भी आने वाले किसी भी कल में क्या देशवासियों को बेपरवाह रहना चाहिये ? 

15.8.11

हार्दिक शुभकामनाएँ...



15 अगस्त 2011

देश के 65 वें 

स्वाधीनता दिवस

के

शुभ अवसर पर

नजरिया

ब्लाग के 

सभी पाठकों,

समर्थकों व 

टिप्पणीकर्ता शुभचिन्तक साथियों सहित

समस्त देशवासियों को 

हार्दिक बधाईयां एवं शुभकामनाएँ...

31.7.11

वास्तुशास्त्र के सर्वत्र उपयोगी प्रचलित नियम.

          जीवन में तनाव, बीमारियों का नियमित क्रम, लगातार प्रयत्न करते रहने पर भी सफलता से दूरी व इस जैसी अनेक समस्याओं के कारण के रुप में वास्तुशास्त्र के जानकार दिशाज्ञान के मुताबिक रहने, खाने-पीने, सोने व काम न कर पाने को एक प्रमुख कारण मानते हैं और वास्तुशास्त्र दिशाओं के मुताबिक ही अपनी नित्य क्रियाओं का संचालन हमें सिखाता है । माना जाता है कि जानते हुए या संयोगवश जिनके जीवन में रहना, काम करना वास्तु (दिशा) नियमों के अनुकूल होता है वे लोग अपने जीवन में दूसरों की तुलना में अधिक सुखी, स्वस्थ व काम धंधे में अधिक सफल पाए जाते हैं ।
 
          दिशाओं की जानकारी से सम्बन्धित इन नियमों को जानने के बाद आप चाहे किसी छोटे से कमरे में रहते हों या फिर अनेकों कमरों वाले किसी बडे मकान/महल में । आपका व्यापार किसी आफिस या दुकान के रुप में चलता हो अथवा कारखाने या फेक्ट्री के रुप में । अपनी व्यवस्थाएँ आप वास्तु शास्त्र के इन नियमों के मुताबिक संशोधित कर इस विधा से लाभान्वित हो सकते हैं
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          1. किसी भी मकान में जहाँ आपका परिवार निवास करता हो उसमें उत्तर-पूर्व वाला कोण ईशान कोण होता है । अतः अपने निवास के इस क्षेत्र में आपके आराध्य देव हेतु (चाहे एक छोटी सी तस्वीर रखकर ही) एक छोटा सा देव स्थान बनावें जिसमें तस्वीर या मूर्ति का मुख पश्चिम की ओर हो । यहाँ यथासम्भव आप पूर्व की ओर मुख करके सम्भव हो तो कुशा या ऊनी आसन पर बैठकर धूप-दीप अगरबत्ती द्वारा चन्द मिनीट नियमित देव आराधना करें । जल भंडारण हेतु कुआँ, टेंक, या पानी की टंकी जैसे इन्तजाम भी देव-स्थान से हटकर लेकिन इसी क्षेत्र में रखें ।
          यह देखलें कि इस कोण के दायरे में कोई भी बाथरुम या शौचालय आपके निवास स्थान में न आता हो, यदि हो तो अविलम्ब उसे वहाँ से हटवा दें ।
 
          2. दक्षिण-पूर्व का कोण आग्नेय कोण होता है । परिवार हेतु किचन इसी क्षेत्र में रखने के साथ ही गेस चूल्हा इसी कोण में लगवाएँ जिसमें भोजन बनाते समय गृहिणी का मुँह पूर्व दिशा में रहे । घर व व्यापार संस्थान में बिजली का मेनस्वीच भी इसी कोण में लगवाने का प्रयास करें । किन्तु यदि यह सम्भव न हो सके तो इस कोण पर (अग्नि प्रतीक) बिजली का एक लाल बल्ब अधिक से अधिक समय तक जलते रहने की व्यवस्था करलें ।
 
          3. दक्षिण-पश्चिम का कोण नेऋत्य कोण होता है । दुकान में स्टाक भार, फेक्ट्री में कच्चे माल का भंडारण व घर के किचन में अनाज के वार्षिक संग्रह की व्यवस्था इसी क्षेत्र में करें । यदि यह सम्भव न हो तो यहाँ हमेशा कोई भारी वजन अवश्य रखें । किसी भी प्रकार की पानी की भूमिगत टंकी या गड्ढा यहाँ न होने दें । यदि घर में ऐसी व्यवस्था हो तो उसे बन्द करदें ।
 
          घर में गृहस्वामी का कमरा इसी कोण में रखते हुए उनके शयन हेतु बिस्तर इसी दिशा में लगाकर यथासंभव उत्तर या फिर पश्चिम दिशा में पैर करके सोने की व्यवस्था करें । दक्षिण दिशा की ओर पैर करके हर्गिज न सोवें । सोते समय शरीर के किसी भी भाग पर टांड, छज्जा, बीम न आ रहा हो इसका ध्यान रखें । यदि पति-पत्नी में आपसी प्रेम अथवा परस्पर वैचारिक तालमेल का अभाव रहता हो तो शयन कक्ष में सारस के जोडे का चित्र लगावें ।
 
          4. उत्तर पश्चिम का कोण वायव्य कोण होता है । घर या संस्थान में रुपये-पैसे रखने के लिये अपनी अलमारी या तिजोरी इसी कोण में रखकर उसका दरवाजा पूर्व दिशा की ओर खुलने दें । वास्तुशास्त्रीय मान्यता के अनुरुप इससे आपके घर की श्री सम्पदा में बरकत रहती है व धन में निरन्तर वृद्धि होती है ।
 
          5. घर, दुकान या संस्थान कहीं भी अपने स्वामित्व के पूरे क्षेत्रफल के बीचों बीच 2'x2' फुट का स्थान बिल्कुल खाली रखकर इसे स्वच्छ रखें और इस जगह कोई भारी वजन न रहने दें ।
 
          6. अपने निजी मकान में मुख्य प्रवेश द्वार पर शुभ चिन्हों युक्त टाईल्स लगावें । किराये के मकान में प्रवेश द्वार के दोनों ओर कुंकू से स्वास्तिक चिन्ह बनावें । यथासम्भव बुरी नजर से बचाव हेतु मकान के मेनगेट को लाल, काला व सफेद तीनों रंगों के मिश्रण में परिवर्तित करवा दें ।
 
          7. पेड-पौधे - घर में जगह कम होने पर भी कम से कम एक गमले में तुलसी का पौधा अवश्य लगावें । सम्भव हो तो अशोक व अनार के पेड लगावें । पपीता हमारे पेट व शरीर के लिये चाहे जितना उपयोगी हो किन्तु हमारे स्वामित्व क्षेत्र में इसका पेड अनिष्ट व अमंगलकरी माना जाता है । अतः यदि आपके यहाँ पपीते का पेड हो तो उसे जड सहित निकलवा दें । इसके अलावा ऐसे कोई भी पेड-पौधे जिनसे दूध निकलता हो को अपने स्वामित्व क्षेत्र के अन्दर न रहने दें । गुलाब के फूल को छोडकर कोई भी कांटेदार वृक्ष विशेष रुप से 'केक्टस' के पौधे को घर में न लगावें ।
 
          इसके अतिरिक्त हिंसक पशु, युद्ध, आंसू, उदासी दिखाते, डूबते जहाज को दिखाते चित्रों को घर में न लगावें । टूटे शीशे (कांच), एक पाये का पटिया, टूटी मूठ के कपडे धोने की मोगरी, जैसे काम न आने वाले अनावश्यक उपकरण घर में न रखें । बन्द घडी व पेन या तो चालू करवाकर घर में रखें अथवा उन्हें भी हटादें ।
 
          वैसे तो इस वृहद शास्त्र में हमारे स्वामित्व क्षेत्र के चप्पे-चप्पे का, भूखण्ड, मिट्टी, खिडकी-दरवाजे, उनकी लम्बाई-चौडाई का विस्तृत  उल्लेख मिलता है जिनकी चर्चा इस एक पोस्ट में कर पाना न तो सम्भव लगता है और न ही आवश्यक, किन्तु प्राथमिक जानकारी से जुडे उपरोक्त तथ्यों को भी समझकर
यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में अपनाने का प्रयास कर सके तो सम्भव है भविष्य में उन्हें अपने जीवन में कुछ अधिक सफलता और घर में कुछ अधिक सुखानुभूति मिलती रह सके ।


29.6.11

एक थे शंभू महादेव राव


          वर्षों पूर्व एक फिल्म आई थी नाम था आंसू बन गये फूल. फिल्म के कलाकारों में हीरो देव मुखर्जी थे जिनका रोल एक उद्दंड कालेज छात्र का था, हीरोईन संभवतः तनूजा थी और उसी कालेज के आदर्शवादी प्रिंसीपल की भूमिका निभा रहे थे दादामुनि अशोक कुमार । इसी फिल्म का एक विशेष किरदार अत्यंत खूंखार गुंडे की भूमिका में शंभू महादेवराव नामक पात्र का था जिसके लिये फिल्म के निर्माता निर्देशक ने हिंदी फिल्मों के मशहूर खलनायक प्राण का चुनाव किया था । पूरी फिल्म किसी सफल बंगाली फिल्म का रीमेक ही थी, हिन्दी संस्करण के लिये भी पूरी टीम करीब-करीब बंगाल से जुडे कलाकारों की ही थी जिसमें प्राण जैसे इक्के-दुक्के कलाकार ही ऐसे रहे होंगे जिनका शायद बंगाली पृष्ठभूमि से कोई जुडाव नहीं रहा हो ।
 
          पूर्व की सफल बंगाली फिल्म जिसके रीमेक में यह फिल्म हिन्दी में बन रही थी इसके बंगाली संस्करण में शंभू महादेवराव का किरदार जिस बंगाली अभिनेता ने निभाया था उसका अभिनय ही उस फिल्म का सबसे सशक्त पक्ष रहा था अतः निर्माता-निर्देशक चाह रहे थे कि प्राण कम से कम एक बार उस बंगाली फिल्म में उस कलाकार को शंभू महादेवराव के रोल में अभिनय करते देख लें जिससे कि हिन्दी संस्करण में इस पात्र की भूमिका के साथ अभिनेता प्राण पूरा न्याय कर सकें । उनके सामूहिक आग्रह पर प्राण ने बहुत ध्यान से सोचने के बाद भी विन्रमतापूर्वक हिन्दी फिल्म के बनने से पहले उस बंगाली संस्करण की फिल्म देखने का उनका अनुरोध यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि जब आपने मुझे यह रोल दिया है तो मुझे मेरे तरीके से ही इसे करने दीजिये । निर्माता-निर्देशक ने अभिनेता प्राण के इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया । हिन्दी फिल्म आंसू बन गये फूल बनी और उस फिल्म का जो सबसे सशक्त पक्ष सामने आया वह प्राण का यही शंभू महादेवराव वाला किरदार ही रहा जिसके लिये इस फिल्म की समूची टीम ने एकमत से यह स्वीकार किया कि प्राण ने जो भूमिका इस पात्र के रुप में इस फिल्म में अभिनीत की उसके समक्ष बंगाली फिल्म के उस कलाकार का अभिनय जो इसी किरदार का उस बंगाली कलाकार ने निभाया था वह प्राण के अभिनय की उत्कृष्टता से बहुत पीछे छूट गया था ।
 
          यहाँ इस घटना का उल्लेख क्यूँ ? दरअसल हम जीवन में जिस भी क्षेत्र में जाते हैं वहाँ उस क्षेत्र के कुछ सुस्थापित सफल नाम ऐसे भी हमारे सामने आते हैं जो हमारे लिये किसी न किसी रुप में प्रेरणास्तोत्र  बन जाते हैं । वहाँ कभी ऐसा भी लगता है कि यदि हम इनकी कार्यशैली का अनुसरण करें तो हमें अधिक तेजी से सफलता मिल सकती है जबकि उनका अनुसरण कर लेने के प्रयास में हम उन जैसे तो बन नहीं पाते बल्कि अपनी स्वयं की मौलिकता और गंवा बैठते हैं । अतः जिन्दगी में हमारा कार्यक्षेत्र चाहे जो रहे हम अपने उन प्रेरणास्तोत्रों से प्रेरणा भले ही लें किन्तु स्वयं की समझ-बूझ के साथ यदि अपनी मौलिक शैली को ही कायम रखते हुए अपनी ओर से श्रेष्ठतम परिणाम देने के प्रयास के साथ ही यदि हम अपना कार्य करते रहें तो निश्चय ही किसी की नकल के बगैर भी उस क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान अधिक आसानी से बनाई जा सकती है ।

          वास्तविक जीवन में कई बार ऐसे अनुभव स्वयं भी देखने में आते हैं और इस फिल्म की भूमिका के माध्यम से अभिनेता प्राण का ये उदाहरण भी इसी तरीके को अधिक अहमियत देता दिखता  है ।

20.6.11

कितनी सिक्योर्ड सिक्युरिटी ?



           तीन दिन पूर्व बेटी की ननंद की शादी जो इन्दौर में ही एक गार्डन में आयोजित थी उसमें मौजूदगी के दौरान पेश आया वाकया । विवाह पक्ष के लोगों ने सुरक्षा के नजरिये से गार्डन में प्रोफेशनल  सिक्युरिटी के द्वारा लगभग चार सुरक्षा गार्ड विभिन्न स्थानों पर तैनात करवा रखे थे और उसके बावजूद भी दूसरी मंजिल के जिस कमरे में दुल्हन व उसके परिवार की अन्य जोखम रखी थी वहाँ ताला लगाकर अपने घरेलू नौकर जो 13-14 वर्ष का लडका ही था उसे उस ताला लगे हुए कमरे के बाहर ताले की सुरक्षा के लिहाज से तैनात किया हुआ था । रिसेप्शन चल रहा था जिसमें सामान्य तौर पर मेचिंग वेशभूषा पहने रहने के कारण महिलाएँ स्वर्णाभूषणों की बनिस्बत आर्टिफिशल गहने पहनना अधिक पसन्द करती हैं और अधिकांश घरेलू मेहमानों के आभूषण प्रायः उनके लगेज मे ही रखे होते हैं, परिवार का प्रत्येक सदस्य पूरी तरह से व्यस्त होता है तब वहीं मौजूद उन चारों सुरक्षागार्ड का इन्चार्ज दूसरी मंजिल पर घूम-घूमकर हर बन्द दरवाजे को खटखटाकर पूछता घूम रहा था कमरे में कोई है क्या ? घूमते-घूमते वही गार्ड दुल्हन व उसके परिजन के ताला लगे कमरे के बाहर आकर उस घरेलू नौकर से बोला - इस कमरे का ताला खोलो, लडके ने जब कारण पूछा तो वह गार्ड बोला मुझे इसे चेक करना है । चाबी तो उस लडके के पास थी नहीं लिहाजा वह नीचे जाकर अपने मालिक से चाबी ले आया और कमरा खोल दिया ।

           इधर गृहस्वामी ने यह सोचते कि नौकर उस कमरे की चाबी क्यों लेकर गया ? उन्होंने अपने एक साथी के साथ उपर जाकर देखा तो वही सिक्यूरिटी गार्ड उस कमरे में मौजूद प्रत्येक अटैची के ताले तौल रहा था । जब उन्होंने उससे वहाँ की मौजूदगी का कारण पूछा तो वह बगले झांकने लगा । घर के लोगों ने उनकी एजेन्सी को खबर देकर वहाँ से किसी की आने तक उस गार्ड की जितनी भी पिटाई-पूजा की वह मार भी बगेर प्रतिरोध के ही उसने खाई । उस माहौल में वहाँ मौजूद हर सदस्य बखूबी यह समझ रहा था कि उस समय यदि घर के सदस्य चौकन्ने न होते तो उस सुरक्षागार्ड की ही कारगुजारी से उस विवाह में ऐसी चोरी तो तय हो ही गई थी जिसमें दुल्हन के पास मौजूद दोनों पक्षों के आभूषणों के साथ ही वधू पक्ष के वैवाहिक परिवार की अधिकांश तैयारियों पर भी ये सुरक्षागार्ड ही पानी फेर जाते ।

          उस समय तो ये घटना एक सामान्य घटना के रुप में सामने से गुजर गई किन्तु आज टी- वी. पर एक विज्ञापन देखकर जिसमें बैंक में झोला लेकर आया एक नकाबपोश लूटेरा रिवाल्वर दिखाकर केशियर के पास मौजूद सारा केश झोले में भरवाकर रिवाल्वर दिखाते हुए भाग जाता है, उसके जाने के बाद जब अन्दर से बैंककर्मी सिक्यूरिटी के नाम से आवाज लगाते हैं तो उसी हुलिये में कंधे पर टंगे उसी झोले के साथ यस सर के रुप में सेल्यूट मारते हुए वहीं का सिक्यूरिटी गार्ड सामने आ खडा होता है । इस विज्ञापन के सामने आने पर न सिर्फ इस शादी की ये घटना फिर से जेहन में आ गई बल्कि इसके साथ ही कुछ समय पूर्व तक शहर की घनी आबादी से खासी दूर ए. बी. रोड पर मौजूद  ICICI बैंक की मुख्य शाखा से बडी रकम निकालकर अपने घर या दुकान-दफ्तर जाने वाले अधिकांश नागरिकों को रास्ते में लूट का शिकार होना पडा था जिसमें बडे नियोजित तरीके से सिर्फ उस व्यक्ति के पास मौजूद केश रकम पर धावा बोला जा रहा था ।

          बार-बार एक ही तरीके से बैंक से रकम लेकर निकलते ग्राहकों की रास्ते में रकम लूट लेने के मामले जो अब बहुत समय से बन्द हो गये हैं उनमें भी तब अन्तिम निष्कर्ष यही सामने आया था कि वहाँ मौजूद कोई सिक्यूरिटी गार्ड इस तरह बडी रकम लेकर निकलने वाले ग्राहकों के बारे में जानकारी मोबाईल के माध्यम से बाहर भेज रहा था और लोग योजनाबद्ध तरीके से इनके इस षडयंत्र का शिकार होकर अपनी मोटी रकम से हाथ धो रहे थे वह खबरें भी  क्रमानुसार दिमागी चलचित्र में बारी-बारी सामने आने लगी ।
 
          ऐसे में यह चिंतन तो बनता ही है कि शादी-विवाह व जीवन के अन्य अनेकों उल्लेखित अवसरों पर हममें से लगभग प्रत्येक व्यक्ति व परिवार इन्हीं एजेन्सियों से बुलवाये गये सुरक्षा गार्ड्स को अपनी सम्पत्ति की सुरक्षा में लगाकर स्वयं को निश्चिंत महसूस कर लेते हैं क्या इनकी सुरक्षा में लोगों की सम्पत्ति वास्तव में सुरक्षित मानना चाहिये ? 
 
          जबकि सोच का यही सिलसिला यदि और भी पीछे जावे तो भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की वो हत्या भी सामने आ जाती है जो उनके उस सुरक्षाकर्मी ने ही की थी जिसके उपर उनके जीवन को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखने की सबसे अधिक जिम्मेदारी रही थी...!


15.6.11

बच्चों के सर्वांगीण विकास में माता-पिता की भूमिका...


          किसी भी दम्पत्ति के लिये उनके एक या अधिक बच्चे वैसे ही होते हैं जैसे दाम्पत्य के उपवन में उपजे सुन्दर व कोमल से फूल और आज के एक ओर कैरियर व दूसरी ओर मँहगाई की प्रधानता वाले युग में तो जहाँ माता-पिता प्रायः दूसरे बच्चे को जन्म देने के बारे में सोच भी नहीं पाते हों वहाँ बच्चे के लालन-पालन में प्यार, स्नेह व नरमदिली का प्रतिशत स्वमेव ही बढता चला जा रहा है, ऐसे में उनके प्रति मार-पिटाई की बात किसी भी आधुनिक सोच वाले पाठक के मन में सही लग ही नहीं सकती । मेरी पिछली पोस्ट "पिटाई से मुक्ति - वर्तमान पीढी का सुख" वास्तव में मैंने कुछ मनोरंजक शैली में लिखने की कोशिश की थी जिसका शायद अधिकांश पाठकों के अन्तर्मन में यह सन्देश गया कि मैं निर्ममता से बच्चों की मार-पिटाई के पक्ष में हूँ जबकि वास्तव में ऐसा बिल्कुल नहीं था शायद इसीलिये ये दूसरी पोस्ट करीब-करीब इसी विषय पर जन्म ले रही है ।

          पीटने का अभिप्राय किसी सीमा तक हल्की-फुल्की या दिखावटी सजा से होता है, अब वे सभी लोग जो यह सोचते हैं कि हम बच्चों से संवाद बनाये रखकर व उन्हें सही-गलत का अन्तर बताते हुए उनका सर्वांगीण विकास कर सकते हैं, यह धारणा आधी या पौनी सच तो हो सकती है किन्तु पूरी सच कभी नहीं हो सकती क्योंकि यदि ये पूरी सच होती तो शायद पूर्व काल से यह कहावत जन्म ही नहीं ले पाती कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते । 
 
          संभवतः बच्चों की तीसरे-चौथे वर्ष की नासमझ उम्र ऐसी होती है जहाँ बच्चा जिद्दी करके अपनी बात माता-पिता से मनवा लेना सीखना प्रारम्भ कर लेता है और जितनी छोटी उम्र उतनी ही छोटी उसकी जिद भरी फरमाईशें होती हैं जिनके लिये माता-पिता ही नहीं दादा-दादी व नाना-नानी जैसे निकटतम रिश्तेदार भी ये मानकर ही चलते हैं कि अभी तो नासमझ है धीरे-धीरे सब समझने लगेगा फिलहाल तो इसकी ये जरासी फरमाईश पूरी कर ही दो । जबकि बढती उम्र के साथ बच्चे को भी ये समझ में आता चलता है कि अब मुझे कौनसे तरीके से अपनी बात (जिसे हम जिद कह सकते हैं) मनवानी है । इधर माता-पिता की व्यस्तता व आमदनी भी बढ रही होती है नतीजा 99% अवसरों पर बच्चा इस जद्दोजहद में मानसिक रुप से अपने अभिभावकों से जीतता ही चला जाता है और जब यही आदत उम्र के मुताबिक बढती चलती है तो ? 
 
          मैं ऐसे तीन लोगों को तो व्यक्तिगत रुप से जानता हूँ जिन्हें बच्चों के बचपन में इस नरमदिली से परिपूर्ण पालन-पोषण के कारण उनके युवावय में आने पर एक को पुत्र के दोस्तों के साथ संगीन अपराध कर फरार हो जाने के कारण लगभग 6 दिन पुलिस कस्टडी में रहना पडा, दूसरे को व्यापार में अपनी वह साख जिसे बनाने में उनकी जिन्दगी खप गई थी पुत्र के युवावय में आकर पिता के समानान्तर कुर्सी पर बैठने के बाद उनकी गैर मौजूदगी में ये सोचकर उटपटांग सौदे कर लेने के कारण कि हमारा तो अपना व्यवसाय है और हमें वे खर्च तो लग ही नहीं रहे हैं जो हमारे ग्राहकों को लग रहे हैं और मेरे द्वारा किये जाने वाले इस सौदे में मोटी आमदनी तो तय है जो अपने पिता से मांगे बगैर मेरे व्यक्तिगत उपयोग में आ सकेगी ऐसे सौदों में जो मोटे नुकसान उनके व्यापार पर आ गये उसकी भरपाई में पिता को मुंह-मांगे ब्याज पर बाजार से पैसे ले-लेकर लम्बे समय की जद्दोजहद के बाद अपनी साख बचानी पडी जिससे कुछ समय बाद अन्ततः उनका शीघ्र प्राणान्त भी हो गया, और तीसरे एक सज्जन जिन्होंने अपने पिता के जमाने में राजकुमारों जैसा पालन-पोषण पाया । पिता के मरणोपरान्त उनका व्यवसाय भी कुशलतापूर्वक संचालित कर अपनी पिता के जमाने की हैसियत को आगे भी बढाया किन्तु  स्वयं के पुत्र की दखलन्दाजी के बाद हुए करोडों के नुकसान ने न सिर्फ उनके पूरे परिवार को सडक पर ला दिया बल्कि पचास पार की उम्र में आने के बाद एक निर्जन से क्षेत्र में 8x10 की किराने की निहायत ही मामूली सी दुकान में बैठकर अपना आगे का जीवन व्यतीत करना पडा ।
 
          जैसा कि अभी हम अपने इर्द-गिर्द देख रहे हैं ये परिवारों में एक बच्चे का युग ही चल रहा है, और लगभग 20 वर्ष पूर्व जब बढती आबादी के विस्फोट को रोकने के लिये चीन ने एक बच्चे की नीति राष्ट्रीय स्तर पर घोषित की थी तब सरिता पत्रिका में मैंने एक बच्चे के दुष्परिणाम से सम्बन्धित एक लेख पढा था उसके मुताबिक जब परिवार में एक बच्चा होता है तो उसे सम्हालने वाले छः लोग हमेशा उसके इर्द-गिर्द रहते हैं दो माता-पिता, दो दादा-दादी और दो नाना-नानी । नतीजा बच्चे के मुँह खोलने के पहिले ही उसकी फरमाईश पूरी हो जाती है, अपने खिलौने व अन्य कोई वस्तु उसे किसी भाई-बहिन से शेअर नहीं करनी पडती, ये सभी पैरेन्ट्स मिलकर उसके प्रति अपने लाड-प्यार के चलते उसे स्वयं कोई निर्णय नहीं लेने देते और होश सम्हालने से लगाकर बडे हो जाने तक बगैर प्रयासों के सब-कुछ पाते चले जाने वाला वह बच्चा निर्णय लेने में अपरिपक्व और मेरा है कि भावना के साथ सामाजिक, पारिवारिक रुप से करीब-करीब स्वार्थी होता चला जाता है । अब ऐसे बच्चे उम्र के स्वनिर्णय लेने के दौर में आकर कितने परिपक्व निर्णय ले पाएंगे यह बात सहज ही समझी जा सकती है ।
 
          इसलिये प्रेम-प्यार, लाड-दुलार व बच्चों के प्रति स्नेह की भावनाओं की तमाम प्रबलता के बावजूद मेरी समझ में ये ध्यान रखना सदैव बच्चे के हित में ही साबित होता है कि हम उसमें जिद करने की भावना को बने जहाँ तक न पनपने दें । जिसके लिये हमें उसकी नासमझ उम्र से ही प्रयासरत होना पडेगा क्योंकि 20-22 वर्ष का हो चुकने पर तो उसका जैसा भी विकास  तब तक हो चुका होगा, उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव की कल्पना भी बेमानी ही साबित होगी । इस सन्दर्भ में मुझे ड्रीम गर्ल, स्वप्नसुंदरी के रुप में देश-दुनिया में विख्यात सुप्रसिद्ध हीरोईन हेमा मालिनी का संस्मरण अनुकरणीय लगता है कि घूमने-फिरने के दौरान उनके बच्चों ने जब भी जिस चीज के लिये भी जिद की हेमा मालिनी ने संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद भी कभी उनकी जिद पूरी करने के लिये अपनी दोनों बच्चियों को वह वस्तु नहीं दिलवाई । अलबत्ता दो दिन बाद स्वयं जाकर वह उसी वस्तु को अपनी बच्चियों को खरीदकर लाकर दे देती किन्तु फरमाईश के वक्त या जिद के बाल हथियार के वक्त तो उन्होंने वह वस्तु कभी भी खरीदकर बच्चियों को नहीं दी । निःसंदेह इससे जहाँ उनकी बच्चियों को उस वस्तु के लिये तरसना नहीं पडा वहीं उनमें जिद करके अपनी बात मनवा लेने की भावना भी कभी आगे नहीं बढ पाई ।
 
          एक डाकू के द्वारा डाकेजनी के दौरान स्वयं को पकड में आने से बचाव के प्रयास में एक व्यक्ति की हत्या हो गई । वह पकड में भी आ गया और अपराध सिद्ध हो जाने की स्थिति में उसे मृत्यु-दंड की सजा मिली । जज के यह पूछने पर कि क्या तुम्हें अपने बचाव में कुछ कहना है उस डाकू ने कहा कि मैं अपनी माँ से कान में कुछ कहना चाहता हूँ । कोर्ट की इजाजत मिलने पर माँ उसके पास गई और अपना कान उस डाकू पुत्र के मुँह के पास ले जाकर उसकी बात सुनने के लिये उसके मुँह के नजदीक माँ ने सटाया और देखते ही देखते उस डाकू पुत्र ने अपनी माँ के उस कान को दांतों से चबाकर लहूलुहान कर दिया । जज ने जब उससे पूछा कि तुमने ऐसा क्यों किया तो उस डाकू ने जवाब दिया कि मैं जब पहली बार स्कूल के अपने सहपाठी की पेन्सिल चुराकर घर लाया था तब इसने मुझे रोकने या सजा देने के बजाय उस पेन्सिल को घर में रख लेने दिया था । यदि ये उसी दिन मुझे उस पेन्सिल को चुराकर लाने के लिये दण्डित कर देती तो आज मुझे यह दिन नहीं देखना पडता । 
 
          तो बच्चों के किसी गलत आचरण को हम समय रहते सख्त व्यवहार के द्वारा यदि नहीं रोक पावें तो समय आने पर दुनिया तो दूर खुद बच्चे भी हमारी उस कमजोरी के लिये हमें ही जिम्मेदार ठहराएंगे । अतः मारना-पीटना भले ही हम आवश्यक न समझें किन्तु आवश्यकता के समय यदि हम उनके किसी अनुचित व्यवहार के प्रति उन्हें सख्ती से न रोक पावें और यह समझते रहें कि मैंने उसे समझा दिया है और आगे से सब ठीक हो जावेगा तब क्या आप जानते हैं कि उसे समझाने वाले उसके मित्र वर्ग में ऐसे लोग भी हैं जिनकी स्वार्थपरक समझाईश आपकी समझाईश से बच्चे के मन में उपर ही चलेगी । 
 
          इसलिये मारना भले ही गलत हो किन्तु बच्चे के समग्र विकास के लिये उसके प्रति कभी-कभी सख्ती का प्रदर्शन भी न कर पाना तो मेरी समझ में ऐसा ही है जैसे हम बगैर ब्रेक की कार में यात्रा कर रहे हों । बच्चा जैसे-जैसे बडा होता जावेगा बगैर ब्रेक के आपकी उस कार की गति उतनी ही बढती जावेगी और फिर वो हमें कहाँ ले जाकर भिडवा देगी और उसका फिर क्या परिणाम होगा इसकी सहज ही कल्पना भी की जा सकती है । निःसंदेह बच्चों को मारना गलत है किन्तु कभी अवसर आने पर पूरी सख्ती से उसे उसके किसी क्रिया-कलाप के लिये रोकना तो न सिर्फ उसके, स्वयं के और परिवार के बल्कि समाज के हित में भी आवश्यक हो ही जाता है । बच्चे को सिर्फ ये समझ में आते रहना आवश्यक है कि मुझसे यदि दूसरी-तीसरी बार कुछ गलती हुई तो उसके लिये मुझे अपने माँ-पिता अथवा प्रशिक्षक के क्रोध का सामना करते हुए सजा भी भुगतना पड सकती है । यही एक भावना हमारे बच्चे के मन में उम्र के अनुसार विकसित होती रहे उसके व्यवस्थित विकास के लिये इतना तो मैं व्यक्तिगत रुप से आवश्यक मानता हूँ । बेशक मारना वो अंतिम ब्रह्मास्त्र हो सकता है जिसका प्रयोग बहुत-बहुत ही आवश्यक होने पर एकाध बार कभी किया जा सके क्योंकि बार-बार ब्रह्मास्त्र यदि चलाने की सोची भी जावे तो न सिर्फ वो ब्रह्मास्त्र भी बोथरा या बेअसर हो जावेगा बल्कि बच्चा भी ये सोचकर ढीठ होता चला जावेगा कि आप मार ही तो सकते हो, लो और मार लो । 

          अब यदि अपने बच्चे के दुनियावी विकास के प्रति मेरा ये नजरिया अब भी आपको गलत लगता हो तो फिर मैं यही कहूँगा कि समझ अपनी-अपनी । 


13.6.11

पिटाई से मुक्ति : वर्तमान पीढी का सुख.

      एक पुरानी कहावत - पिता से पिटने के बाद पिता को सामान्य मूड में देखकर पुत्र ने हिम्मत जुटाकर पूछ ही लिया - पापा, क्या आपके पापा भी आपको ऐसे ही पीटते थे ? हाँ बिल्कुल, पिता ने जवाब दिया । और उनके पापा भी उन्हें पीटा करते थे पुत्र ने फिर पूछा ? अरे उनकी तो बात ही मत करो - वे तो मेरे पिताजी को नंगा करके मारते थे फिर उसी हालत में बाथरुम में बन्द भी कर देते थे, पिता ने जवाब दिया । और क्या उनके भी पिताजी उन्हें मारा करते थे पुत्र ने फिर पूछा ? उनके गुस्से के बारे में तो मैंने सुन रखा था कि वे तो मेरे दादाजी को मारते वक्त दीवार से भिडाते हुए उठाकर खिडकी से बाहर तक फेंक दिया करते थे । लेकिन तुम ये सब क्यों पूछ रहे हो इस बार पिता ने पुत्र से पूछा ? कुछ नहीं मैं तो यह जानना चाह रहा था कि ये खानदानी गुंडागर्दी आखिर कब तक चलेगी ? पुत्र ने कुछ मासूमियत से अपने पिता के प्रतिप्रश्न के उत्तर में जवाब दिया ।

          तो अब नई पीढी को लगभग अपने अभिभावकों की इस मार-कुटाई से करीब-करीब मुक्ति मिल गई सी प्रतीत होती है । अब एक या बमुश्किल दो बच्चों के इस युग में बच्चों के बडे से बडे अपराध पर भी  प्रायः पिता उन्हें पीटने की सोच भी नहीं पाते बल्कि कभी भूले से भी उन्हें ये मालूम पड जावे कि उनके बच्चे को स्कूल में किसी शिक्षक ने चांटा भी मार दिया तो समझ लो उस शिक्षक की शामत आना तय सी हो जाती है । वे दिन हवा हुए जब स्कूल में बच्चे को भर्ती करवाते समय पालक स्कूल के शिक्षक से बोलकर आते थे, माटसाब मेरे बच्चे को अच्छे से पढाना, सख्ती भी करना पडे तो चिंता मत करना, बस आप तो यूं समझलो कि आज से इसकी हड्डी-हड्डी मेरी और चमडी-चमडी आपकी, और विद्यार्थी व शिक्षार्थी सभी एक ही सिद्धांत पर चला करते थे "छडी पडे छम्-छम, विद्या आवे धम्-धम" । और विद्यार्थी को शिक्षा प्राप्ति के दौरान प्राइमरी से लगाकर सेकन्ड्री तक मुर्गा बनते, कान पकडकर उठक-बैठक लगाते, हथेली पर स्केल या रुल की मार खाते, बैंच पर खडे होते या फिर क्लास से निकाल दिये जाने की सजा झेलते-झेलते अपनी शिक्षा का ये दौर पूरा करना पडता था ।

      निःसंदेह पिताओं के द्वारा अपने पुत्रों को उस समय दी जाने वाली ये सजा प्रशंसनीय तो कतई नहीं हो सकती थी । लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर इसके काफी कुछ सकारात्मक परिणाम भी सामने आते थे-

        विश्वप्रसिद्ध शख्सियत अल्फ्रेड हिचकाक को उनके पिता ने मारने-पीटने के बाद रात भर के लिये तहखाने के कबाड के बीच बन्द कर दिया । रात भर घिग्गी सी बंधी हुई स्थिति में डर के जिस माहौल में बालक अल्फ्रेड ने वह डरावनी रात व्यतीत की उसी डर को बडे होकर फिल्म निर्माता बनने के बाद उसने एक से बढकर एक डरावनी फिल्मों के रुप में सारी दुनिया के सामने लगातार प्रस्तुत किया और हाॅरर (डरावनी) फिल्मों के निर्माण के क्षेत्र में बेताज बादशाह बनकर सारी दुनिया के समक्ष अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया ।

           उल्लेखनीय हस्तियों के पिटाई संस्मरण में विख्यात अभिनेता, निर्माता, निर्देशक- राजकपूर की पिटाई भी इसी श्रेणी में आती है । पापा पृथ्वीराज कपूर का फिल्म इंडस्ट्री में पर्याप्त दबदबा होने के बावजूद गुरुकुल प्रथा का अनुसरण करते हुए उन्होंने राजकपूर को फिल्मकार केदार शर्मा का सहायक बनवाया, जहाँ राजकपूर को फिल्म के प्रत्येक शाट के पूर्व सिर्फ क्लीपिंग देने का काम सौंपा गया था । तरुण राजकपूर कुछ अपनी उम्र व कुछ इण्डस्ट्री के आकर्षण के वशीभूत हर शाट के बाद शीशे में अपना चेहरा देखने खडा हो जाता था जिससे कई बार अगला शाट फिल्माने की प्रक्रिया बाधित होती थी । निर्माता केदार शर्मा ने दो-एक बार राजकपूर को इसके लिये मना भी किया किन्तु आदत से मजबूर राजकपूर पर उनकी समझाईश का कोई असर नहीं हुआ । अंततः अगली बार इसी क्रम में जब शाट फिल्माने की प्रक्रिया बाधित हुई तो केदार शर्मा ने जो झन्नाटेदार थप्पड राजकपूर को रसीद किया तो  राजकपूर न जाने कितनी दूर जाकर गिरे । इस घटना के परिणामस्वरुप जहाँ एक ओर केदार शर्मा को राजकपूर की इस बेजा आदत से आगे के लिये निजात मिल गई वहीं राजकपूर ने भी अनुशासन का जो सबक इससे हासिल किया उसी अनुशासन ने उस राजकपूर को सर्वोच्च श्रेणी का फिल्म निर्माता बनवाकर न सिर्फ देश भर में बल्कि दुनिया के अनेक देशों में समान रुप से लोकप्रिय बनवाया । अपने आगे के अनेकों साक्षात्कारों में राजकपूर ने इस घटना का सगर्व उल्लेख भी किया ।

          पुत्र को आत्मनिर्भर बनाने की सोच के साथ एक समय एक पिता ने अपने पुत्र को सख्त निर्देश दिया- कल से तुम जब तक एक रुपया कमाकर नहीं लाओगे तुम्हें खाना नहीं मिलेगा । कल से दिन के समय तुम मुझे घर में मत दिखना । पुत्र ने माँ को बताया कि पिताजी ने मुझे ऐसा निर्देश दिया है । माँ ने अपनी ममता के वशीभूत हो उसे अपने पास से एक रुपया दे दिया और कहा दिन में घूम फिरकर आ जाना और कल तो ये रुपया अपने पिता को दे देना, पुत्र ने भी वैसा ही किया, दिन भर इधर-उधर दोस्तों के साथ घूमकर आने के बाद पिता के हाथ में वो रुपया रख दिया । पिता ने उसके सामने उस रुपये को जलते चूल्हे में फेंकते हुए कहा - मुझे बेवकूफ समझ रखा है क्या ये रुपया तू कमाकर लाया है ? कल से कमाकर लाना । पुत्र ने चिंतित अवस्था में उसी शहर में रह रही अपनी विवाहित बहन को अपनी समस्या बताई । इस बार बहन ने उसे अपने पास से रुपया देकर कहा - ठीक है कल ये रुपया देकर देख लो । दूसरे दिन शाम को पिता के हाथ में बहन से लिया हुआ रुपया पुत्र ने ऐसे रख दिया जैसे मैं इसे कमाकर लाया हूँ । पिता ने फिर उस रुपये को चलते चूल्हे में फेंकते हुए कहा । फिर वही बात क्या तू मुझे मूर्ख समझ रहा है ।
   
         अब तो पुत्र की हालत खराब हो गई । माँ व बहिन से लिये हुए रुपये पिता ने न जाने कैसे भांप लिये थे । तीसरे दिन पुत्र अपने दोस्त से उधार रुपया लेकर आया और शाम को पिता के हाथ में अपनी उस दिन की कमाई के रुप में रख दिया । पिता ने पल-दो पल उस रुपये को हाथ में रखा व पुत्र को गौर से देखते हुए फिर उस रुपये को जलते चूल्हे में वही कहते हुए फेंक दिया । साथ ही यह निर्देश फिर दे दिया कि कल से गल्ति मत करना और कमाकर ही लाना । अब पुत्र ने सोचा कि ऐसे तो काम नहीं चलेगा, न जाने कैसे पिताजी भांप ही लेते हैं । दूसरे दिन कुछ सोचकर पुत्र वास्तव में रुपया कमाकर लाने के लिये निकल पडा । दिन भर पुत्र ने कडी मेहनत की और शाम को अपने पिता के हाथ में दिन भर की मेहनत के एवज में पाया हुआ रुपया रख दिया । पिता ने पुत्र की ओर देखते हुए उस रुपये को भी तू तो मुझे बेवकूफ ही समझ रहा है कहते हुए जलते चूल्हे में फेंक दिया । पिताजी ये आप क्या कर रहे हैं ? दिन भर मैंने तपती धूप में कडी मेहनत से यह रुपया कमाया है, कहते हुए पुत्र ने दौडकर जलते चूल्हे में से उस रुपये को बाहर निकाल लिया । तो इस पिटाई या सख्ति का जो सुपरिणाम उस पीढी को मिलता था उसके कारण पिता से पिटने वाला बालक दुनिया में कहीं भी किसी से भी फिर नहीं पिट पाता था लेकिन अब ?

    श्रीमतिजी की हम उम्र महिलाओं की गोष्ठी में एक परिचिता का दुःख कुछ यूं व्यक्त हो रहा था- अरे सुनीता अपनी तो किस्मत ही खराब है जब बहू बनकर आए तो सास के सामने कुछ बोल नहीं सकते थे, और अब जब सास बने तो बहू के सामने कुछ नहीं बोल सकते ।

            यही दुःख अभी एक पार्टी में एक मित्र जिनका अच्छा खासा अनाज मण्डी में गेहूँ का कारोबार है, मकान, दुकान, वाहन व इकलौते विवाहित पुत्र जैसे सभी भौतिक सुखों के बावजूद 55 वर्ष के आसपास की उम्र में ही शरीर रोगों का घर बन चुका है, उनसे कुशल-क्षेम जानने के दौरान सामने आया - मैंने पूछा - और अशोकजी कैसा क्या चल रहा है ? वे बडी मायूसी से फीकी सी मुस्कराहट के साथ बोले - बस सुशीलजी, जो और जैसी कट जावे । मैंने कहा - क्यों भाई ऐसा क्यों ? तो वे बोले - सुशीलजी बडे बदकिस्मत हैं अपन लोग । बात तब भी पूरी तरह पल्ले नहीं पडने पर कुछ और कुरेदा तो वे मुझसे सहमति भरवाते हुए बोले - अपन तो अपने पिताजी के हाथों जब तब पिटते हुए ही बडे हुए और अब अपन अपने बच्चों को तू भी बोलदो तो घर भर में तूफान सा झेलना पड जाता है । दुःख उनका जायज लग रहा था । आजकल सीमित सन्तानों के दौर में यही रोना हर दूसरे घर में दिखाई दे रहा है ।

           इस स्थिति के समर्थन में आधुनिक विचाकधारा के पोषक चाहे जितने तर्क दे लें किन्तु इसके दुष्परिणामों में इसी ब्लाग की मेरी पूर्व पोस्ट "तरुणाई की ये राह" में घर पर पेरेण्ट्स के समक्ष शेर बने रहने वाले ऐसे बच्चों में कोई अपने दोस्तों से ही पिट व मर रहा है तो कुछ  बालक या तो अपने से शारीरिक या मानसिक रुप से तगडे लोगों से पिट रहे हैं या फिर कई बार तो वे पुलिस से भी जूते खा रहे होते हैं । अतः नई पीढी के पालक व बालक भले ही इस स्थिति को एक राहत के रुप में देखें किन्तु कहीं न कहीं पालकों की इस नरमदिली के चलते बालकों का दुनियावी प्रशिक्षण अधूरा तो छूट ही रहा है ।

          क्या आपको नहीं लगता कि अपने बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिये इस प्रकार कभी-कभी हो जाने वाली उनकी पिटाई जिसे हम लोग तो अपने जमाने में कुटावडे ही कहते थे, या अभिभावकों के उनके प्रति सख्त तेवर  भलें ही वे पूर्ण सख्ती के नकली किन्तु जीवन्त अभिनय के रुप में ही अपने बच्चे के सामने आते क्यों न दिख रहे हों अंततः बच्चे के हित में ही साबित होते हैं  ?


8.6.11

क्या व्यर्थ है टिप्पणियों की मशक्कत....!


        हमारे दैनंदिनी के भोजन में दाल के महत्व से हम सभी बखूबी परिचित हैं । किसी को ये दाल तडके के बगैर अधूरी लगती है तो किसी को कोथमीर के बगैर । लेकिन महत्व तो दाल का ही होता है । मैंने एक परिचित महिला को कभी यह कहते सुना था कि कोथमीर के बगैर दाल ऐसी लगती है जैसे विधवा की मांग । ठीक यही स्थिति हमारे हिन्दी ब्लाग जगत में किसी भी पोस्ट के सन्दर्भ में टिप्पणियों के बाबद इस रुप में देखने में आती है कि यदि किसी पोस्ट के नीचे टिप्पणियां नहीं दिख रही है तो न लेखक को मजा आता है और न ही पाठक को । दोनों को ही एक प्रकार के अधूरेपन का एहसास होता है । पाठक तो फिर भी पढकर निकल जाते हैं किन्तु लेखक को लगता है जैसे मेरी तो सारी मेहनत ही व्यर्थ हो गई, मैंने इतने जतन से लिखा और किसी भी पाठक की ओर से कोई प्रतिक्रिया ही नहीं मिली ।

            मैं अंग्रेजी ब्लाग्स के अधिक सम्पर्क में नहीं आया हूँ इसलिये कह नहीं सकता कि वहाँ इन टिप्पणियों का क्या और कितना महत्व है किन्तु हिन्दी ब्लाग जगत में तो करीब-करीब हम सभी ब्लागर साथियों की अधिकांश उर्जा अपने ब्लाग व पोस्ट पर टिप्पणियों की मात्रा बढवाने में ही अक्सर उपयोग में आते देखी जाती है । क्या वाकई ये टिप्पणियां हमारी इस ब्लाग-यात्रा को गतिमान बनाये रखने के लिये इतनी ही आवश्यक है जितनी प्रायः हम ब्लागर समुदाय के मध्य देखी, सुनी व पढी जाती है । शायद नहीं...  ये कुछ उदाहरण इस बात को समझ पाने में शायद माध्यम बन सकें ।

            1. परिकल्पना ब्लाग में श्री रविन्द्र प्रतापजी की किसी पोस्ट में कुछ समय पूर्व किसी ब्लाग के सन्दर्भ में यह पढा था कि उन ब्लागर ने अपने ब्लाग पर टिप्पणियों का विकल्प ही बन्द किया हुआ है फिर भी उनका ब्लाग सफलतापूर्वक चल रहा है । ये पोस्ट तारीख के हिसाब से मेरे ध्यान में नहीं आ पाने के कारण मैं उस पोस्ट की लिंक यहाँ नहीं दे पा रहा हूँ । अतः क्षमा...

            2. किसी भी ब्लाग में लोकप्रिय पोस्ट का निर्धारण हम नहीं करते बल्कि हम तो लोकप्रिय पोस्ट का गूगल का बना-बनाया विजेड अपने ब्लाग पर लगा देते हैं फिर पाठक संख्या के आधार पर लोकप्रिय पोस्ट का निर्धारण वह विजेड स्वयं ही करता रहता है । इस मापदण्ड पर मेरे ब्लाग स्वास्थ्य-सुख में सर्वाधिक पढी जा रही टाप 7 पोस्ट में तीसरे क्रम पर मौजूद पोस्ट "सुखी जीवन के सरल सूत्र" को देखकर भी लगाया जा सकता है जिसमें उसके प्रकाशन दि. 16 नवम्बर 2010 से लगाकर आज तक एक भी टिप्पणी नहीं आई है किन्तु वह पोस्ट लोकप्रियता की दौड में निरन्तर उपर की यात्रा तय करते हुए उस ब्लाग पर तीसरे क्रम पर शोभायमान हो रही है ।

            3. हिन्दी ब्लाग-जगत के अधिकांश ब्लागर साथियों के निर्विवाद रुप से सर्वाधिक लोकप्रिय मित्र ब्लागर भाई श्री सतीश सक्सेना जिनकी किसी भी पोस्ट पर औसतन 70 से लगाकर 85-90 व कभी-कभी इससे भी ज्यादा तक की मात्रा में टिप्पणियां अब तक देखी जाती रही हैं उनके ब्लाग मेरे गीत की पिछली दो पोस्ट मैं इस अनुरोध के साथ देख चुका हूँ कि -
अनुरोध  : आपके आने का आभार ...आगे से, मेरे गीत पर कमेन्ट न करने का अनुरोध है , आशा है मान रखेंगे  !  तो क्या हमें यह मान लेना चाहिये कि उनके ब्लाग से पाठक कम हो गये होंगे ?

           शायद ब्लाग्स का प्रोफार्म बनाते समय इसके निर्माताओं ने यह सोचकर टिप्पणी के इस माध्यम के लिये स्थान आरक्षित किया होगा कि यदि किसी पाठक के मन में सम्बन्धित ब्लाग-पोस्ट को पढकर उसके विषय में कोई प्रतिक्रिया यदि उपजे तो वो इस टिप्पणी बाक्स के माध्यम से उसे आसानी से अभिव्यक्त कर उसके लेखक तक अपनी बात पहुँचा सके । जबकि हम इस टिप्पणी बाक्स का उपयोग अक्सर यह दिखाने के लिये करते हैं कि मैंने आपकी पोस्ट पढ ली है अतः आप भी कृपया मेरी पोस्ट पढकर अपनी उपस्थिति का प्रमाण इस टिप्पणी बाक्स के माध्यम से मेरे ब्लाग पर भी दर्ज करें, अथवा मैं किसी की पोस्ट पढूं या न पढूं किन्तु शुरु व आखिर के पैरेग्राफ पर नजर डालकर जैसे भी बने अपनी टिप्पणी अधिक से अधिक ब्लाग्स पर छोड आऊँ जिससे कि मेरे ब्लाग पर भी अधिक से अधिक पाठकों की टिप्पणियां दिखती रह सकें, अथवा अपने ब्लाग पर प्रकाशित पोस्ट की लिंक इस टिप्पणी बाक्स के माध्यम से दूसरे ब्लाग पर छोड आऊँ जिससे कि अधिकतम पाठक उस लिंक के द्वारा मेरे ब्लाग पर आते रह सकें, अथवा ये तेरी मेरी यारी की प्रथा को जीवित रखने के लिये टिप्पणियों की आवक-जावक के क्रम को मैनेज रखने के माध्यम के रुप में इसे पल्लवित-पोषित करता चलूँ ।

           हम किसी भी रुप में टिप्पणियों के इस क्रम को जीवित रखें इसमें कहीं कोई विरोधाभास नहीं है किन्तु यदि दो बातों का इस सन्दर्भ में हम ध्यान रखकर चल सकें तो हमारी बहुत सी उर्जा व तनाव बचाया जा सकता है पहली यह कि सिर्फ टिप्पणी करने के लिये टिप्पणी न करें बल्कि वास्तव में टिप्पणी के माध्यम से उस पोस्ट के सन्दर्भ में लेखक तक कोई बात यदि पहुँचाना हो तो टिप्पणी अवश्य करें और दूसरी यह कि मैंने तो फलां ब्लाग पर टिप्पणी की किन्तु सामने वाले ने मेरे ब्लाग पर टिप्पणी नहीं की इस भावना से किसी भी ब्लाग पर टिप्पणी न करें ।

           वैसे भी टिप्पणी प्रायः पोस्ट प्रकाशित होने के पहले व दूसरे दिन ही अधिकतर चलती है जबकि वह पोस्ट सदा-सर्वदा तब तक जीवित रहती है जब तक कि हम स्वयं उसे हटा न दें जो कि बिना किसी विशेष कारण के कोई भी ब्लागर कभी भी नहीं हटाता, और जैसे हम किसी दुकान पर कुछ खरीदने जाते हैं और वहाँ कुछ और सामग्री भी अपने उपयोग की देखकर खरीदकर ले आते हैं उसी प्रकार किसी भी एग्रीगेटर अथवा सर्च इंजिन के माध्यम से आने वाले पाठक यदि रुचिकर या उपयोगी समझते हैं तो आपके ब्लाग की अन्य पोस्ट भी अवश्य पढते हैं और सर्च इंजिन के माध्यम से आते रहने वाले पाठक तो कभी टिप्पणी लिखने के झमेले में पडते दिखते ही नहीं हैं जबकि जितने ज्यादा पाठक हमारे ब्लाग पर आकर हमारी पोस्ट पढते हैं लोकप्रियता के मापदंड पर हमारा ब्लाग उतना ही आगे आते दिखता चलता है । अतः हम टिप्पणियां अवश्य करें किन्तु उन टिप्पणियों को ही सबकुछ समझकर अपनी तमाम उर्जा उधर ही न लगाते हुए अपनी पोस्ट की सामग्री को अधिक से अधिक रुचिकर व जनोपयोगी बनाये रखने के प्रयास में अपनी उसी उर्जा का उपयोग यदि करते रहें तो भी हमारे ब्लाग की लोकप्रियता को अपना बहुत सा समय व टिप्पणी नहीं मिली के अनावश्यक तनाव से बचाकर भी न सिर्फ लम्बे समय तक जीवन्त बनाये रख सकते हैं बल्कि इस लोकप्रियता को ब्लाग पर आने वाले पाठकों के आंकडों के माध्यम से निरन्तर जांचते हुए भी अपनी इस ब्लाग-यात्रा की निरन्तरता को तुलनात्मक रुप से कम समय में भी सफलतापूर्वक बनाये रख सकते हैं ।

4.6.11

उपलब्धियां : एक अनाडी ब्लागर की....


          इसी ब्लाग पर दि. 4 अप्रेल 2011 को भारत के क्रिकेट वर्ल्डकप में विश्र्वविजेता बनने वाली बधाईयों वाली पोस्ट में "अपना ब्लाग" एग्रीगेटर के श्री योगेन्द्रजी पाल सा. ने मुझे टिप्पणी के मार्फत सूचित किया कि- "आपके लेख चुराए जा रहे हैं, मुझे लगा कि शायद आपको पता ना हो इसलिए जानकारी देने आ गया |" आगे आपने मेरे लिये वो लिंक भी प्रस्तुत की जिस पर इन्होंने मेरी ब्लागपोस्ट को देखा था http://maiaurmerisoch.blogspot.com/2011/04/blog-post_04.html मैंने श्री योगेन्द्रजी को धन्यवाद देते हुए इस लिंक पर जाकर देखा तो पाया कि श्री शशांक मेहताजी ने अपने ब्लाग 'मैं और मेरी सोच' पर मेरे 'नजरिया' ब्लाग पर दि. 3-2-2011 को प्रकाशित मेरी पोस्ट "कच्ची उम्र के ये शरीर सम्बन्ध"  हुबहू चित्र व शीर्षक से साथ शब्दषः प्रकाशित कर रखी थी । मैंने इनके टिप्पणी बाक्स में मेरा विरोध व नाराजी दर्ज की और आकर श्री योगेन्द्रजी को धन्यवाद देकर व अपने ब्लाग से कापी-पेस्ट की सुविधा बाधित कर चुपचाप अपने अगले काम में लग गया । दूसरे दिन मेरे इसी ब्लाग पोस्ट पर श्री शशांक मेहताजी की ये टिप्पणी दर्ज हुई "सुशीलजी सबसे पहले तो मैं अपनी भूल के लिये क्षमा चाहता हूँ. मैं ब्लाग जगत के नियमों से अनजान था इसलिये मुझसे भूल हो गई................"  इसके साथ ही श्री शशांक मेहताजी ने मेरी उस पोस्ट को अपने ब्लाग से डिलीट भी कर दिया था ।

          अब मैं सोचता हूँ कि कितना नासमझ था मैं जो मुश्किल से उपलब्ध ऐसे दुर्लभ अवसर को कुल्लड में गुड फोडने जैसे इस गुपचुप तरीके से उस परिस्थिति में अपने स्तर पर ही इतने सस्ते में निपटा दिया । मैं भी उस समय यदि किसी रौब-दाब वाले स्वयं से वरिष्ठ ब्लागर साथी को अपना निःशुल्क वकील बना लेता तो बाकायदा इस ब्लाग जगत में अच्छा-खासा बवाल भी मचता और समस्त ब्लागर समुदाय पूरी उत्सुकता से देखता समझता कि आखिर माजरा क्या है ?  और मुझे भी सबकी सहानुभूति से उपजे स्नेह सहित कुछ और अतिरिक्त पब्लिसिटी यहाँ मुफ्त में ही मिल जाती, किन्तु मैंने तो इसे यहाँ जाने-अन्जाने सब तरफ घट रही छोटी सी सामान्य घटना मानकर ससुरी पूरी समस्या को ही जंगल में मोर नाचा किसने देखा कि शैली में सारी बात वहीं समाप्त कर दी । यह जुदा बात हे कि वही शशांक मेहताजी अब मेरे तीन में से दो ब्लाग के फालोअर भी हैं ।

          इस ब्लाग जगत में आने के बाद स्वयं की रुचि के अनुकुल मेरी यहाँ कुछ ऐसी धुनी रम गई कि मेरे लिये घर, समाज, उद्यम व दुनिया की समस्त गतिविधियाँ करीब-करीब थम सी गई और कम से कम 5 महिने नियमित रुप से 12 से 15 घंटे रोजाना सिर्फ और सिर्फ इस ब्लागिंग अभियान को गति देने में ही निरन्तर गुजरे । पिछले मई माह में एक शारीरिक समस्या मेरे समक्ष यह आई कि मैं जब भी खडा होकर चलना शुरु करुँ मुझे चक्कर आना प्रारम्भ हो जाएँ, अपने स्तर पर सब प्रयास करके देख लिये लेकिन चक्कर आना बन्द नहीं हुए । फिर इतनी लम्बी अवधि से प्रतिदिन इतने घण्टे रोज इस ब्लागिंग अभियान में हथेली माऊस ही घुमाती रही, नतीजा दाँए हाथ की कलाई में असहजता महसूस होने लगी । दिमाग में ये विचार पुख्ता प्रमाण के रुप में सामने आने लगा कि लेपटाप की चुंधियाती रोशनी से अपनी आँखें बमुश्किल 15"-18" इंच की दूरी पर निरन्तर चल रही है उसके कारण चक्कर आने लगे हैं और सीधे हाथ की कलाई जो एक ऊँगली से 90% टंकण कार्य और यही हथेली जो लगातार माऊस का संचालन कर रही है उसके कारण दाँई हथेली की ये समस्या सामने आने लगी है । तब तक 30 माह सकुशल गुजार सकने वाली HCL Me के नये माडल के मेरे लेपटाप की बैटरी भी बमुश्किल 10 महिने भी गुजारे बगैर काल कवलित हो गई । इस दौरान जितना समय इस लेपटाप के समक्ष कम से कम गुजरा उससे बगैर किसी अतिरिक्त प्रयास के चक्कर आना भी बन्द हो गये और कलाई में भी स्वमेव ही राहतपूर्ण स्थिति स्वयं को महसूस होने लगी ।

          इसी अवधि में इस ब्लाग स्नेह से जुडी कुछ और उपलब्धियां और भी अलग किस्म की सामने आती रही - जैसे-जैसे मेरे नजरिया ब्लाग पर फालोअर्स की संख्या बढती गई वैसे-वैसे इस ब्लाग-जगत के मेरे कुछ शुभचिंतक मित्र मुझसे कन्नी काटते चले गये । शायद उनके दिमाग में एक ही भावना रही हो कि हम तो इतने वर्षों से यहाँ इतने उत्कृष्ट शैली के लेखन में लगे हैं हमारे ब्लाग पर अब तक जितने फालोअर्स नहीं हुए उससे ज्यादा इतना कामचलाऊ लिखने वाले इस बन्दे के ब्लाग पर फालोअर्स इतने कम महिनों में कैसे बढ गये, और ऐसे सभी साथियों के दिमाग में इसका उत्तर भी मौजूद की ब्लागर बनने से सम्बन्धित वो सभी छोटी-छोटी आवश्यकताएँ जिन्हें यहाँ आने वाला हर ब्लागर करीब-करीब जानता ही है को कुछ लच्छेदार शैली में प्रकाशित कर नये ब्लागर मित्रों को बरगलाकर व उन्हें बेवकूफ बनाकर ही मैं अपने ब्लाग पर ये फालोअर्स बढा रहा हूँ, और जबरन सबके सामने मूंछों पर ताव देता दिख रहा हूँ, फिर अब तो हद हो गई एलेक्सा रेंकिंग जैसे श्रेष्ठतम मापदंड पर दसवें क्रम पर इसका ये ब्लाग भी दिखने लगा, तो कहीं तो ये रोष मन में उमडते-घुमडते और कहीं खुलकर अभिव्यक्त होते मेरे सामने आता चल रहा है । कहते हुए सभी पाठक बन्धुओं से क्षमा चाहता हूँ लेकिन सीमित अनुपात में ही सही इस ब्लाग-जगत में अपने कुछ साथियों को मैंने पूर्वागृह के इस दायरे में ही निरन्तर महसूस किया है ।

          एक और समस्या अपने से अधिक बुजुर्ग और नये ब्लागर साथियों में स्वयं के प्रति ये महसूस की कि हम तो असहाय अवस्था में अपनी पोस्ट प्रकाशित कर रहे हैं और टिप्पणियां करना हमारे तो बस में नहीं है, किन्तु मैं उनके ब्लाग पर टिप्पणी क्यों नहीं कर रहा हूँ । जबकि 1500 टिप्पणियां इस नजरिया ब्लाग पर देने की संख्या तक के मेरे सैकडों ब्लागर्स साथियों के ब्लाग-लिंक को मैंने तीन हिस्सों में विभाजित कर अपने तीनों ब्लाग नजरिया, जिन्दगी के रंग और स्वास्थ्य-सुख पर 'मेरे ब्लाग लिंक' माध्यम से सेट करके एक भगीरथी अभियान इस रुप में भी पूर्ण किया है कि मेरे किसी भी टिप्पणीकार साथी की कोई भी पोस्ट प्रकाशित होते ही तत्काल से लगाकर मेरे न पढ पाने की अन्तिम सीमा तक मेरी जानकारी में रहे और मैं अपने ब्लाग पर टिप्पणी देने वाले किसी भी ब्लागर साथी की पोस्ट पर टिप्पणी देकर उनका उत्साहवर्द्धन करना भूल न सकूँ । 
 
          इस दरम्यान इस ब्लाग स्नेह के कारण आर्थिक मोर्चे पर होने वाले मेरे नुकसानों की चर्चा
तो मैं न ही करुँ तो बेहतर है जबकि सामाजिक स्तर पर मेरे इस ब्लाग स्नेह का खामियाजा अपने अत्यन्त नजदीकी रिश्तों में आवश्यकता के समय अपनी मौजूदगी वहाँ दर्ज नहीं करवा पाने की नाराजगी के रुप में मुझे अलग से भुगतना पडा । इसके अतिरिक्त इसी ब्लाग-स्नेह के पूर्व मेरी प्रातःकालीन घूमने व योग वगैरह कर लेने की जो स्वास्थ्यप्रद गतिविधियां अनियमित क्रम में ही सही किन्तु चलती रहती थी उस पर भी पूरी तरह से विराम लग गया । 
 
          तो इस ब्लाग-स्नेह की ये कीमतें सामूहिक रुप से पिछले महीनों में लगातार मैंने  चुकाई हैं और बदले में अपने ब्लाग-जगत के मित्रों के पर्याप्त स्नेह के बावजूद भी कुछ प्रतिशत मित्रों से इस आधार पर बन रही इन अनजान दूरियों को भी मानसिक स्तर पर  निरन्तर भुगता है अतः मस्तिष्क इस दिशा में स्वयं को ये सोचकर अधिक सहज महसूस कर रहा है कि -

और नहीं बस और नहीं....

          किन्तु रुकिये, पूर्व इसके कि आप मेरी इस पोस्ट को इस हिन्दी ब्लाग जगत से मेरे  स्थायी सन्यास के घोषणा-पत्र के रुप में समझें मैं ये स्पष्ट कर दूँ कि अपने स्वान्त सुखाय के चलते जहाँ मैंने अपने हजारों घंटे लगातार गुजारे हों वहाँ स्थायी सन्यास भी ऐसी ही चाहत उपजने पर भले ही ले लूँ, फिलहाल तो ये सन्यास इतना ही रहेगा कि अब तक जहाँ ये ब्लागिंग मेरे लिये सबसे पहली पायदान पर और शेष दुनिया की समस्त आवश्यकताएँ बाद के क्रमों में चल रही थीं वहीं अब समस्त दुनियावी आवश्यकताओं को प्राथमिक क्रम पर रखने के बाद ही  बचा हुआ समय मैं इस ब्लाग स्नेह को देना चाहूँगा जिससे न सिर्फ उपरोक्त सभी समस्याओं का क्रमशः निदान होता चला जावेगा, बल्कि ऩए फालोअर्स के बढते रहने का क्रम थम जाने के साथ ही एलेक्सा रेंकिंग से भी मेरे उस समर्पण की कमी के कारण जिसके चलते मेरा ये ब्लाग वहाँ भी दिखने लगा है, वहाँ से भी स्वमेव ही ये खिसकते-खिसकते बाहर हो जाएगा । इस प्रकार अपने ऐसे साथियों के मन में मेरे प्रति उपजते इस अबोलेपन की महसूसियत से भी मुझे मुक्ति मिलती चली जावेगी । यद्यपि तब भी मुझे अप्रत्यक्ष रुप से यह तो सुनना ही है कि देखा- जोड-तोड करके ऊपर पहुँच जाना अलग बात थी और बगैर किसी योग्यता के वहाँ लगातार टिके रहना बिल्कुल अलग । किन्तु ऐसे आरोप का भी मैं सामना कर लूंगा ।
 
          चलते-चलते अपनी आदत के मुताबिक एक निवेदनात्मक सुझाव और भी-    

          वे सभी ब्लागर साथी जो ये मानते हों कि इस ब्लाग-जगत में ऐसी उपलब्धियों पर पहला हक हमारा बनता है, मेरा छोटा सा सुझाव मात्र यही है कि वे भी अपने इस ब्लाग-स्नेह अभियान में पूरी तरह डूबकर,  समस्त दीन-दुनिया को भुलाकर उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते अपने ब्लाग की नई पोस्ट के लिये निरन्तर जनरुचि के मुताबिक विषय तलाशते हुए, उन्हें रुचिकर शैली में सहजगम्य रुप से प्रकाशित करने रहने के साथ ही, टिप्पणियों के रुप में स्वयं को अधिक से अधिक ब्लागर साथियों से रुबरु करवाते हुए, हर सम्भव तरीके से अपने ब्लाग पर ट्रेफिक बढवाते रहने का ईमानदार प्रयास यदि कर पाएँ तो मेरा विश्वास है कि वे भी अपने ब्लाग पर फालोअर्स की बडी संख्या के साथ ही किसी भी रेंकिंग मापदण्डों पर  अपने ब्लाग सहित शायद मुझसे भी कम समय में ऐसे दुरुह दिख सकने वाले लक्ष्यों को सहज ही प्राप्त कर लेंगे । अतः ऐसे सभी इच्छुक साथी हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम की शैली में इस अनवरत अभियान में तत्काल जुट जावें । निश्चित रुप से हिम्मते मर्दा मददे खुदा के ब्रह्म सूत्र पर वे भी शीघ्रातिशीघ्र लक्ष्यविजेता के रुप में स्वयं को सहज ही देख सकेंगे । 

          शेष मेरे सभी पाठकों के मेरे प्रति अब तक के स्नेहिल व्यवहार के लिये अनेकों धन्यवाद सहित...


31.5.11

आशीर्वाद दिवस...


 मंगलवार 31 मई 2011

हमारे पोते आर्जव का प्रथम






तुम जियो हजारों साल




साल के दिन हों पचास हजार...




शुभाशीष प्रदाता-

दादा-दादी, पापा-मम्मी, बडे पापा-मम्मी, भूआ-फूफाजी, 

और बडे भईया-

हर्षल सक्षम

शुभकामना समारोह में आप भी नन्हें मुन्नों के साथ सादर आमन्त्रित हैं... 


27.5.11

जल्दबाजी का भूत...!

          कंवर सा. कल शाम को अपन एक सप्ताह की यात्रा पर चल रहे हैं, 18 सीटर मेटाडोर का मैंने इन्तजाम कर लिया है, 14 टिकिट आपके परिवार को मिलाकर सामने हैं यदि और कोई चलने वाला आपकी नजर में हो तो उसे भी ले लेना, मैं भी मेरी तरफ से देख लेता हूँ नहीं तो अपने परिवार के 14 लोग ही आराम से चलेंगे । कोई प्री-प्लानिंग नहीं, पहले से कोई सूचना नहीं बस आप तो चलो । मैं उनकी इस जल्दबाज शैली से तब तक बखूबी परिचित हो चुका था, और मार्केटिंग स्तर पर स्वयं अपना काम  करने के कारण कहीं छुट्टी लेने जैसी कोई समस्या भी नहीं थी लिहाजा बच्चों के स्कूल में आवश्यक एप्लीकेशन देकर व अपने दो-चार क्लाईन्ट्स को उनके काम के प्रति आश्वस्त कर उनके साथ निकलने के लिये समयानुसार सपरिवार तैयार हो गया । ये परिचित शख्स मुझसे उम्र में थोडे ही बडे मेरे काका श्वसुर थे । उस समय हमारे साथ 10 से भी अधिक छोटे बच्चे उस यात्रा में थे ।
 
           नीयत समय पर सब यात्रा के लिये निकल पडे । कहीं 12, कहीं 15 तो कहीं 20-20 घंटे की त्रस्त कर देने वाली यात्रा करके ग्रुप कहीं भी पहुँचें और पहुँचते ही उनका जल्दी का टेप चालू हो जावे । चलो जल्दी करो, आगे वहाँ चलना है । तीसरे-चौथे दिन तक तो उनकी उस जल्दबाज शैली से सभी हलकान हो उठे । आखिर बच्चों ने शिकायत के लिये मुझे ही पकडा - जीजाजी आप पापा को बोलो कि जहाँ भी आएँ वहाँ तसल्ली से घूमने-फिरने तो दें । जब मैंने भी बेहद विरोधसूचक शैली में सभी बच्चों व महिलाओं की भावनाओं से उन्हें अवगत करवाते हुए उनकी उस जल्दबाज शैली का विरोध किया तो मजबूरी में वे ये कहते हुए मान तो गए कि - कंवर सा. मैं तो ये सोच रहा था कि अपन दो-चार जगह और इसी समय में घूम लेंगे लेकिन बेहद अनमनेपन से वे आगे की यात्रा में सभी यात्रियों की भावना के अनुरुप समय तक रुक पाए ।

          इन साहब का मण्डी में दलाली का काम था और हर समय जल्दी की मानसिक गिरफ्त में रहने के कारण इनकी सहज मलत्याग की प्रवृत्ति बाधित होते-होते ये पहले कब्ज की गिरफ्त में आकर बाद में ब्लड-प्रेशर की समस्या से घिरे हुए थे । प्रतिदिन ब्लडप्रेशर कन्ट्रोल में रखने की गोली लेना इनकी बाध्यता थी, एक दिन गोली लेने के आधे घण्टे में स्वयं को सहज नहीं महसूस कर पाने के कारण एक गोली और ले ली जिसके कारण दो-चार घण्टे बाद हास्पीटल में एडमिट होना पडा, जहाँ पता चला कि रोजाना बढ जाने वाला उनका ब्लड-प्रेशर (इसके बारे में विस्तृत जानकारी यदि आप लेना चाहें तो हाई ब्लड-प्रेशर (उच्च रक्तचाप) से बचाव ये पोस्ट माउस क्लिक करके देखें) उस दिन वैसे ही घटा हुआ था और अपनी जल्दबाज प्रवृत्ति के चलते ये एक नहीं बल्कि दो-दो गोली ब्लड प्रेशर घटाने की और ले चुके थे । अतः उस दिन का सूरज उनकी जिन्दगी में देखा जाने वाला अन्तिम सूरज साबित हुआ और महज 48 वर्ष की उम्र में जितनी जल्दी उन्हे हमेशा रहती थी उतनी ही जल्दी वे इस दुनिया से कूच भी कर गये ।
 
          एक अन्य रिश्तेदार जो अजमेर में रहते हैं उन्हें भी मैंने अक्सर बेहद जल्दबाजी में ही देखा । एक दिन खबर आई कि उनकी कार का एक्सीडेंट हो गया है और उनका चौथे नम्बर का छोटा भाई जो उनके साथ आगे की सीट पर बैठा था उस एक्सीडेंट में वह अपनी विद्यार्थी उम्र में ही कण्टक्टर साईड से होने वाले उस एक्सीडेंट की भेंट चढकर शहीद हो गया था । उनके अंतिम संस्कार में मैं ही अजमेर जब पहुँचा तो उस ह्रदयविदारक शोकसंतप्त माहौल में वे रह-रहकर उस मृतक भाई को याद करके चिल्लाते दिख रहे थे हाए सुशील (संयोगवश उस भाई का यही नाम था) मेरे कारण तेरी जान चली गई । ईश्वर ही जाने अभी उनकी वो मानसिक जल्दबाजी समाप्त हुई या घटी या नहीं.

          मल्टीलेबल मार्केटिंग कम्पनी में कार्यरत मेरे एक अति महत्वाकांक्षी साथी भी इस समय मेरे जेहन में आ रहे हैं जिन्हें उन्नति करने की ऐसी ही जल्दबाजी रहती थी । जब ये कम्पनी हमारी अपेक्षाओं को पूर्ण नहीं कर पाई तो इन्होंने पहले लोडिंग रिक्शा खरीदा, फिर अपने सम्पर्कों के चलते एक और लोडिंग रिक्शा खरीदकर किराये पर चलवा दिया और फिर जल्दी ही दोनों रिक्शा किराये पर सौंपकर और अधिक लाभ के लिये बडी मेटाडोर खरीदकर उस पर दिन रात अधिक से अधिक दौड लगाने लगे. निरन्तर काम का बढता दबाव और पर्याप्त नींद न ले पाने के कारण एक रात 2.30 बजे के लगभग उज्जैन से इन्दौर आते समय एक्सीडेण्ट कर बैठे और उनकी जीवन-यात्रा भी फिर उससे आगे नहीं बढ सकी ।
 
          जल्दबाजी के ये और इस जैसे अनेक उदाहरण तो वे हुए जिनसे मेरा वास्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से पडता रहा और इसके दुष्परिणाम समय-समय पर मेरे देखने में आते रहे । लेकिन सार्वजनिक रुप से जल्दी से जल्दी किले फतह करने वाले कुछ और उदाहरणों की यदि हम बात करें तो शेअर बाजार में जल्दी से जल्दी सही गलत सभी हथकण्डे अपनाकर सारी दुनिया की दौलत अपने कब्जे में कर लेने की सोच रखने वाले हर्षद मेहता का उल्लेख किया जा सकता है जिसके कारनामों के कारण उस पर भरोसा करने वाले पदाधिकारियों की दो बैकें एक समय फैल हो गई थी और लाखों लोग अपनी बैंक जमा राशि से भी हाथ धो बैठे थे । यद्यपि बीच में इनकी कारों का काफिला और घीरुभाई अंबानी के आफिस की बिल्डिंग में ही मौजूद इनका बडा सा आफिस घीरुभाई अंबानी से भी अधिक ऐश्वर्यपूर्ण लगने लगा था । किन्तु अपनी जल्दबाज उपलब्धियों के चपेटे में बैंक व शेअर बाजार के अनेकों ग्राहकों को अकाल फाँसी लगवा देने वाले यही हर्षद मेहता शीघ्र ही कानून की गिरफ्त में फंसकर और बीमारियों के आक्रमण से घिरकर 45-50 वर्ष की मध्य उम्र में ही दुनिया से रुखसत हो लिये थे ।
 
          फिर हमारे देश की महान राजनैतिक पार्टी रही कांग्रेस आई की अन्तर्राष्ट्रीय शख्सियत संजय गांधी जिन्हें सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे का वाली शैली में देश की जनसंख्या और देश के अल्पसंख्यक वर्ग को जल्दी से जल्दी देश से खदेड देने का जुनून चढा था जिसके चलते 1975-77 के इमरजेंसी काल में हजारों लोगों की जबरिया नसबन्दी करवा देने और रातों रात उस अल्पसंख्यक वर्ग की पचासों बस्तियों पर बुलडोजर चलवा देने की महारथ के चलते वे भी अपनी जल्दबाज शैली के मुताबिक ही प्लेन में बैठकर जल्दी से दुनिया से रुखसत हो लिये थे । हमारे क्षेत्र में इसी पार्टी के इनके एक परम अनुयायी नेता जिनके नाम का मैं उल्लेख नहीं कर रहा हूँ उनका भी यही रेकार्ड रहा - साम, दाम, दण्ड, भेद की नीतियों पर चलते अपने सामने दिखने वाली हर खुबसूरत लडकी को अपनी अंकशयिनी बनालूँ, दसों दिशाओं से अपने सामने दिख सकने वाली सारी दौलत अपने कब्जे में करलूँ, और अपने राजनैतिक आकाओं को हर समय प्रसन्न भी रख लूँ कि फटाफट शैली में जल्दी-जल्दी पार्षद व विधायकगिरी की यात्रा तय करते हुए संजय गांधी की दुनिया से रुखसतगी के बमुश्किल चंद दिनों बाद ही एक मोटरसायकल एक्सीडेंट में ये भी चपेटे में आ गये और लगभग एक सप्ताह जीवन-मृत्यु के बीच कोमा में संघर्षरत रहकर ये भी अपने आका से मिलने उनके पास ही पहुँच गये । क्षेत्र की जनता तो "मरने वालो कसो भी थो पन गरीबां के तो वो नी सतायो" की शैली में उनकी याद करके रह गई पर सुनते हैं उन्हें उपर भी अपने आका संजय गांधी से इसलिये डांट खानी पडी की क्यों रे भैया यहाँ तक आने में इतनी देर कैसे करदी ? जिसका जवाब उन्होंने बडी मासूमियत से अपने आका को यही दिया कि दादा आप तो प्लेन से आ गये थे, मैं मोटर सायकल से आया हूँ तो इतनी देर लगना तो लाजमी था ही । 
 
          कभी दो कहानियाँ मेरे पढने में आई थी - एक में दो लकडहारे थे जिन्हें पेड काटने का काम पडता रहता था, इनमें से एक काम दिखते ही पेड काटने में भिड जाता था और पसीना बहाते-बहाते जितना भी समय लगे अपने काम में पिला रहता था जबकि दूसरा लकडहारा आठ घण्टे का काम जब सामने देखता तो इत्मिनान से छः घण्टे अपनी कुल्हाडी की धार तेज करने में लगाता और शेष दो घण्टे में उस तीक्ष्ण धारदार कुल्हाडी से सामने मौजूद वृक्ष को काट लेता था । दूसरे सफल व्यक्ति के उदाहरण में जब पत्रकारों नें उससे पूछा कि आपने इतने कम समय में इतनी सफलता हासिल की इसका राज क्या है ? तब उस व्यक्ति का जवाब था कि मैं लक्ष्य सामने रखकर आवश्यकता के मुताबिक दौड लगाता हूँ फिर इत्मिनान से सुस्ताते हुए अपनी उपलब्धियों का जायजा लेता हूँ और यदि मुझे अपनी कार्यप्रणाली में कहीं कोई बदलाव आवश्यक लगता है तो उसकी रुपरेखा का निर्धारण भी उस सुस्ताने के क्रम में ही कर लेता हूँ तत्पश्चात् फिर दौड लगाने लगता हूँ । 

          कुछ नहीं से सब कुछ पाने तक की अपनी इस जीवनयात्रा (जिसमें स्वयं का स्थायित्व, विवाह बाद की जिम्मेदारियां, तीन बच्चों का लालन-पालन, उनकी शिक्षा, विवाह व उनके स्थायित्व से सम्बन्धित अपना योगदान, इस दरम्यान स्वयं का मकान, दोपहिया व चार पहिया वाहन व जीवन के लिये आवश्यक अन्य भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति) में भले ही मुझे भी 15-15 घंटे से अधिक व्यस्त रहना पडा हो किन्तु अनावश्यक जल्दबाजी कभी मस्तिष्क पर हावी नहीं हुई बल्कि ये सोच सदा रही कि जिस काम में जो समय लगना है वो तो लगना ही है । उसके बाद भी मुझे ये कभी नहीं लगा कि समय की कमी के कारण जो कुछ मैंने पाना चाहा हो उसे मैं हासिल नहीं कर पाया हूँ जबकि इसके विपरीत इन जल्दबाज व्यक्तियों की न सिर्फ उपलब्धियों का दायरा असीमित होते हुए भी सीमित दिखा, बल्कि न ये अपनी जिन्दगी सुकून से जी पाए और न ही स्वयं के कमाये हुए धन व साधनों का स्वयं के लिये कोई आनन्द या उपभोग कर पाये । 

          ऐसे में यह प्रश्न तो सहज रुप से मन में उठता है कि  लगभग हर चौथे-पांचवें व्यक्ति में देखी जाने वाली ये जल्दबाजी
क्या वास्तव में आवश्यक है ?



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