15.11.19

जाने कैसे लोग थे वो...?




        इन दिनों वॉट्सएप पर एक मैसेज चलन में बना हुआ है जिसमें वर्षों बाद उन्नति के ऊंचे शिखर पर स्थापित एक छात्र अपने पूर्व प्रोफेसर से मिलने पर उसका धन्यवाद करते हुए कहता है कि सर आज मैंने जो कुछ भी हासिल किया है वो आपकी उस एक दिन की उदारता का परिणाम है जब मैंने क्लास में आपके पीरियड के पूर्व कुछ विशेष मजबूर परिस्थिति में अपने एक साथी की घडी चुरा ली थी और आपके समक्ष शिकायत आने के बाद आपने सभी छात्रों की आँखों पर पट्टी बंधवाकर सबकी तलाशी लेते हुए मेरी जेब से वो घडी निकालकर उस छात्र को लौटा दी थी । मैं अगले कुछ दिनों डर के कारण सो भी नहीं पा रहा था कि आप मेरी उस कमजोरी का जिक्र स्कूल में करवाकर मुझे बदनाम कर देंगे और तब मेरे सामने शर्म के कारण मर जाने के अलावा दूसरा कोई मार्ग नहीं बचेगा । किंतु आपने कभी किसी के भी सामने मेरी उस कमजोरी का जिक्र न करके मुझे सार्वजनिक रुप से बेइज्जत होने से बचा लिया और अपनी उसी आत्मग्लानि से पीछा छुडाने की लगातार कोशिश में मैं अपनी योग्यताएँ बढाते हुए आज यहाँ तक पहुँच पाया । मेरी जिन्दगी पर आपका ये ऐसा कर्ज है जिसकी जीते-जी मैं कभी भरपाई कर ही नहीं सकता ।

        प्रोफेसर ने उस पूर्व छात्र से पूछा – अच्छा तो क्या वह तुम थे ?  छात्र ने जब आश्चर्य से पूछा कि मेरी जेब से आपने ही वो घडी निकाली और आप पूछ रहे हैं कि क्या वो मैं था, इसका क्या  मतलब  हुआ ? तब उन प्रोफेसर ने बताया कि दरअसल उस दिन क्लास में सबकी आँखों पर पट्टी बंधवाने के बाद मैंने भी अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली थी, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरी नजरों में भी उस छात्र की जिसने न जाने किन परिस्थितियों में वो घडी चुराई होगी, उसकी इज्जत तनिक भी कम हो, और वो भूतपूर्व छात्र अपनी सारी प्रतिष्ठा भूलकर रोते हुए उन प्रोफेसर महोदय के चरणों में गिर पडा ।

       साथियों ये कहानी यहाँ मैंने क्यों उद्धृत की अब उसका भी कारण जानिये- वर्षों पूर्व मेरे अपने छात्र जीवन में मेरा एक अभिन्न मित्र जो आठ भाई-बहनों से भरे-पूरे निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में सातवें नंबर पर 13-14 वर्ष की उम्र का रहा होगा और अभावग्रस्त परिवार में रहने के कारण न सिर्फ अपने पिता से बल्कि बाकि सब बडों से भी निरन्तर प्रताडित होता रहता था, वो अपनी 6ठी या 7वीं की क्लास में मुश्किल से दिलवाई गई तीन किताबों की एक ही जिल्द बनवाकर लाया था और दुर्भाग्यवश उसकी वही सजिल्द तीन किताबों की मिश्रीत किताब स्कूल में किसी ने चुरा ली ।

        एक साथ तीनों किताबों के गुम हो जाने की खबर घर में मालूम पडने पर बहुत ही पिटाई होगी इस डर से उसने मध्यांतर में किसी दूसरे छात्र की उन तीन में से एक किताब चुरा ली अब कोढ में खाज ये कि तत्काल उस दूसरे छात्र को अपनी किताब चोरी हो जाने की जानकारी लग गई और उसने क्लास में मौजूद शिक्षक से उस किताब के चोरी हो जाने की शिकायत कर दी ।

        शिक्षक ने उसी छात्र से अन्य सभी छात्रों के स्कूल बैग व डेस्क की तलाशी लेने को कहा । मेरे अभागे मित्र के पास वो किताब बरामद हो गई और उसके बाद उन शिक्षक महोदय ने सबके सामने न सिर्फ उसकी जबर्दस्त पिटाई की बल्कि स्कूल से निकलवा देने की धमकी देकर माफ करवाने के एवज में उसे अपने पीरियड की दूसरी सभी क्लासों में लेकर गया और जहाँ-जहाँ जो-जो चोरियां हुईं वो सब भी स्कूल से न निकलवाने का लालच देते हुए उसी से कबूलवाई, उस वक्त जिनकी कोई चोरी नहीं हुई थी वे भी छात्र अपनी शिकायतें लेकर खडे होते गए और 40 से अधिक किताबों की चोरी मेरे उस मित्र के नाम करवाकर सगर्व उन शिक्षक महोदय ने उसे प्रिंसिपल के समक्ष ले जाकर खडा कर दिया ।

        प्रिंसिपल सर ने दूसरे दिन अपने पिताजी को लेकर आओ के आदेश के साथ उस मित्र को घर रवाना कर दिया, तब तक स्कूल की छुट्टी भी हो चुकी थी और बहुसंख्यक छात्रों का समूह चोर है, चोर है के नारे लगाता उस मित्र के पीछे पड गया । शर्मिंदगी के कारण वो मित्र अपने घर भी नहीं गया और मुंह छिपाकर घर से भी भाग गया ।

        आगे की कहानी बताने की आवश्यकता ही नहीं है, इसलिये कि उसके बाद उस मित्र का आगे का सारा जीवन पगडंडियों पर चलते ही बीता । इस घटना के सात वर्ष बाद पुनः उसमें आगे पढने की लालसा जागी, उसने प्रायवेट परीक्षाएं देकर अगले दो-तीन वर्ष पठाई नियमित रखने की कोशिश भी की किंतु लंगडा घोडा कहाँ तक दौड पाता । आज भी वो मित्र मिलता रहता है जिसके साथ यदि उस समय ये दुर्घटना नहीं हुई होती तो वो भी अपने भाई-बहनों के समान उच्च शिक्षित अवस्था में अपना जीवन अधिक व्यवस्थित रुप में गुजार रहा होता ।

        काश !  उस समय उस शिक्षक ने स्वयं को प्रिंसिपल के समक्ष विजेता दिखाने के लोभ से बचकर उस मासूम छात्र के साथ रहमदिली दिखाई होती । तो...

        इस कथासार की शुरुआती कहानी कई बार वॉट्सएप पर सामने से गुजरी किंतु आज जब इसी कहानी पर मशहूर प्रणेता उज्जवल पाटनी का वीडिओ भी देखा तो जेहन में उस समय की ये घटना बिजली के समान कौंध गई और उसे मैंने यहाँ प्रस्तुत कर दी । शायद किस्से-कहानियों की जिंदगी और वास्तविक जिंदगी में यही अन्तर होता है ।



10.11.19

एक नया ज्ञान – हमारे व्यवहार पर...



       अपने सामाजिक, पारिवारिक व कारोबारी जीवन में जो हम जो कुछ भी कार्य-व्यवसाय, सम्बन्ध, सम्पत्ति बना व कमा पाते हैं उनमें हमारी बहुत सी योग्यताओं व क्षमताओं के साथ एक और योग्यता सर्वोपरी स्थान हासिल करती है वह है हमारा रवैया या व्यवहार या अंग्रेजी में कहें तो एटिट्यूड, इस एटिट्यूड का महत्व एक और दिलचस्प तरीके से हमारे सामने आया है । आप भी इसे देखें-


       जीवन के एक शानदार गणितिय सिद्धांत को यहाँ देखें,  समझें  और इसपर चिंतन करें । यदि अंग्रेजी वर्णमाला के 26 अक्षरों को हम 1 से 26 तक का क्रम दें-ऐसे

A, B, C, D, E, F, G, H, I, J, K, L, M, N, O, P, Q, R, S, T, U, V, W, X, Y, Z =
1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19, 20, 21, 22, 23, 24, 25, 26

यानी A to Z का मान इस प्रकार लें जिसमें-
A=1,  B=2,  C=3,  D=4,  E=5,  F=6,  G=7,  H=8,  I=9,  J=10,  K=11,  L=12, M=13,  N=14,  O=15,  P=16,  Q=17,  R=18,  S=19,  T=20,  U=21,  V=22, W=23, X=24, Y=25, Z=26 हो

तो...
Hard Work:
H+A+R+D+W+O+R+K=
8+1+18+4+23+15+18+11= 98%

Knowledge:
K+N+O+W+L+E+D++E=
11+14+15+23+12+5+4+7+5= 96%

Luck:
L+U+C+K=
12+21+3+11= 47%

       यानी इनमें से कोई भी 100% स्कोर नही कर सकता,  तो फिर वह क्या है जो 100% कर सकता है ?

       Money  नही, यह, 72% है

       Leadership ?  जी नही, यह भी सीर्फ 97% ही है ।   तब ?  इसे भी क्लिक करके देखें...सफलता के सात सूत्र... धन्यवाद.


      सभी समस्याओं का समाधान करना संभव हैयदि हमारा एक परफेक्ट ATTITUDE या व्यवहार हो । जी हां,  सिर्फ हमारा ATTITUDE  ही है जो हमारे जीवन को 100% सफल कर सकता है ।

A+T+T+I+T+U+D+E=
1+20+20+9+20+21+4+5= 100 %

आपके लिये अन्य उपयोगी पोस्ट लिंक - कृपया क्लिक करके देखें

सकारात्मक या नकारात्मक...?

मनोस्थिति : सुख या दु:ख...

निरन्तरता का महत्व. (लघुकथा)


       अतः यदि किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति में हमें कहीं कोई रुकावट दिखे तो हमें सिर्फ अपना व्यवहार बदलने की आवश्यकता है, यकीनन तब हम अपने उद्देश्य में अवश्य ही सफल हो जायेंगे । 

गणितीय संख्या का एक और उदाहरण यहाँ देखें-
अविश्वसनीय और अकल्पनीय...


7.11.19

जनसेवा - जीवनसेवा का अपना-अपना तरीका...

       बात कुछ पुरानी है, चिकित्सा के क्षेत्र में इन्दौर के एक सिद्धहस्त चिकित्सक के पास शहर से लगभग 100 कि. मी. दूर के किसी गांव से एक बीमार-वृद्ध महिला का पोस्टकार्ड आया, लिखा था- डॉ. साहेब बीमारी के कारण मैं भयंकर तकलीफ में अपना समय गुजार रही हूँ, मेरे लिये ये सम्भव नहीं है कि मैं आपको दिखाने शहर तक आ सकूँ । निवेदन है कि यदि कभी आपका इधर से गुजरना हो तो आप मुझ गरीब को भी थोडा समय अवश्य देने की कृपा करें और वे मशहूर व व्यस्त चिकित्सक अपने सभी अपॉइन्टमेंट समायोजित कर स्वयं की कार लेकर उस वृद्धा के गांव पहुँच गये । मरीजा की हालत बिस्तर से उठने लायक भी नहीं थी, जाँच के दरम्यान महिला को मुंह में कफ आगया, जिसे थूकने के लिये वह इधर-उधर देखने लगी, तब उन्हीं डॉक्टर साहब ने उस महिला के मुंह के समक्ष अपना हाथ रखते हुए उसे अपनी हथेली में ही उस कफ को थूक लेने की सुविधा प्रदान की । इसे भी देखें...प्रेरक प्रसंग- दरियादिली धन्यवाद.

       ऐसी सेवा-भावना वाकई दुर्लभ है, किन्तु विलुप्त नहीं हुई है, भारत देश के ऐसे वास्तविक हीरो प्रायः जनसामान्य के सामने भी नहीं आ पाते किन्तु उनके द्वारा किये जाने वाले सेवाकार्य दस-पच्चीस से होते हुए हजारों लाखों लोगों के लिये कई बार निरन्तर उपयोगी बने रहते हैं । लोगों के आवागमन में सुविधा के उद्देश्य को दिमाग में रखकर दशरथ मांझी ने पूरे पहाड को काटकर रास्ता बना देने में अपनी जिंदगी खपा दी, ऐसे ही कुछ रियल हीरो और उनके सेवाकार्यों को यहाँ भी देखिये...
            





       हमारे आस-पास के माहौल में भी ऐसे छुपे हुए चेहरे प्रायः देखने में आ ही जाते हैं- प्रस्तुत उदाहरण एक लाभार्थी महिला द्वारा-
       ऑफिस के लिये बस से आती जाती एक महिला के अनुसार- उस दिन बस लगभग आधे-पौन घंटे देर से आई । खड़े-खड़े पैर दुखने लगे थे, पर बस मिल गई । देर से आने के कारण पहले से ही बस काफी भरी हुई थी । बस में चढ़ कर मैंनें चारों तरफ नज़र दौडाई तो पाया कि सभी सीटें भर चुकी थी । उम्मीद की कोई किरण नज़र नही आई । तभी एक मजदूरन ने मुझे आवाज़ लगाकर अपनी सीट देते हुए कहा, "मैडम आप यहां बैठ जाएँ ।" मैंनें उसे धन्यवाद देते हुए उस सीट पर बैठकर राहत की सांस ली । वो महिला भी मेरे साथ बस स्टाप पर ही खड़ी थी मैंने जिस पर ध्यान नही दिया था । कुछ देर बाद मेरे पास वाली सीट खाली हुई, मैंने उसे बैठने का इशारा किया, तब उसने एक ऐसी महिला को उस सीट पर बिठा दिया जिसकी गोद में छोटा बच्चा था । वो मजदूरन भीड़ की धक्का-मुक्की सहते हुए एक पोल को पकड़कर खड़ी थी । थोड़ी देर बाद बच्चे वाली औरत अपने गन्तव्य पर उतर गई । इस बार उसने वही सीट एक बुजुर्ग को दे दी, जो लम्बे समय से बस में खड़े थे । मुझे आश्चर्य हुआ कि हम दिन-रात बस की सीट के लिये लड़ते हैं, और ये सीट मिलने के बाद दूसरे को दे रही है ।

       कुछ देर बाद वो बुजुर्ग भी अपने स्टांप पर उतर गए,  तब वो सीट पर बैठी । मुझसे रहा नही गया,  तो उससे पूछ बैठी,  "तुम्हें तो तीन बार सीट मिल गई थी फिर तुमने बार-बार सीट क्यों छोड़ी ? तुम दिन भर ईंट-गारा ढोती हो,  आराम की जरूरत तो तुम्हें भी होगी,  फिर क्यो नही बैठी ? इसे भी देखें...बुरे विचारों से बचें. धन्यवाद.

       मेरी इस बात का जो जवाब उसने दिया उसकी उम्मीद मैंने कभी नही की थी । उसने कहा, "मैं भी थकती हूँ । आपके पहले से स्टाप पर खड़ी थी,  मेरे भी पैरों में दर्द होने लगा था । जब मैं बस में चढ़ी तब यही सीट खाली थी । मैंने देखा आप पैरों की तकलीफ के कारण धीरे-धीरे बस में चढ़ी । ऐसे में आप कैसे खड़ी रहती, इसलिये मैंने आपको सीट दे दी । उस बच्चे वाली महिला को सीट इसलिये दी क्योंकी उसकी गोद का छोटा बच्चा बहुत देर से रो रहा था । उसने सीट पर बैठते ही सुकून महसूस किया । बुजुर्ग के खड़े रहते मैं कैसे बैठती, सो उन्हें दे दी । मैंने उन्हें सीट देकर ढेरों आशीर्वाद पाए । कुछ देर का सफर है मैडमजी,  सीट के लिये क्या लड़ना । वैसे भी सीट को बस में ही छोड़ कर जाना हैं,  घर तो नहीं ले जाना ना । मैं ठहरी ईट-गारा ढोने वाली,  मेरे पास क्या है,  न दान करने लायक पैसे हैं,  न कोई पुण्य कमाने लायक करने को कुछ । रास्ते से कचरा-पत्थर हटा देती हूं,  कभी कोई पौधा लगा देती हूं । यहां बस में अपनी सीट दे देती हूं । यही है मेंरे पास, यही करना मुझे आता है ।" वो तो मुस्करा कर चली गई पर मुझे आत्ममंथन करने को मजबूर कर गई ।

       मुझे उसकी बातों से एक सीख मिली कि हम बड़ा कुछ नही कर सकते  तो क्या ? समाज में एक छोटा सा,  नगण्य दिखने वाला कार्य तो कर ही सकते हैं । मुझे वो मज़दूर महिला उन सभी लोगों को एक सबक के रुप में दिखी जो समाजसेवा के नाम पर बाते तो बड़ी-बड़ी बातें कर लेते हैं किन्तु वास्तव में कभी कुछ नहीं करते ।मैंने मन ही मन उस महिला को नमन किया तथा उससे सीख ली कि यदि हमें समाज के लिए, लोगों की भलाई के लिये कुछ करना हो,  तो वो दिखावे के लिए न हो, बल्कि खुद की संतुष्टि के लिए हो । 
       चलते-चलते इनके भी सेवाकार्य पर एक नजर डाल लें..


5.11.19

कितने घातक ऐसे फेसबुकी फ्रेंड...



       फेसबुक की उपयोगिता व इसका खुमार सामान्यजन के जीवन में जिस तेजी से फैल रहा है चलते-फिरते इंटरनेट युक्त स्मार्टफोन के इस युग में ये किसी से छुपा नहीं है । नित नए मित्रों को बढाते चले जाने वाले इन मित्रों में कौन किस प्रवृत्ति और नियत से हमसे जुडा है, ये हम जान नहीं पाते । किंतु लाईक व कमेन्ट्स की चाह यहाँ हमारे क्रियाकलापों पर हॉवी रहती है । लडके-लडकियों की आपसी मित्रता फेसबुक पेज से इसके मैसेंजर पर आकर पहले चेटिंग फिर फोन संपर्क के माध्यम में परिवर्तित होते हुए नितांत अंतरंगता के दायरे में पहुँच जाती है जहाँ कई बार युवतियां ब्लेकमेल का शिकार होती भी दिखती रही हैं ।

        इस पर प्रकाशित लाईव स्टेटस के दुरुपयोग में कभी किसी का छोटा बच्चा अपह्रत हुआ, तो कभी सपरिवार यात्रा के दौरान किसी का चोरों द्वारा पूरा घर साफ कर जाने जैसे वाकये तो देखने-सुनने में आते रहे हैं, लेकिन मूर्ख बनाकर सम्पन्न परिवार के खजाने खाली करवा देने वाला एक ताजा प्रसंग मासिक पत्रिका सत्यकथा में देखने में आया, उसके मुताबिक-

      छत्तीसगढ राजनांदगांव के पारा कस्बे में निवासित सुनिता आर्य ने स्मार्टफोन की मदद से इस आभासी दुनिया में नया कदम रखा । नये-नये लोगों को मित्र बनाना उसे अच्छा लगने लगा । एक दिन उसके पास डेविड सूर्ययन नामक किसी शख्स की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई, उसकी प्रोफाईल देखने पर वो लंदन में रहने वाला दिखा । प्रसन्नता से उसने फेंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर पति को भी सगर्व उस नई मित्रता के बारे में बताया । काम-धंधे में व्यस्त पति ने पत्नी को प्रसन्ऩ देखकर उसे प्रोत्साहित ही किया और बात आई-गई हो गई । फिर डेविड के साथ सुनीता की चैटिंग बढने लगी, कभी डेविड हिंदुस्तान के बारे में पूछता और कभी लंदन के मुख्य स्थानों की जानकारी देते उसे वहाँ आने को निमंत्रित करता । फोन संपर्क पर भी वो आने लगे और डेविड सुनीता को बहनजी कहते हुए बडे सम्मान से उससे बातें करने लगा ।

       एक दिन मोबाईल पर डेविड का फोन आया, कुशलक्षेम पूछने-बताने के बाद वो बोला- मैं अभी कामकाज के सिलसिले में फिनलैंड आया हूँ, सुन्दर जगह है और मैं यहाँ से आपके लिये भी कुछ गिफ्ट ले रहा हूँ । सुनीता को अच्छा लगने के बाद भी उसने औपचारिक रुप से उसे मना किया, लेकिन प्रसन्नतापूर्वक अपने पति को भी उसके इस मित्र द्वारा भेजी जाने वाली फॉरेनर गिफ्ट के बारे में बता दिया ।

       दूसरे दिन सुनीता के मोबाईल पर किसी अनजान नंबर से फोन आया । जिसपर उधर से पूछा गया कि क्या आप सुनीता आर्य बोल रही हैं  ?  इधर से हाँ का उत्तर मिलने पर जवाब आया कि मैं फिनलैंड से कस्टम ऑफिसर स्टेनली बोल रहा हूँ, आपके नाम भारत भेजे जा रहे सोने के गहनों का एक पार्सल कस्टम विभाग ने जब्त किया है, फिलहाल हमने कार्यवाही रोक रखी है । यदि आप उसकी कस्टम ड्यूटी चुका दें तो वो पार्सल आप तक भेजा जा सकता है । सुनीता के द्वारा यह पूछने पर कि कस्टम ड्यूटी कितने रुपये की है, उधर से बताया गया कि 61,500/- रु. की । यह सोचते हुए कि ज्वेलरी की खरीदी में डेविड के पास रुपये कम पड गये होंगे और अब रु. न होने के कारण वो भला आदमी कस्टम में फँस रहा होगा । वो तुरंत अपने बैंक पहुंची और बताये गये बैंक खाते में 61,500/- रु. जमा करवाकर उस नंबर पर सूचित कर दिया । उस व्यक्ति ने धन्यवाद देते हुए शीघ्र पार्सल भिजवाने का आश्वासन देते हुए फोन रख दिया । 

       सोने के विदेशी गहनों की राह देखती सुनीता को 5-6 दिन बाद फिर अन्जान नंबर से फोन आया, वह सुनीता आर्य ही बोल रही है ये कन्फर्म कर बताया गया कि फिनलैंड में आपके खिलाफ गंभीर आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ है जिसके मुताबिक आपने डेविड सूर्ययन के मार्फत तस्करी का सोना भारत मंगवाने का अपराध किया है जिसमें आपको कई साल की जेल की सजा होगी । डेविड तो हमारी गिरफ्त में और हमारी कस्टम टीम आपकी गिरफ्तारी के लिये तैयारी कर रही है ।

      यह सुनकर सुनीता के हाथ-पांव फूल गये, वो उस व्यक्ति के समक्ष फोन पर गिडगिडाते हुए बोली- भैया मैंने तो कोई गल्ति नहीं की, आप प्लीज मुझे माफ करदो । उधर से आवाज आई- आप सही हैं या गलत ये फैसला तो कोर्ट करेगी, आप भली महिला लग रही हैं इसलिये आप चाहें तो मैं आपकी मदद कर सकता हूँ । भैया आपकी बडी मेहरबानी होगी कहते हुए सुनीता लगभग रो पडी । तो सुनिये मैं अधिकारियों को कुछ दे-दिलाकर आपका नाम इस सूचि से बाहर करवा सकता हूँ, लेकिन इसमें 5 लाख रु. लगेंगे जिसका आपको आज ही इन्तजाम करना होगा नहीं तो स्थिति मेरे हाथ से निकल जाएगी । डरी-सहमी सुनीता ने मरता क्या न करता कि स्थिति में उसी दिन बैंक जाकर बताये गये बैंक खाते में 5 लाख रु. ट्रांसफर करवा दिए और उस दिन को कोसने लगी जब उसने फेसबुक की ये फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट की थी । इसे भी देखें- जीवन पर भारी - फेसबुक की यारी धन्यवाद.

      वह नहीं जानती थी कि ये 5 लाख रु. भेजकर वह उस चंगुल से मुक्त नहीं हुई थी, बल्कि और भी उलझ गई थी । दो दिन बाद उसके पास उसी अधिकारीनुमा शख्स का फिर फोन आया कि आपके रुपये से मैं सिर्फ आपके खिलाफ होने वाली कार्यवाही की गति को ही रुकवा पाया हूँ, उपर के अधिकारियों को चुप रखने के लिये आपको और रुपये भेजना होंगे । इसी तरह उधर से सुनीता को डरा-डराकर 40 लाख रु. से भी अधिक की रकम उससे ट्रांसफर करवा ली गई । इधर मामला खत्म हो पाएगा या उसे जेल जाना पडेगा सोचते-सोचते डरी-सहमी सुनीता का स्वास्थ्य भी खराब रहने लगा । अपराधबोध में घुटते आखिर एक दिन उसने सारा वाकया अपने पति को बता दिया और फूट-फूटकर रोने लगी । पढे-लिखे पति की आँखें फटी रह गई कि तुमने डर के मारे इतने रुपये ट्रांसफर करवा दिये और मुझे बताया तक नहीं ।


          दूसरे दिन उसके पति ने अपने राजनीतिक सम्पर्क के साथ राजनांदगांव के पुलिस अधीक्षक के पास पहुँचकर अपनी पत्नी के साथ होने वाली इस घटना की जानकारी दी । पुलिस अधीक्षक समझ गये कि योजनाबद्ध तरीके से उनकी पत्नी को ठगा गया है । उन्होंने पहले इसकी रिपोर्ट लिखवाई और 

      रिपोर्ट के आधार पर पुलिस की जांच जब आगे बढी तो पहले उस नंबर को सर्च किया गया जिससे फोन कॉल आती थी, पता चला कि ये नंबर दिल्ली से ऑपरेट हो रहा था और वर्तमान में बंद है । जिस अकाउन्ट में सुनीता ने रुपये ट्रांसफर किये थे पुलिस जब उन तक पहुँची तो फर्जीवाडा खुलता चला गया । इधर वो मोबाईल नंबर भी रांची (झारखंड) में चालू हो गया, उसके मालिक रमन्ना तक पुलिस पहुँची तो उसने बताया कि ये सिमकार्ड उसे दिल्ली के नाईजीरियन युवक स्टेनली ने बेचा था ।


          रमन्ना कि निशानदेही पर पुलिस ने जब दिल्ली से स्टेनली ओकवो और नवाकौर एमानुएल नामक युवकों को पकडा, तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए अपनी ठगी का ये तरीका सिलसिलेवार पुलिस अधिकारियों को बताया । उनके कब्जे से पुलिस सिर्फ 5 लाख रु. ही बरामद कर पाई । जबकि बडी रकम के नुकसान के साथ ही एक लम्बे मानसिक संत्रास से गुजरने की सजा तो उस महिला के साथ उसके पति को भी पत्नी के फेसबुक मित्रों पर अंधविश्वास के कारण भुगतना ही पडी ।


       समझने वाली बात यही है कि ऐसे अपुष्ट माध्यम से किसी भी अन्जान शख्स से दोस्ती गांठकर खुश हो लेना, जिसका वास्तविक नाम व शख्सियत भी हम नहीं जानते वो हमें कहाँ तक संकट में पहुँचा सकता है । आप बेशक इस माध्यम का रोजमर्रा के जीवन में भरपूर आनंद लें, लेकिन इतनी सतर्कता भी रखें कि किसी भी अपरिचित शख्स से बेमतलब की मित्रता से दूरी बनाये रखना ही श्रेयस्कर है ।


1.11.19

व्यथा गृहलक्ष्मी की....


     प्रायः सभी एकल भारतीय परिवारों में यदि बच्चे बहुत छोटे न रहे हों और मुख्य गृहिणी नौकरी-पेशा न हो तो एक समस्या अक्सर सामने आती है और वो है पति के काम पर व बच्चों के अपने स्कूल-कॉलेज निकल जाने के बाद सबके बारे में सोचते रहना और उनकी वापसी की प्रतिक्षा में उनके आते ही उनकी कुशल-क्षेम पूछने के साथ दिन-भर की उनकी दिनचर्या से सम्बन्धित कुछ बातें करने की सोच रखना व उनकी अपनी सोच के मुताबिक आवश्यक लगने पर अपनी ओर से उन्हें कुछ सुझाव भी दे लेना ।

         सामान्य स्थिति में कमोबेश यही क्रम हर परिवार में दुखम्-सुखम् चलता रहता है जिसमें प्रायः सभी सदस्यों की दिन भर में जुडी नकारात्मक परिस्थितियों की झुंझलाहट अक्सर गृहिणियों पर ही हस्तांतरित होती रहती है । यह झुंझलाहट कभी-कभी इस सीमा तक भी उन पर उतरते दिखती है कि वह सोचने लगती है कि आखिर मेरा कसूर क्या है एक उदाहरण- 


        बेटा घर में घुसते ही बोला- "मम्मी कुछ खाने को दे दो, बहुत भूख लगी है माँ ने कहा- "बोला था, ले जा कुछ कॉलेज, सब्जी तो बन ही गई थी । "बेटा बोला- "यार मम्मा अपना ज्ञान अपने पास ही रखो, अभी जो कहा है वो कर दो बस, और हाँ रात में कुछ ढंग का खाना बनाना, पहले ही मेरा दिन अच्छा नहीं गया है । कृपया इसे भी देखें नारी तू नारायणी धन्यवाद.


      उसके खाने की व्यवस्था कर कमरे में माँ बुलाने गई तो उसकी आंख लग गई थी । भूखा है, सोचते हुए माँ ने जैसे ही उसे जगाया कि कुछ खा कर सो जाए । तभी बेटा चीख कर बोला- जब सो गया था तो उठाया क्यों तुमने ?  माँ ने कहा तूने ही तो कुछ खिलाने को कहा था । वो बोला- "मम्मी एक तो कॉलेज में टेंशन, ऊपर से तुम भी अजीब काम करती हो, कभी तो दिमाग भी लगा लिया करो ।



        तभी घंटी बजी तो बेटी भी आ गई थी । माँ ने प्यार से पूछा- "आ गई मेरी बेटी, कैसा रहा दिन ?" तो बैग पटक कर वो बोली, "मम्मी आज पेपर अच्छा नहीं हुआ।" माँ ने कहा," कोई बात नहीं, अगली बार कर लेना ।" बेटी चीख कर बोली- अगली बार क्या ? रिजल्ट तो अभी खराब हुआ ना, मम्मी यार तुम जाओ यहाँ से, तुमको कुछ नहीं पता ।" माँ उसके कमरे से भी निकल गई ।


       शाम को पतिदेव आए तो उनका भी मुँह लाल था । थोड़ी बात करने की, कुछ जानने की कोशिश कि तो वो भी झल्ला के बोले- "यार मुझे अकेला छोड़ दो । पहले ही बॉस ने क्लास ले ली है और अब तुम शुरू हो गई ।" देखिए- वैवाहिक जीवन में साथी का महत्व...धन्यवाद.

      कितने सालों यही सब सुनती आ रही थी वो । सोचा सबकी पंचिंग बैग मैं ही हूँ । हम औरतें भी ना अपनी इज्ज़त करवाना हमें आता ही नहीं । सबको खाना खिला कर वो अपने कमरे में चली गई । इसे भी देखें - कल्पना - स्त्री-विहीन गांव की. धन्यवाद.

      अगले दिन से उसने किसी से भी कुछ भी पूछना-कहना बंद कर दिया । जो जैसा कहता, कर के दे देती । पति आते तो चाय दे देती और अपने कमरे में चली जाती । पूछना ही बंद कर दिया कि दिन कैसा रहा ? बेटा कॉलज और बेटी स्कूल से आती तो माँ ना कुछ बोलती ना पूछती । यह सिलसिला काफी दिन चला...

       एक रविवार तीनों उसके पास आए और पतिदेव बोले तबियत ठीक है ना ? क्या हुआ है ? इतने दिनों से चुप ही हो, बच्चे भी हैरान थे ।

      थोड़ी देर चुप रहने के बाद वो बोली- मैं तुम लोगो की पंचिंग बैग हूँ क्या ? जो भी आता है अपना गुस्सा, चिड़चिड़ाहट व भडास मुझपे ही निकाल देता है । मैं भी दिन भर इंतज़ार करती हूं तुम लोगों का । पूरा दिन काम करके कि अब मेरे बच्चे आएंगे, पति आएंगे, दो बातें करेंगे प्यार से, और तुम सब आते ही मुझे ही पंच करना शुरु कर देते हो ।

      अगर तुम लोगों का दिन अच्छा नहीं गया तो क्या वो मेरी गलती होती है ? हर बार मुझे झिड़क देना क्या सही है ? कभी तुमने पूछा कि मुझे दिन भर में कोई तकलीफ तो नहीं हुई । तीनो चुप थे, सही तो कहा मैंने- दरवाजे पे लटका पंचिंग बैग समझ लिया है मुझे, जो आता है मुक्का मार के चलता बनता है । तीनों शरमिंदा थे ।

      हर माँ,  हर बीवी अपने बच्चों और पति के घर लौटने का इंतज़ार करती है । उनसे पूछती है कि दिन भर में सब ठीक तो था, लेकिन अक्सर हम उनको हल्के में लेते हैं । हर चीज़ का गुस्सा उन पर निकाल देते हैं । कभी-कभार तो यह ठीक है, लेकिन अगर ये आपके घरवालों की आदत बन जाए तो ? तब तो गृहिणी के लिये यही उत्तम है कि अनावश्यक सवाल-जवाब से वह अपने को मुक्त ही रखें ।

       हम सभी वयस्कों के लिये भी उचित यही है कि यदि वो कभी हमसे दो बात करना चाहे और हमारा मूड दिन भर की किसी भी गतिविधि के संदर्भ में यदि खराब हो तो भी संक्षिप्त में बगैर चिढें जवाब देकर वहाँ से हट जावें जिससे न हमारा मूड और ज्यादा खराब हो और ना ही माँ अथवा पत्नी को यह हीनता महसूस हो कि आपकी नजरों में उसकी तो कोई इज्जत ही नहीं बची है ।

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