3.2.11

कच्ची उम्र के ये शरीर सम्बन्ध...!

           कल एक समाचार पढने के बाद कि केन्द्र सरकार 12 से 14 वर्ष की उम्र सेक्स सम्बन्धों के लिये स्वीकार्य किये जाने का विधेयक पास करवाने की तैयारी कर रही है । मेरी स्मृतियों की दो घटनाओं को एक साथ ताजा कर गया- 
 
           मेरे बडे भाई के एक मित्र जो बम्बई में रहते थे उनसे मेरा रिश्ता भी बडे भाई के मित्र याने मेरे भी बडे भाई जैसा बन चुका था । आवश्यकता व सामाजिक समारोह के अवसरों पर एक-दूसरे के यहाँ आना जाना भी आवश्यक रुप से होता ही रहता था और जैसी बम्बई की वर्षों पूर्व से स्थिति रही है कि सामान्य लोगों के पास यदि एक कमरा भी मौजूद है तो वो किसी उपलब्धि से कम नहीं था । इसलिये किसी भी किस्म की पर्दादारी बहुत मुश्किल ही रह पाती थी । उन्हीं भाई साहब की लडकी लगभग इतनी ही छोटी उम्र की हमारे देखने में आती रहती थी और साल छ महिने में बम्बई का चक्कर लगते रहने के कारण उनके परिवार से सम्पर्क भी बना ही रहता था ।
 
          अचानक अगले एक प्रवास में उनके यहाँ वह लडकी नहीं दिखाई दी । पूछने पर पता चला कि उसने तो शादी करली । बडा आश्चर्य हुआ कि कुल जमा 15 वर्ष की भी उसकी उम्र नहीं थी और शादी करली ? कोई खबर भी नहीं हुई । तो मालूम पडा कि शादी उसने स्वयं घर से भागकर की इसलिये पूर्व खबर जैसी कोई संभावना थी ही नहीं । बात आई-गई हो गई, हम अपने काम-धंधे में लग गये । संयोगवश अगले वर्ष फिर बम्बई जाना हुआ । अब वो लडकी भी घर पर दिख रही थी और दो-पांच माह का एक नवजात शिशु भी जो उसी लडकी का था उस घर में दिखाई दे रहा था । उस समय का वो बम्बई प्रवास लगभग एक सप्ताह का था और रोजाना उनके घर का चक्कर अनिवार्य रुप से लग रहा था । करीब-करीब सभी दिन वो लडकी और उसका नवजात शिशु घर पर ही दिखते, किन्तु कभी भी उस शिशु के पिता याने उस लडकी के पति को देख पाने का मौका नहीं मिला । मैंने जब इस बारे में अपने बडे भाई से पूछा तो पता चला कि वो तो कभी का उस लडकी को छोड भागा और ये लडकी तो अब स्थाई रुप से अपने मां-बाप के पास अपने उस बच्चे के साथ ही रहती है । भले ही वहाँ के माहौल में सामाजिक प्रतिष्ठा जैसा कोई सरोकार न रहा हो किन्तु उस गरीब परिवार में गरीबी में आटा गीला होने वाली स्थिति तो पूरी तरह से और स्थाई रुप से बढी हुई समस्या के रुप में सामने दिखने लगी । मैं बस अवाक् ही रह गया ।
 
         दूसरी घटना मेरे ही परिचितों में अपने ही शहर में देखी । मेरे एक परिचित शादी कर चुकने के बाद परिवार पालने जैसी आवश्कता पूर्ति की आर्थिक व्यवस्था अपनी आरामतलबी और नशे की जरुरत के चलते नहीं जुटा पाते थे । एक लडकी सहित दो बच्चे परिवार में बढ भी चुके थे और परिवार के पालन-पोषण हेतु आवश्यक अर्थोपार्जन भी उनकी पत्नि ही छोटे-छोटे कार्यों के द्वारा करते रहने की जद्दोजहद में दिखती रहती थी । उन परिचित की उस अकर्मण्यता का खामियाजा उनके बच्चों को आवश्यक शिक्षा से वंचित रहकर भी भुगतना ही पडा था । लडकी 15-16 वर्ष के आसपास की उम्र की थी और देखने में आकर्षक भी । एक समारोह में मालूम हुआ कि उस लडकी ने अपने माता-पिता को ये समझाते हुए कि अभी सम्पन्न परिवार का ये लडका मेरे लिये उपलब्ध दिख रहा है जो यदि छूट गया तो आगे आप मेरे लिये कर भी क्या पाओगे स्वयं ही उसने शादी करली । 
 
          कुछ समय बाद वहाँ भी वही स्थिति सामने आई कि जिस भी लडके से उसने शादी की वो कहाँ गया मालूम नहीं । लडकी लेकिन फिर से अपने मां-बाप के साथ उनके घर में स्थाई रुप से रहती दिख रही है । यहाँ एक बात जो गनीमत के रुप में दिखी वो ये कि इस लडकी के साथ कोई नवजात शिशु नहीं जुडा ।
 
        
अभी दिनांक 24-01-2011 को अपने इसी ब्लाग की पोस्ट एक समाचार - एक विचार में मैंने इस खबर का भी उल्लेख किया था कि होटल के सेक्स रैकेट में पुलिस द्वारा पकडी गई 7 युवतियों में एक लडकी हायर सेकन्ड्री की छात्रा थी । याने-
 

          
           बात इस उम्र के नौनिहालों द्वारा स्वयं शादी का आवरण ओढाकर इस आवश्यकता की पूर्ति करते हुए या प्रेम सम्बन्धों की आड में एकान्त में इस सुख का चोरी-छुपे लाभ उठाते हुए या फिर और कोई माध्यम न जुडने पर देह-व्यापार के घिसे हुए खुर्राटों के चंगुल में फंसकर ही इस सुख को पाने का प्रयास करते हुए इन्हें देखा जावे किन्तु टी.वी., इन्टरनेट जैसे दृश्य मीडिया के खुलेपन के इस वातावरण में यह तो दिखने लगा है कि या तो बच्चों को संस्कारित रुप से इतना मजबूत रखने के शुरु से प्रयास उनके पालकों द्वारा किये जावें कि वे गुण-दोषों के आधार पर स्वयं को ऐसे कमजोर कर सकने वाले क्षणों में मजबूती से बचा पावें जो कि असम्भव नहीं तो भी वर्तमान माहौल में अत्यधिक कठिन दिखता है  । 

           तो क्या उनकी वयस्कता की उम्र का नये सिरे से आकलन किया जाकर यदि आवश्यक लगे तो सामाजिक रुप से उनका कुछ वर्ष पूर्व ही विवाह करवा दिया जाना चाहिये जिससे कि इस किस्म के स्व-निर्णय से किये गये विवाह के बाद इस प्रकार ये युवतियां वापस अपने मां-पिता के घर स्थाई रुप से बोझ बनकर न आ पावें ।



43 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

कच्ची उम्र मे संबंध कभी भी स्थायी नही हो सकते इसके लिये तो सिर्फ़ माता पिता को ही ध्यान देना होगा और बच्चो मे अच्छे संस्कार पोषित करने पडेंगे।

योगेन्द्र पाल ने कहा…

आपने लिखा बहुत ही बेहतरीन है, तथा उदाहरण भी अच्छे दिए हैं, पर अंत तक यह समझ नहीं आया कि आप इस बिल के पक्ष में हैं या विपक्ष में कृपया खुल कर कहें

सोमेश सक्सेना ने कहा…

स्थिति बहुत चिंतनीय है। आने वाले समय में पता नहीं क्या होगा।
योगेन्द्र जी वाली शंका मुझे भी है।

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

@ वन्दनाजी
त्वरित टिप्पणी के लिये धन्यवाद...

@ योगेन्द्र पाल सा.,
आपके बाद की इस टिप्पणी में श्री सोमेशजी सक्सेनाजी जो कह रहे हैं वैसी ही उहापोह वाली स्थिति मुझे भी लगती है ।

@ श्री सोमेश सक्सेनाजी,
करीब-करीब हर घर से जुडी सामाजिक समस्या है । बच्चों के मेच्योर होने के पूर्व शादी भी आसान तो नहीं है । वाकई आगे क्या होगा ?

: केवल राम : ने कहा…

ऐसी स्थिति समाज के लिए कभी भी सही नहीं हो सकती ..इस पर गहनता से सोचने की जरुरत है

सोमेश सक्सेना ने कहा…

@ आपके बाद की इस टिप्पणी में श्री सोमेशजी सक्सेनाजी जो कह रहे हैं वैसी ही उहापोह वाली स्थिति मुझे भी लगती है ।

ये दो जी और एक श्री हटा दें तो कृपा होगी सर। मुझे छोटा भाई ही समझिए अपना।

निरंजन मिश्र (अनाम) ने कहा…

जिस उम्र मे बच्चो को अपना भला बुरा सोचने की समझ नहीं होती, उस उम्र मे भला सरीरिक शंबंधों को सही अर्थो मे कैसे समझा जा सकता है

यहा भी स्वागत है :-
धर्म संस्कृति ज्ञान पहेली - 3
जवाब देने का अंतिम समय शुक्रवार 2.00 बजे तक

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

आदरणीय सुरेश जी ,

सर्वप्रथम ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर लिखने के लिए धन्यवाद |

कच्ची उम्र के अपरिपक्व रिश्ते स्थाई तो हो ही नहीं सकते |

हाँ , इस नाज़ुक मामले पर नए सिरे से विचार किये जाने की

आवश्यकता जरूर है |

ajit gupta ने कहा…

अब क्‍या लिखें जी। जब सामाजिक कार्य भी राजनैतिक इच्‍छाशक्ति से होने लगेंगे तब कुछ भी हो सकता है। कहाँ है हमारे सामाजिक‍ संत? क्‍या उनका कोई कर्तव्‍य नहीं अपने समाज को सही दिशा देने में? या केवल मन्दिर निर्माण और अपने भक्‍तों का समूह बढाने में ही उनकी शक्ति लगी हुई है?

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

दुर्भाग्य ही है यदि यह होता है।

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

@ श्री केवलरामजी,
वाकई चिंतन के साथ ही सार्थक राह तलाशने की भी आवश्यकता है ।

@ सोमेश सक्सेना,
एक जी तो गल्ति से लग गया था, अब दोनों जी व श्री हटा देने के बाद मुझे कुछ अधूरापन लग रहा है ।

@ श्री निरंजन मिश्र (अनाम),
इस उम्र में ये फैसले सही नहीं हो पाते, यही इशारा मेरे इस आलेख में करने का प्रयास किया है ।

@ श्री सुरेन्द्र सिंह " झंझट " सा.
वाकई आवश्यकता है ।

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

दीदी श्री अजितजी,
जैसे सिनेमा वालों का ये तर्क होता है कि हम वही दिखाते हैं जो समाज में चल रहा होता है, भले ही उससे प्रेरित होकर और अधिक लोग अपराध की राह पर अग्रसर होते रहें वैसी ही स्थिति राजनैतिक कर्ताधर्ता भी दर्शाकर अपनी बात व कानून का निर्धारण करने का प्रयास करते रहते हैं । बचे सामाजिक संत ? न तो मेरी मंशा इनके विरुद्ध बोलने की है और ना ही शायद सामर्थ्य, किन्तु यौनाचार जैसे इस विषय पर कुछ तथाकथित संत कहलाए जाने वाले नामों ने भी कम प्रदूषण नहीं फैलाया है । बचे वास्तविक संत तो उनके लक्ष्य वाकई मन्दिर-मठ तक ज्यादा सीमित हो चुके दिखते हैं । अतः समस्या का वास्तविक समाधान तो शायद भुक्तभोगियों को ही खोजना होगा ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जिस रफ़्तार से ज़माना जा रहा है पता नहीं क्या होने वाला है .... अपना समाज तो वैसे भी इस रफ़्तार में सबसे आगे है ... पर कच्ची उम्र में बनने वाले रिश्ते किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहे जा सकते ...

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

इस सरकार से आप कोई अच्छा विधेयक लाने की उम्मीद कर सकते है ? :)

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

@ श्री प्रवीण पाण्डेयजी,
वाकई दुर्भाग्य ही है ।

@ श्री दिगम्बर नासवा सा.,
विदेशी संस्कृति की नकल करने की होड में युवा पीढी वाकई सबसे आगे दिख रही है ।

@ श्री पी.सी.गोदियाल "परचेत" सा.,
धुरंधरों की इस सरकार में बिल्कुल नहीं कर सकते ।

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत विचारणीय आलेख...समझ में नहीं आता कि इस बिल के द्वारा सरकार समाज में क्या सुधार लाना चाहती है..एक तरफ बाल विवाह पर रोक, दूसरी तरफ इस तरह का बिल लाने का इरादा. इससे अच्छा तो यह ही होगा कि शादी की कानूनन उम्र ही कम कर दी जाए..वैसे कच्ची उम्र के फैसले कितने सही होते हैं यह सभी जानते हैं. अब तो माता पिता पर ही यह जिम्मेदारी आजाती है कि वे अपने बच्चों में ऐसे संस्कार डालें कि वे उचित अनुचित का फैसला कर सकें.

दर्शन कौर धनोए ने कहा…

सुशीलजी ,बहुत गहन चिन्तन हे --बम्बई जेसी खुली नगरी में अपने बच्चो को सार्थक परिवेश देना वाकई मुशकिल काम हे --मेरे परिवार में बड़े भाई के धर यह हो चूका हे --लेकिन इस सत्य से मेरी दोनों लडकियाँ सबक ले चुकी हे --और अंदर ही अंदर वो बहुत स्ट्रांग हो गई हे --यदि बच्चे खुद जुम्मेदार और समझदार हो जाए -तो परेशानी की जरूरत ही नही होगी --इसके लिएअभिभावको को भी थोडा कड़ा रुख अपनाना पड़ेगा--लेकिन हमेशा नही; कभी -कभी नरमाई भी जरूरी हे ?

वाणी गीत ने कहा…

परिवार और समाज की जिम्मेदारी तो होनी चाहिए चरित्र निर्माण में , इसमें क्या शक है ..

मगर इस तरह के बिल पास कर बच्चों के शारीरिक शोषण को क़ानूनी मान्यता देने की मंशा ही नजर आ रही है ...
कम उम्र के संबंधों और विवाह के दुष्परिणाम को देखते हुए ही विवाह की कानूनी उम्र तय की गयी थी , मगर इतने वर्षों के प्रयास पर पानी फिरता दिख रहा है मुझे ... इस तरह के बिल लाने वाले मानसिक रुग्णता के शिकार ही लग रहे हैं ..!

एस.एम.मासूम ने कहा…

सुशील बाकलीवाल @ एक बेहतरीन मुद्दे पे कुछ शानदार केर्हने के लिए आप का शुक्रिया. मुंबई मैं ऐसी घटनाएँ प्रतिदिन सुने दिया करती हैं. और मुंबई के पार्क , बीच सब यही सवाल पूछते दिखाई देते हैं. जब १३ से १८ के बीच मैं आज के युवा सेक्स पा ही लेते हैं, सही तरीके से या ग़लत तरीके से और अधिकतर बच्चियां ही इसका नुकसान जाने या अनजाने मैं उठाती है तो कहीं ना कहीं हम बड़ों की ही ग़लती अधिक लगती है. यदि १३-१४ या १५ साल मैं जब युवाओं को सेक्स की आवश्यकता पड़ने लगती है तभी किसी सही तरीके से उनकी ज़रुरत पूरी कर दी जाए तो शायद कुछ भला हो?
.
मुझे लगता है की "सामाजिक रुप से उनका कुछ वर्ष पूर्व ही विवाह करवा दिया जावे: ही सही मशविरा है

Pushpendra Paliwal ने कहा…

sarkaar ko lagta hai delhi bombay hi india hai

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

बहुत विचारणीय आलेख...
समझ में नहीं आता कि इस बिल के द्वारा सरकार समाज में क्या सुधार लाना चाहती है

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप ने बहुत से मुद्दे एक साथ परोस दिए हैं। यौन सम्बन्धों के लिए आज के युग में 18-21 वर्ष ही उचित उम्र है। इस मुद्दे का जिस तरह से मीडिया ने प्रचार किया है उस का खंडन भी हुआ है। समस्या कुछ और है। 12 वर्ष के उपरांत यदि बच्चों को माहोल मिल जाए तो वे यौनाकर्षण में फँसते हैं और परिणाम की परवाह किए बिना चोरी छुपे वे संबंध भी बना लेते हैं। अब समस्या यह है कि यदि 18 वर्ष से कम उम्र का लड़का किसी लड़की के साथ स्वैच्छिक यौनाचार कर ले तो वह वर्तमान कानून के अनुसार बलात्कार माना जाएगा। प्रश्न यह है कि क्या एक नाबालिग बालक को बलात्कार की सजा मिलनी चाहिए? इस कारण से इस परिघटना को बलात्कार का अपराध न मान कर एक गलती माना जाए यह सुझाव आया है। मैं समझता हूँ कि इस सुझाव पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए। सारी सामाजिक परिस्थितियों और परिणामो की रोशनी में। यह अवयस्कों को यौनाचार की छूट देना तो कतई नहीं है।

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

@ Shri Kailash C Sharma,
@ सुश्री दर्शनकौर धनोए जी,
@ सुश्री वाणी गीतजी,
@ एस. एम. मासूम सा.,
@ श्री पुष्पेन्द्र पालीवाल सा.,
@ श्री संजय कुमार चौरसियाजी,
धन्यवाद आप सभी को इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करने के लिये । आभार सहित...

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

सम्माननीय श्री दिनेशरायजी द्विवेदी सर,
सम्भव है मेरे द्वारा इस आलेख में बहुत से मुद्दे आपस में गडमड होते दिख रहे हों । लेकिन मेरा आशय उस बिल को देखकर कच्ची उम्र में इन दोनों लडकियों (जो मेरी जानकारी में रही हैं) के द्वारा जो स्वनिर्णय से घर से भागकर या घर में बताकर विवाह रुप में जो फैसले इन्होंने किये उसके कारण और परिणाम, फिर सेक्स रैकेट में जो उल्लेख मैंने किया वो भी हायर सेकन्ड्री की लडकी याने मोटे तौर पर 16-17 की उम्र और इसके साथ ही ये जो चित्र मुझे ई-मेल से किसी ने भेजा इसमें भी लडकी की उम्र व उसकी शरीर सम्बन्धों से जुडी चाहत ही बिना किसी दबाव के जो सामने दिख रही है बस इन्हीं मुद्दों को ध्यान में लाने का रहा है । अब इस बिल की कानूनी मंशा तो आप ही बेहतर समझ व बता सकते हैं यहाँ मेरे लिये कुछ भी समझना या बोलना सम्भव ही नहीं है । धन्यवाद सहित...

Sawai SIingh Rajpurohit ने कहा…

दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक और भयावह स्थिति......

Patali-The-Village ने कहा…

इस पर गहनता से सोचने की जरुरत है|यदि यह होता है तो दुर्भाग्य ही है|

Sawai SIingh Rajpurohit ने कहा…

मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है

"गौ माता की करूँ पुकार सुनिए....." देखियेगा और अपने अनुपम विचारों से हमारा मार्गदर्शन करें.

आप भी सादर आमंत्रित हैं,
http://sawaisinghrajprohit.blogspot.com पर आकर
हमारा हौसला बढाऐ और हमें भी धन्य करें.......
आपका अपना सवाई

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

जनाब मासूम साहब और वकील साहब से सहमत .

sandhya ने कहा…

इस विषय पर माता - पिता, परिवार, समाज को मिलकर गंभीर चिंतन करने की आवश्यकता है, बहुत कुछ हो सकता है, आखिर परिवार, समाज ये सभी मिलकर ही तो राष्ट्र का निर्माण करते हैं, और सरकार का भी.. प्रसंशनीय प्रयास

ZEAL ने कहा…

इस तरह के विधेयक यदि पास हो गए तो काफी कुछ नियंत्रण के बाहर हो जाएगा। सर पीटने की स्थिति आ जाएगी।

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

bhaut hi gambhir aur vicharniya mudda aap ne uthaya hai. jo umra bachchon ke padhne likhne ki hoti hai usame ise manyata dena katai sahi nahin hai..........

mukesh wahane ने कहा…

bilkul sahi kadam aapne uthaya hai.............

Mr Dutt ने कहा…

इस उम्र मैं मंन कोई ठोस फैसला लेने लायक नही होता बस मन भटकता रहता है और एक खास बात और इस उम्र मैं आकर्षण बड़ी जल्दी होता है
इसलिए माँ बाप को चाहिए की बच्चों के सैट वक़्त बिताया जाय
harish

शशांक मेहता ने कहा…

सुशीलजी सबसे पहले तो मैं अपनी भूल के लिए क्षमा चाहता हूँ. मै ब्लॉगजगत के नियमो से अंजान था इसलिए मुझसे भूल हो गयी..............

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

इस प्रकार के ज्‍वलंत और समाज और संस्‍कृति के लिए नुकसानदायक विषयों पर सार्थक चिंतन करके आपने एक और अच्‍छा कार्य किया है।

Bhartiya ने कहा…

Situation is really critical.
Government only trying to get rid of its duties of developing culture through this bill, and because big Indian population is teenage they don't want to force youth to stop, as youngsters are big vote bank
as i think.

Puneet ने कहा…

आपने बहुत अच्छा लिखा है..
मेरा भी येही मानना है शायद शादी की उम्र कुछ कम कर देनी चाहिए
क्योंकि शारीरिक रूप से आदमी जल्दी व्यसक हो जाता है.... और काम भावना भी एक प्राकृतिक गुण है...और हर कोई इस पैर विजय नहीं पा सकता क्योंकि हर कोई योगी नहीं हो सकता...

वैसे इसका मुख्य मकसद तो काम इच्छाओ को पूरा करना है जिससे व्यवस्था बन सके.... लेकिन एक सभ्य समाज में शादी के द्वारा ही ये इच्छा पूरी की जाये तो सही रहेगा

बाकि मेरी शायद अभी उतनी उम्र नहीं इतने बड़े बड़े सुझाव देने की :)

अशोक कुमार शुक्ला ने कहा…

जिस पेचीदा सवाल को आपने उठाया है वह सदा से अनुत्तरित ही रहा है वास्तव में यौन इच्छाओं के लिये निधा्ररित न्यूनतम आयु सीमा को पुर्नपरिभाषित करना इसका उपाय नहीं है। पारिवारिक वातावरण तथा संस्कार ही इसके लिये उत्तरदायी हो सकते हैं ।

KHABAR JASHPUR ने कहा…

अब तो बस इन सब का एक ही हल दिख पड़ता है की बच्चे शादी के लायक हो जाएँ तो उनकी तत्काल शादी कर दो और फिर पढाई लिखाई दोनों को साथ में कराया जाए

Gulam E Gause Azam ने कहा…

Dear , Shushil Bakliwal Ji .........

Mujhe Aapka Lekh Bahut Bahut Achha Laga , Aapki Soch Kabile Tareef he , Aur Aapka Ye blog Jisme sabhi Post Kabile Tareef He , hum sab Ishwer Se Dua Karte he ki Aapki Jesi Soch Wale Sabhi Ban Jaye to Ye Samasya Jald KHatam ho jayegi , Per Mujhe afshosh he is baat per ki TV ne Samaz ke Nojawan Ladko aur Ladkiyo Me Aashiki Mijaj Peda Kar diya he , Jo Itna Badta Ja raha he ki Iski Koi sima Nahi he , Bus Meri Ray First Comment Dene Wali Bahan Vandana Jesi he ki Har Mata Pita ko Apne Bachho ka Palan Poshan Achhe Sanskaran aur Gyan Se Karna Chahiye Tabhi Jaker Is samasya Se Bacha ja sakta he .

Thanks My dear .

Q. Sir , Kya Aap hume ye Blog Design Karna Bata Sakte he ?

बेनामी ने कहा…

सबसे जरुरी बात यह है कि माता-पिता अपने बच्चे को जागरुक करे अच्छे संस्कार दें

Mirza Mohammad Raza ने कहा…

आपने जो उदाहरण दिए वो जायदातर लड़की की मर्ज़ी के ही थे लेकिन मैंने ये बहुत देख मेरे गांव में की लड़की की शादी उसकी 14_18 साल की उम्र में ओर जायदातर तो 15 साल की उम्र कर दि जाती है बात इतनी नहीं बल्कि बात ये की उनकी शादी उनसे दुगनी उम्र य उससे कम उम्र के लड़के के साथ की जाती हैं।बस ये देख जाता है की लड़का कमाता सही है य ना।इस उम्र में लड़कियां भी माँ बाप से कुछ नही केह पातीं।

sohan ने कहा…

इसमें सबसे बड़ी गलती उनके माता पिता की है अगर वह उन्हें अच्छे संस्कार दे तो ये नौबत ही नहीं आयेगी! माता पिता बच्चों को छूट देते हैं यह दिखाने के लिए कि हम modern जमाने के हैं इससे परिणाम यह देखने को मिल रहा है कि फिर बच्चे भी अपने माता पिता इज्जत नहीं करते हैं गैर धर्म में शादी ये सब परिणाम है

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