15.2.11

दानवीर कंजूस...!

            
           अभी-अभी एक रिश्तेदारी में शादी की 25वीं सालगिरह का भोजन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । उस दिन सुबह से ही दोनों बहुओं में चर्चा चल रही थी कि उन्होंने इस विशेष अवसर पर अपनी पत्नि को 50 तोला सोने के आभूषण का सेट उपहार में दिया है । मैं इन दोनों एक से बढकर एक पति-पत्नि को पहले से जानता हूँ, इसलिये मेरे सामने चल रही इस 50 तोला सोने के आभूषणों की गिफ्ट की बात पर मैं मात्र मुस्करा के रह गया, क्योंकि ये तोहफा घर में रखे पैसों को सोने जैसे सुरक्षित माध्यम में इन्वेस्ट कर देने से ज्यादा क्या हुआ ?

           इन दम्पत्ति की एक ही फूल सी कोमल व सुन्दर पुत्री है और एक ही लडका है । धंधा चाहे जो हो किन्तु लक्ष्मीजी का वरदहस्त झकाझक दिखाई देता है । अभी-अभी अपना पुराना मकान बेचें बगैर घर का नया मकान खरीदने के साथ ही टवेरा जैसी दो गाडियां भी इन्होंने खरीदी हैं जिसे ये किराये पर भी चलवा लेते हैं और वास्तविक व्यवसाय से होने वाली चलते रस्ते हीरे-पन्ने के आभूषण खरीद सकने की क्षमता वाली आमदनी का वास्तविक  स्त्रोत या तो वे स्वयं जानें या फिर उपर वाले रामजी । तो माता लक्ष्मीजी की ऐसी कृपा होने के बावजूद उस इकलौती पुत्री की शादी इन्होंने छोटे गांव में इन शर्तों के साथ ही सम्पन्न की कि हमारे पास 8-10 तोला सोने से अधिक, एकाध लाख नगद से अधिक, और इस रेंज में आने वाली इन 12-15 साडियों से अधिक लगाने के लिये कुछ नहीं है । लडके वालों को तो ऐसे अवसरों पर लडकी से मतलब होता है तो राजी-खुशी उसकी शादी की जिम्मेदारी से भी ये दम्पत्ति बरी हो लिये ।

          अब ऐसे श्रीसम्पन्न दम्पत्ति की मेमोरेबल 25वीं शादी की सालगिरह की पार्टी की बानगी देखिये- मुख्य शहर से 15 से भी अधिक किलोमीटर दूर एक धार्मिक स्थल पर जहाँ 55/- रु. प्रति थाली के मान से दाल-बाफले-लड्डू का भोजन उपलब्ध रहता हो वहाँ इन्होंने स्वयं यही मीनू अपने महाराज से बनवाया जिससे की और जो भी बचत हो सके वो हो जावे । फिर ऐसा जीर्ण-शीर्ण हाल जिसमें 50 साल से भी अधिक पुरानी टूटी-फूटी हरी फर्शियां और उपर टीन शेड की मौसम की मार से काली और जीर्ण-शीर्ण तपतपाती हुई छत मौजूद थी उसे नाम-मात्र के किराये पर जुगाडकर मेहमानों को उसमें बुलाया । भोजन की सर्विस के नाम पर ऐसे कोई सेवक-नौकर नहीं जो 200-250 मेहमानों को साफ-सुथरे माहौल में खाना खिला सकें । आप अपनी टेबल स्वयं साफ करो, अपनी थाली स्वयं उठाकर मांजने में रखो और अपने आप जाकर पानी पी लो और भेंटस्वरुप लिफाफे जो हर मेहमान अपनी हैसियत के मुताबिक दे रहे थे उसमें ही इस पार्टी के कुल खर्चे से कहीं ज्यादा आमदनी का स्कोप भी उनके लिये बखूबी बनता जा रहा था । पत्नि जरुर नई साडी और उस तथाकथित सोने के सेट को पहने घूमते हुए दिख रही थी किन्तु पति महोदय का तो पेन्ट भी पांयचे के नीचे से किनारे उधडते हुए उस समारोह में भी अलग ही नजर आ रहा था । 

           एक ओर जहाँ सामान्यजन की सोच ये रहती हो कि यदि हम मेहमानों को अपने यहाँ भोजन पर बुला रहे हों तो भले ही अपने घर में कैसे भी काम चला लेते हों किन्तु उन्हें अच्छे से अच्छा भोजन, अच्छे से अच्छा वातावरण और उन्हें कोई परेशानी न हो ऐसी सेवा पहले उपलब्ध करवाएँ क्योंकि इन्हीं से तो हमारी सार्वजनिक मेहमाननवाजी की छवि अपने परिचितों व समाज में बनती है वहीं इनकी ये महाकंजूस सोच इस रुप में कदम-कदम पर सामने दिख रही थी ।

           अभी दो दिन पूर्व ही नया सवेरा ब्लाग पर भी भूख से कुलबुलाते हुए हजारों रुपये हर जेब में अलग-अलग रखें एक सूटेड-बूटेड साहब की 2/- रु. की मूंगफली खरीदकर वह भी वापस कर देने और मुफ्त में उस गरीब खोमचेवाले की 2-5 मूंगफली चखने के नाम पर खाने का भी एक किस्सा पढा ही था । तो ऐसे कंजूस हममें से लगभग सभी को अपने दैनंदिनी के जीवन में कदम-कदम पर टकराते हुए दिखते ही हैं और इनकी इस कंजूस मनोवृत्ति के कारण वे सभी लोग जो इनके सम्पर्क में आते हैं उन्हें निरन्तर तकलीफें उठाना पडती हैं जिससे इन्हें कोई फर्क नहीं पडता ।

           एक बार ऐसे ही किसी डेड स्याणे के यहाँ चोरी हो गई । वे महोदय धाडे मार-मारकर रोते हुए विलाप कर रहे थे कि हाए मेरा तो सब कुछ लूट गया । तभी एक सन्यासी उधर से निकले, उन्होंने उस कंजूस से पूछा कि भई आखिर क्या हुआ ? तब उस कंजूस ने बताया कि मेरी तिजोरी में से चोर 2 किलो सोने का वो ढेला उठाकर ले गये जो मेरे पिताजी के मरने के बाद से मेरे पास सुरक्षित रखा था और जिसे मैंने पिछले 30-35 वर्षों से ऐसे ही सहेजकर रखा हुआ था । तब उन सन्यासी ने आसपास देखकर सडक से लगभग उतना ही वजनदार पत्थर उठाकर उस व्यक्ति को देते हुए कहा कि तेरी तिजोरी में उस सोने के ढेले की जगह इस ढेले को रखदे और समझले कि तेरा माल सुरक्षित रखा हुआ है, फिर तो उस कंजूस को बहुत गुस्सा आया और वो उस सन्यासी से बोला कि आपका दिमाग तो खराब नहीं हो गया है जो सोने के ढेले की बजाय ये पत्थर का ढेला रखवाकर मुझे समझा रहे हो कि इसे ही सोना समझकर पडा रहने दूँ । सन्यासी ने उसे मुस्कराते हुए समझाया कि तेरे पिताजी के जमाने से तू इसकी सुरक्षा कर रहा है । न तूने इसका कोई उपयोग आज तक किया और न आगे तेरा ऐसा कोई इरादा है तो फिर क्या फर्क पडना है कि तेरी तिजोरी में सोने का ढेला रखा है या पत्थर का । भले ही ये अतिशयोक्ति वाली बात हो किन्तु इन जैसे कंजूसों के लिये ही महाकवि तुलसीदास रचित एक श्लोक अपने शिक्षण काल में शायद सभी ने पढा होगा कि-

कृपणेन समो दाता न भूतौ न भविष्यति,
अस्पृसन्नैव वित्तानी य परेभ्य प्रयच्छति ।

         अर्थात् कंजूस के समान दानी इस पृथ्वी पर न कभी हुआ है और न होगा । क्योंकि जीतेजी वो अपना धन न स्वयं खाता है और न किसी को खाने देता है और मरने के बाद वो सारा धन समाज के लिये छोड जाता है ।

        आपका भी ऐसे कंजूसों से वास्ता पडता है या नहीं ?


39 टिप्पणियाँ:

योगेन्द्र पाल ने कहा…

सही लिखा है आपने मेरा बचपन ही ऐसे कंजूसों के यहाँ बीता है, उनका ना आगे कोई है न पीछे कोई पर एक समय खाना भी बचाते हैं, दूसरों के यहाँ खाकर :)

ZEAL ने कहा…

अक्सर लोग फालतू जगह पैसा बर्बाद करते हैं , लेकिन जहाँ ज़रुरत है वहां नहीं। बहुतेरे कंजूस मिले हैं आज तक ।

Patali-The-Village ने कहा…

मैं ने एक ऐसा परिवार भी देखा है जहाँ परिवार के सात मेंबर हैं सातों टीचर हैं पर सब्जी भी मांग कर खाते हैं|

सतीश सक्सेना ने कहा…

बड़ा मनोरंजक लेख है ....
वह धन क्या जो किसी के काम न आये ...वह धन क्या जो किसी के आंसू न पोंछ सके ...
अधिकतर लोग ऐसे ही धन जमा करते रहते हैं , इस धन का उपयोग बच्चों को पढ़ाने में अथवा अपने परिवार की मदद करने पर भी नहीं करते......
मेरे एक मित्र हैं जिन्होंने बहुत पैसा होने के बावजूद अपनी बती को उच्च शिक्षा दिलाने में कंजूसी बरती ...ऐसे लक्ष्मी पूजकों को देख लोगों को देख मुझे कभी ख़ुशी नहीं होती
क्या जीवन है इन लोगों का ...

Atul Shrivastava ने कहा…

ऐसे धन की क्‍या कीमत जो किसी के काम न आ सके। भगवान बचाए ऐसे कंजूसों से। अच्‍छी पोस्‍ट।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

सुशील जी,
अगर धन का सदुपयोग न हो तो वह धन मिट्टी के सामान है !
ऐसे लोगों की सोच बदलने की आवश्यकता है !
सार्थक लेख !

दर्शन कौर धनोए ने कहा…

सुशिल जी,कंजूस होना अच्छी बात हे --पर हद में |

"पलाश" ने कहा…

जीवन में पाला ओ नही पडा लेकिन हाँ आज तक स्कूल मे पडी वो कहानी याद है जिसमे एक कंजूस पथरीले रास्ते मे हाथ मे लेकर इसलिये चलता है कि अगर जूते खराब हो गये , तो मे पैसा खर्च करना पडेगा ।

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

* श्री योगेन्द्र पाल सा.,
* डा. दिव्याजी,
* Patali-The-Village
आभार आपका, इस संकुचित मानव प्रवृत्ति पर अपने संस्मरण बांटने के लिये.
* श्री सतीश सक्सेना जी,
यही कारण है कि ऐसे लोगों के सम्पर्क में आने पर अक्सर कोफ्त ही होती है ।

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

* श्री अतुल श्रीवास्तवजी,
* श्री ज्ञानचंद मर्मज्ञ सा.,

वाकई लोगों को चूस-चूसकर भेला करना और फिर उस धन को मिट्टी सदृश पटककर दुसरों को तरसाना. भगवान ही बचाए ऐसे महारथियों से.

* दर्शन कौर धनोएजी,

जिस एक सीमा में आप कंजूसी का समर्थन कर रही हैं उसे मितव्ययिता कहते हैं जो वास्तव में आवश्यक भी होती ही किन्तु मितव्ययिता और कंजूसी दोनों बिलकुल अलग-अलग स्थितियां हैं ।

* "पलाश" जी,

अच्छी कहानी का उल्लेख किया आपने, इस कंजूसी के संदर्भ में.

निर्मला कपिला ने कहा…

कुछ सोचने पर मजबूर करता है आलेख। तब तो अपने नेता भले जो धन को छुपा कर बैंकों मे रख रहे हैं ये उनके मरने के बाद देश के काम आयेगा।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

kya kanjusi hai!!!

ajit gupta ने कहा…

कुछ लोगों ने पैसे को भगवान मान लिया है, बस इसी को बचाकर रखना चाहते हैं और धन के उपयोग की जगह उसके रखवाले बन जाते हैं। कोई अत्‍यधिक कंजूस है तो कोई पराए पैसे से भी ऐश करता है। भारत में ऐसे बहुत कम ही लोग है जो धन का सदुपयोग करते हैं। हमने भी ऐसे कंजूस देखे हैं।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

जिस धन का उपयोग न हो वो मिट्टी के समान ही है ..अच्छी कथा ..

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

ऐसे कंजूस भरे पडे हैं चारो ओर।

---------
अंतरिक्ष में वैलेंटाइन डे।
अंधविश्‍वास:महिलाएं बदनाम क्‍यों हैं?

: केवल राम : ने कहा…

चिंतनपरक लेख ..शब्दों का बड़ी चतुराई से प्रयोग किया है ....

वन्दना ने कहा…

ऐसे कंजूस हर जगह पाये जाने वाले प्राणी है और इनका होना समाज के लिये हानिकारक नही क्योंकि जो भी मिलेगा समाज को ही मिलेगा आखिर मे…………बस जब तक ज़िन्दा रहे ये लोग इनसे बचकर चलना चाहिये।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

आदमी क्या लेकर आया है जो sath लेकर जायेगा ।
aisi कंजूसी भी kis काम की ।

amit-nivedita ने कहा…

maximum log aise hi hain...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हाँ, पाला पड़ा है।

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

* सुश्री निर्मला कपिलाजी,
यदि नेता उस धन को विदेशी बैंकों में रखकर मर रहे हैं तो देश के काम भी कैसे वह धन आ पा रहा है ?

* श्री सुरेन्द्र सिंह " झंझट "
शुक्रिया आपका अपने विचार व्यक्त करने के लिये.

* दीदी श्री अजीत गुप्ताजी,
धन का बचाना भी आवश्यक लगता है और आवश्यकता के समय 100 की बजाय 110 खर्च करना भी आवश्यक लगता है. लेकिन जो बचाते ही चले जावें और खर्च करने के समय जेब पर ताला लगाकर बैठे रहें ऐसे ही लोगों के कारण यह आलेख आकार ले पाया है ।

* सुश्री संगीता स्वरुपजी,
वाकई ऐसे लोग ही उस धन को मिट्टी सदृश बना देते हैं ।

* श्री केवल रामजी,
वाकई चिंतनपरक, शब्द तो आवश्यकता के समय जिस रुप में भी आकार ले लें । आभार सहित..

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

* सुश्री वन्दनाजी,
ऐसे धुरंधरों से बच पाना भी कहाँ सम्भव हो पाता है.

* डॉ टी एस दराल सरजी,
आदमी न कुछ लाया है और न कुछ साथ ले जा पायेगा इसीलिये तो जो कुछ ईश्वर की ओर से उसे मिला है उसका समयानुसार व्यवस्थित उपयोग कर ही लेना चाहिये.

* Shri amit-niveditaji,
मेक्जिमम लोग तो ऐसे नहीं हैं वर्ना समारोहों के अवसर पर 125/- रु. से लगाकर 1250/- रु. प्रति प्लेट का भोजन लोग कैसे अपने मेहमानों के लिये उपलब्ध करवा देते होते ?

* श्री प्रवीण पाण्डेयजी,
आभार आपका, अपना मत प्रकट करने के लिये.

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत सही लिखा है आपने।
बहुत वास्ता पड़ता है कंजूसों से।

राज भाटिय़ा ने कहा…

अजी हमारा पाला पडा हे इस से भी बडे कंजूसो से, जिन्होने आज तक किसी को इस लिये घर पर नही बुलाया कि कही चाय ना पिलानी पड जाये.... ओर यह लोग इतने महान कंजूस होते हे कि पेसा होने के वाजूद भी नमक से घटिया आटे की रोटी खाते हे, पता नही पेसा कब काम आयेगा, एक दो बार पुछा तो मालूम पडा बुरे समय के लिये बचत कर रहे हे, तो आज कोन सा समय अच्छा हे इन के लिये, अजी दुनिया रंगबिरंगी हे, एक बुजुर्ग अपने सगे देवर की लडकी की शादी मे सिर्फ़ इस लिये नही गई की शगून देना पडेगा

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

बहुत सुन्दर अनुभव कथा लेख ..
एक चुटकुला
एक कंजूस चौथी मजिल पर छत साफ़ करते समय फिसल गया .. छत के ठीक नीचे उस जगह पर रसोई की खिडकी थी ..
नीचे गिरते समय खिडकी से सामने से चिल्लाता हुवा गिरा - .अरी ..मेरे लिए खाना मत चड़ा देना आज ...

आपकी यह पोस्ट बहुत अच्छी लगी ..यहा शुक्रवार को चर्चामंच पर होगी.. आप वह आ कर अपने विचार से अनुग्रहित करियेगा ...

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

इसी सन्दर्भ में मेरी एक पोस्ट /कथा जो..विश्व्गाथा ब्लॉग में छपी थी ...

http://vishwagatha.blogspot.com/2011/01/blog-post_17.html?spref=fb

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

* श्री मनोज कुमारजी,
आभार आपका प्रतिक्रिया देने के लिये. इस बार बहुत दिनों बाद आपका ब्लाग पर आना हुआ है.

* श्री राज भाटियाजी सा.,
अच्छे संस्मरण बताये आपने बुरे दिनों के नाम पर बचत करने वाले कंजूसों के. धन्यवाद...

* डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीतिजी,
आभार आपका महाकंजूस के चुटकुले को शेयर करते हुए इस आलेख को चर्चामंच में स्थान देने के लिये. विश्वगाथा ब्लाग की आपकी प्रस्तुति 'दानी मितव्ययी' बिल्कुल उत्तम दर्जे का उदाहरण प्रस्तुत करती है ।

anshumala ने कहा…

हा मेरे पड़ोस में भी ऐसे ही कंजूस लोग है देखने में अच्छे खासे है और लम्बी लम्बी हाकते भी लेकिन तब बहुत गुस्सा आता है जब उनको अपनी छोटी सी बेटी की बहुत तबियत ख़राब होने पर सरकारी अस्पताल में ले जा कर इलाज कराते देखती हूँ नाराज भी होंगे की वहा अच्छा इलाज नहीं है कोई ध्यान नहीं देता बेटी और बीमार ना हो जाये पर उसे किसी दूसरे अच्छे डाक्टर के पास नहीं ले जाते है वो भी हैसियत होते हुए भी |

sagebob ने कहा…

आपका कंजूस पुराण बहुत ही बढ़िया रहा.
शुभ कामनाएं

Shambunath ने कहा…

दानवीरता पर बड़ा ही रोचक और अप्रतिम आलेख पढ़कर आनंद आ गया...प्रस्तुति बिल्कुल नए ढंग की थी....

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

* anshumalaji,
धन्यवाद आपको अपना संस्मरण प्रस्तुत करने के लिये.

* sagebobji,
आभार... आपको आलेख पसन्द आया, मेरा भी लिखना सार्थक रहा.

* Shambunathji,
आपके पधारने व इस ब्लाग को फालो करने के लिये धन्यवाद...

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

दिलचस्प संस्मरण...दिलचस्प कथा....
बधाई।

रामपुरी सम्राट श्री राम लाल ने कहा…

सुंदर बात, क्या फर्क पड़ता है सोना हो या पत्थर जब इस्तेमाल ही नहीं करना है

आप "हास्य व्यंग ब्लोगर्स महासभा" मे श लेखक के तौर पर आमंत्रित है .... अपनी ई-मेल आई डी टिप्पणी बॉक्स मे दे या मुझे ई-मेल करे
hvba@rocketmail.com

रामपुरी सम्राट श्री राम लाल ने कहा…

या मुझे इस आई डी पर मेल करे :-
ramlal@hasyavyang.tk

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

दरअसल कंजूसी के पीछे आदमी का विगत अभावग्रस्त जीवन का लम्बा संघर्ष होता है। आज भले ही वह धनी हो जाय लेकिन आदत नहीं सुधरती। उनके बच्चे अपने पिता की कंजूसी से चिढ़ते हैं, शाह खर्च होते हैं मगर वे अपनी आदत नहीं बदल सकते।

मैं भी अपने पिता को महान कंजूस कहता था। एक पैसा बचाने के लिए वे 5 किमी पैदल चल सकते थे। आज वे नहीं हैं तो जान पाया हूँ कि उतना बड़ा घर उनकी महान कंजूसी से ही चल पाता था।
...बढ़िया पोस्ट।

Udan Tashtari ने कहा…

जय हो कजूँस महाराज की..बेहतरीन.

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

सुशील भाई आप ने हास्य और व्यंग्य का अनोखा संगम प्रस्तुत किया है| यह लेख समाज के लिए सचमुच एक आईना है| बधाई मान्यवर|

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर व्यंग..आज भी ऐसे कंजूसों की कमी नहीं है..बहुत सुन्दर पोस्ट..

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