1.2.11

लालच का अंत ?



        किसी गांव में एक समय चार मित्र बेहतर भविष्य की तलाश में भोजन-पानी की आवश्यक तैयारी के साथ शहर की ओर निकले । रास्ते में विश्राम के समय एक सन्यासी से मुलाकात के बाद उन्होंने अपना मकसद उन सन्यासी को बताया, तब सन्यासी ने उन्हें चार बत्तीयां देते हुए कहा कि सामने दिख रही पहाडी पर तुम जाओ । जहाँ भी कोई बत्ती गिरे वहीं थोडी खुदाई करने पर तुम्हें तुम्हारे उद्देश्य की पूर्ति जितना धन प्राप्त हो जावेगा । सभी ने आपस में विचार-विमर्श कर सन्यासीजी को धन्यवाद दिया और पहाडी की ओर चढना प्रारम्भ किया ।
 
          कुछ दूर चढने पर एक बत्ती गिर गई । सबने वहाँ खुदाई की तो अन्दर लोहा ही लोहा दिखने लगा । एक मित्र ने कहा कि अपना मकसद इस लोहे को बेचकर पूरा हो सकता है । किन्तु बाकि तीनों मित्रों को उसकी बात समझ में नहीं आई । तब वह मित्र वहीं रुककर अपने लिये उस लोहे के भण्डार को ले जाने की व्यवस्था में लग गया और शेष तीनों मित्र आगे निकल गये ।
 
           और थोडी चढाई चढने पर फिर एक बत्ती गिरी । वहाँ तीनों ने खुदाई की तो भरपूर तांबा वहाँ मौजूद पाया । उनमें से फिर एक मित्र बोला ये उस लोहे की तुलना में कहीं अधिक बेहतर विकल्प है और इसमें हम तीनों का भविष्य बन सकता है । तब बाकि दो मित्रों को उसकी बात सही नहीं लगी और वह मित्र तांबे के द्वारा अपना भविष्य संवारने वहीं रुक गया व शेष दोनों मित्र फिर आगे चढने लगे । 
 
            कुछ और उपर चढने पर एक बत्ती फिर गिरी । दोनों मित्रों ने वहाँ खुदाई करके देखा तो वहाँ चांदी की ढेरों सिल्लीयां निकली ।
तब दोनों में से एक मित्र की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा । उसने दूसरे से कहा- वे दोनों तो लोहे और तांबे में ही रह गये यहाँ तो इतनी चांदी मौजूद है कि हमें अब जीवन में कोई कमी ही नहीं रहेगी । किन्तु दूसरे मित्र ने कहा कि ये चांदी तुम ले जाओ मैं अभी और आगे जाऊंगा । तब संतुष्ट मित्र चांदी ले जाने की व्यवस्था में लग गया और दूसरा फिर उपर की ओर निकल गया ।
 
            वह थोडा ही और उपर पहुंचा कि चौथी बत्ती भी गिरी । उसने वहाँ खुदाई की तो उसकी उम्मीद के मुताबिक वहाँ सोने का खजाना दिखने लगा । अब तो उसकी प्रसन्नता की सीमा न रही । उसने उपर की ओर देखा तो पहाडी की चोटी थोडी ही दूरी पर दिख रही थी । तब उसने सोचा कि ये पहाड तो बहुमूल्य संपदाओं से भरा पडा है और ये बत्तियां तो उन स्वामीजी ने प्रतीक रुप में ही दी हैं । इस सोने पर तो मेरे अलावा अब और किसी का कोई हिस्सा भी नहीं बचा है किन्तु जिस तरह इस पहाड पर लोहा, तांबा, चांदी व सोना मिला है ऐसे ही इस पहाडी की चोटी पर हीरे-जवाहरात भी अवश्य ही मौजूद होंगे । लगे हाथों मैं उस चोटी पर भी देख लूं ।
 
           यह सोचकर वह व्यक्ति उस पहाडी की चोटी पर पहुंचा, लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से उसे वहाँ एक ऐसा आदमी दिखा जो हिल-डुल भी नहीं पा रहा था और उसके सिर पर एक बडा सा चक्र धंसा हुआ था जो निरन्तर घूम रहा था । बडे आश्चर्य़ के साथ उसने उस चक्र वाले व्यक्ति से पूछा- आप कौन हैं और आपके सिर में ये चक्र कैसे फंसा घूम रहा है ? उसके इतना पूछते ही चमत्कारिक तरीके से वह चक्र पहले से मौजूद व्यक्ति के सिर से उतरकर पहाड चढने वाले उस अन्तिम चौथे मित्र की सिर में धंस गया । मुक्त होने वाला व्यक्ति उससे बोला- धन्यवाद तुम्हारा जो अपने लालच के कारण तुम उपर तक आगए । अब न तुम्हें कभी भूख-प्यास लगेगी और न ही ये चक्र तुम्हारे सिर से हटेगा । हाँ यदि कोई तुमसे बडा लालची तुम्हारी किस्मत से यहाँ तक आ जावेगा तभी तुम अपनी मुक्ति का कामना कर सकते हो । मैं तो अब इस बोझ से मुक्त होकर जा रहा हूँ ।
 
            पुरातन काल की ये कथा कितनी सत्य या असत्य है ये तो शायद कोई भी नहीं जानता किन्तु लालच का भूत तो ऐसा ही है जिसकी गिरफ्त में देश-दुनिया की नामी-गिरामी शख्सियतें भी सर पर ये चक्र धंसवाए भोजन-पानी कि चिन्ता से कहीं अधिक और बडे भण्डार की तलाश में घूम रही हैं, और भ्रष्टाचार  व विध्वंस के नये-नये तरीके इजाद भी करवा रही हैं ।  आपका
क्या ख्याल है ?



26 टिप्पणियाँ:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

लालच ऐसी ही चीज है।

Patali-The-Village ने कहा…

लालच बहुत बुरी बाला है|

सतीश सक्सेना ने कहा…

बेचारे के हीरे ........

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

लालच न जाने कहाँ ले जाये, एकान्त, मुक्ति की कामना में।

Rahul Singh ने कहा…

निन्‍यान्‍बे का चक्‍कर.

निर्मला कपिला ने कहा…

तभी तो कहती हैं कि लालच बुरी बला है। आभार।

: केवल राम : ने कहा…

लालच बुरी बला ....

वन्दना ने कहा…

तभी तो कहा है लालच बुरी बला है।

ZEAL ने कहा…

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बेहद प्रेरणादायी प्रसंग।

करोड़ों के घोटाले के बाद भी इनका पेट नहीं भरता। चक्र इनके सर से ज्यादा दूर नहीं है।

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सुज्ञ ने कहा…

लालच को रेखांकित कर सार्थक बोध दिया गया है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

मा गृधः कस्य स्वधनम्!

smshindi By Sonu ने कहा…

लालच बुरी बाला है|

smshindi By Sonu ने कहा…

मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है !

भाग कर शादी करनी हो तो सबसे अच्छा महूरत फरबरी माह मे.............

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

आ. शास्त्रीजी सा.,
मा गृधः कस्य स्वधनम् ! यदि आपके इस संस्कृत पंक्ति का अर्थ लालच बुरी बला से कुछ हटकर हो तो कृपया हिन्दी में भी इसका अनुवाद पाठकों के हित में अवश्य बतावें । धन्यवाद सहित...

sandhya ने कहा…

लालच को रेखांकित कर सार्थक बोध दिया गया है..........

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

लालच बुरी बला है
इस सच्चाई से रूबरू कराती है आपकी कथा

एस.एम.मासूम ने कहा…

सही मुद्दा
.
ज़रा सोंच के देखें क्या हम सच मैं इतने बेवकूफ हैं

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

bahut hi sunder shikh deti achchhi bodh katha...... sunder prastuti.

Atul Shrivastava ने कहा…

अच्‍छी सीख्‍ा देती कहानी।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

अच्छी बोधकथा..... सच्ची सीख देती

anshumala ने कहा…

ये कहानी लिखने के लिए धन्यवाद अभी हाल में ही इसी कहानी का जिक्र मैंने सुज्ञ जी के ब्लॉग पर किया था तब उन्होंने कहानी का विस्तार पूछा था अब उन्होंने इसे यहाँ पढ़ा लिया |

निर्मला कपिला ने कहा…

जो ख्याल आपका है वही हमारा है। बहुत अच्छी सार्थक बोध कथा। बधाई।

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

अंशुमालाजी
वर्षों पूर्व लगभग अपने बचपन में यह कहानी मैंने किसी पुस्तक में पढी थी जिसकी पुनरावृत्ति बाद में किसी समाचार पत्र में भी देखी थी इसे ही वर्तमान संदर्भों में आप सबकी सेवा में प्रस्तुत कर देने का प्रयास किया है । धन्यवाद...

सोमेश सक्सेना ने कहा…

अच्छी सीख है. धन्यवाद.

रंजना ने कहा…

प्रेरणादायी कथा...सतत स्मरणीय ...

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

वर्तमान संदर्भों में अच्छी कथा है.

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