15.6.11

बच्चों के सर्वांगीण विकास में माता-पिता की भूमिका...


          किसी भी दम्पत्ति के लिये उनके एक या अधिक बच्चे वैसे ही होते हैं जैसे दाम्पत्य के उपवन में उपजे सुन्दर व कोमल से फूल और आज के एक ओर कैरियर व दूसरी ओर मँहगाई की प्रधानता वाले युग में तो जहाँ माता-पिता प्रायः दूसरे बच्चे को जन्म देने के बारे में सोच भी नहीं पाते हों वहाँ बच्चे के लालन-पालन में प्यार, स्नेह व नरमदिली का प्रतिशत स्वमेव ही बढता चला जा रहा है, ऐसे में उनके प्रति मार-पिटाई की बात किसी भी आधुनिक सोच वाले पाठक के मन में सही लग ही नहीं सकती । मेरी पिछली पोस्ट "पिटाई से मुक्ति - वर्तमान पीढी का सुख" वास्तव में मैंने कुछ मनोरंजक शैली में लिखने की कोशिश की थी जिसका शायद अधिकांश पाठकों के अन्तर्मन में यह सन्देश गया कि मैं निर्ममता से बच्चों की मार-पिटाई के पक्ष में हूँ जबकि वास्तव में ऐसा बिल्कुल नहीं था शायद इसीलिये ये दूसरी पोस्ट करीब-करीब इसी विषय पर जन्म ले रही है ।

          पीटने का अभिप्राय किसी सीमा तक हल्की-फुल्की या दिखावटी सजा से होता है, अब वे सभी लोग जो यह सोचते हैं कि हम बच्चों से संवाद बनाये रखकर व उन्हें सही-गलत का अन्तर बताते हुए उनका सर्वांगीण विकास कर सकते हैं, यह धारणा आधी या पौनी सच तो हो सकती है किन्तु पूरी सच कभी नहीं हो सकती क्योंकि यदि ये पूरी सच होती तो शायद पूर्व काल से यह कहावत जन्म ही नहीं ले पाती कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते । 
 
          संभवतः बच्चों की तीसरे-चौथे वर्ष की नासमझ उम्र ऐसी होती है जहाँ बच्चा जिद्दी करके अपनी बात माता-पिता से मनवा लेना सीखना प्रारम्भ कर लेता है और जितनी छोटी उम्र उतनी ही छोटी उसकी जिद भरी फरमाईशें होती हैं जिनके लिये माता-पिता ही नहीं दादा-दादी व नाना-नानी जैसे निकटतम रिश्तेदार भी ये मानकर ही चलते हैं कि अभी तो नासमझ है धीरे-धीरे सब समझने लगेगा फिलहाल तो इसकी ये जरासी फरमाईश पूरी कर ही दो । जबकि बढती उम्र के साथ बच्चे को भी ये समझ में आता चलता है कि अब मुझे कौनसे तरीके से अपनी बात (जिसे हम जिद कह सकते हैं) मनवानी है । इधर माता-पिता की व्यस्तता व आमदनी भी बढ रही होती है नतीजा 99% अवसरों पर बच्चा इस जद्दोजहद में मानसिक रुप से अपने अभिभावकों से जीतता ही चला जाता है और जब यही आदत उम्र के मुताबिक बढती चलती है तो ? 
 
          मैं ऐसे तीन लोगों को तो व्यक्तिगत रुप से जानता हूँ जिन्हें बच्चों के बचपन में इस नरमदिली से परिपूर्ण पालन-पोषण के कारण उनके युवावय में आने पर एक को पुत्र के दोस्तों के साथ संगीन अपराध कर फरार हो जाने के कारण लगभग 6 दिन पुलिस कस्टडी में रहना पडा, दूसरे को व्यापार में अपनी वह साख जिसे बनाने में उनकी जिन्दगी खप गई थी पुत्र के युवावय में आकर पिता के समानान्तर कुर्सी पर बैठने के बाद उनकी गैर मौजूदगी में ये सोचकर उटपटांग सौदे कर लेने के कारण कि हमारा तो अपना व्यवसाय है और हमें वे खर्च तो लग ही नहीं रहे हैं जो हमारे ग्राहकों को लग रहे हैं और मेरे द्वारा किये जाने वाले इस सौदे में मोटी आमदनी तो तय है जो अपने पिता से मांगे बगैर मेरे व्यक्तिगत उपयोग में आ सकेगी ऐसे सौदों में जो मोटे नुकसान उनके व्यापार पर आ गये उसकी भरपाई में पिता को मुंह-मांगे ब्याज पर बाजार से पैसे ले-लेकर लम्बे समय की जद्दोजहद के बाद अपनी साख बचानी पडी जिससे कुछ समय बाद अन्ततः उनका शीघ्र प्राणान्त भी हो गया, और तीसरे एक सज्जन जिन्होंने अपने पिता के जमाने में राजकुमारों जैसा पालन-पोषण पाया । पिता के मरणोपरान्त उनका व्यवसाय भी कुशलतापूर्वक संचालित कर अपनी पिता के जमाने की हैसियत को आगे भी बढाया किन्तु  स्वयं के पुत्र की दखलन्दाजी के बाद हुए करोडों के नुकसान ने न सिर्फ उनके पूरे परिवार को सडक पर ला दिया बल्कि पचास पार की उम्र में आने के बाद एक निर्जन से क्षेत्र में 8x10 की किराने की निहायत ही मामूली सी दुकान में बैठकर अपना आगे का जीवन व्यतीत करना पडा ।
 
          जैसा कि अभी हम अपने इर्द-गिर्द देख रहे हैं ये परिवारों में एक बच्चे का युग ही चल रहा है, और लगभग 20 वर्ष पूर्व जब बढती आबादी के विस्फोट को रोकने के लिये चीन ने एक बच्चे की नीति राष्ट्रीय स्तर पर घोषित की थी तब सरिता पत्रिका में मैंने एक बच्चे के दुष्परिणाम से सम्बन्धित एक लेख पढा था उसके मुताबिक जब परिवार में एक बच्चा होता है तो उसे सम्हालने वाले छः लोग हमेशा उसके इर्द-गिर्द रहते हैं दो माता-पिता, दो दादा-दादी और दो नाना-नानी । नतीजा बच्चे के मुँह खोलने के पहिले ही उसकी फरमाईश पूरी हो जाती है, अपने खिलौने व अन्य कोई वस्तु उसे किसी भाई-बहिन से शेअर नहीं करनी पडती, ये सभी पैरेन्ट्स मिलकर उसके प्रति अपने लाड-प्यार के चलते उसे स्वयं कोई निर्णय नहीं लेने देते और होश सम्हालने से लगाकर बडे हो जाने तक बगैर प्रयासों के सब-कुछ पाते चले जाने वाला वह बच्चा निर्णय लेने में अपरिपक्व और मेरा है कि भावना के साथ सामाजिक, पारिवारिक रुप से करीब-करीब स्वार्थी होता चला जाता है । अब ऐसे बच्चे उम्र के स्वनिर्णय लेने के दौर में आकर कितने परिपक्व निर्णय ले पाएंगे यह बात सहज ही समझी जा सकती है ।
 
          इसलिये प्रेम-प्यार, लाड-दुलार व बच्चों के प्रति स्नेह की भावनाओं की तमाम प्रबलता के बावजूद मेरी समझ में ये ध्यान रखना सदैव बच्चे के हित में ही साबित होता है कि हम उसमें जिद करने की भावना को बने जहाँ तक न पनपने दें । जिसके लिये हमें उसकी नासमझ उम्र से ही प्रयासरत होना पडेगा क्योंकि 20-22 वर्ष का हो चुकने पर तो उसका जैसा भी विकास  तब तक हो चुका होगा, उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव की कल्पना भी बेमानी ही साबित होगी । इस सन्दर्भ में मुझे ड्रीम गर्ल, स्वप्नसुंदरी के रुप में देश-दुनिया में विख्यात सुप्रसिद्ध हीरोईन हेमा मालिनी का संस्मरण अनुकरणीय लगता है कि घूमने-फिरने के दौरान उनके बच्चों ने जब भी जिस चीज के लिये भी जिद की हेमा मालिनी ने संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद भी कभी उनकी जिद पूरी करने के लिये अपनी दोनों बच्चियों को वह वस्तु नहीं दिलवाई । अलबत्ता दो दिन बाद स्वयं जाकर वह उसी वस्तु को अपनी बच्चियों को खरीदकर लाकर दे देती किन्तु फरमाईश के वक्त या जिद के बाल हथियार के वक्त तो उन्होंने वह वस्तु कभी भी खरीदकर बच्चियों को नहीं दी । निःसंदेह इससे जहाँ उनकी बच्चियों को उस वस्तु के लिये तरसना नहीं पडा वहीं उनमें जिद करके अपनी बात मनवा लेने की भावना भी कभी आगे नहीं बढ पाई ।
 
          एक डाकू के द्वारा डाकेजनी के दौरान स्वयं को पकड में आने से बचाव के प्रयास में एक व्यक्ति की हत्या हो गई । वह पकड में भी आ गया और अपराध सिद्ध हो जाने की स्थिति में उसे मृत्यु-दंड की सजा मिली । जज के यह पूछने पर कि क्या तुम्हें अपने बचाव में कुछ कहना है उस डाकू ने कहा कि मैं अपनी माँ से कान में कुछ कहना चाहता हूँ । कोर्ट की इजाजत मिलने पर माँ उसके पास गई और अपना कान उस डाकू पुत्र के मुँह के पास ले जाकर उसकी बात सुनने के लिये उसके मुँह के नजदीक माँ ने सटाया और देखते ही देखते उस डाकू पुत्र ने अपनी माँ के उस कान को दांतों से चबाकर लहूलुहान कर दिया । जज ने जब उससे पूछा कि तुमने ऐसा क्यों किया तो उस डाकू ने जवाब दिया कि मैं जब पहली बार स्कूल के अपने सहपाठी की पेन्सिल चुराकर घर लाया था तब इसने मुझे रोकने या सजा देने के बजाय उस पेन्सिल को घर में रख लेने दिया था । यदि ये उसी दिन मुझे उस पेन्सिल को चुराकर लाने के लिये दण्डित कर देती तो आज मुझे यह दिन नहीं देखना पडता । 
 
          तो बच्चों के किसी गलत आचरण को हम समय रहते सख्त व्यवहार के द्वारा यदि नहीं रोक पावें तो समय आने पर दुनिया तो दूर खुद बच्चे भी हमारी उस कमजोरी के लिये हमें ही जिम्मेदार ठहराएंगे । अतः मारना-पीटना भले ही हम आवश्यक न समझें किन्तु आवश्यकता के समय यदि हम उनके किसी अनुचित व्यवहार के प्रति उन्हें सख्ती से न रोक पावें और यह समझते रहें कि मैंने उसे समझा दिया है और आगे से सब ठीक हो जावेगा तब क्या आप जानते हैं कि उसे समझाने वाले उसके मित्र वर्ग में ऐसे लोग भी हैं जिनकी स्वार्थपरक समझाईश आपकी समझाईश से बच्चे के मन में उपर ही चलेगी । 
 
          इसलिये मारना भले ही गलत हो किन्तु बच्चे के समग्र विकास के लिये उसके प्रति कभी-कभी सख्ती का प्रदर्शन भी न कर पाना तो मेरी समझ में ऐसा ही है जैसे हम बगैर ब्रेक की कार में यात्रा कर रहे हों । बच्चा जैसे-जैसे बडा होता जावेगा बगैर ब्रेक के आपकी उस कार की गति उतनी ही बढती जावेगी और फिर वो हमें कहाँ ले जाकर भिडवा देगी और उसका फिर क्या परिणाम होगा इसकी सहज ही कल्पना भी की जा सकती है । निःसंदेह बच्चों को मारना गलत है किन्तु कभी अवसर आने पर पूरी सख्ती से उसे उसके किसी क्रिया-कलाप के लिये रोकना तो न सिर्फ उसके, स्वयं के और परिवार के बल्कि समाज के हित में भी आवश्यक हो ही जाता है । बच्चे को सिर्फ ये समझ में आते रहना आवश्यक है कि मुझसे यदि दूसरी-तीसरी बार कुछ गलती हुई तो उसके लिये मुझे अपने माँ-पिता अथवा प्रशिक्षक के क्रोध का सामना करते हुए सजा भी भुगतना पड सकती है । यही एक भावना हमारे बच्चे के मन में उम्र के अनुसार विकसित होती रहे उसके व्यवस्थित विकास के लिये इतना तो मैं व्यक्तिगत रुप से आवश्यक मानता हूँ । बेशक मारना वो अंतिम ब्रह्मास्त्र हो सकता है जिसका प्रयोग बहुत-बहुत ही आवश्यक होने पर एकाध बार कभी किया जा सके क्योंकि बार-बार ब्रह्मास्त्र यदि चलाने की सोची भी जावे तो न सिर्फ वो ब्रह्मास्त्र भी बोथरा या बेअसर हो जावेगा बल्कि बच्चा भी ये सोचकर ढीठ होता चला जावेगा कि आप मार ही तो सकते हो, लो और मार लो । 

          अब यदि अपने बच्चे के दुनियावी विकास के प्रति मेरा ये नजरिया अब भी आपको गलत लगता हो तो फिर मैं यही कहूँगा कि समझ अपनी-अपनी । 


23 टिप्पणियाँ:

Jyoti Mishra ने कहा…

I agree with each point of yours.
It was a nice read... thanks for sharing.

कुश्वंश ने कहा…

एक दम सटीक और दमदार विश्लेषण है आपका, स्नेह करने और जिद पूरी करने में अंतर समझना चाहिए

ajit gupta ने कहा…

बच्‍चा जन्‍म के साथ ही समझदार होता है, उसे पता है कि मुझे कब रोना है। उसका मनोविज्ञान इतना उच्‍च कोटी का होता है जितने की कल्‍पना तो बड़े कर भी नहीं पाते। अपनी बात मनवाने के सारे ही पैंतरे उसे आते हैं। लेकिन बच्‍चा बड़ा होकर कहीं गलत दिशा में ना चले जाए इसके लिए तो माता-पिता की सतत निगरानी की आवश्‍यकता होती है। ना ऐसे में मारपीट काम आती है और ना ही डाँट। एक मनोचिकित्‍सक जैसा ही बर्ताव करना पड़ता है, यदि माता-पिता समझदार हैं तो। कई बार तो माता-पिता को भी पता नहीं पड़ता कि उनका बच्‍चा गलत रास्‍ते पर है, यहाँ तक की वे हमेशा ही उसका पक्ष लेते हैं। मुझे तो लगता है कि अधिक से अधिक संवाद होना चाहिए जिससे बच्‍चे की मानसिकता का पता चलता रहे। शेष तो भगवान की मर्जी।

आकाश सिंह ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति के लिए धन्यवाद |

सतीश सक्सेना ने कहा…

एक बढ़िया पोस्ट लिखी है आपने !
बच्चों के भविष्य में एक समझदार माता पिता की भूमिका का बहुत महत्व होता है !

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

बिल्कुल सही लिखा है !

Vishu Singh Disodia ने कहा…

bhut acchi abhivaykti

अमीत तोमर ने कहा…

एक बार इसे जरुर पढ़े कॉग्रेस के चार चतुरो की पांच नादानियां | http://www.bharatyogi.net/2011/06/blog-post_15.html

prerna argal ने कहा…

ye baat to shi hai ki jyaadaa pyaar bachchon ko jiddi bana deta hai.isliye kabhi kabhi unke saath sakati karane main koi harj nahi.hain kyonki mata-pitaa jo karenge bachchon ki bhalaai ke liye hi karenge.aur bachchon ko sahirah dikhaanaa he3r parents ka kartavya hai,bahut achcha lekh.badhaai.


please visit my blog.thanks.

निर्मला कपिला ने कहा…

बिलकुल आपसे सहमत हूँ।

Patali-The-Village ने कहा…

बच्चों के भविष्य को लेकर माँ बाप की अहम् भूमिका होती है| बहुत सुन्दर लेख| धन्यवाद|

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" ने कहा…

bahut achha vishleshan..

insaan vaisa hi banta hai jaisa wah dekhta hai, sunta hai aur sochta hai...

chahu aur ka watawaran aur margdarshan hi uske jeevan ki disha tay karta hai...

sunder aalekh...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बच्चे समझदार हों तो प्यार करने से भी नहीं बिगड़ते हैं।

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच{16-6-2011}

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

बच्चों के सर्वांगीण विकास में माता-पिता की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है.
बहुत महत्वपूर्ण लेख है.

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

आदरणीय सुशील बाकलीवाल जी नमस्कार बहुत ही सार्थक लेख आप का बच्चों को प्यार दुलार के साथ ग्यान अपनी संस्कृति बुरे कार्य से रोकना सब सिखाना है उसमे परहेज नहीं सत्य कहा आप ने
शुक्ल भ्रमर ५

Vivek Jain ने कहा…

बहुत ही ज्ञानवर्धक है ये आलेख,
आभार,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Kunwar Kusumesh ने कहा…

Agreed.

सदा ने कहा…

बहुत ही ज्ञानवर्धक प्रस्‍तुति ।

mahendra srivastava ने कहा…

बहुत सुंदर.. क्या बात है

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

अभिभावक और बच्चों का रिश्ता एक तरफ सहज ही प्रेमपूरित और दूसरी तरफ बहुत ही संवेदनशील होता है| दोनों पक्षों को समय के अनुसार समझने की जरूरत है|

यादें ने कहा…

आडियो फाइल भेजने के लिये ,कृप्या अपना ई-मेल दें !
धन्यावाद!

Gagan Kundra ने कहा…

very well said sir

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आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं के लिये धन्यवाद...

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