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29.8.11

अण्णा आंदोलन : सफलता के साथ आशंकाएं


          देश के राजतंत्र में विकराल रुप से बढ चुके भ्रष्टाचार से प्रत्यक्ष जुडी मंहगाई की मार से त्रस्त आम जनता की जो ऐतिहासिक शक्ति अण्णा के आंदोलन को समर्थन देने देश भर में जुटी उससे खौफ खाकर सभी राजनैतिक दलों ने अत्यन्त मजबूरी की स्थिति में अण्णा की मांगों को संसद में ध्वनिमत से पारित तो कर दिया क्योंकि यदि इतने लम्बे अनशन और इतने प्रबल जनसमर्थन के दौरान अण्णा के जीवन के साथ कुछ भी अप्रिय हो जाता तो सत्तापक्ष ही नहीं वरन सभी राजनैतिक दलों के इन प्रतिनिधियों को अगले आमचुनाव में अपने अस्तित्व  के बचाव का खतरा स्पष्ट दिखने लगा था इसलिये अनशन तुडवाने के लिये अण्णा की ये मांगें स्टेंडिंग कमेटी में विचार हेतु भेज दिये जाने की स्थिति स्वीकार कर लेने के बाद एक बार तो ये सभी राजनैतिक दल इस समय तो देश व दुनिया के सामने अपना दामन बचा ले गये किन्तु स्टेंडिंग कमेटी में मसला भेज दिये जाने के बाद गेंद फिर इन्हीं के पाले में पहुंच जानी है और उस कमेटी में भी  इन्हीं धुरंधर राजनीतिज्ञों को इस कानून को लागू करने का फैसला करना है जिन्होंने इतनी विपरित परिस्थितियों में भी इस आंदोलन की खिलाफत करने के प्रयासों में संसद में भी अपनी तरफ से पुरजोर विरोध करने के प्रयासों में कोई कमी नहीं रहने दी ।

          अब जब अण्णा का अनशन समाप्त हो चुका है और धीरे-धीरे इस जनतंत्र का दबाव भी कम से कमतर ही होते चला जाना है, तो येन-केन प्रकारेण अपनी लेटलतीफ शैली में इन मुद्दों को लटकाते चले जाने के बाद कैसे इन्हें अपने निजी स्वार्थों के खिलाफ सख्त कानून बनने से रोका जा सके इस प्रकार के सियासी दांव-पेंच इनकी कार्यप्रणाली में फिर से चालू होते दिख सकते हैं और कानून बनने का मसला जब नियमों और बहुमत की आड में सप्ताहों और महिनों की हदें पार करवाते हुए वर्षों के दायरे तक लम्बित कर देने में यदि ये सफल हो जावेंगे तो इतने बडे व उग्र विरोध को भी आसानी से दबा लेने के प्रयासों में ये विशेषज्ञ अपनी ओर से कोई भी कसर कैसे बाकि रहने देंगे ?
 
          दूसरी ओर अण्णा यह भी स्पष्ट कर ही चुके हैं कि आमजन के अधिकारों की सुरक्षा व सुधार हेतु उनके अगले अभियान क्या-क्या होंगे । कहने की आवश्यकता नहीं है कि उनके द्वारा चलाये जाने वाले सभी अभियान इनके उन्मुक्त अधिकारों के दायरों को सीमित करने के एक के बाद एक प्रयास रुप में ही होंगे और उनके प्रत्येक अभियान की सफलता इनके  निजी स्वार्थपूर्ण मंसूबों को आघात पहुँचाने वाली ही होगी, ऐसी स्थिति में महात्मा गांधी के आधुनिक प्रतीक बन चुके अण्णा की आवाज व प्रयास भी किसी आकस्मिक पल में फिर किसी गोडसे के द्वारा बन्द कर दिये जाने की आशंका के प्रति भी आने वाले किसी भी कल में क्या देशवासियों को बेपरवाह रहना चाहिये ? 

16.4.11

भ्रष्टतंत्र में छवि राजावत व नीरा यादव में समानता


एक विकास की आधुनिक अवधारणाओं को जीवंत रुप देने में लगी यूथ आईकान.

और

दूसरी भ्रष्टाचार के दलदल में महाभ्रष्ट का तमगा पाने वाली. 

इनमें कैसी समानता ?


छवि राजावत  
       
          एम.बी.ए. शिक्षित, ग्राम पंचायत सोडा (राज.) की सरपंच बाई सा, आधुनिक पहनावा, आधुनिक सोच, ट्रेक्टर चालन, घुडसवारी, टेक्नोलाजी सेवी, पुरातन काल से लेकर आधुनिक परिस्थितियों पर देश-दुनिया को अपना दृष्टिकोण समझा सकने में सक्षम छवि राजावत जो अपनी विकासवादी सोच के साथ इस गांव के सरपंच का पद सम्हालते ही टीवी चेनल्स, मीडिया व इन्टरनेट पर यूथ आईकान के रुप में छा गई । 

          इनके ग्राम विकास की अवधारणा को तेजी से आगे बढाने के पुनीत उद्देश्य में अनेकों एनजीओ और कार्पोरेट भी साथ आ गये और गांव में 63 सालों से रुके पडे कार्यों को 3 साल में पूरा करवाने के महाअभियान में हर संभव मदद करने लगे । सिनेतारिका जैसी शख्सियत वाली छवि को वर्तमान में कोई अपने सार्वजनिक कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनाने का आग्रह करते दिख रहा है तो कोई उन पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाना चाह रहा है ।


नीरा यादव

          किसी जमाने में दबे और पिछडे वर्ग में विकास के विश्वास का उदाहरण बनी 1971 बैच की नीरा यादव आईएएस की परीक्षा पास कर देश की सबसे ऊंची सेवा में नौकरी करने आई थी तो दबे व पिछडे वर्ग के लोग उनका उदाहरण देते नहीं थकते थे । बुलंदशहर के वेरा फिरोजपुर गांव की रहने वाली नीरा यादव जब जौनपुर में पहली बार डी एम बनी तो जौनपुर में बाढ के इंतजाम देखने वे अपने छोटे बच्चे को पीठ पर बांधकर बचाव के इंतजाम देखने पानी में स्वयं जाती थी । 

           अब इन्हीं नीरा यादव को नोएडा विकास प्राधिकरण में 1994-95 में चेयरमेन पद पर रहते कैलाश अस्पताल और यू-फ्लेक्स ग्रुप को हजारों वर्गमीटर जमीन औने-पौने दाम में आवंटित किये जाने के साथ ही अलग-अलग सेक्टरों में प्लाट्स  और कमर्शियल भूखंडों के आवंटन में फर्जीवाडे के अपराध में महाभ्रष्ट के तमगे से विभूषित करते हुए इनके साथी अशोक चतुर्वेदी सहित 4-4 वर्ष की सजा सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई और इन्हें जिला कारावास भेज दिया गया ।

           इन पर मेरे इस लेखन का मकसद इनके भ्रष्टाचार के कारनामों को सामने लाना या महाभ्रष्टों की गिनती में शामिल होकर सजा पाना नहीं रहा है, क्योंकि ये तो कमोबेश सभी जानते हैं. बल्कि किसी समय पूरे नेक जज्बे से अपने सेवा काल का प्रारंभ करते हुए बुलंदियों की राह पर चलने वाली यही नीरा यादव देश के भ्रष्टतंत्र के साथ आटे में नमक के बराबर समझौते करते हुए कब नमक में आटे के अनुपात में आ गई शायद उन्हें खुद भी उस समय इसका आभास नहीं रहा होगा ।
  
          अब आज हमारे सामने छवि राजावत हैं इनके भी प्रारम्भिक दौर से क्षेत्र व देश की जनता को इनमें विकास को आगे बढाने की इनकी सोच व लगन शिद्दत से दिख रही है । किन्तु आज जो एनजीओ और कार्पोरेट्स इनके इस अभियान में मददगार बने दिख रहे हैं वे कब अपनी मदद के एवज में छोटे-छोटे लाभ उठाने से शुरुआत करते-कराते इन्हें भी भ्रष्टाचार के दलदल में खींच लेंगे, इनकी जागरुकता के अभाव में आगे चलकर ऐसा बिल्कुल हो सकता है ।

          अतः ऐसी किसी भी अप्रिय स्थिति से बचे रहने के लिये अपने  दादा व परिवार की फौजी विरासत को कायम रखते हुए छवि को प्रत्येक कदम पर दृढ संकल्पित रहते हुए  और अपने आसपास के सहयोगियों के पाक व नापाक इरादों पर गिद्ध दृष्टि रखते हुए ही अपने मकसद के साथ आगे बढते रहना आवश्यक होगा । अन्यथा तो-



बुलन्दी देर तक किस शख्स की किस्मत में होती है

अधिक ऊँची इमारत हर घडी खतरे में रहती है ।


9.4.11

कामा है, पूर्णविराम नहीं ।



          श्री अण्णा हजारे और उनके सक्रिय सहयोगियों की निरन्तर बढती जा रही एकजुटता आखिर रंग लाई । कपिल सिब्बल के नेतृत्व में सरकार ने प्रबुद्ध विधिविदों के जनता से विचार विमर्श के बाद बनाये जन लोकपाल बिल के सभी प्रावधानों को स्वीकार कर लेने की मांग सैद्धान्तिक रुप से मान ली है । वर्तमान सहमति के आधार पर जन लोकपाल बिल के इस क्रियान्वय में आधे सदस्य सरकार की ओर के और आधे सदस्य जनता की ओर के मिलकर काम करेंगे । इस कमेटी में दो अध्यक्ष रहेंगे जिनमें एक जनता का प्रतिनिधि होगा ।
 
          श्री अण्णा ने जनता की ओर से श्री शांतिभूषण के नाम को अध्यक्ष पद हेतु सहमति प्रदान कर दी है जबकि सरकार की ओर से श्री प्रणब मुखर्जी इसके अध्यक्ष बनाये जा सकते हैं ।  इस आंदोलन की अभी तक की जीत का सेहरा देशवासियों की एकजुटता को समर्पित करते हुए व सभी देशवासियों को बधाई देते हुए श्री अण्णा ने 9 अप्रेल 2011 को प्रातः 10:30 तक विधिवत आदेश प्रसारित होने के बाद अनशन समाप्ति की घोषणा कर दी है । 

 
           निश्चय ही श्री अण्णा हजारे के नेतृत्व में प्रारम्भ और महज 4 दिनों में देश ही नहीं दुनिया भर की जनता से मिले अपार जनसमर्थन से उत्पन्न अब तक की इस उपलब्धि को देश से भ्रष्टाचार की भयावहता पर अंकुश लगा सकने के सामूहिक प्रयास के इन परिणामों को अभी पूर्णविराम तो नहीं किन्तु कामा सृदश उपलब्धिपूर्ण अवश्य ही माना जा सकता है ।

       दुनिया में महाभ्रष्ट देशों की सूचि में निरन्तर शिखर की ओर अग्रसर हमारे देश में इस महाआन्दोलन के परिणामस्वरुप शिखर पर व्याप्त भ्रष्टाचार के उन्मूलन की दिशा में अब तक की यह उपलब्धि भी मील का पत्थर साबित हो सकेगी । ऐसा विश्वास फिलहाल तो सभी देशवासियों को करना चाहिये । 


7.4.11

भ्रष्टाचार के खिलाफ जनयुद्ध

जागो देशवासियों...
अभी नहीं तो कभी नहीं.
        
         देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिये एक ऐसे कठोर कानून की आवश्यकता है जो कम से कम समय में भ्रष्टाचारियों को जेल की सलाखों के पीछे धकेल सके । अतः देश में जनलोकपाल लागू होना चाहिये । यह जनता के लिये जनता के द्वारा बनाया गया कानून है । इस कानून के लागू होने से देश में निश्चित रुप से भ्रष्टाचार कम होगा, समय पर न्याय मिल सकेगा, लूटा गया धन वापस मिल सकेगा, देश में अमन चैन कायम होगा, मिलावटखोरी बंद होगी, नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद खत्म होगा, देश में बडे-बूढे, बच्चे जवान, स्त्री-पुरुष निर्भय होकर जी सकेंगे ।

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          जन लोकपाल को सरकार द्वारा लागू करवाने के लिये श्री अन्ना हजारे ने एक जनआन्दोलन की शुरुआत की है । श्री अन्ना ने प्रधानमंत्री डा. मनमोहनसिंह को अल्टीमेटम दिया है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून "जन लोकपाल बिल" लागू करें । इसके कानून के अनुसार भ्रष्टाचार करने पर किसी भी व्यक्ति को जल्द और सख्त सजा हो सकेगी ।

जन लोकपाल बिल क्या है ?
           जस्टिस संतोष हेगडे, प्रशांत भूषण, अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी व अन्य प्रबुद्ध व्यक्तियों द्वारा बनाया गया यह विधेयक जनता के द्वारा वेबसाईट पर दी गई प्रतिक्रिया  और  जनता के साथ विचार विमर्श के बाद विधि-विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया गया है ।  इस बिल को शांति भूषण,  जे. एम. लिंगदाह, अन्ना हजारे, श्री श्री रविशंकर, बाबा रामदेव, महमूद मदानी, आर्क बिशप विन्सेन्ट एम. कान्सेसाओ, सैयद रिजवी, जस्टिस डी. एस. तेवटिया, प्रदीप गुप्ता, कमलकान्त जायसवाल, सुनिता गोदारा, सैय्यद शाह, फजलुर्रहमान वाईजी आदि का समर्थन प्राप्त है । इस बिल की प्रति प्रधानमंत्री एवं सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भैजी गयी थी, जिसका उन्होंने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया है । 

इस कानून में क्या है ?
           1.  इस कानून के अन्तर्गत केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा ।
          2. ये संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी । कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी जांच की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर पाएगा ।
          3. भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कई सालों तक मुकदमे लंबित नहीं रहेंगे । किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी । ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा और भ्रष्ट नेता, अधिकारी या जज को दो साल के भीतर जेल भेजा जावेगा ।
          4. अपराध सिद्ध होने पर भ्रष्टाचारियों के द्वारा सरकार को हुए घाटे को वसूल किया जावेगा ।
          5. ये आम आदमी की कैसे मदद करेगा ?
                   यदि किसी नागरिक का काम तय समय सीमा में नहीं होता तो लोकपाल दोषी अफसर  पर जुर्माना लगाएगा और वह मुआवजा शिकायतकर्ता को मुआवजे के रुप में मिलेगा ।
         6. अगर आपका राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट आदि तय समय सीमा के अन्दर नहीं बनते हैं, या  पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नहीं करती तो आप इसकी शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं और उसे यह काम एक महिने के भीतर करवाना होगा । आप किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं जैसे- सरकारी राशन की कालाबाजारी, सडक बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी, पंचायत निधि का दुरुपयोग, लोकपाल को इसकी जांच एक साल के भीतर करनी होगी ।

          7.
क्या सरकार भ्रष्ट और कमजोर लोगों को लोकपाल का सदस्य नहीं बनाना चाहेगी ?
                   ये मुमकिन नहीं है क्योंकि लोकपाल के सदस्यों का चयन जजों, नागरिकों और संवैधानिक संस्थानों द्वारा किया जावेगा न कि नेताओं द्वारा । इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके से और जनता की भागीदारी से होगी ।
          8. अगर लोकपाल में काम करने वाले अधिकारी भ्रष्ट पाये गये तो ?
                    लोकपाल / लोकायुक्तों का कामकाज पूरी तरह से पारदर्शी होगा । लोकपाल के किसी भी क्रमचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच अधिकतम दो महिने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जावेगा ।
          9. मौजूदा भ्रष्टाचार निरोधक संस्थानों का क्या होगा ?

                  सीवीसी, विजिलेंस विभाग, सी बी आई की भ्रष्टाचार निरोधक विभाग को लोकपाल में विलय कर दिया जाएगा. लोकपाल को किसी जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने व मुकदमा चलाने के लिये पूर्ण शक्ति और व्यवस्था भी होगी.


क्या भ्रष्टाचार का खात्मा संभव है ?
        सत्तर के दशक में हांगकांग में भ्रष्ट माफिया, नेता और पुलिस में गठजोड हो जाने से भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुँच गया था, जिसके विरुद्ध लाखों आमजन सडकों पर आ गये थे । आखिरकार सरकार को जनशक्ति के आगे झुकते हुए स्वतंत्र भ्रष्टाचार विरोधी आयोग ( I.C.A.C.)  का गठन करना पडा जिसने सीधी कार्य़वाही करते हुए 160 में से 120 भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया । यह सीधा सन्देश एक मिसाल बन गया और आज हांगकांग का विकास और भ्रष्टाचार की न्यूनता हमारे लिये अनुकरणीय है । 

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आपके जन-समर्थन से भ्रष्टाचार का खात्मा भारत में भी संभव है ।

जन लोकपाल कानून आने से भ्रष्टाचारियों के मन में डर पैदा होगा.
 
          विनीत :  भारत स्वाभिमान ट्रस्ट,  आर्ट आफ लिविंग,  भारतीय राष्ट्रवादी समानता पार्टी,  अभ्यास मंडल,  अन्य अनेक सामाजिक संगठन  और  प्रबुद्ध नागरिक ।

अपनी बात-
               उपरोक्त बिल में कहीं ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता जो किसी भी प्रकार से सरकार के कामकाज में बाधक बने ।  

 फिलहाल तो 
          सरकार जनता की दौलत लूट रही है । देश में जेबकटों के लिये कानून है किन्तु उन भ्रष्ट लोगों के लिये नहीं जो जनता के धन से अपनी जेबें भर रहे हैं ।                               -किरण बेदी.

          शरद पंवार जो खुद कई घोटालों में शामिल हैं वे मंत्रियों के उस समूह का नेत्रत्व कर रहे हैं जो लोकपाल बिल के मसौदे में फेरबदल पर विचार कर रहा है । इस समूह में कपिल सिब्बल भी हैं जिन्हें 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में कोई घोटाला नजर नहीं आता ।                                  -अरविन्द केजरीवाल.

स्वाभाविक है कि ये नेता इस कानून को अपनी ओर से कभी भी लागू नहीं होने देंगे ।

               देश की जनता को सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह से ही जवाबदेही तय करनी चाहिये । वे ही देश को ये जवाब दें कि ये कानून कब तक लागू किया जा रहा है । और यदि इसे हम लागू नहीं कर पा रहे हैं तो उसकी राह में वास्तविक रुकावटें क्या आ रही हैं ?


1.4.11

भ्रष्टाचार की जड

 
       आज के दौर में बहुसंख्यक लोग येन-केन-प्रकारेण पैसे के पीछे एक ही प्रकार की अन्धी दौड में दौडे चले जा रहे है । जेब भर जावे तो तिजोरी भरना है, तिजोरी भर जावे तो बैंक में भर देना है, और बैंक में आयकर के चपेटे में आ जाने का अंदेशा बनने लगे तो फिर स्विस बैंक तो है ही । इनकी एक ही सोच, एक ही जीवन दर्शन दिखता है-
       
ऐसा हो, वैसा हो, फिर चाहे जैसा हो, पर हाथ में पैसा हो.

          जबकि खाना यही रोटी है जो पेट भरने के बाद उस वक्त तो किसी काम की नहीं बचती,  पहनना यही एक जोडी कपडे हैं जो अल्मारीयों में भले ही सैकडों जोडे भर लिये जावें किन्तु एक बार में एक से अधिक किसी काम नहीं आते, घूमने के लिये एक वाहन भी बहुत होता है, फिर चाहे वाहनों के जखीरे ही क्यों ना खडे कर दिये जावें, और रहना  भी एक ही घर में है फिर चाहे हर कालोनी, हर शहर में अपने अनेकों घर क्यों न बना लिये जावें ।

          मेरी इस बात का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि यदि आप अपनी योग्यता के बल पर ये पैसा कमा रहे हैं तो इसे न कमावें । बल्कि ये है कि जब हमारा कल सुरक्षित लगने लगे तो कम से कम इस पैसे को जोडने की होड में किसी भी प्रकार के भ्रष्ट तरीके अपनाने की दौड में शामिल न रहें ।

          मैंरे तो अपने अभी तक के जीवन में अधिकांश उदाहरण ऐसे ही देखने में आए हैं कि यदि पिता ने अपनी योग्यता, प्रतिभा या किस्मत के बल पर धन के अंबार जमा कर दिये तो उनके पुत्रों ने फिर अपने जीवन में उस धन को उजाड तो दिया किन्तु अपनी प्रतिभा का विकास कर स्वयं उस धन को कमा पाने की कभी जहमत नहीं उठा पाये । चाहे फिल्म जगत में हम देखें, राजनीति के क्षेत्र में देखें या फिर किसी भी और क्षेत्र में देखलें । कहीं किस्मत के बल पर अपवाद देखने में भले ही आ जावे किन्तु अधिकांश उदाहरणों में तो यही देखने में आता रहा है ।
         पैसा तो अपने पूर्वज भी कमाते थे और बडे-बडे सेठ साहूकारों में उनके नाम भी गिने जाते थे, किन्तु उनमें बेईमानी के द्वारा पैसे जोडने की आदत बिरले ही कहीं देखने में आती थी , बल्कि समाज से कमाये गये उस पैसे को प्रायः प्याऊ, धर्मशाला व मन्दिर जैसे रुप में इस्तेमाल कर उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा समाज के उपयोग के लिये ही छोड भी जाते थे जबकि आज मैं और मेरे बाद से आगे की सोच देखने में आती ही नहीं है और हम सभी और अभी, और अभी की होड में इस पैसे को जोडते चले जाने की दिशा में न दिन का चैन देख रहे हैं और ना ही रात का आराम । पहले स्वास्थ्य को खर्च करके धन बचा रहे हैं और फिर उस धन को डाक्टरों व अस्पतालों में खर्च करके स्वास्थ्य बचाने का प्रयास कर रहे हैं । कहाँ ले जा रही है यह अन्धी दौड इस मानव समाज को ? जबकि हम लगातार यह सुनते चले आ रहे हैं कि  
         पूत कपूत तो क्यों धन संचय और पूत सपूत तो क्यों धन संचय.

        क्या हमारे पुरखों का ये जीवन दर्शन सही नहीं था कि-
        सांई इतना दीजिये जामे कुटुंब समाय, मैं भी भूखो ना रहूँ साधु न भूखो जाय.




          निवेदन-   
यह पोस्ट  जिन्दगी के रंग ब्लाग में 
 21-1-2011 को प्रकाशित हो चुकी है और छोटा 
 प्लेटफार्म होने के बावजूद तब से अब तक इस पोस्ट में 
 दिखी जनरुचि में यह चिन्तन चल ही रहा था कि इसे 
इस नजरिया ब्लाग के थोडे बडे प्लेटफार्म पर लाया जावे तभी आज अचानक हमारे चिर-परिचित श्री 
 अजय कुमार झा जी की एक पोस्ट से ये जानने में आया कि 
मेरी ये ही पोस्ट दि. 31-3-2011 के दैनिक जागरण 
 के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित की गई है और इसे 
जिन्दगी के रंग के रेफरेन्स से प्रकाशित करने के 
 बजाय इस नजरिया ब्लाग के रेफरेन्स से ही प्रकाशित 
 किया है तो मुझे लगा कि ये अधिक सही समय हो 
 सकता है जब ये लोकप्रिय पोस्ट  इस ब्लाग पर आपके 
सामने आवे । अतः जिन्दगी के रंग ब्लाग पर कुछ 
पाठक मित्रों द्वारा यह पूर्व पढी हुई लग सकती है । ऐसे 
सभी मित्रों से असुविधा के लिये अग्रिम क्षमा सहित...


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