4.7.16

असफलता V/s, सफलता...!


            5 वर्ष की उम्र में उसके पिता का निधन हो गया । 16 वर्ष की उम्र में उसका स्कूल छूट गया । 17 वर्ष की उम्र तक वह असंतुष्ट अवस्था में 4 बार जॉब बदल चुका था । 18 वर्ष की उम्र में उसकी शादी हो गई । 18 से 22 वर्ष की उम्र में उसने रेल्वे में कंडक्टर की नौकरी में फैल रहने के बाद सेना में नौकरी करने की कोशिश की और वहाँ से भी उसे निकाल दिया गया । उसने वकालत पास करने की कोशिश की वहाँ भी वह रिजेक्ट हुआ । फिर उसने इंश्योरेंस एजेंसी में प्रयास किया और वहाँ भी असफल ही साबित हुआ । 

            पारिवारिक जीवन में 19 वर्ष की उम्र में वह एक कन्या का पिता बना किंतु 20 वर्ष की उम्र में उसकी पत्नी उस कन्या को उसके पास छोडकर किसी अन्य पुरुष के साथ चली गई । उसने एक छोटे रेस्टोरेंट में कप-प्लेट धोने से शुरु करके कुक का काम किया । उसकी पुत्री का अपहरण हो गया और उसे भी वह बचा नहीं पाया । किंतु फिर भी संयोगवश उसने अपनी पत्नी को अपने साथ रहने के लिये राजी कर लिया ।

            65 वर्ष की उम्र में वह रिटायर हो गया और उसके रिटायरमेंट पर संस्थान ने उसके पास सिर्फ 105 डॉलर का चैक इस नोट के साथ भेजा कि इससे आगे व अधिक उसकी कोई पात्रता नहीं बनती । 

            थक-हारकर उसने आत्महत्या कर लेने का निर्णय किया । लगभग सारा जीवन हर जगह असफल रहने के कारण उसका जीवन के प्रति समस्त मोह भंग हो चुका था । उसने एक पेड के नीचे अपनी वसीयतनुमा ईच्छा लिखकर जब फांसी लगाने का प्रयास किया तब अचानक उसके मन में यह विचार आया कि जीवन में बहुत कुछ ऐसा है जो उसने अभी तक नहीं किया है । 

            अपने कुकिंग जॉब के दौरान वो यह महसूस करता था कि उसके बनाये हुए चिकन की रेसिपी को लोग पसन्द करते थे । तब उसने उस चेक को भुनवाकर 87 डॉलर इन्वेस्ट करते हुए कुछ चिकन के छोटे-छोटे पैकेट बनाकर केंचुकी फ्रॉयड चिकन के नाम से डोअर-टू-डोअर बेचने का काम फिर शुरु किया और इस बार उसे लोगों से धीरे-धीरे अच्छा प्रतिसाद मिलने लगा । 

            चलते-चलते जहाँ वह शख्स 65 वर्ष की उम्र में आत्महत्या करने को उद्धृत था वहीं 88 वर्ष की उम्र में कोलोनेल सेंडर्स का नाम फाउंडर ऑफ केंचुकी फ्रॉयड चिकन (KFC) के रुप में विश्व भर में बिलेनियर्स के रुप में स्थापित हो चुका था ।

            कथासार यही है कि जब तक जीवन है कोई भी व्यक्ति कभी भी कहीं भी नई शुरुआत कर सकता है । प्रयास कभी भी अंतिम नहीं होते । न ही यह बात मायने रखती है कि आपने उसके लिये कितनी कठोर मेहनत की । इंसान का काम है - चलते रहना, प्रयासरत रहना, वांछित परिणाम न मिलने पर तरीकों में बदलाव करते रहने के साथ पुनः-पुनः प्रयास करते रहना । लक्ष्य व स्वप्नपूर्ति के लिये कोई भी उम्र कभी भी अंतिम नहीं होती ।
 

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