4.4.13

सावधान ! ये अन्दर की बात है...


          वे सभी लोग जिन्हे व्यापारिक आवश्यकता के कारण  रोजाना या अक्सर किसी एक निश्चित स्थान जैसे दुकान, आफिस, बैंक अथवा एक शहर से दूसरे शहर नियमित रुप से नगदी रकम लेकर आना-जाना होता है वे प्रायः तडीबाज उचक्कों की लिस्ट में रहते हैं और आजकल मोबाईल की मेहरबानी से किसी को अपने पीछे लगा पाकर उस पर शंका करके अतिरिक्त सतर्कता भी नहीं बरत पाते वे अक्सर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी वाली तर्ज पर किसी भी दिन एकान्त या रात के समय इन उचक्कों के चंगुल में फंसकर न सिर्फ झोले अथवा बेग में रखी अपनी धनराशि से, बल्कि अच्छी खासी शारीरिक चोट खाकर उसके उपचार में भी और अतिरिक्त धन खर्च करके शरीर सुधार के साथ ही अपने समय का भी अच्छा-खासा नुकसान अनिवार्य रुप से झेलने के लिये मजबूर हो जाते हैं । 

          ऐसे लुटे-पीटे लोगों की यदि सूचि बनाने की कोशिश की जावे तो बीसीयों नाम आपके अपने ही दायरे व अखबारों में पढे गये घटनाक्रमों से आपके सामने आते चले जाएँगे, बिल्कुल ताजे घटनाक्रम में हमारे एक मित्र सदृश परिचित श्री अरविन्द अजमेरा जिनका इन्दौर के दवा बाजार में दवाईयों की सप्लाई करने का व्यवसाय है और जो किला मैदान जैसे ऐसे क्षेत्र में निवास करते हैं जहाँ रात्रि के समय आवाजाही अत्यन्त सीमित हो  जाती है, वे अपने नियमित क्रम में अपने बेग में 40,000/- रु. रखकर रात 9-10 बजे के बीच जब अपने एक्टिवा स्कूटर से घर आ रहे थे तब अचानक उनके घर के आसपास के आधे-पौन किलोमीटर के क्षेत्र में दो मोटर सायकिल पर आते हुए चार उचक्कों ने उन्हें ओवरटेक करते हुए बिलकुल नजदीक से पहले तो उनकी आँखों में मिर्ची पावडर फेक दिया जिससे तेज जलन व कुछ नहीं देख पाने की स्थिति में वे अपनी गाडी सहित गिर पडे उसी समय उनके स्कूटर पर टंगा हुआ बेग उनसे छिन लिया और उनके विरोध करने पर चारों ने मिलकर उनकी अच्छी खासी पिटाई भी कर दी और उनका रुपयों से भरा बेग छिनकर वे चारों उचक्के भाग निकले । दूसरे दिन उनके अस्पताल में भर्ती होने की सूचना अखबारों में छपने पर जन-सामान्य के साथ ही उनके मित्रों व परिचितों को भी उनके साथ घटे इस हादसे के बारे में पता चल पाया । 

          एक और घटनाक्रम मैंने बस से गोधरा (गुजरात) से इन्दौर आते समय देखा था जिसमें एक सज्जन अपने बेग के साथ बस में बैठे और बस चलने में थोडी देर होने पर अपने बेग पर नजर रखने की सोच के साथ दो-चार मिनिट के लिये किसी काम से नीचे उतरे और सिर्फ उतने ही समय में जैसे ही वे वापस अपनी सीट पर पहुँचे तो ये देखकर उनके होश उड गये कि उनका बेग गायब हो चुका था जबकि उसी स्थिति में अनेकों सहयात्रियों के बेग उकी सीटों पर सही सलामत रखे हुए थे । पता चला कि उनके उस बेग में 1,20,000/- रु. नगद रखे थे जिसे वे वहाँ से व्यापारिक उगाही करके वापस लौट रहे थे । समस्या एक ही है किन्तु ऐसे उदाहरण अनेक मिल जाएँगे । जबकि इस धोखे अथवा लूट से बचाव का साधारण सा उपाय पिछले अनेकों वर्षों से मैं स्वयं उपयोग में ला रहा हूँ क्योंकि मुझे भी अपने काम के सिलसिले में खासी केश रकम साथ में रखकर एक राज्य से दुसरे राज्य तक का कम से कम 6-8 घंटे का सफर महिने में 3-4 बार लगातार करना पडता था ।

          उपाय मात्र इतना सा है कि बाजार में ऐसी अन्डरवियर मिल जाती हैं जिनमें अन्दर की ओर दोनों बाजू में ऐसे जेब होते हैं जिनमें हजार रुपये के नोट की भी एक से ज्यादा गड्डी एक जेब में आराम से रखी जा सकती है जबकि उसे पहनने वाले के पास ऐसी दो जेब होती है अतः सौ नोटों की दो गड्डियां जब आप उसके अन्दर रख लेते हैं तो लाख-दो लाख रुपये तक आपके शरीर के ठेठ त्वचा से चिपकी स्थिति में आपके साथ सुरक्षित हो जाते हैं और उस पर पेन्ट पहन चुकने के बाद वे सामने से कतई अस्वाभिक भी नहीं लगते । आप यदि घर में नहीं भी हैं तब भी आराम से कहीं भी बाथरुम में जाकर अपनी उस मुद्रा को अपनी अन्दर की जेब में रखकर उपर से पेन्ट व बेल्ट पहनकर इतने सुरक्षित हो जाते हैं कि रेल यात्रा तक के दौरान भी आप अपनी जोखम के साथ आराम से पूरी रात चैन की नींद सो लेते हैं और आपकी जोखम आपके शरीर से लगभग चिपकी अवस्था में सुरक्षित रहती है । इस दरम्यान यदि किसी को ऐसा आभास भी हो कि आपके पास लूट सकने लायक नगदी है तो भी वह आपकी पेंट व अन्डरवियर उतरवाकर तब तक आपकी जोखम के करीब नहीं पहुँच सकता जब तक कि वह आपका अपहरण ही न करले, और इस किस्म के अपहरण इन जैसे मौकापरस्त छोटे उचक्कों के लिये तो सम्भव नहीं होते ।

          लगभग 10 वर्ष पूर्व परिवार में एक बडी बीमारी का सामना करने के दरम्यान हास्पीटल, डाक्टर व दवाईयों के खर्च का आवश्यकतानुसार भुगतान करने के लिये मुझे डेढ लाख रुपये साथ में रखकर बगैर किसी नाते-रिश्ते के बम्बई में पूरे एक माह तक गेस्ट-हाउस में रहना पडा था तब भी यही पाकेट वाले अन्डरवियर मेरे निश्चिंत रहवास और आवश्यकतानुसार भुगतान कर पाने की सुविधा हेतु पूर्ण मददगार साबित हुए थे और सिर्फ यात्रा ही नहीं अपने शहर में भी जब कभी कुछ घंटों के लिये यदि अधिक केश-करंसी रखने की आवश्यकता होती है तो 'लक्स' व  'रुपा' कंपनी के ये ही पाकेट वाले अन्डरवियर मेरी जान-माल की निश्चिंत सुरक्षा करते हैं । अतः वे सभी लोग जिन्हें किसी भी परिस्थिति में नियमित या अनियमित रुप से केश-करन्सी लेकर अकेले या किसी के साथ भी आने-जाने की अक्सर आवश्यकता रहती हो वे आराम से इन पाकेट अन्डरवियर को पहनना प्रारम्भ कर, अपनी जोखिम हमेशा इसमें रखकर निश्चिंत अवस्था में अपने कार्य सम्पादित करते रह सकते हैं ।

11 टिप्पणियाँ:

सतीश सक्सेना ने कहा…

बढ़िया उपयोगी जानकारी...
आभार भाई जी !

सुज्ञ ने कहा…

सजग जानकारी

Rajendra Kumar ने कहा…

बेहतरीन आलेख...

manoj jaiswal ने कहा…

सावधान करती ज्ञानवर्धक जानकारी।

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…

बहुत सही व् सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

आपने अन्दर की बात सार्वजनिक कर दी :) बहुत कुछ हम इंसानों की लापरवाही भी ऐसी घटनाओं को न्योता देती है , वैसे बात तो आपने विशिष्ठ बताई !

Sanjay Tripathi ने कहा…

धन्यवाद उपयोगी जानकारी के लिए!

Sanjay Tripathi ने कहा…

धन्यवाद उपयोगी जानकारी के लिए!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

रुपये पैसे सुरक्षित ही रखने चाहिये, जैसे भी संभव हों।

संजय भास्‍कर ने कहा…

उपयोगी जानकारी ...बेहतरीन आलेख

संजय भास्‍कर ने कहा…

शब्दों की मुस्कुराहट पर …..मैं अकेला चलता हूँ

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