31.5.11

आशीर्वाद दिवस...


 मंगलवार 31 मई 2011

हमारे पोते आर्जव का प्रथम






तुम जियो हजारों साल




साल के दिन हों पचास हजार...




शुभाशीष प्रदाता-

दादा-दादी, पापा-मम्मी, बडे पापा-मम्मी, भूआ-फूफाजी, 

और बडे भईया-

हर्षल सक्षम

शुभकामना समारोह में आप भी नन्हें मुन्नों के साथ सादर आमन्त्रित हैं... 


27.5.11

जल्दबाजी का भूत...!

          कंवर सा. कल शाम को अपन एक सप्ताह की यात्रा पर चल रहे हैं, 18 सीटर मेटाडोर का मैंने इन्तजाम कर लिया है, 14 टिकिट आपके परिवार को मिलाकर सामने हैं यदि और कोई चलने वाला आपकी नजर में हो तो उसे भी ले लेना, मैं भी मेरी तरफ से देख लेता हूँ नहीं तो अपने परिवार के 14 लोग ही आराम से चलेंगे । कोई प्री-प्लानिंग नहीं, पहले से कोई सूचना नहीं बस आप तो चलो । मैं उनकी इस जल्दबाज शैली से तब तक बखूबी परिचित हो चुका था, और मार्केटिंग स्तर पर स्वयं अपना काम  करने के कारण कहीं छुट्टी लेने जैसी कोई समस्या भी नहीं थी लिहाजा बच्चों के स्कूल में आवश्यक एप्लीकेशन देकर व अपने दो-चार क्लाईन्ट्स को उनके काम के प्रति आश्वस्त कर उनके साथ निकलने के लिये समयानुसार सपरिवार तैयार हो गया । ये परिचित शख्स मुझसे उम्र में थोडे ही बडे मेरे काका श्वसुर थे । उस समय हमारे साथ 10 से भी अधिक छोटे बच्चे उस यात्रा में थे ।
 
           नीयत समय पर सब यात्रा के लिये निकल पडे । कहीं 12, कहीं 15 तो कहीं 20-20 घंटे की त्रस्त कर देने वाली यात्रा करके ग्रुप कहीं भी पहुँचें और पहुँचते ही उनका जल्दी का टेप चालू हो जावे । चलो जल्दी करो, आगे वहाँ चलना है । तीसरे-चौथे दिन तक तो उनकी उस जल्दबाज शैली से सभी हलकान हो उठे । आखिर बच्चों ने शिकायत के लिये मुझे ही पकडा - जीजाजी आप पापा को बोलो कि जहाँ भी आएँ वहाँ तसल्ली से घूमने-फिरने तो दें । जब मैंने भी बेहद विरोधसूचक शैली में सभी बच्चों व महिलाओं की भावनाओं से उन्हें अवगत करवाते हुए उनकी उस जल्दबाज शैली का विरोध किया तो मजबूरी में वे ये कहते हुए मान तो गए कि - कंवर सा. मैं तो ये सोच रहा था कि अपन दो-चार जगह और इसी समय में घूम लेंगे लेकिन बेहद अनमनेपन से वे आगे की यात्रा में सभी यात्रियों की भावना के अनुरुप समय तक रुक पाए ।

          इन साहब का मण्डी में दलाली का काम था और हर समय जल्दी की मानसिक गिरफ्त में रहने के कारण इनकी सहज मलत्याग की प्रवृत्ति बाधित होते-होते ये पहले कब्ज की गिरफ्त में आकर बाद में ब्लड-प्रेशर की समस्या से घिरे हुए थे । प्रतिदिन ब्लडप्रेशर कन्ट्रोल में रखने की गोली लेना इनकी बाध्यता थी, एक दिन गोली लेने के आधे घण्टे में स्वयं को सहज नहीं महसूस कर पाने के कारण एक गोली और ले ली जिसके कारण दो-चार घण्टे बाद हास्पीटल में एडमिट होना पडा, जहाँ पता चला कि रोजाना बढ जाने वाला उनका ब्लड-प्रेशर (इसके बारे में विस्तृत जानकारी यदि आप लेना चाहें तो हाई ब्लड-प्रेशर (उच्च रक्तचाप) से बचाव ये पोस्ट माउस क्लिक करके देखें) उस दिन वैसे ही घटा हुआ था और अपनी जल्दबाज प्रवृत्ति के चलते ये एक नहीं बल्कि दो-दो गोली ब्लड प्रेशर घटाने की और ले चुके थे । अतः उस दिन का सूरज उनकी जिन्दगी में देखा जाने वाला अन्तिम सूरज साबित हुआ और महज 48 वर्ष की उम्र में जितनी जल्दी उन्हे हमेशा रहती थी उतनी ही जल्दी वे इस दुनिया से कूच भी कर गये ।
 
          एक अन्य रिश्तेदार जो अजमेर में रहते हैं उन्हें भी मैंने अक्सर बेहद जल्दबाजी में ही देखा । एक दिन खबर आई कि उनकी कार का एक्सीडेंट हो गया है और उनका चौथे नम्बर का छोटा भाई जो उनके साथ आगे की सीट पर बैठा था उस एक्सीडेंट में वह अपनी विद्यार्थी उम्र में ही कण्टक्टर साईड से होने वाले उस एक्सीडेंट की भेंट चढकर शहीद हो गया था । उनके अंतिम संस्कार में मैं ही अजमेर जब पहुँचा तो उस ह्रदयविदारक शोकसंतप्त माहौल में वे रह-रहकर उस मृतक भाई को याद करके चिल्लाते दिख रहे थे हाए सुशील (संयोगवश उस भाई का यही नाम था) मेरे कारण तेरी जान चली गई । ईश्वर ही जाने अभी उनकी वो मानसिक जल्दबाजी समाप्त हुई या घटी या नहीं.

          मल्टीलेबल मार्केटिंग कम्पनी में कार्यरत मेरे एक अति महत्वाकांक्षी साथी भी इस समय मेरे जेहन में आ रहे हैं जिन्हें उन्नति करने की ऐसी ही जल्दबाजी रहती थी । जब ये कम्पनी हमारी अपेक्षाओं को पूर्ण नहीं कर पाई तो इन्होंने पहले लोडिंग रिक्शा खरीदा, फिर अपने सम्पर्कों के चलते एक और लोडिंग रिक्शा खरीदकर किराये पर चलवा दिया और फिर जल्दी ही दोनों रिक्शा किराये पर सौंपकर और अधिक लाभ के लिये बडी मेटाडोर खरीदकर उस पर दिन रात अधिक से अधिक दौड लगाने लगे. निरन्तर काम का बढता दबाव और पर्याप्त नींद न ले पाने के कारण एक रात 2.30 बजे के लगभग उज्जैन से इन्दौर आते समय एक्सीडेण्ट कर बैठे और उनकी जीवन-यात्रा भी फिर उससे आगे नहीं बढ सकी ।
 
          जल्दबाजी के ये और इस जैसे अनेक उदाहरण तो वे हुए जिनसे मेरा वास्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से पडता रहा और इसके दुष्परिणाम समय-समय पर मेरे देखने में आते रहे । लेकिन सार्वजनिक रुप से जल्दी से जल्दी किले फतह करने वाले कुछ और उदाहरणों की यदि हम बात करें तो शेअर बाजार में जल्दी से जल्दी सही गलत सभी हथकण्डे अपनाकर सारी दुनिया की दौलत अपने कब्जे में कर लेने की सोच रखने वाले हर्षद मेहता का उल्लेख किया जा सकता है जिसके कारनामों के कारण उस पर भरोसा करने वाले पदाधिकारियों की दो बैकें एक समय फैल हो गई थी और लाखों लोग अपनी बैंक जमा राशि से भी हाथ धो बैठे थे । यद्यपि बीच में इनकी कारों का काफिला और घीरुभाई अंबानी के आफिस की बिल्डिंग में ही मौजूद इनका बडा सा आफिस घीरुभाई अंबानी से भी अधिक ऐश्वर्यपूर्ण लगने लगा था । किन्तु अपनी जल्दबाज उपलब्धियों के चपेटे में बैंक व शेअर बाजार के अनेकों ग्राहकों को अकाल फाँसी लगवा देने वाले यही हर्षद मेहता शीघ्र ही कानून की गिरफ्त में फंसकर और बीमारियों के आक्रमण से घिरकर 45-50 वर्ष की मध्य उम्र में ही दुनिया से रुखसत हो लिये थे ।
 
          फिर हमारे देश की महान राजनैतिक पार्टी रही कांग्रेस आई की अन्तर्राष्ट्रीय शख्सियत संजय गांधी जिन्हें सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे का वाली शैली में देश की जनसंख्या और देश के अल्पसंख्यक वर्ग को जल्दी से जल्दी देश से खदेड देने का जुनून चढा था जिसके चलते 1975-77 के इमरजेंसी काल में हजारों लोगों की जबरिया नसबन्दी करवा देने और रातों रात उस अल्पसंख्यक वर्ग की पचासों बस्तियों पर बुलडोजर चलवा देने की महारथ के चलते वे भी अपनी जल्दबाज शैली के मुताबिक ही प्लेन में बैठकर जल्दी से दुनिया से रुखसत हो लिये थे । हमारे क्षेत्र में इसी पार्टी के इनके एक परम अनुयायी नेता जिनके नाम का मैं उल्लेख नहीं कर रहा हूँ उनका भी यही रेकार्ड रहा - साम, दाम, दण्ड, भेद की नीतियों पर चलते अपने सामने दिखने वाली हर खुबसूरत लडकी को अपनी अंकशयिनी बनालूँ, दसों दिशाओं से अपने सामने दिख सकने वाली सारी दौलत अपने कब्जे में करलूँ, और अपने राजनैतिक आकाओं को हर समय प्रसन्न भी रख लूँ कि फटाफट शैली में जल्दी-जल्दी पार्षद व विधायकगिरी की यात्रा तय करते हुए संजय गांधी की दुनिया से रुखसतगी के बमुश्किल चंद दिनों बाद ही एक मोटरसायकल एक्सीडेंट में ये भी चपेटे में आ गये और लगभग एक सप्ताह जीवन-मृत्यु के बीच कोमा में संघर्षरत रहकर ये भी अपने आका से मिलने उनके पास ही पहुँच गये । क्षेत्र की जनता तो "मरने वालो कसो भी थो पन गरीबां के तो वो नी सतायो" की शैली में उनकी याद करके रह गई पर सुनते हैं उन्हें उपर भी अपने आका संजय गांधी से इसलिये डांट खानी पडी की क्यों रे भैया यहाँ तक आने में इतनी देर कैसे करदी ? जिसका जवाब उन्होंने बडी मासूमियत से अपने आका को यही दिया कि दादा आप तो प्लेन से आ गये थे, मैं मोटर सायकल से आया हूँ तो इतनी देर लगना तो लाजमी था ही । 
 
          कभी दो कहानियाँ मेरे पढने में आई थी - एक में दो लकडहारे थे जिन्हें पेड काटने का काम पडता रहता था, इनमें से एक काम दिखते ही पेड काटने में भिड जाता था और पसीना बहाते-बहाते जितना भी समय लगे अपने काम में पिला रहता था जबकि दूसरा लकडहारा आठ घण्टे का काम जब सामने देखता तो इत्मिनान से छः घण्टे अपनी कुल्हाडी की धार तेज करने में लगाता और शेष दो घण्टे में उस तीक्ष्ण धारदार कुल्हाडी से सामने मौजूद वृक्ष को काट लेता था । दूसरे सफल व्यक्ति के उदाहरण में जब पत्रकारों नें उससे पूछा कि आपने इतने कम समय में इतनी सफलता हासिल की इसका राज क्या है ? तब उस व्यक्ति का जवाब था कि मैं लक्ष्य सामने रखकर आवश्यकता के मुताबिक दौड लगाता हूँ फिर इत्मिनान से सुस्ताते हुए अपनी उपलब्धियों का जायजा लेता हूँ और यदि मुझे अपनी कार्यप्रणाली में कहीं कोई बदलाव आवश्यक लगता है तो उसकी रुपरेखा का निर्धारण भी उस सुस्ताने के क्रम में ही कर लेता हूँ तत्पश्चात् फिर दौड लगाने लगता हूँ । 

          कुछ नहीं से सब कुछ पाने तक की अपनी इस जीवनयात्रा (जिसमें स्वयं का स्थायित्व, विवाह बाद की जिम्मेदारियां, तीन बच्चों का लालन-पालन, उनकी शिक्षा, विवाह व उनके स्थायित्व से सम्बन्धित अपना योगदान, इस दरम्यान स्वयं का मकान, दोपहिया व चार पहिया वाहन व जीवन के लिये आवश्यक अन्य भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति) में भले ही मुझे भी 15-15 घंटे से अधिक व्यस्त रहना पडा हो किन्तु अनावश्यक जल्दबाजी कभी मस्तिष्क पर हावी नहीं हुई बल्कि ये सोच सदा रही कि जिस काम में जो समय लगना है वो तो लगना ही है । उसके बाद भी मुझे ये कभी नहीं लगा कि समय की कमी के कारण जो कुछ मैंने पाना चाहा हो उसे मैं हासिल नहीं कर पाया हूँ जबकि इसके विपरीत इन जल्दबाज व्यक्तियों की न सिर्फ उपलब्धियों का दायरा असीमित होते हुए भी सीमित दिखा, बल्कि न ये अपनी जिन्दगी सुकून से जी पाए और न ही स्वयं के कमाये हुए धन व साधनों का स्वयं के लिये कोई आनन्द या उपभोग कर पाये । 

          ऐसे में यह प्रश्न तो सहज रुप से मन में उठता है कि  लगभग हर चौथे-पांचवें व्यक्ति में देखी जाने वाली ये जल्दबाजी
क्या वास्तव में आवश्यक है ?



24.5.11

रफ्तार का जुनून...?

            स्कूटर पर आने-जाने वाले बैंक आफिसर पिता और स्कूटी की मदद से इमीटेशन ज्वेलरी का कारोबार करने वाली माता ने अपने मकान के नवीनीकरण अभियान में अपने इकलौती सन्तान 22 वर्षीय पुत्र की वैवाहिक तैयारियों के अनुसार उसकी भावी आवश्यकताओं की सभी स्थितियों को ध्यान में रखते हुए मकान की उपरी मंजिल पर सबकुछ समय की आवश्यकता के साथ ही बच्चे की इच्छापूर्ति के मुताबिक सर्वश्रेष्ठ निर्माण कार्य अत्याधुनिक इन्टीरियर के द्वारा करवा लिया था । परिवार के स्टेटस के मुताबिक घर में कार भी थी जिसका उपयोग या तो पूरा परिवार एक साथ कहीं जाने के समय काम में लेते थे या फिर शौकिया तौर पर उनका ये बालक अपने दोस्तों के साथ कर लिया करता था ।

        होनहार पुत्र कालेज में ग्रेजुएशन की परीक्षा में उच्चतम अंकों से पास हुआ तो प्रसन्नता के दौर में माँ-पिता ने बच्चे की इच्छापूर्ति हेतु उसकी मनपसन्द मोटर बाईक भी तोहफे में उसे दिलवा दी । वैसे भी माँ-पिता दोनों की उस बालक के प्रति सोच यह रहती थी कि हमारा सबकुछ इसी का तो है । इसलिये यदि इसकी चाहत बाईक के इस मेक व माडल की है तो यही बाईक इसे हम क्यों न दिलवाएँ ।

        बाईक खरीदें एक माह भी नहीं हुआ होगा कि पास ही के गांव में रहने वाले बालक के मित्र की शादी का संयोग बन गया । पिता ने बालक को निर्देशित भी कर दिया कि तुम अपने इस मित्र की शादी में बाईक से नहीं जाओगे । तुम्हे जितनी बार भी आना-जाना करना है कार के द्वारा ही करना है जिसे उपरी तौर पर तो बालक ने मान लिया किन्तु मन से नहीं मान पाया । सुबह पिता के समक्ष कार लेकर निकला वह बालक दूसरी बार घर आने पर पिता की गैरमौजूदगी में अपनी नई बाईक लेकर ही निकला । शादी के घर में दूल्हे के कपडे लांड्री से लाने का काम बाकि था जिसकी जिम्मेदारी इसी बालक ने दूसरे दोस्त के लांड्री के नजदीक रहने के बावजूद स्वयं ले ली और अपनी नई मोटर बाईक से लांड्री से कपडे लेकर वहीं नजदीक रहने वाले मित्र के साथ वापस शादी वाले घर की ओर दोनों मित्र चल पडे । दूसरा मित्र भी अपनी स्वयं की मोटर बाईक पर ही चल रहा था । रास्ते में अनजाने ही दोनों में रेस चालू हो गई और अपनी नई बाईक की रफ्तार का कौशल दिखाने में एक मोड पर तेजी से टर्न लेने में बालक गाडी का बेलेन्स कन्ट्रोल नहीं कर पाया और लगभग 8 फीट गहरे बडे से गड्ढे में बाईक के साथ जो गिरा तो बालक नीचे और बाईक उसके उपर जा गिरी । जब तक पीछे से दूसरा मित्र वहाँ पहुँचा और दो-चार लोगों को रोककर उस बालक को गड्ढे में से निकाला तब तक उसके प्राण पखेरु उड चुके थे । इन दम्पत्ति के साथ यही बालक हमारी बैंकाक-पटाया की स्वप्न-यात्रा में हमारे साथ भी कुछ समय बिता चुका था ।

        यह बालक तो अकाल मृत्यु के द्वारा दुनिया से रुखसत हो गया और माँ-पिता की आगे की शेष पूरी जिन्दगी उजाड हो गई । नसीब से ये एक सन्तान मिलने वाले रिटायरमेंट के करीब पहुँच रहे पिता व माता की उम्र ऐसी भी नहीं रह गई थी कि वे इस दुर्घटना के बाद दूसरी सन्तान को जन्म देकर अपनी सामर्थ्य के दौर में उसे आत्मनिर्भर बनता देख पाते । प्रायः इसमें की घटना में लोग सोचते हैं कि लडकियों को इम्प्रेस करने के चक्कर में नवयुवक ऐसी दुर्घटनाएँ कर बैठते हैं किन्तु यहाँ ऐसा कोई चक्कर नहीं था यदि कुछ था तो नई उम्र और नई बाईक के साथ कहीं न कहीं हवा में उडने जैसा जुनून था । लगभग तीन साल पहले घटने वाली इस घटना का यहाँ उल्लेख क्यों हो गया अब उसका कारण भी देखें-
 
पिछले दिनों में अखबारो में छपने वाली एक नहीं दो घटनाएँ...
 
          एक बाईक पर दो लडके हाईवे पर ऐसी ही तेज गति से जा रहे थे दूसरी ओर से एक गेहूँ काटने वाली मशीन चली आ रही थी । अचानक बाईक चलाने वाले लडके का पल भर के लिये ध्यान हटा और बाईक उस मशीन से जा टकराई । बाईक चलाने वाले को तो गम्भीर चोटें आई किन्तु पीछे बैठा लडका इस टक्कर से उछलकर उस मशीन में लगे दांतों से टकरा गया जो इतने नुकीले थे कि उस लडके के सीने को चीरते हुए आर-पार हो गए । जब आस पास के लोग वहाँ पहुँचे वो लडका दर्द से छटपटा रहा था । लोगों ने सामूहिक प्रयासों से कोशिश करके उसे उन नुकीले दांतों से अलग किया किन्तु उसकी जिन्दगी नहीं बचाई जा सकी ।
 
          दूसरी घटना में तेज रफ्तार से जा रही बाईक उसके आगे चल रहे टाटा मेजिक वाहन के अचानक ब्रेक लगा देने से उससे तेजी से टकराई जिससे बाईक चलाने वाला लडका सडक के बीच में गिर गया और दूसरी ओर से आते हुए ट्रक का अगला पहिया उसकी कमर के निचले हिस्से को रौंदता हुआ निकल गया । कुछ देर पानी-पानी की गुहार लगाते हुए उस लडके ने भी वहीं दम तोड दिया ।
 
          इन दोनों हादसों में भी मरने वाले युवकों की उम्र 20 और 25 वर्ष के मध्य ही थी और बाईक की गति हद से ज्यादा तेज तो थी ही । ऐसी कितनी ही घटनाएँ हम सभी अपने-अपने क्षेत्रों में अक्सर घटते हुए देख रहे हैं । जिनमें बाईक सवार बाईक को चलाकर नहीं उडाकर निकलते दिखने की कोशिश करते दिखते हैं और अंततः इन आकस्मिक स्थितियों की चपेट में आकर या तो शेष जीवन के लिये अपाहिज होकर रह जाते हैं या फिर दुनिया से रुखसत होकर अपने माता-पिता को जिन्दगी भर के लिये किश्तों में रोते रहने की सौगात दे जाते हैं । 
 
           क्या वास्तव में उन्हें इतनी जल्दी रहती है जबकि इससे कई गुना अधिक समय इन्हीं युवकों का मोबाईल पर SMS भेजते रहने में और इन्टरनेट पर फेसबुक या इस जैसी अन्य सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर अनावश्यक चेटिंग करने में गुजर जाता है, या फिर हालीवुड-बालीवुड की फिल्मों के ऐसे दृश्य देखकर रफ्तार का ये जुनून उनके दिलो-दिमाग में इस सीमा तक छाया रहता है, या जैसी कि आम धारणा रहती है कि लडकियों को इम्प्रेस करने के चक्कर में इस गति से ये खुली सडक दिखते ही इतनी अनियंत्रित बाईक चलाना प्रारम्भ कर देते हैं । कारण चाहे जो हो परिणाम तो आप भी डूबे, देश भी डूबे, जनता को भी ले डूबे वाला ही बनता है । 

          आखिर विज्ञान की आधुनिकतम उपलब्धियों का पूरा रोमांच प्राप्त करने की ये कीमत इस रुप में कब तक ?

16.5.11

हमारी शांतिप्रियता के साथ... इनकी ये लूट कब तक ?


        एक ने वोट मिलते ही  3/- रु. प्रति लीटर की बात करते हुए 5/- रु. प्रति लीटर की मूल्यवृद्धि कर आम नागरिक को वर्ष भर में अनेकों बार चोट पहुँचाई तो दूसरे ने पेट्रोल की आग में अपनी रोटी पकाई । क्या कांग्रेसी, क्या भाजपाई सभी ने पेट्रोल की आग में काडी दिखाई ।

        किसी भी राजनीतिक पार्टी को हक नहीं है देश की जनता के आंसू पोंछने के दिखावे में विरोध जताने का...  या मरहम लगाने का दिखावा करने का । केन्द्र ने यदि भाव बढाए तो राज्य ने कौनसे कर घटा दिये । जितने दाम कांग्रेस ने केन्द्र में बैठकर बढाये उसी अनुपात में भाजपा ने राज्य में टेक्स बढाया और दिखावे के लिये... सारे भाजपा नेता अपनी-अपनी लक्झरी गाडियों में बैठकर पार्टी मुख्यालय पर उपस्थित होकर, अपनी गाडियां वहीं खडी कर दो किलोमीटर की साईकिल रेली का दिखावा कर और वापस अपनी-अपनी लक्झरी कारों में बैठकर अपने ठिकानों पर रवाना हो लिये । क्या विरोध है...वाह !  आम आदमी से किसी को कोई लेना-देना नहीं है । मंहगाई की आग में झुलसते नागरिकों की चीखो-पुकार से भले ही चारों ओर कोहराम मच रहा हो लेकिन सरकार को तेल कंपनियों का सिर्फ वो घाटा नजर आ रहा है जिसकी जिम्मेदार खुद सरकार है ।

        आज भी खाडी देशों से भारत में पेट्रोल सिर्फ 16.50 रु. लीटर आ रहा है जिस पर 50/- रु. प्रति लीटर से भी अधिक का सरकारी टेक्स जुडकर यही पेट्रोल 69/- रु. प्र. ली. देश की जनता को इस एहसान के साथ बेचा जा रहा है कि हम घाटा उठा रही कम्पनियों को सबसिडी देकर आप तक इतना सस्ता पेट्रोल, डीजल, गैस व मिट्टी का तेल पहुँचा रहे हैं । इसमें तेल कंपनियों का 20/- रु. प्रति लीटर का मुनाफा भी शामिल चल रहा है किन्तु इनका व्यापार घाटा भी सुरसा के मुंह के समान बढता ही जा रहा है । देश को चलाने वाला हर शख्स चाहे अफसरशाह के रुप में हो या राजनीतिज्ञ के रुप में निरन्तर आम आदमी को लूटकर अपनी तिजोरी भरते चले जाने की जुगत में लगा हुआ है । नेता, अधिकारी और पूंजीपति आम जनता को लूटकर दोनों हाथों से धन उलीच रहे हैं । सरकार नित नये टेक्स लगाकर खजाना भर रही है और यही जुटाई हुई अतिरिक्त दौलत भ्रष्टाचार के जरिये इन नेताओं के खातों में विदेशी बैंकों में जमा होती जा रही है । 

     देश में व्यवस्थाएँ बदहाल हैं, देशवासी कंगाल हैं, अधिकारी निहाल हैं और नेता मालामाल हैं. चारों ओर लूट मची है, हर अमीर को अपने स्तर पर लूट करने की पूरी छूट मिली हुई है । अंबानी का पेट खरबों से भी नहीं भर रहा है इसलिये वो भी स्पेक्ट्रम घोटालों में हाथ आजमा रहा है । टाटा हो या बिडला कोई भी बाजी लगाने में पीछे नहीं दिखना चाह रहा है । अत्यधिक आमदनी के लिये जिस देश में तेल, अनाज, सीमेन्ट व सभी जीवनोपयोगी आवश्यक वस्तुओं का उपरी  स्तर पर सट्टा करवाया जा रहा है, जहाँ खिलाडियों को नीलाम किया जा रहा है, हर बडा और बडा बनने के चक्कर में अपने घर में अधिक उजाला करने के कोशिश करते हुए आम जनता के आशीयां जलाए चले जा रहा हो और आम जनता के रुप में हम निरन्तर जलते हुए भी उनके लिये मोहरा बने जा रहे हैं । हम एक चिंगारी भी नहीं बन पा रहे हैं इसलिये निरन्तर सिकुडते-सिमटते जा रहे हैं । हमें बचाने न तो कभी कोई दल आएगा और न ही इस दलदल से हमें निकाल पाएगा । आम जनता ही एकजुट होकर टेक्स न देने की क्रांतिकारी राह पर चल सके तब तो फिर भी कुछ परिवर्तन सम्भव हो । वर्ना तो बोलो ही राम...  बोलो ही राम...! चल ही रहा है ।

भारत सहित पडोसी देशों में बिक रहे पेट्रोल के सामान्य भावों का अन्तर...
          क्यूबा 29/- रु.,  बर्मा 30/- रु.,  नेपाल 34/- रु.,  पाकिस्तान 35/- रु.,  अफगानिस्तान 36/- रु.,  बांगला देश 50/- रु. और (हमारा प्यारा हिन्दुस्तान) भारत 70/- रु. प्र. ली. । उस पर भी पेट्रोलियम कंपनियाँ घाटे में । आखिर ये छोटे-छोटे पडौसी देश अपने नागरिकों को इतने सस्ते भावों पर यही पेट्रोल कैसे उपलब्ध करवा पा रहे हैं ?

सभी तथ्य दैनिक अग्निबाण के सौजन्य से.

11.5.11

है ना आश्चर्य...!


        मेरा छोटा पुत्र अपने काम के सिलसिले में परसों रात्रि को स्लीपिंग कोच बस से जयपुर गया । बस की व्यवस्था उपर स्लीपर और नीचे सीटिंग यात्रियों की थी । रात की गहरी नींद में बालक की जेब से पर्स निकलकर नीचे गिर गया और बस के वेग से आगे आ गया । आगे सीमित दूरी की एक महिला यात्री ने उस पर्स को अपने पैरों के नीचे दबा लिया और सबकी नजर बचाकर पर्स को कब्जे में करने की कोशिश करने लगी । उसकी ये कोशिश बस के ड्रायवर से छुप न सकी । उसने जब उस महिला से वो पर्स मांगा तो महिला यात्री बोली - मेरा ही पर्स है जो नीचे गिर गया है । लेकिन उसकी हरकतें और जबाव देने में लडखडाहट से ड्राईवर उसकी बातों में नहीं आया और पर्स अपने कब्जे में लेकर उस महिला यात्री से बोला - ठीक है तुम्हारा पर्स है तो बताओ इसमें क्या-क्या रखा है ? महिला यात्री के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था लिहाजा पर्स ड्राईवर की कस्टडी में पहुंच गया और खीसियाई सी महिला यात्री गंतव्य पर बस से उतर गई ।

           इधर जब बस के जयपुर पहुँचने पर बालक अपना सामान सम्हालते नीचे उतरा तो पर्स गायब देखकर हक्का-बक्का रह गया । पर्स में काम के सिलसिले से सम्बन्धित महत्वपूर्ण कागजो व कुछ छोटे नोटों के साथ के साथ ही 1000 x 18 = 18,000/- रु. नगद और तीन अलग-अलग बैंकों के डेबिट व क्रेडिट कार्ड रखे थे । उपर नीचे दांए बांए ढूंढते और अगल-बगल के यात्रियों से पर्स के बारे में पूछताछ करते मेरे बालक को वो ड्रायवर चुपचाप देखता ही रहा । जब बालक पूछते-पूछते उस तक पहुँचा तो ड्रायवर ने फिर वही प्रश्न मेरे पुत्र से किया कि तुम्हारा पर्स कैसा था और उसमें क्या-क्या सामान था ?  जब पर्स की पहचान के साथ उसमें रखे सामान का ब्यौरा मेरे पुत्र ने बताया तो उस ड्रायवर ने फौरन वह पर्स निकालकर चेक करवाते हुए उसे मेरे पुत्र को सौंप दिया ।
 
           पुत्र ने जब ड्राईवर को धन्यवाद दिया तो ड्राईवर बोला - भैया रात दिन ये बस चलाता हूँ यदि ऐसी बेईमानी दिमाग में रखकर चलूंगा तो कब मेरे साथ क्या हादसा हो जाएगा किसे मालूम ? इसलिये कम से कम बेइमानी से दूर रहकर अपना काम करता हूँ । 

           ईमानदार बने रहने की चाहे जो बाध्यता उस ड्राईवर के दिमाग में रही हो किन्तु जनसामान्य के लिये तो ईमानदारी व्यवहार में रही ही । अभी कुछ दिन पूर्व इसी ब्लाग पर जब ऐसी ही एक पोस्ट "सार्वजनिक जीवन में अनुकरणीय कार्यप्रणाली" के द्वारा रेल्वे के टिकिट चेकर की ईमानदारी से सम्बन्धित
मैंने प्रकाशित की थी तो अनेक पाठकों ने आश्चर्य व्यक्त किया था कि अपने देश में ऐसी ईमानदारी कहाँ सम्भव है मैं भी मानता हूँ कि बहुत दुर्लभ है तभी तो ये घटनाएँ दिमाग में कुछ विशेष अहसास करवाती हैं वर्ना तो...

शेष अगली पोष्ट में...


7.5.11

ब्लाग / टिप्पणी में हिन्दी लेखन - समस्या के समाधान का एक प्रयास...

         इसी ब्लाग की मेरी पूर्व पोस्ट क्या हिन्दी चिट्ठाकार अंग्रेजी में स्वयं को ज्यादा सहज महसूस कर रहे है ? की टिप्पणियों में चिट्ठाकार मित्रों की कम्प्यूटर पर आसान टाईपिंग की समस्या प्रमुखता से दिखी वहीं मोबाईल से पोस्ट पढकर व मोबाईल से ही टिप्पणी देने के कारण टिप्पणियों में कई मित्रो को अंग्रेजी का प्रयोग न चाहते हुए भी मजबूरी में करने की बाध्यता भी प्रमुखता से दिखी । कट/कापी-पेस्ट की प्रक्रिया में भी समय अधिक लगता है । कुछ और प्रतिक्रिया बारहा साफ्टवेअर से सम्बन्धित भी रहीं । यद्यपि बारहा साफ्टवेअर के प्रयोग से मुझे लगता है मैं अनभिज्ञ हूँ । किन्तु फिर भी कम्प्यूटर पर सबसे आसान तरीका जो हिन्दी लेखन का मुझे लगा उसे आप तक व्यवस्थित रुप से पहुँचाने का एक प्रयास इस पोस्ट के द्वारा मैं और कर रहा हूँ । यद्यपि मैं समझता हूँ कि बहुसंख्यक पाठक मित्रों के लिये ये जानकारी कोई नई नहीं होगी ।

          सबसे पहले हमारा कम्प्यूटर आपरेटिंग सिस्टम Window XP या इसके बाद के Window Vista या Window 7 होना आवश्यक है जो कि मुझे लगता है कि इस समय के बहुसंख्यक कम्प्यूटर Window XP बेस पर ही चल रहे हैं । इस सिस्टम में इन्टरनेट पर हिन्दी चलाने के लिये इस साफ्टवेअर में इनबिल्ट (इन्डिक आई एम ई) Iidic IME सिस्टम को इस Window XP की आपरेटिंग सीडी लगाकर सक्षम करना होता है जिसका तरीका इस लिंक के द्वारा आप बखूबी समझ सकते हैं- विण्डोज एक्सपी में इण्डिक सपोर्ट सक्षम करना (भाग-1) यहाँ प्रस्तुत ये जानकारी ई-पण्डित के श्री श्रीशजी के द्वारा बिल्कुल आसान विधि से बताई/समझाई गई है । इसी लिंक में  इस लेख के भाग-2 के साथ ही हिन्दी भाषा सक्षम नहीं वाले मोबाईल सेट को आप इन्टरनेट पर प्रसारित हिन्दी को आसानी से पढ सकने योग्य भी बना सकेंगे ।

          इस लिंक पर प्रस्तुत विधि के द्वारा जब आप अपने Window XP या इसके बाद के आपरेटिंग सिस्टम में इसे सक्षम कर चुके होंगे (यद्यपि Window-7 में तो यह सक्षम ही आता है) तो Alt + Shift Key's के द्वारा हिन्दी से इंग्लिश और इंग्लिश से हिन्दी पर आसानी से परिवर्तित होते रह सकेंगे ।

          इसके बाद आपके समक्ष समस्या आ सकती है की-बोर्ड के चुनाव की उसका समाधान कुछ इस तरह से देखें-

          प्रिन्टिंग विधा में सबसे लोकप्रिय साफ्टवेअर रहा है श्रीलिपि । और इसके साथ DTP आपरेटर प्रायः देवनागरी में Deo सीरिज टाइपिंग हेतु अपने कम्प्यूटर में रखते हैं । बहुत आसान की बोर्ड- हमारे सीधे हाथ की उंगलियों से अक्षर टाईप हो जाते हैं और उल्टे हाथ की उंगलियों के दायरे में सारा मात्राओं का सेक्शन चलता है । और यही आसान की बोर्ड जब आपके कम्प्यूटर से आप Indic IME को सक्षम कर लेते हैं तो इसी कीबोर्ड का विकल्प आपको इस साफ्टवेअर में भी न सिर्फ मिल जाता है बल्कि कीबोर्ड की मदद से कौनसी की कौनसा अक्षर बना रही है उसका फोटो प्रिंट भी आप उसी साफ्टवेअर में से कापी कर सदैव अपने डेस्कबोर्ड पर सामने रख सकते हैं । 

          इसके साथ ही प्रायः हमारे कम्प्यूटर में WordPad साफ्टवेयर भी इंस्टाल रहता ही है । इसके पेज को खोलकर हम इत्मिनान से अपने पोस्ट आर्टिकल इस पर बगैर इन्टरनेट आन किये टाईप कर लेते हैं और बाद में नेट आन कर अपने डेशबोर्ड से नया संदेश बनाएँ वाले पेज को खोलकर WordPad का सारा मैटर यहाँ कापी-पेस्ट कर लेते हैं । आप 60% अपना काम इस विधि से बगैर इन्टरनेट के पूरा कर सकेंगे ।

           मेरी इसी पिछली पोस्ट पर इस समस्या का एक समाधान भाई श्री अविनाश वाचस्पतिजी भी नुक्कड ब्लाग की http://www.nukkadh.com/2009/09/blog-post_22.html  इस लिंक पर दे गये हैं । आप एक नजर इस लिंक पर भी डाल सकते हैं । और जहाँ भी आपकी समस्या का जो सबसे आसान विकल्प आप समझें उसे अपना सकते हैं ।

          अब आखिर में बात मोबाईल से पोस्ट पढने की-  एक तरीका तो मैंने आपको बताया कि श्री श्रीशजी की उपर की लिंक में आपको इससे सम्बन्धित भी पूरी जानकारी मिल ही जाएगी किन्तु यदि मोबाईल में आपेरा मिनी साफ्टवेयर के संयोजन व सेटिंग में हिन्दी लेंग्वेज सक्षम हो तो आप न सिर्फ अपना पूरा ब्लाग डेशबोर्ड संचालन इस मोबाईल की मदद से करते रह सकते हैं बल्कि जब भी चाहें अपनी टिप्पणी भी हिन्दी में मोबाईल के द्वारा ही हर उस ब्लाग-पोस्ट में जिसे आप मोबाईल से पढ रहे हैं उस ब्लाग पर अपनी हिन्दी टिप्पणी भी आसानी से प्रेषित करते रह सकते हैं ।
 
          कुछ माह पूर्व मैंने नोकिया x2 माडल करीब 5,000/- रु. में खरीदकर उसमें ये समस्त सुविधाएँ देखकर इस पोस्ट में इसके बारे में अपने पाठक मित्रों को विस्तृत जानकारी दी थी । यही फोन अब तो लगभग 4,000/- में ही आता दिख रहा है, जबकि एक और नोकिया फोन के माडल की प्रशंसा न देन्यं न पलायनम ब्लाग के श्री प्रवीण पाण्डेयजी भी अपनी इस पोस्ट पर कर चुके हैं । लेकिन ये विकल्प आपके लिये तभी उपयोगी हैं जब आपको मोबाईल बदलने की आवश्यकता हो या आप नया मोबाईल खरीदना चाह रहे हों वर्ना तो आप अपने मोबाईल में सिर्फ पोस्ट पढने जितना कामचलाउ परिवर्तन करवाकर दूसरों के लिये अनाकर्षक व किसी सीमा तक पढने में असुविधाजनक रोमन लिपी में अंग्रेजी में टाईप की जाने वाली टिप्पणी से अपना काम चलाते रहना जारी रख ही सकते हैं ।

      एक निवेदन भी - कुछ अतिरिक्त व्यस्तताएँ मेरे लिये ऐसी चल रही हैं जिसके कारण मैं चाहकर भी अभी अधिक समय अपनी ब्लाग सक्रियता को फिलहाल नहीं दे पा रहा हूँ । इस कारण न सिर्फ मेरी ब्लाग पोस्ट देरी से आ रही है बल्कि आप जैसे मित्रों के ब्लाग पर मैं व्यवस्थित रुप से अभी आ भी नहीं पा रहा हूँ । कृपया इस अनियमितता के बाबत अगले 2-4 दिन और के लिये आप मुझे क्षमा कर सकेंगे यह निवेदन भी आपसे है । धन्यवाद सहित...


3.5.11

क्या हिन्दी चिट्ठाकार अंग्रेजी में ज्यादा सहज हैं ?



          इन दिनों मेरे देखने में ऐसा क्यों आ रहा है कि पोस्ट-दर-पोस्ट टिप्पणीकर्ता अपनी टिप्पणियों में हिन्दी का दामन छोडकर इंग्लिश की बोर्ड के साथ रोमन लिपि में अपनी टिप्पणियां देने को प्राथमिकता देते दिखाई दे रहे हैं । पहले तो सिर्फ कडुवा सच ब्लाग के उदयजी व उनके जैसे कोई इक्का दुक्का ब्लागर्स की ही टिप्पणी इस पैटर्न पर देखने में आती थी और चूंकि उनके अपने ब्लाग में भी लेटर हमेशा एक जैसे छोटे-छोटे दिखाई देते हैं तो ये समझने में आता था कि शायद उनके पास मौजूद कम्प्यूटर के विशेष ओल्ड माडल में होने के कारण उनके लिये ये मजबूरी रहती हो । कुछ और सीमित ब्लागर्स जैसे क्षितिज ब्लाग के जगदीश बालीजी की टिप्पणी भी ऐसी ही आती थी वहाँ भी ये समझ में आता था कि इनके तीन में से दो ब्लाग अंग्रेजी के हैं इसलिये इनका हाथ स्वाभाविक रुप से  इंग्लिश की बोर्ड पर ही अधिक चलता होगा । लेकिन फिर  इस सूचि में कभी हिन्दी तो कभी रोमन इंग्लिश में टिप्पणी देने वाले चिट्ठाकारों के नाम बढते हुए क्रम में यूं देखने में आने लगे-
       In search of saanjh ब्लाग की Saanjh, खुदको खोजने का एक सफर ब्लाग की मंजूलाजी, बहुत सीमित अनुपात में परवाज...शब्दों...के पंख ब्लाग की डा मोनिका वर्माजी, झरोखा ब्लाग की पूनम श्रीवास्तवजी, Mridula's ब्लाग की Mridula Pradhanji, नमस्कार ब्लाग के श्री विवेक रंजन श्रीवास्तवजी, सृजन शिखर ब्लाग के श्री उपेन्द्र उपेनजी, अनकवि ब्लाग के श्री हर्षवर्द्धन वर्माजी, झंझट के झटके ब्लाग के श्री सुरेन्द्रसिंह झंझटजी, स्पर्श ब्लाग की दीप्ति शर्माजी, काव्य-कल्पना ब्लाग के Er. सत्यम् शिवमजी, आदत मुस्कराने की ब्लाग के श्री संजय भास्करजी, पछुवा पवन ब्लाग के श्री पवन कुमार मिश्रजी, काव्या ब्लाग की नीलिमा गर्ग जी, बालाजी ब्लाग के Shri G. N. SHAW, काव्यवाणी ब्लाग के श्री शेखर कुमावत, गजलयात्रा ब्लाग की डा. वर्षासिंहजी, मेरी सोच मेरी अभिव्यक्ति ब्लाग के श्री सी. एस. देवेन्द्र कुमार, मसिकागद ब्लाग के श्री दीपक मशालजी, अमृतरस ब्लाग की डा. नूतन डिमरी गैरोला, भगत भोपाल ब्लाग के श्री भगत सिंह पंथीजी, यादें... सदा के लिये ब्लाग के श्री ओम कश्यपजी, मेरे अरमान मेरे सपने ब्लाग की श्री दर्शन कौर धनौएजी, झील ब्लाग की डा. दिव्या श्रीवास्तवजी, चैतन्य का कोना ब्लाग के श्री चैतन्य शर्माजी, राम राम भाई ब्लाग के श्री वीरेन्द्र शर्माजी, कुंवर कुसुमेश ब्लाग के श्री कुंवर कुसुमेशजी, दादा का चश्मा, दादी का संदूक ब्लाग के श्री अरशद अली, अपनत्व ब्लाग के अपनत्व (सरिताजी), अनामिका की सदायें ब्लाग की अनामिकाजी, कासे कहूँ ब्लाग की कविता वर्माजी, वानभट्ट ब्लाग के श्री वानभट्टजी, स्वप्न मेरे ब्लाग के श्री दिगम्बर नासवाजी, मेरा हमसफर ब्लाग के श्री पी. के .शर्माजी, कुछ कही कुछ अनकही ब्लाग के श्री विजय रंजनजी, सुरभित सुमन ब्लाग की सुश्री सुमनजी, कवि योगेन्द्र मौदगिलजी, बस यूं ही...अमित ब्लाग के श्री अमित श्रीवास्तवजी, रोशी ब्लाग की रोशी अग्रवालजी, मेरे सपने ब्लाग के श्री विवेक जैन जी व अन्य अनेक नाम जिन तक पहुँचने की कोशिश आगे नहीं की गई ।

        इस सन्दर्भ में जो विशेष बात जो मेरे देखने में आई और जिसके कारण यह विषय सार्वजनिक रुप से जानकारी में लाने का ये विचार मेरे मन में आया वह ये रहा कि शुरुआती नामों में पहले जहाँ जिक्र किया जावे तो अनेक चिट्टाकारों की पहले जो टिप्पणी रोमन लिपी में दिखी वो बाद में हिन्दी में परिवर्तित होती चली गई जिनमें मुख्य नाम- डा. मोनिका वर्माजी, श्री उपेन्द्र उपेनजी, इं. सत्यम शिवमजी, श्री संजय भास्करजी, डा. वर्षा सिंहजी, डा. नूतन डिमरीजी इन सभी के लिये जा सकते हैं । जबकि आखरी के नामों में विरोधाभास यह देखने में आ रहा है कि श्री अमित श्रीवास्तवजी, डा. दिव्या श्रीवास्तवजी, दर्शन कौर धनौएजी ये ऐसे नाम दिख रहे हैं जिनकी टिप्पणियां अच्छी भली हिन्दी से चलते-चलते अब अंग्रेजी में परिवर्तित होते दिखाई दे रही हैं ।

          ये सभी नाम जिनकी मैं यहाँ चर्चा कर रहा हूँ ये सभी मेरे मित्र व शुभचिंतक हैं, इनमें से अधिकांश तो मेरे ब्लाग्स के फालोअर्स भी हैं इसलिये मेहरबानी करके कोई भी ये न समझें कि मैं किसी को कमतर दिखाने के नजरिये से उनके नामों का उल्लेख कर रहा हूँ बल्कि मैं सही मायनों में ये समझने का प्रयास करना चाह रहा हूँ कि हिन्दी में जब हमारी बडी से बडी पोस्ट हम अपने ब्लाग पर प्रकाशित कर लेते हैं तो दो-चार लाईन या कभी-कभी तो दो चार शब्दों की हमारी टिप्पणी में अंग्रेजी टायपिंग हमें अधिक सहज क्यों लगने लगती है ? जबकि मात्र Alt + Shift  key's को एक साथ दबाकर हम तत्काल इंग्लिश से हिन्दी व हिन्दी से इंग्लिश पर शिफ्ट हो जाते हैं ।



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