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8.3.13

जीवन पर भारी – फेसबुक की यारी

            इन्दौर के चन्दन नगर में रहने वाले 21 वर्षीय कम्प्यूटर शिक्षक मजहर खान ने इसी वर्ष 4 मार्च को फाँसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त करली । पुलिस जाँच में उसके घर वालों ने बताया कि मजहर फेसबुक पर किसी लडकी से चेटिंग करते रहने के दौरान उसके प्यार के प्रति गंभीर होता चला गया जबकि कोई अमीर युवती उसके साथ सिर्फ समयपास मनोरंजन कर उसकी भावनाओं से खिलवाड कर रही थी । जब मजहर के प्रेम का यह भ्रम पूरी तरह से टूट गया तो वो इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाया और निराशा के गर्त में डूबकर उसने फाँसी लगाकर अपना जीवन ही समाप्त कर लिया ।

        इस घटना के कुछ ही समय पहले फेसबुक के प्रेम-प्रसंग का एक रोचक वाकया ऐसा भी सामने आया था जिसमें चेटिंग के दरम्यान होने वाले प्यार में युवती ने जब अपने प्रेमी से मिलने की इच्छा जताई तो प्रेमी महोदय ने उसे ही अपने पास आने का अनुरोध किया ।  प्रेम की गिरफ्त में आकंठ लिप्त युवती सेकडों किलोमीटर का सफर तय करके जब अपने फेसबुक प्रेमी से मिलने उसके नगर में पहुँची तो प्रेमी महोदय ने उसके मोबाईल की फोनकाल रिसीव करना भी बन्द कर दिया । किसी अंजान हितैषी की मदद से दूसरे मोबाईल नंबर द्वारा उस तरुणी ने अपने प्रेमी को फोन करवाकर धोखे से उसे अपने सामने बुलवाया तो यह देखकर वह युवती भौंचक्क रह गई कि उसके सामने उसके दादाजी की उम्र का 62-63 वर्षीय बुजुर्ग जो फेसबुक पर लम्बे समय से उससे प्रेम का दावा कर रहा था, आकर खडा हो गया । तब अपने उस फेसबुकी प्रेमी की लानत-मलानत करते हुए अपनी किस्मत को कोसते–कलपते वह युवती वापस अपने गृहनगर रवाना हुई ।

       
इसी कडी से जुडा 4-5 मिनीट के वीडियो क्लिपिंग में एक गडबडझाला यू-ट्यूब पर भी देखा जा सकता है जहाँ अत्यन्त प्रसन्न मुद्रा में एक युवक व युवती इस माध्यम से चेटिंग के द्वारा एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं, दोनों में मनपसन्द वार्तालाप होता है फिर एक ही शहर के होने के कारण मिलने का समय और स्थान जो एक सायबर केफे के किसी केबिन नंबर के द्वारा सेट होता है वहाँ आकर्षक परिधान में सज-संवरकर बाजार से गुलदस्ता खरीदते हुए युवक जब उस सायबर केफे के तयशुदा केबिन में प्रवेश करता है तो वहाँ प्रतिक्षारत युवती और वह आगंतुक युवक शर्म से पानी-पानी हो जाते हैं क्योंकि वे दोनों सगे भाई-बहिन ही निकलते हैं ।

       
सोशल मीडिया के इस लोकप्रिय माध्यम का युवाओं पर इतना व्यापक असर देखने में आ रहा है कि लडका या लडकी दोनों में से कोई भी एक यदि तयशुदा समय में चेटिंग पर उपलब्ध नहीं हो पाए तो कम्प्यूटर पर मौजूद दूसरे पक्ष की व्यग्रता देखते ही बनती है । फेसबुक की ऐसी ही दीवानगी अपने युवा होते पुत्र में पिता ने जब देखी तो केरियर के प्रति गम्भीर रहने की समझाईश देते हुए पिता ने अपने पुत्र से कहा कि बेटा इस फेसबुक से तुम्हें जीवन में रोटी तो नहीं मिलेगी क्यों यहाँ व्यर्थ में अपना समय बर्बाद कर रहे हो तो बेटे ने तत्काल अपने पिता को जवाब दिया कि- पापा, ये तो मैं भी जानता हूँ कि इस फेसबुक से मुझे जीवन में रोटी नहीं मिलेगी परन्तु मेरे जीवन के लिये रोटी बनाने वाली तो मुझे इसी फेसबुक से ही मिलेगी । 
       
        इस समयपास माध्यम से मेच्यूअर लोग तो मानसिक रुप से अप्रभावित ही रहते हैं किन्तु युवावस्था की दहलीज पर खडे नये युवक-युवतियों के लिये ये दिल्लगी ऐसी दिल की लगी साबित हो रही है जो उनके सोचने-समझने के दायरे को दिल से निकलकर दिमाग तक शायद पहुँचने ही नहीं दे रही है और गाहे-बगाहे ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति किसी न किसी बदले हुए रुप में लगातार देखने में आ रही हैं । अतः ऐसी घटनाओं के दुःखद परिणामों को देखते हुए नई युवा पीढी को यह ध्यान में रखना ही चाहिये कि पांच-पच्चीस से लगाकर सौ-दो सो व हजारों-हजार अपरिचित मित्रों तक पहुँचा देने वाला यह आभासी माध्यम हमारे जीवन को किसी भी रुप में दुःखों के गर्त में न धकेल पावे ।
      

24.5.11

रफ्तार का जुनून...?

            स्कूटर पर आने-जाने वाले बैंक आफिसर पिता और स्कूटी की मदद से इमीटेशन ज्वेलरी का कारोबार करने वाली माता ने अपने मकान के नवीनीकरण अभियान में अपने इकलौती सन्तान 22 वर्षीय पुत्र की वैवाहिक तैयारियों के अनुसार उसकी भावी आवश्यकताओं की सभी स्थितियों को ध्यान में रखते हुए मकान की उपरी मंजिल पर सबकुछ समय की आवश्यकता के साथ ही बच्चे की इच्छापूर्ति के मुताबिक सर्वश्रेष्ठ निर्माण कार्य अत्याधुनिक इन्टीरियर के द्वारा करवा लिया था । परिवार के स्टेटस के मुताबिक घर में कार भी थी जिसका उपयोग या तो पूरा परिवार एक साथ कहीं जाने के समय काम में लेते थे या फिर शौकिया तौर पर उनका ये बालक अपने दोस्तों के साथ कर लिया करता था ।

        होनहार पुत्र कालेज में ग्रेजुएशन की परीक्षा में उच्चतम अंकों से पास हुआ तो प्रसन्नता के दौर में माँ-पिता ने बच्चे की इच्छापूर्ति हेतु उसकी मनपसन्द मोटर बाईक भी तोहफे में उसे दिलवा दी । वैसे भी माँ-पिता दोनों की उस बालक के प्रति सोच यह रहती थी कि हमारा सबकुछ इसी का तो है । इसलिये यदि इसकी चाहत बाईक के इस मेक व माडल की है तो यही बाईक इसे हम क्यों न दिलवाएँ ।

        बाईक खरीदें एक माह भी नहीं हुआ होगा कि पास ही के गांव में रहने वाले बालक के मित्र की शादी का संयोग बन गया । पिता ने बालक को निर्देशित भी कर दिया कि तुम अपने इस मित्र की शादी में बाईक से नहीं जाओगे । तुम्हे जितनी बार भी आना-जाना करना है कार के द्वारा ही करना है जिसे उपरी तौर पर तो बालक ने मान लिया किन्तु मन से नहीं मान पाया । सुबह पिता के समक्ष कार लेकर निकला वह बालक दूसरी बार घर आने पर पिता की गैरमौजूदगी में अपनी नई बाईक लेकर ही निकला । शादी के घर में दूल्हे के कपडे लांड्री से लाने का काम बाकि था जिसकी जिम्मेदारी इसी बालक ने दूसरे दोस्त के लांड्री के नजदीक रहने के बावजूद स्वयं ले ली और अपनी नई मोटर बाईक से लांड्री से कपडे लेकर वहीं नजदीक रहने वाले मित्र के साथ वापस शादी वाले घर की ओर दोनों मित्र चल पडे । दूसरा मित्र भी अपनी स्वयं की मोटर बाईक पर ही चल रहा था । रास्ते में अनजाने ही दोनों में रेस चालू हो गई और अपनी नई बाईक की रफ्तार का कौशल दिखाने में एक मोड पर तेजी से टर्न लेने में बालक गाडी का बेलेन्स कन्ट्रोल नहीं कर पाया और लगभग 8 फीट गहरे बडे से गड्ढे में बाईक के साथ जो गिरा तो बालक नीचे और बाईक उसके उपर जा गिरी । जब तक पीछे से दूसरा मित्र वहाँ पहुँचा और दो-चार लोगों को रोककर उस बालक को गड्ढे में से निकाला तब तक उसके प्राण पखेरु उड चुके थे । इन दम्पत्ति के साथ यही बालक हमारी बैंकाक-पटाया की स्वप्न-यात्रा में हमारे साथ भी कुछ समय बिता चुका था ।

        यह बालक तो अकाल मृत्यु के द्वारा दुनिया से रुखसत हो गया और माँ-पिता की आगे की शेष पूरी जिन्दगी उजाड हो गई । नसीब से ये एक सन्तान मिलने वाले रिटायरमेंट के करीब पहुँच रहे पिता व माता की उम्र ऐसी भी नहीं रह गई थी कि वे इस दुर्घटना के बाद दूसरी सन्तान को जन्म देकर अपनी सामर्थ्य के दौर में उसे आत्मनिर्भर बनता देख पाते । प्रायः इसमें की घटना में लोग सोचते हैं कि लडकियों को इम्प्रेस करने के चक्कर में नवयुवक ऐसी दुर्घटनाएँ कर बैठते हैं किन्तु यहाँ ऐसा कोई चक्कर नहीं था यदि कुछ था तो नई उम्र और नई बाईक के साथ कहीं न कहीं हवा में उडने जैसा जुनून था । लगभग तीन साल पहले घटने वाली इस घटना का यहाँ उल्लेख क्यों हो गया अब उसका कारण भी देखें-
  
पिछले दिनों में अखबारो में छपने वाली एक नहीं दो घटनाएँ...
  
          एक बाईक पर दो लडके हाईवे पर ऐसी ही तेज गति से जा रहे थे दूसरी ओर से एक गेहूँ काटने वाली मशीन चली आ रही थी । अचानक बाईक चलाने वाले लडके का पल भर के लिये ध्यान हटा और बाईक उस मशीन से जा टकराई । बाईक चलाने वाले को तो गम्भीर चोटें आई किन्तु पीछे बैठा लडका इस टक्कर से उछलकर उस मशीन में लगे दांतों से टकरा गया जो इतने नुकीले थे कि उस लडके के सीने को चीरते हुए आर-पार हो गए । जब आस पास के लोग वहाँ पहुँचे वो लडका दर्द से छटपटा रहा था । लोगों ने सामूहिक प्रयासों से कोशिश करके उसे उन नुकीले दांतों से अलग किया किन्तु उसकी जिन्दगी नहीं बचाई जा सकी ।
  
          दूसरी घटना में तेज रफ्तार से जा रही बाईक उसके आगे चल रहे टाटा मेजिक वाहन के अचानक ब्रेक लगा देने से उससे तेजी से टकराई जिससे बाईक चलाने वाला लडका सडक के बीच में गिर गया और दूसरी ओर से आते हुए ट्रक का अगला पहिया उसकी कमर के निचले हिस्से को रौंदता हुआ निकल गया । कुछ देर पानी-पानी की गुहार लगाते हुए उस लडके ने भी वहीं दम तोड दिया ।
  
          इन दोनों हादसों में भी मरने वाले युवकों की उम्र 20 और 25 वर्ष के मध्य ही थी और बाईक की गति हद से ज्यादा तेज तो थी ही । ऐसी कितनी ही घटनाएँ हम सभी अपने-अपने क्षेत्रों में अक्सर घटते हुए देख रहे हैं । जिनमें बाईक सवार बाईक को चलाकर नहीं उडाकर निकलते दिखने की कोशिश करते दिखते हैं और अंततः इन आकस्मिक स्थितियों की चपेट में आकर या तो शेष जीवन के लिये अपाहिज होकर रह जाते हैं या फिर दुनिया से रुखसत होकर अपने माता-पिता को जिन्दगी भर के लिये किश्तों में रोते रहने की सौगात दे जाते हैं । 
  
           क्या वास्तव में उन्हें इतनी जल्दी रहती है जबकि इससे कई गुना अधिक समय इन्हीं युवकों का मोबाईल पर SMS भेजते रहने में और इन्टरनेट पर फेसबुक या इस जैसी अन्य सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर अनावश्यक चेटिंग करने में गुजर जाता है, या फिर हालीवुड-बालीवुड की फिल्मों के ऐसे दृश्य देखकर रफ्तार का ये जुनून उनके दिलो-दिमाग में इस सीमा तक छाया रहता है, या जैसी कि आम धारणा रहती है कि लडकियों को इम्प्रेस करने के चक्कर में इस गति से ये खुली सडक दिखते ही इतनी अनियंत्रित बाईक चलाना प्रारम्भ कर देते हैं । कारण चाहे जो हो परिणाम तो आप भी डूबे, देश भी डूबे, जनता को भी ले डूबे वाला ही बनता है । 

          आखिर विज्ञान की आधुनिकतम उपलब्धियों का पूरा रोमांच प्राप्त करने की ये कीमत इस रुप में कब तक ?

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