27.5.11

जल्दबाजी का भूत...!

          कंवर सा. कल शाम को अपन एक सप्ताह की यात्रा पर चल रहे हैं, 18 सीटर मेटाडोर का मैंने इन्तजाम कर लिया है, 14 टिकिट आपके परिवार को मिलाकर सामने हैं यदि और कोई चलने वाला आपकी नजर में हो तो उसे भी ले लेना, मैं भी मेरी तरफ से देख लेता हूँ नहीं तो अपने परिवार के 14 लोग ही आराम से चलेंगे । कोई प्री-प्लानिंग नहीं, पहले से कोई सूचना नहीं बस आप तो चलो । मैं उनकी इस जल्दबाज शैली से तब तक बखूबी परिचित हो चुका था, और मार्केटिंग स्तर पर स्वयं अपना काम  करने के कारण कहीं छुट्टी लेने जैसी कोई समस्या भी नहीं थी लिहाजा बच्चों के स्कूल में आवश्यक एप्लीकेशन देकर व अपने दो-चार क्लाईन्ट्स को उनके काम के प्रति आश्वस्त कर उनके साथ निकलने के लिये समयानुसार सपरिवार तैयार हो गया । ये परिचित शख्स मुझसे उम्र में थोडे ही बडे मेरे काका श्वसुर थे । उस समय हमारे साथ 10 से भी अधिक छोटे बच्चे उस यात्रा में थे ।
 
           नीयत समय पर सब यात्रा के लिये निकल पडे । कहीं 12, कहीं 15 तो कहीं 20-20 घंटे की त्रस्त कर देने वाली यात्रा करके ग्रुप कहीं भी पहुँचें और पहुँचते ही उनका जल्दी का टेप चालू हो जावे । चलो जल्दी करो, आगे वहाँ चलना है । तीसरे-चौथे दिन तक तो उनकी उस जल्दबाज शैली से सभी हलकान हो उठे । आखिर बच्चों ने शिकायत के लिये मुझे ही पकडा - जीजाजी आप पापा को बोलो कि जहाँ भी आएँ वहाँ तसल्ली से घूमने-फिरने तो दें । जब मैंने भी बेहद विरोधसूचक शैली में सभी बच्चों व महिलाओं की भावनाओं से उन्हें अवगत करवाते हुए उनकी उस जल्दबाज शैली का विरोध किया तो मजबूरी में वे ये कहते हुए मान तो गए कि - कंवर सा. मैं तो ये सोच रहा था कि अपन दो-चार जगह और इसी समय में घूम लेंगे लेकिन बेहद अनमनेपन से वे आगे की यात्रा में सभी यात्रियों की भावना के अनुरुप समय तक रुक पाए ।

          इन साहब का मण्डी में दलाली का काम था और हर समय जल्दी की मानसिक गिरफ्त में रहने के कारण इनकी सहज मलत्याग की प्रवृत्ति बाधित होते-होते ये पहले कब्ज की गिरफ्त में आकर बाद में ब्लड-प्रेशर की समस्या से घिरे हुए थे । प्रतिदिन ब्लडप्रेशर कन्ट्रोल में रखने की गोली लेना इनकी बाध्यता थी, एक दिन गोली लेने के आधे घण्टे में स्वयं को सहज नहीं महसूस कर पाने के कारण एक गोली और ले ली जिसके कारण दो-चार घण्टे बाद हास्पीटल में एडमिट होना पडा, जहाँ पता चला कि रोजाना बढ जाने वाला उनका ब्लड-प्रेशर (इसके बारे में विस्तृत जानकारी यदि आप लेना चाहें तो हाई ब्लड-प्रेशर (उच्च रक्तचाप) से बचाव ये पोस्ट माउस क्लिक करके देखें) उस दिन वैसे ही घटा हुआ था और अपनी जल्दबाज प्रवृत्ति के चलते ये एक नहीं बल्कि दो-दो गोली ब्लड प्रेशर घटाने की और ले चुके थे । अतः उस दिन का सूरज उनकी जिन्दगी में देखा जाने वाला अन्तिम सूरज साबित हुआ और महज 48 वर्ष की उम्र में जितनी जल्दी उन्हे हमेशा रहती थी उतनी ही जल्दी वे इस दुनिया से कूच भी कर गये ।
 
          एक अन्य रिश्तेदार जो अजमेर में रहते हैं उन्हें भी मैंने अक्सर बेहद जल्दबाजी में ही देखा । एक दिन खबर आई कि उनकी कार का एक्सीडेंट हो गया है और उनका चौथे नम्बर का छोटा भाई जो उनके साथ आगे की सीट पर बैठा था उस एक्सीडेंट में वह अपनी विद्यार्थी उम्र में ही कण्टक्टर साईड से होने वाले उस एक्सीडेंट की भेंट चढकर शहीद हो गया था । उनके अंतिम संस्कार में मैं ही अजमेर जब पहुँचा तो उस ह्रदयविदारक शोकसंतप्त माहौल में वे रह-रहकर उस मृतक भाई को याद करके चिल्लाते दिख रहे थे हाए सुशील (संयोगवश उस भाई का यही नाम था) मेरे कारण तेरी जान चली गई । ईश्वर ही जाने अभी उनकी वो मानसिक जल्दबाजी समाप्त हुई या घटी या नहीं.

          मल्टीलेबल मार्केटिंग कम्पनी में कार्यरत मेरे एक अति महत्वाकांक्षी साथी भी इस समय मेरे जेहन में आ रहे हैं जिन्हें उन्नति करने की ऐसी ही जल्दबाजी रहती थी । जब ये कम्पनी हमारी अपेक्षाओं को पूर्ण नहीं कर पाई तो इन्होंने पहले लोडिंग रिक्शा खरीदा, फिर अपने सम्पर्कों के चलते एक और लोडिंग रिक्शा खरीदकर किराये पर चलवा दिया और फिर जल्दी ही दोनों रिक्शा किराये पर सौंपकर और अधिक लाभ के लिये बडी मेटाडोर खरीदकर उस पर दिन रात अधिक से अधिक दौड लगाने लगे. निरन्तर काम का बढता दबाव और पर्याप्त नींद न ले पाने के कारण एक रात 2.30 बजे के लगभग उज्जैन से इन्दौर आते समय एक्सीडेण्ट कर बैठे और उनकी जीवन-यात्रा भी फिर उससे आगे नहीं बढ सकी ।
 
          जल्दबाजी के ये और इस जैसे अनेक उदाहरण तो वे हुए जिनसे मेरा वास्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से पडता रहा और इसके दुष्परिणाम समय-समय पर मेरे देखने में आते रहे । लेकिन सार्वजनिक रुप से जल्दी से जल्दी किले फतह करने वाले कुछ और उदाहरणों की यदि हम बात करें तो शेअर बाजार में जल्दी से जल्दी सही गलत सभी हथकण्डे अपनाकर सारी दुनिया की दौलत अपने कब्जे में कर लेने की सोच रखने वाले हर्षद मेहता का उल्लेख किया जा सकता है जिसके कारनामों के कारण उस पर भरोसा करने वाले पदाधिकारियों की दो बैकें एक समय फैल हो गई थी और लाखों लोग अपनी बैंक जमा राशि से भी हाथ धो बैठे थे । यद्यपि बीच में इनकी कारों का काफिला और घीरुभाई अंबानी के आफिस की बिल्डिंग में ही मौजूद इनका बडा सा आफिस घीरुभाई अंबानी से भी अधिक ऐश्वर्यपूर्ण लगने लगा था । किन्तु अपनी जल्दबाज उपलब्धियों के चपेटे में बैंक व शेअर बाजार के अनेकों ग्राहकों को अकाल फाँसी लगवा देने वाले यही हर्षद मेहता शीघ्र ही कानून की गिरफ्त में फंसकर और बीमारियों के आक्रमण से घिरकर 45-50 वर्ष की मध्य उम्र में ही दुनिया से रुखसत हो लिये थे ।
 
          फिर हमारे देश की महान राजनैतिक पार्टी रही कांग्रेस आई की अन्तर्राष्ट्रीय शख्सियत संजय गांधी जिन्हें सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे का वाली शैली में देश की जनसंख्या और देश के अल्पसंख्यक वर्ग को जल्दी से जल्दी देश से खदेड देने का जुनून चढा था जिसके चलते 1975-77 के इमरजेंसी काल में हजारों लोगों की जबरिया नसबन्दी करवा देने और रातों रात उस अल्पसंख्यक वर्ग की पचासों बस्तियों पर बुलडोजर चलवा देने की महारथ के चलते वे भी अपनी जल्दबाज शैली के मुताबिक ही प्लेन में बैठकर जल्दी से दुनिया से रुखसत हो लिये थे । हमारे क्षेत्र में इसी पार्टी के इनके एक परम अनुयायी नेता जिनके नाम का मैं उल्लेख नहीं कर रहा हूँ उनका भी यही रेकार्ड रहा - साम, दाम, दण्ड, भेद की नीतियों पर चलते अपने सामने दिखने वाली हर खुबसूरत लडकी को अपनी अंकशयिनी बनालूँ, दसों दिशाओं से अपने सामने दिख सकने वाली सारी दौलत अपने कब्जे में करलूँ, और अपने राजनैतिक आकाओं को हर समय प्रसन्न भी रख लूँ कि फटाफट शैली में जल्दी-जल्दी पार्षद व विधायकगिरी की यात्रा तय करते हुए संजय गांधी की दुनिया से रुखसतगी के बमुश्किल चंद दिनों बाद ही एक मोटरसायकल एक्सीडेंट में ये भी चपेटे में आ गये और लगभग एक सप्ताह जीवन-मृत्यु के बीच कोमा में संघर्षरत रहकर ये भी अपने आका से मिलने उनके पास ही पहुँच गये । क्षेत्र की जनता तो "मरने वालो कसो भी थो पन गरीबां के तो वो नी सतायो" की शैली में उनकी याद करके रह गई पर सुनते हैं उन्हें उपर भी अपने आका संजय गांधी से इसलिये डांट खानी पडी की क्यों रे भैया यहाँ तक आने में इतनी देर कैसे करदी ? जिसका जवाब उन्होंने बडी मासूमियत से अपने आका को यही दिया कि दादा आप तो प्लेन से आ गये थे, मैं मोटर सायकल से आया हूँ तो इतनी देर लगना तो लाजमी था ही । 
 
          कभी दो कहानियाँ मेरे पढने में आई थी - एक में दो लकडहारे थे जिन्हें पेड काटने का काम पडता रहता था, इनमें से एक काम दिखते ही पेड काटने में भिड जाता था और पसीना बहाते-बहाते जितना भी समय लगे अपने काम में पिला रहता था जबकि दूसरा लकडहारा आठ घण्टे का काम जब सामने देखता तो इत्मिनान से छः घण्टे अपनी कुल्हाडी की धार तेज करने में लगाता और शेष दो घण्टे में उस तीक्ष्ण धारदार कुल्हाडी से सामने मौजूद वृक्ष को काट लेता था । दूसरे सफल व्यक्ति के उदाहरण में जब पत्रकारों नें उससे पूछा कि आपने इतने कम समय में इतनी सफलता हासिल की इसका राज क्या है ? तब उस व्यक्ति का जवाब था कि मैं लक्ष्य सामने रखकर आवश्यकता के मुताबिक दौड लगाता हूँ फिर इत्मिनान से सुस्ताते हुए अपनी उपलब्धियों का जायजा लेता हूँ और यदि मुझे अपनी कार्यप्रणाली में कहीं कोई बदलाव आवश्यक लगता है तो उसकी रुपरेखा का निर्धारण भी उस सुस्ताने के क्रम में ही कर लेता हूँ तत्पश्चात् फिर दौड लगाने लगता हूँ । 

          कुछ नहीं से सब कुछ पाने तक की अपनी इस जीवनयात्रा (जिसमें स्वयं का स्थायित्व, विवाह बाद की जिम्मेदारियां, तीन बच्चों का लालन-पालन, उनकी शिक्षा, विवाह व उनके स्थायित्व से सम्बन्धित अपना योगदान, इस दरम्यान स्वयं का मकान, दोपहिया व चार पहिया वाहन व जीवन के लिये आवश्यक अन्य भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति) में भले ही मुझे भी 15-15 घंटे से अधिक व्यस्त रहना पडा हो किन्तु अनावश्यक जल्दबाजी कभी मस्तिष्क पर हावी नहीं हुई बल्कि ये सोच सदा रही कि जिस काम में जो समय लगना है वो तो लगना ही है । उसके बाद भी मुझे ये कभी नहीं लगा कि समय की कमी के कारण जो कुछ मैंने पाना चाहा हो उसे मैं हासिल नहीं कर पाया हूँ जबकि इसके विपरीत इन जल्दबाज व्यक्तियों की न सिर्फ उपलब्धियों का दायरा असीमित होते हुए भी सीमित दिखा, बल्कि न ये अपनी जिन्दगी सुकून से जी पाए और न ही स्वयं के कमाये हुए धन व साधनों का स्वयं के लिये कोई आनन्द या उपभोग कर पाये । 

          ऐसे में यह प्रश्न तो सहज रुप से मन में उठता है कि  लगभग हर चौथे-पांचवें व्यक्ति में देखी जाने वाली ये जल्दबाजी
क्या वास्तव में आवश्यक है ?



29 टिप्पणियाँ:

राज भाटिय़ा ने कहा…

जर्मन लोग सब काम तसल्ली से ओर मगन हो कर करते हे, इन के संग रहते रहते हमे भी आदत पड गई हे, इस लिये डरने की कोई बात नही:) लेकिन कभी कभी भगवान को भी अचानक अच्छे लोगो की जरुरत पड जाती हे... फ़िर उस समय मना तो नही कर सकते ना.. जब जाना ही हे तो पहले क्या बाद मे क्या:) बहुत सुंदर लेख लिखा मजे दार

: केवल राम : ने कहा…

आपके इस लेख में जीवन के बहुत से पक्षों पर एक साथ प्रकाश डाला गया है ....हर एक पक्ष को समझने की आवश्यकता है और फिर उसी समझ के अनुसार चलने की कोशिश करनी चाहिए ..आपका आभार इस विचारणीय लेख के लिए ..शुक्रिया आपका

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

आजकल तो आपधापी की आदत सी होगई है सबको.....

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

जल्दबाजी में लिए कई निर्णयों का भुक्तभोगी हूँ ,अब कोई निर्णय करता लेता हूँ तो सोच समझकर तसल्ली से दूसरों से विचारविमर्श करके | भले ही किसी की सलाह मानू या नहीं पर उस पर मनन जरुर करता हूँ |

विशाल ने कहा…

बहुत ही बढ़िया आलेख.
आभार.

ajit gupta ने कहा…

सुशीलजी, अच्‍छा आलेख है। जल्‍दबाजी की आदत लगता है हमारे जीन्‍स में ही होती है। कुछ लोग समझ लेते हैं कि मेरी यह आदत सही नहीं है और कुछ सुधार कर लेते हैं लेकिन कुछ तो समझ ही नहीं पाते कि इस आदत के दुष्‍परिणाम क्‍या होंगे? यही कारण है कि लोग संन्‍यासियों की शरण में जाते हैं। मुझे लगता है कि मनुष्‍य में जल्‍दीबाजी की तरह ही कई आदतें हैं जिनके निदान के लिए आज संन्‍यासियों की बढोतरी होती जा रही है।

Jyoti Mishra ने कहा…

true !!!!
these things are so common that we are now used to it, or ignore it

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत से उदाहरण दे कर लेख की सार्थकता सिद्ध की है ..जल्दबाजी से ज्यादा ज़रूरी है सही रूप से काम करना ... सार्थक और प्रेरणादायक लेख

Shah Nawaz ने कहा…

इस लेख के ज़रिये आपने एक बहुत ही महतवपूर्ण मुद्दा उठाया है... आज की इस भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में अक्सर लोग जल्दबाज़ी का शिकार होते हैं...

वन्दना ने कहा…

विचारणीय और उपयोगी आलेख है जो एक सबक और संदेश देता है।

सुज्ञ ने कहा…

विचारणीय और उपयोगी आलेख है।

अनावश्यक हड़बडी और त्वरित निर्णय क्षमता में बारीक सी भेद रेखा है।

kase kahun? ने कहा…

sarthak post hai..lakadhare vala udahran ek jeevan darshan hai ....apadhapi ke bina bhi samajh soojh se tarakki ki rah par chala ja sakta hai.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

ठीक ही कहा है --जल्दी से देर भली ।
वैसे हमेशा जल्दी में रहना एक anxiety disorder भी हो सकता है ।

Patali-The-Village ने कहा…

आज की इस भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में अक्सर लोग जल्दबाज़ी का शिकार होते हैं|सार्थक और प्रेरणादायक लेख|

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

प्रेरणादायक लेख...
बहरहाल, इस आपधापी से छुटकारे की कोई संभावना नहीं है...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

काम मगन होकर किया जाये, तसल्ली से।

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

जल्दी का काम शैतान का इसीलिये कहा गया है.. किन्तु जब काम आनंद लेकर किया जाए तभी उसका सुख है!!

Vaanbhatt ने कहा…

जिन्हें जल्दी थी...वो चले गये... तेज औजार की सहायता से काम जल्दी निपटाया जा सकता है...बात बड़ी सटीक है...

G.N.SHAW ने कहा…

सुशिल जी ..आप के कथनों से मै सत - प्रतिसत सहमत हूँ ! ऐसे लेख सच्चाई से भरी हुयी मेरे पास भी है , जिसे मै अपने पोस्ट पर बाद में पोस्ट करूंगा ! बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति !

मदन शर्मा ने कहा…

जी बिलकुल सही कहा आपने इसीलिए अब मै भी धीरे धीरे आलसी वाला काम करने की कोशिश कर रहा हूँ

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

बडे अच्‍छे से खबर ली है।

---------
मौलवी और पंडित घुमाते रहे...
सीधे सच्‍चे लोग सदा दिल में उतर जाते हैं।

रचना दीक्षित ने कहा…

वाह वाह यह तो मजेदार रहा. सचमुच हरेक आदमी जल्दी में है.

mahendra verma ने कहा…

जनोपयोगी सार्थक लेख।
जल्दबाजी में तो काम बिगड़ता ही है।

Vivek Jain ने कहा…

बहुत सार्थक आलेख,
- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपकी बात से बिल्कुल सहमत हूँ ... इस जल्दबाज़ी की कतई ज़रूरत नही होती ... ये एक मानसिक अवस्था होती है जो सहज ही आ जाती है इंसान के अंदर अगर किसी कारण से देरी हो जाती है तो ... ऐसे में जबरन अपने आपको समझाना पढ़ता है ... जो ज़रूर करना चाहिए और जल्दबाज़ी से बचना चाहिए ...

Richa P Madhwani ने कहा…

http://shayaridays.blogspot.com

रविकर ने कहा…

बिल्कुल सहमत हूँ ||

जल्दबाज़ी से बचना चाहिए ||

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत रोचक आलेख है सर!


सादर

वीना ने कहा…

सही कहा जल्दबाजी से तो बचना ही चाहिए....कहा भी गया है जल्दी काम शैतान का...

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आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं के लिये धन्यवाद...

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