9.3.11

सुखी जीवन.

      हम सभी अपने जीवन में सुखी रहना चाहते हैं किन्तु सुखी रह नहीं पाते हैं, निश्चय ही यह पूरी तरह से हमारे बस में नहीं है किन्तु फिर भी कुछ बातों का यदि हम ध्यान रख सकें तो सुखी रहने के मकसद में बहुत हद तक सफल हो सकते हैं-

          किसी को दुःख न दें- सबसे पहले हम ऐसे किसी भी कार्य-व्यवहार से बचने की कोशिश करें जिससे किसी को भी दुःख पहुँचता हो. क्योंकि जानकर या बदले की भावना रखते हुए जब हम किसी को दुःख पहुँचाने का प्रयास करते हैं तो इस प्रयास में हम स्वयं भी दुःखी होते ही हैं फिर सामने वाला भी ऐसा ही जबाबी कार्य करता है जिससे हमें दुःख पहुँचे याने दोनों ओर से दुःख पलटकर हमारे पास ही आता है ।  अतः सुखी होने के प्रयास को बनाये रखने के लिये कभी भी किसी को अपनी ओर से दुःख न दें । 

        अनावश्यक चिंताओं से बचें- ऐसे कोई भी कारण जैसे सार्वजनिक भ्रष्टाचार, निरन्तर बढती मंहगाई, ट्रेन का समय पर न आना व इससे मिलते जुलते वे सभी कारण जिनसे हम प्रभावित तो होते हैं किन्तु जिन पर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं होता उनके प्रति सोच-सोचकर स्वयं को अनावश्यक चिंताओं में न उलझने दें ।


       क्षमाभाव रखें- परिवार-समाज व अपने सर्कल में सभी सम्बन्धित लोगों का व्यवहार हमारे चाहे मुताबिक कभी नहीं हो सकता, यह स्थिति जाने अनजाने हममें क्रोध व कई बार ईर्ष्या के भाव पैदा करती है जो अंततः हमारे ही दुःख का कारण बनती है अतः क्षमा, सहानुभूति व शांतिप्रियता जैसे गुणों को अपनाकर हम न सिर्फ सबके प्रिय बने रह सकते हैं बल्कि अपने अधिकांश कार्य अधिकतम सम्बन्धितों के सहयोग से कम समय व प्रयास में पूर्ण कर सकते हैं ।


       हँसते रहें - हँसाते रहें-  यह सर्वविदित सत्य है कि हँसते रहने से उपजी प्रसन्नता के कारण हमारे शरीर की मांसपेशियां अधिक सबल व स्वस्थ होती हैं और इससे स्वमेव ही हम रोगमुक्त भी होते हैं. इसीलिये हम अपने चारों ओर निरन्तर बढ रहे हास्य क्लबों का विकास होते भी देख ही रहे हैं । अतः कामेडी फिल्में, जोक्स, चुटकुले, विनोदप्रिय मित्रों की संगति व ऐसे सभी माध्यम जो हमें हँसने-हँसाने का मौका देते हों के अधिकतम सम्पर्क में रहने का प्रयास करें, किन्तु हँसते रहने के प्रयास में कभी किसी की हँसी उडाने का प्रयास न करें अन्यथा जैसे  पांडवों के महल में पानी से भरे कुँड को जब कारीगरों ने फर्श का आभास दिलाने जैसी कलाकारी की और भ्रम में दुर्योधन उसमें गिर पडा तो उसकी हँसी उडाते हुए द्रोपदी ने मजाक में कह दिया था कि "अन्धे की औलाद अन्धी" उसके बाद का इतिहास दुनिया जानती है कि उसी अपमान के बदले में दुर्योधन ने न सिर्फ भरी सभा में उसी द्रोपदी का चीरहरण करवाकर उसे बेइज्जत किया बल्कि छल, बल से  उनका सब राज-पाट छुडवाकर सभी पांडवों के साथ द्रोपदी को भी 13वर्षों तक जंगलों की खाक भी छनवा दी थी । इसलिये किसी की हँसी उडाने का प्रयास न करते हुए निरन्तर प्रसन्न व हँसते रहने के अवसर तलाशते रहें ।  यहाँ यह भी ध्यान रखें कि जब आप हँसते हैं तो आप ईश्वर की आराधना करते हैं किन्तु जब आप किसी को हँसाते हैं तो ईश्वर आपकी आराधना कर रहे होते हैं ।
 
       फिजूलखर्ची से बचें- यह एक महत्वपूर्ण कारण है जो आगे-पीछे हमें दुःखों के जाल में ढकेल सकता है । हमारी आमदनी चाहे जो हो किन्तु अनावश्यक तडक-भडक व दिखावे में पडकर हम किसी भी गैरजरुरी खर्च से यदि स्वयं को बचाते चलने का प्रयास करेंगे तो आर्थिक कारणों से दुःखी होने की संभावना नहीं रहेगी । इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हम कंजूस हो जावें, बल्कि जहाँ आवश्यक हो वहाँ बडे से बडे खर्च में भी पीछे नहीं हटें किन्तु जहाँ आवश्यकता न हो वहाँ व्यर्थ के दिखावे या फिजूलखर्ची से बचें ।

       स्वयं को समझदार साबित करने की कोशिश से बचें-  हम अपनी समझ के मुताबिक पर्याप्त समझदार हो सकते हैं शायद हों भी किन्तु कई बार जब हम अपनी समझदारी के किस्से किसी के सामने बखान करने बैठ जाते हैं तो सामने वाले के मन-मस्तिष्क में हमारी छबि खराब ही होती है जो आगे चलकर हमारे दुःख का कारण भी बन सकती है, और किसी तेज-तरार्र से पाला पड जाने पर हमें ये भी सुनने को मिल सकता है कि  "आपको पूरा हक है कि आप स्वयं को संसार में सबसे समझदार समझें, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप सामने वाले को बेवकूफ समझें"। अतः अपने बुजुर्गों की यह सलाह भी गांठ बांधलें कि जो सुख चाहे जीव को तो भोंदू बनके जी ।

       निश्चित रुप से ये वे माध्यम हैं जो आपके-हमारे व किसी के भी जीवन को सुखपूर्वक गुजरवाने में हमेशा मददगार साबित होते हैं । बाकि तो जीवन में सात सुखों की जो शास्त्रोक्त परिभाषा है चलते-चलते हम उसे भी समझ ले-

 पहला सुख निरोगी काया,

दूजा सुख घर में हो माया,
 
तीसरा सुख पतिव्रता नारी, 

चौथा सुख पुत्र आज्ञाकारी,

पांचवां सुख घर में सुवासा,

छठा सुख राज्य में पांसा,  और 

सातवां सुख सन्तोषी जीवन ।

       अब इनमें से आप कितने सुखों से परिपूर्ण हैं यह तो आप ही बेहतर समझ सकते हैं । मेरी भावना तो यही है कि--

सुखी रहें सब जीव जगत के,  कोई कभी न घबराए,
बैर-भाव, अभिमान छो़डकर, नित्य नये मंगल गाएँ ।

       विशेष निवेदन-  ये पोस्ट मेरे स्वास्थ्य-सुख ब्लाग में 16 नवम्बर 2010 को  "सुखी जीवन के सरल सूत्र" शीर्षक से प्रकाशित हो चुकी थी, और जिसे ब्लाग जगत में मेरे  पूर्ण अपरिचित होने के कारण लगभग नकारात्मक पाठक ही मिले थे । जबकि अब मैं देख रहा हूँ कि गूगल सर्च के द्वारा आने वाले पाठक इस पोस्ट को पर्याप्त तवज्जो देते दिख रहे हैं और कामन विषय है इसलिये मैं इसे इस ब्लाग पर भी सामान्य संशोधन व नये ले-आऊट के साथ इसे पुनः प्रकाशित कर रहा हूँ । संभव है 10-15% पाठकों को यह पहले भी पढी हुई महसूस हो । अतः उन पाठकों से क्षमा सहित... 



19 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अनुकरणीय बातें।

Sunil Kumar ने कहा…

इन बातों को ध्यान में रखने की जरुरत है| मगर दूसरा सुख ना हो तो ? अच्छी रचना आभार

Roshi ने कहा…

sabhi baate vicharniya

pv.kanpur ने कहा…

jo sukh chahe to bhondoo ban ke ji...
kisi ne sach kaha hai -
bane raho pagla, kaam karega agla,
bane raho lull, salary pao full...
samajhdaar ki maut hai...
sukhi rahne ke naayab tarikon main kuch aur formule, shayad ye bhi kaam aayein.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सार्थक पोस्ट ...विचारणीय बातें

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

यह आलेख बहुत महत्वपूर्ण है....
बहुत ही प्रेरणादायक है|
आप की बातों से सहमत हूँ

सतीश सक्सेना ने कहा…

बिलकुल ठीक ..... शुभकामनायें !

एस.एम.मासूम ने कहा…

हम सभी अपने जीवन में सुखी रहना चाहते हैं किन्तो लोग सुखी नहीं रहने देते. सुशील बाकलीवाल जे एक बेहतरीन लेख जिस पे बातचीत होती चाहिए, यह सिंदर प्रयास जैसी टिप्पणी वाली पोस्ट नहीं.
किसी को दुःख न दें, क्षमाभाव रखें , बहुत ही अच्छी नसीहतें हैं लेकिन इनको अपनाने वाला शक के देरे मैं आ जाता है या फिर बेवकूफ कहलाता है. इसमें लोगों की ग़लती नहीं आज का युग ही ऐसा है. क्षमा करने वाला कायर और मारने वाला बहादुर कहलाता है.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत काम के सारे बिंदु.... आभार

prashant kumar ने कहा…

hi sushil ji,
naye blog writers ke liye zaroori sujhav wala lekh padha....bahut achcha hai

Saadhuvaad :)

ZEAL ने कहा…

Useful tips .

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सुखों की परिभाषा बहुत पसंद आई, भाई जी ।
सुन्दर पोस्ट ।

ajit gupta ने कहा…

सुखी रहने के प्रयास में ही ब्‍लागिंग करते हैं।

Patali-The-Village ने कहा…

सार्थक पोस्ट ...विचारणीय बातें| आभार|

sandhya ने कहा…

सुखी जीवन का मूल है, आपके इस लेख में, बहुत अच्छी सीख..........

वन्दना ने कहा…

बहुत सुन्दर विचारणीय पोस्ट्।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Sundar baaten, Aabhar.
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पैरों तले जमीन खिसक जाए!
क्या इससे मर्दानगी कम हो जाती है ?

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

सार्थक,जीवनोपयोगी लेख...

दर्शन कौर धनोए ने कहा…

La-Jbaab post -----

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