11.3.11

उन्नति के मार्ग में बाधक महारोग - क्या कहेंगे लोग ?


         एक सज्जन के साथ एक संयोग बना । आबादी से लगभग 4-5 किलोमीटर दूर का एक भूखण्ड जो उनके किसी दूर-दराज के परिचित ने सस्ते दामों पर खरीद रखा था पैसों की आकस्मिक आवश्यकता के कारण वे उस भूखण्ड को बेचने निकले, मजबूरी के समय ग्राहक भी नहीं मिलते । ऐसे में ये सज्जन उस जरुरतमंद के सम्पर्क में आ गए और वास्तविक खरीद मूल्य से मात्र 60-65% दाम देकर उन्होंने उस भूखण्ड का कब्जा विधिवत प्राप्त कर लिया । संयोग की बात अगला बायपास वहीं से प्रस्तावित हुआ और बमुश्किल तीन वर्ष में उन्हें उस भूखण्ड के दस गुना से भी अधिक दाम नगद मिल गये । उस समय उनकी इच्छा अपनी इस संयोगात्मक उपलब्धि पर खुलकर सबको बताने की व जश्न मनाने की हो रही थी लेकिन लोग क्या कहेंगे कि तुमने उस जरुरतमंद को तो उसकी खरीद जितने पैसे भी नहीं देकर उसका हक मारा था । वे अपनी उस प्रसन्नता को सेलिब्रेट ही नहीं कर पाए ।

           दूसरी ओर कुछ समय पहले एक परिचित की पत्नि के शरीर में कहीं एक गठान महसूस हुई, और जब उसमें स्थाई दर्द लगने लगा तो उन्होंने उस गठान के बारे में अपने पति को बताया, चिन्तित अवस्था में वे परिचित अपनी पत्नि को डाक्टर के पास लेकर गये । आवश्यक जांच व उपचार के बाद डाक्टर ने एक छोटे आपरेशन द्वारा वह गांठ शरीर से निकालकर उस कटे हुए अंश को बायप्सी जांच के लिये दो अलग-अलग लेब में टेस्ट के लिये भिजवा दिया । दो दिन बाद जब डाक्टर ने उस बायप्सी जांच रिपोर्ट के आधार पर परिचित को बताया कि आपकी पत्नि की ये केन्सर की गांठ थी जो वैसे तो इस आपरेशन से निकाल दी है लेकिन फिर भी आप अगले उपचार के लिये इन्हें किसी विशेषज्ञ डाक्टर के निर्देशन में केन्सर हास्पीटल ले जाएं । अब तो उन परिचित की स्थिति सांप-छछूंदर जैसी हो गई, पत्नि कैसे इस स्थिति का सामना कर पाएगी । बेटे की अभी ही शादी हुई है, बहू इस केन्सर की बात अपने पीहर में बताएगी, सयानी बेटी की शादी की जिम्मेदारी भी सामने है उसकी शादी में बाधा आ जाएगी, नाते-रिश्तेदार क्या कहेंगे, वगैरह, वगैरह ।

         उहापोह के इसी दौर में उन्हें समाचार-पत्र में आयुर्वेदिक जैसी दवा के प्रयोग से कैसे भी केन्सर को जड से खत्म कर देने वाले किसी डाक्टर का विज्ञापन दिखा । उससे मिलने पर उस डाक्टर ने उन्हें यकीन दिला दिया कि मेरी दवा से कितने ही रोगी मौत के मुंह से बचकर स्वस्थ हुए हैं और आपकी पत्नि की तो केन्सर वाली गांठ निकल भी चुकी है अब तो इतनी सीमित खुराक में ही उनकी समस्या खत्म हो जाएगी जहाँ केन्सर अस्पताल में आपके लाखों रुपये खर्च होना है वहीं मेरा इलाज हजारों के खर्च में उससे भी बेहतर परिणाम देते हुए आपकी पत्नि को पूर्णतः रोगमुक्त करवा देगा ।  उन सज्जन ने यह स्थिति पूरी तरह से अपने पक्ष में समझते हुए उस तथाकथित डाक्टर की दवा अपनी पत्नि के लिये किसी को भी रोग की जानकारी दिये बगैर चालू करवा दी । जबकि सर्जरी के बाद उनकी पत्नि का यह रोग और तेजी से बढने लगा । लोग क्या कहेंगे के यक्ष प्रश्न के समक्ष वे सामान्य दवाई से उस महारोग का उपचार करवाते रहे और देखते ही देखते एक दिन उनकी पत्नि के जीवन का अन्तिम दिन आ गया तब वे परिचित खुलकर रो भी नहीं पाये ।
      
            जीवन में स्थितियां चाहे प्रसन्नता की बनें या समस्याओं की प्रायः लोग उसके बारे में खुलकर किसी अपने से चर्चा भी नहीं कर पाते कि लोग क्या कहेंगें ? व्यापार में लम्बा नुकसान हो जावे, एक-दो व्यवसाय में इच्छित सफलता न मिलने पर अगला कोई नया व्यवसाय प्रारम्भ किया जावे, घर में कोई कलह चल रही हो या ऐसे किसी भी अवसर पर पुरुष वर्ग प्रायः चुप रहकर ही उस स्थिति का सामना करते देखे जाते हैं । महिलाएँ तो फिर भी अपने क्रोध या प्रसन्नता के सामान्य आवेग अपनी किसी परिचित सहेली, चहैती पडोसन या ऐसे ही किसी विश्वासपात्र माध्यम के समक्ष किसी से कहना मत की शैली में व्यक्त कर लेती हैं, किन्तु पुरुष वर्ग अपने मर्दाना अहं को सामने रखकर ऐसे सभी अवसरों को अपने अन्दर ही समेट लेना अधिक पसन्द करते है और ऐसी आवेगात्मक स्थितियों से अन्दर का यह भण्डार भर जाने पर ? बात चाहे पागलखाने की की जावे या फिर जेलखाने की, महिलाओं की तुलना में तीन से चार गुना तक अधिक पुरुष ही वहाँ दिखते है । हम अपने अन्दर के आवेग को या तो अच्छी तरह रोकर बाहर निकाल सकते हैं या फिर हँसकर, और प्रायः इन दोनों ही स्थितियों में प्रथमतः ये सोच हम पर हावी हो जाती है कि लोग क्या कहेंगे ?

            इस सन्दर्भ में एक सुनी-सुनाई कहानी का उल्लेख यहाँ अप्रासंगिक नहीं होगा-

           अधेडावस्था की दहलीज का एक पुरुष अपनी तरुणाई की उम्र से गुजरते पुत्र को घोडे पर बैठाकर स्वयं पैदल चल रहा था । एक चौराहे पर दो-चार लोग आपस में उन्हें देखकर खिल्ली उडाने वाले अंदाज में बोलने लगे देखलो कैसा जमाना चल रहा है, जवान बेटा खुद तो घोडे पर बैठा है और बूढे बाप को पैदल चलवा रहा है । दोनों ने सुना लगा शायद ये लोग सही कह रहे हैं उन्होंने उस चौराहे से आगे निकलने पर स्थिति बदल ली । अब पिता घोडे पर हो गया और पुत्र पैदल चलने लगा, थोडी ही दूर चले होंगे कि अगले चौराहे पर फिर वही नजारा यहाँ लोग कहते हुए दिखे- अच्छा भला बाप तो घोडे पर बैठा है और नादान बच्चे को पैदल चलवा रहा है । दोनों ने सुना लगा कि ये भी सही नहीं है क्यों ना दोनों ही घोडे पर बैठ जावें, ये सोचते हुए वे दोनों पिता-पुत्र उस घोडे पर बैठकर चलने लगे । लेकिन... अगले चौराहे से गुजरते हुए फिर उन्होंने लोगों को अपने ही बारे में बात करते हुए सुना- कैसा जमाना चल रहा है एक निरीह जानवर पर दो-दो मुश्टंडे लदे चले जा रहे हैं । अब तो बडी मुश्किल हो गई, दोनों ने सोचा और फिर दोनों ही घोडे की रास पकडकर पैदल चलने लगे, इस स्थिति में जब वे आगे पहुँचे तो लोग बात करते दिखे कैसे पागल हैं ये लोग इतनी लम्बी राह पर अच्छा-भला घोडा साथ में होते हुए पैदल-पैदल जा रहे हैं ।
 
        नतीजा साफ है आप बहुत बोलते हैं तो लोग कहेंगे बकवादी आदमी है, आप चुप रहते हैं तो लोग कहेंगे अज्ञानी है, आप दयालु हैं तो लोगों से सुनने को मिल जावेगा कि ये तो निर्बल है और आप दया नहीं करते हैं तो ये सुनना तय है कि ये तो पत्थर है । आप कभी भी लोगों का मुंह बन्द नहीं कर सकते । लोगों के हिसाब से तो आप पर कलंक लगना तय ही है ।

        इसलिये यदि अपने जीवन में उन्नति करना है या फिर मनपसन्द मार्ग पर चलना है तो क्या कहेंगे लोग ? वाले इस महारोग से जितना हो सके दूर ही रहिये-


कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना,
उनके कहने के चक्कर में तुम मन में ही न रहना.



34 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अपना जीवन अपने हिसाब से जीना हो, औरों के हिसाब से नहीं।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

अपना रास्ता खुद चुनो, आसपास को देख कर नहीं।

निर्मला कपिला ने कहा…

बिलकुल सही कहा। कहानी यही सिखाती है कि अगर आगे बढना है तो लोगों की परवाह किये बिना अपने खुद के चुने रास्ते पर चलते रहो। सार्थक पोस्ट। धन्यवाद।

Udan Tashtari ने कहा…

कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना,

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…

वाकई आपका चिंतन गजब है ।
सुशील जी । धन्यवाद ।
एक और बेहतरीन प्रस्तुति के लिये ।

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

आदरणीय सुशील बाकलीवालजी
प्रणाम,
बहुत सुन्दर लेख बिल्कुल सही फ़रमाया आपने

Pinky Kaur ने कहा…

apki post bhout achi ha visit my blog plz
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Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

सत्य वचन....
बहुत सुन्दर वैचारिक लेख...

Manpreet Kaur ने कहा…

bouth he aacha post hai aapka ... keep it up
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सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

सुरेश जी ,

बहुत ही पते की बातें बताई हैं आपने लेख में | "लोग क्या कहेंगे ?" की डर से अन्दर ही अन्दर कुढना या गलना

जीवन के लिए बहुत ही हानिकारक है |

Sachin ने कहा…

आदरणीय सुशीलजी,

प्रणाम ,

कुछ दिनों से आपके ब्लॉग को फोल्लो कर रहा हु ,आपकी सभी पोस्ट में सिखने को बहुत कुछ मिलता है ।

धन्यवाद् ।

sandhya ने कहा…

बिलकुल सही कहा आपने कुछ तो लोग कहेंगे ही, तो सबसे अच्छा यही है, सही रास्ते पर बढते रहना बिना किसी की परवाह किये... बेहतरीन प्रस्तुति के लिये धन्यवाद..

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत ही सार्थक आलेख..ज़िंदगी में वही करना चाहिए जो स्वयं को सही लगे..जब हम यह सोचने लगें की लोग क्या कहेंगे तो हम कभी सही निर्णय नहीं ले पायेंगे..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सही दिशानिर्देश देता लेख ...

सतीश सक्सेना ने कहा…

सब लोग क्या कहेंगे ....??
कमजोरों के लिए यह महामारी का काम करती है और नुक्सान अक्सर अनुमान से कही अधिक होता है ! शुभकामनायें आपको !

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…

नमस्कार श्री सुशील जी
मेरे ख्याल से ये सभी रजिस्टर्ड यूजर को दिखायेगा । चाहे वे आपके फ़ालोअर्स हों या न हों ।
चाहे उनका ब्लाग हो या न हो । पर मेरे अनुभव के अनुसार ये पुराने फ़ालोअर्स को लगभग
15 दिन बाद दिखाना आरम्भ करता है । ये गैजेट अपने ही अनुसार कार्य करता है । इसमें कोई
करेक्शन नहीं कर सकते । ब्लाग वर्ल्ड काम पर प्रतिदिन ही फ़ालोअर्स और नान फ़ालोअर्स आते हैं ।
पर इसे लगाने के बाद धीरे धीरे इसने आज की तारीख 11 march 2011 तक इसने 16 फ़ालोअर्स शो किये हैं । अतः इसकी कार्यप्रणाली समझने के लिये थोङा इन्तजार कीजिये । मैं भी इसके बारे में इतना ही जानता हूँ । ..एक बात और । इस बेचारी का सेफ़्टी पिन लगाकर आपने मुँह क्यों बन्द कर दिया । तंग
ज्यादा करती थी ।

sagebob ने कहा…

बहुत ही सुलझा हुआ लेखन है आपका.

कुछ तो लोग कहेंगे,लोगों का काम है कहना ,
छोडो बेकार की बातें,कहीं बीत न जाए रैना.

सलाम.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

इधर-उधर मत ध्यान दो, चलो स्वभाविक चाल।
सबकी मतियाँ भिन्न है, अपनी चाल सम्भाल।।

Pinky Kaur ने कहा…

.जब हम यह सोचने लगें की लोग क्या कहेंगे that's true, visit my blog plz
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Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही सुलझा हुआ लेखन है आपका|धन्यवाद|

सुनील कुमार ने कहा…

jeevan ko unke hisab se hi jeene do...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

सुनो सबकी ! करो मन की !!

amit-nivedita ने कहा…

bilkul sahi..

pv.kanpur ने कहा…

ikkis logon ne kuch na kuch kah dala...ab mai kya kahoon...likhte rahiye...logon ki baaton ko dil se na lagaiye...chahe achchi ho ya buri...filhaal pratkriyayein achchi hain...meri bhi...hindi main tippani karne ke liye kaya karna hoga...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Sahi vishleshan.
---------
ब्‍लॉगवाणी: ब्‍लॉग समीक्षा का विनम्र प्रयास।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सच है जीतने मुँह उतनी बातें .. कुछ न कुछ तो लोग कहेंगे ही ... और हमारे पास तो समय भी बहुत है टिप्पणी करने का ... इसलिए जो मन में आए वो करो ... हन किसी का बुरा ना करो दिल से ...

ZEAL ने कहा…

बेहद प्रेरणादायी प्रसंग ! One must listen to his/her heart.

Baldev Sharma ने कहा…

अति उत्तम सुशिल जी, वाकई हम कुछ अंतर्द्वंद के चलते कई बार वो सब कर जाते हैं जो नहीं करना चाहिए और कई बार वो सब कुछ नहीं कर पाते जो हमें कर लेना चाहिए... आपका लेख पढ़ा, अत्यंत ख़ुशी की प्राप्ति हुयी... धन्यवाद..

mahendra verma ने कहा…

बहुत ही गंभीर विषय पर लिखा है आपने।
बहुतों की सारी उम्र ‘लोग क्या कहेंगे‘ की चिंता करने में ही बीत जाती है।
इस महारोग से बचना ही चाहिए...उपयोगी लेख।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

क्या कहेंगे लोग ?
कुछ तो लोग कहेंगे,लोगों का काम है कहना.
हमें आपका लेख बेहद पसंद आया.

arti jha ने कहा…

bahut hi sundarta se aapne humare ziban ki iss suchhai ;;;ki log kya kahenge'''ko jo sabdon me dhala hai kabile taarif hai....sir hum aksar log kya kahenge ke karan apne man ki nhi kr paate ....apne sapno ko pura nhi kar pate...longo ka kya hai... hum achha karenge ye tab v kahenge,bura karenge ye tab v kahenge,hum kucchh karenge ye tab v kahenge,or kuchh nhi karenge ye tab v kahenge.mtlb ki ye har surat me kucchh na kucchh to kahenge jarur....

smallbooter ने कहा…

बिलकुल सही कहा आपने हालाकि मै खुद तो इस रोग से तीन साल पहले ही बाहर निकाल चूका हूँ और दुनिया क्या कहेगी उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन मेरी पत्नी अभी भी इस रोग से ग्रस्त है और उसका नुकसान मै गाहे बगाहे उठाता ही रहता हूँ

तो लोग क्या कहेंगे वो रोग जितनी जल्दी खतम हो जाये उतना ही अच्छा है

devanshukashyap ने कहा…

nice piece :p

Divya Sandesh ने कहा…

adbhud preran sutra.

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