26.3.11

क्या ठीक है ये सोच - मुझसे नहीं होगा...!

          हममें से बहुतों के सोचने के तरीके में किसी भी नये काम के सामने आने पर अक्सर एक नकारात्मक प्रवृत्ति सामने आ जाती है और वो होती है काम सामने आते ही हथियार डाल देने की प्रवृत्ति- मुझसे नहीं होगा । जब भी कोई थोडा भी कठिन दिखाई देने वाला कोई कार्य हमारे सामने आता है तो प्रायः हमारा दिमाग उसकी पूर्ति की राह में कितनी-कितनी रुकावटें कैसे-कैसे सामने आ सकती हैं, उसे पहले ही सोचकर तत्काल इस नतीजे पर पहुँच जाता है कि ये काम तो मुझसे नहीं होगा और जब ये नकारात्मकता शुरु से ही हमारे दिमाग में घर बनाने लगे और फिर भी किसी भी कारण से यदि उसी कार्य को हमें करना भी पडे तो आधी-अधूरी चाह के साथ किये जाने वाले ऐसे किसी भी कार्य़ के परिणामों का भी नकारात्मक ही मिल पाना पहले से ही तय हो जाता है । हमारे मस्तिष्क के अचेतन से मिलने वाले ये नकारात्मक संकेत अपना असर ऐसे ही दिखाते हैं जैसे साइकल चलाना सीखने के दौर में प्रायः घबराहट में हमारा दिमाग ये सोचने लगे कि अरे सामने ये खंभा या ये झाड आ गया और मैं इससे टकरा न जाऊं, मैं इससे टकरा न जाऊं, और फिर देखते ही देखते अंततः हम उससे टकरा कर गिर भी जाते हैं ।


  हममें से कोई भी व्यक्ति किसी भी कार्य़ में पूर्ण पारंगत तो शायद कभी भी नहीं होता है और नवीनता के दौर में तो हर कोई अपनी अज्ञानता या अल्पज्ञानता के कारण वैसे ही असमंजस वाली मनोदशा से भरा होता है किन्तु हमारी ये अल्पज्ञ सी सीमित समझ घोर अन्धकार में जंगल में चलते हुए हमारे हाथ के उस कंडील के समान तो होती ही है जिसकी रोशनी पांच कदम से अधिक दूर नहीं जा पाती । अब यदि हम ये सोचकर रुक जावें कि मेरी क्षमता तो पांच कदम की ही है और रास्ता जो मुझे तय करना है वह पांच कोस तक भी पूरा होने वाला नहीं है इसलिये मेरा इस राह पर जाना संभव नहीं लगता तो सोचिये कि क्या हमारा यह निर्णय सही होगा ? ये सही है कि हमारी जानकारी का दायरा पांच कदम का ही है लेकिन ये पांच कदम आगे तक की जानकारी तो हमें लगातार हमारे कितना भी आगे चले जाने तक भी हमारे हर बढे कदम के साथ कंडील की उस रोशनी की तरह हमसे आगे चलती ही रहती है, तो फिर हमें अपने सीमित ज्ञान या साधनों से डरकर पहले से ही हार मान लेने का विचार या सोच कितना सही या गलत हो सकता है इसका निर्णय हमें अपने मन में नये सिरे से करने की आवश्यकता उस नकारात्मकता की स्थिति में समझना चाहिये ।
              
        हम कभी भी किसी खाली बोरी को खडा नहीं कर सकतेयदि बोरी को खडा करना है तो पहले उसे सामान से भरना ही होगा । ऐसे ही हमें अपने नकारात्मकताओं के खालीपन से स्वयं को बचाये रखने के लिये आत्मविश्वास के विचारों से स्वयं को भरकर रखना भी आवश्यक होता है । नकारात्मकता निःसंदेह सुखद लगती है क्योंकि वो हमें आरामप्रद स्थिति में रखते दिखती है और हमारा मन भी प्रायः उस आरामप्रदता को ही अधिक पसन्द करता है तभी तो दौडने वाले लोग चलने वालों से हमेशा कम ही दिखते हैं, और चलने वाले लोग भी बैठने वालों से कम ही देखने में आते हैं । किन्तु जो आराम या सुख हमें अपने निष्क्रिय बैठे रहने से हासिल होता है उसे हम काम किये बगैर कब तक हासिल कर सकते हैं, और निष्क्रिय अवस्था में बैठे रहकर भी हम कब तक संतुष्ट रह सकते हैं ? तो जब हर तरह से हमारा काम में लगे रहना आवश्यक है ही तो फिर हम किसी भी काम को मजबूरी में ही करना क्यों स्वीकार करें ? क्यों न किसी भी नये कार्य के सामने आते ही हम तत्काल ये सोचते हुए कि इससे हमें क्या-क्या लाभ हो सकते हैं और इसे कर लेने का सर्वश्रेष्ठ तरीका कौनसा हो सकता है ये मन्थन करते हुए हम उस काम को एक चुनौति के समान स्वीकार करते हुए उसमें भी अपने श्रेष्ठतम परिणाम लाकर अपने आप को क्यों न दिखावें ।
       
       हर महत्वपूर्ण कार्य के दौरान प्रायः हमारा वास्ता दो किस्म के व्यक्तियों से पडता है- पहले वो जो हमारे शुभचिन्तक होने के कारण हमें यह समझाने की कोशिश कर रहे होते हैं कि कहाँ आप अपने को इस बेकार के झमेले में डाल रहे हो, भगवान की दया से सब कुछ तो व्यवस्थित चल रहा है (दूसरे शब्दों में रोटी तो मिल ही रही है)और दूसरे वो जो आपको ये समझाने की कोशिश कर रहे होते हैं कि जो कुछ भी आप करने की सोच रहे हो उसे कर पाना कोई खालाजी का खेल नहीं है, आपके पहले ही इसमें न जाने कितने लोग असफल हो चुके हैं । वास्तव में ये दूसरे किस्म के लोग ही वे होते हैं जो आपके लक्ष्य से हटते ही आपके प्रति ये कहना भी चालू कर देते हैं कि देखलो एक और सीधा-सादा काम इनसे नहीं हो पाया, याने यदि आप काम करने की धुन के साथ चलते रहें तो गिनाने में वो काम कठिन और काम का ध्यान हटा दें तो फिर वही काम सामान्य । अतः प्रत्येक स्थिति में आप अपना निर्णय स्वयं लें और समझदारी का तकाजा तो ये है कि जो काम हमें अधिक कठिन लगे उस काम को हम चैलेन्ज मानकर सबसे पहले करने का न सिर्फ ईमानदार प्रयास करें बल्कि उसमें सफलता प्राप्त करके ही अपने आप को दिखावें । 

        हमें हमेशा यह याद रखने की आवश्यकता है कि आसान काम तो सभी लोग अपने-अपने स्तर पर कर ही रहे हैं, किन्तु जीवन में उपलब्धियां हमेशा उनकी ही मायने रखती दिखती हैं जो आसान या सामान्य से हटकर कठिन दिखाई देने वाले कामों में भी पूरे मनोयोग से जुटे रहकर तब तक चैन नहीं लेते जब तक सफलता आगे बढकर उनका अभिनंदन नहीं कर लेती । ऐसे किसी भी कठिन लगने वाले कार्य में सफलता को हासिल कर सकने का एक ही मूलमंत्र है जिसे हम निरन्तरता के सिद्धान्त का नाम भी दे सकते हैं और अपनी सामर्थ्य के मुताबिक निरन्तरता के चमत्कारिक परिणाम देखने के लिये इस लिंक पर प्रस्तुत लघुकथा के चमत्कारिक परिणामों को अपने मस्तिष्क में बैठाकर बडे से बडे और कठिन से कठिन कार्य भी हम इस मूलमंत्र के द्वारा सम्पादित कर अपने अपनों को दिखा सकते हैं कि-

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों, कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं हो सकता.

26 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही ओर विचारणिया बात कही आप ने अपनी इस पोस्ट मे, मैने देखा हे बहुत से लोग काम को देख कर पहले ही मना कर देते हे... मैने खुद देखा हे कि काम कितना भी कठिन हो अगर आप हिम्मत रखेगे तो जरुर सफ़ल होंगे,यही मेरी जिन्दगी का नियम हे, ओर बच्चो को भी यही शिक्षा दे रहा हुं. धन्यवाद

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  2. सत्य कहा आपने हमारी नकारात्मक सोंच हमें आगे बढ़ने से रोकती है सन्देश देती हुई सार्थक पोस्ट आभार

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  3. इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता ...
    प्रेरक प्रविष्टि!

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  4. महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए हैं आपने। धन्यवाद। व्यक्तिविकास संबंधी ऐसे लेखों की प्रतीक्षा है। पाठकों केलिए दो पुस्तकों के नाम देता हूँ, जो अवश्य पढें।
    I am Ok, You are Ok by Thomas A. Haris
    Count Your Chickens before they hatch by
    Arindum Choudhari

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  5. सहमत हूँ आपसे....शुभकामनायें !

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  6. इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता ...

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  7. EVERYTHING IS POSSIBLE...........ऐसे ही नही कहा गया है…………बस सोच पाज़िटिव रखनी चाहिये।

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  8. यह घातक सोच है, सदा ही इससे दूर रहना होगा।

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  9. सहमत हूँ आप की बात से...हमारा समस्या के प्रति नजरिया ही परिणिति को निर्धारित कर देता है...

    सुन्दर पोस्ट के लिए आभार

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  10. NO-BODY IS PERFECT,
    AND I AM NO-BODY,
    THEREFORE I AM PERFECT...

    जय हिंद...

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  11. सही बात सकारात्मक सोच से बढ़कर कुछ नहीं.....

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  12. नथिंग इज इम्पासिबल । जय हो हमारे
    इंदौरी बाबा की ।
    बाबा जी ये नजरिया का बैनर कौन से
    साफ़्टवेयर से बनाया है ।.. मतबल अपना
    फ़ोटुआ कैसे एड किये भाई ? ये गूढ ग्यान
    भी बता दो ।

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  13. नकारात्‍मक सोच व्‍यक्ति को पंगु बना देती है। अच्‍छी पोस्‍ट।

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  14. There is always a beautiful possibility beyond all impossibilities.

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  15. प्रेरणादायक पोस्ट ...कुछ करने का हौसला ही साथ देता है ..

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  16. शत प्रतिशत सही बात है सर , अगर आप किसी काम का बीड़ा उठाते हैं तो ऊपरवाला एक खास तरह की हिम्मत भी आपको साथ में दे देता है | देखने वाले कुछ लोग इसे बेवकूफी और कुछ फालतू के काम कहते हैं | इसे ही कहते हैं नजरिया ,लेकिन ये सच है की हर नए , आविष्कारक और अनूठे काम की पहले आलोचना ही होती है | लेकिन फिर उन्ही लोगों के नाम इतिहास के पन्नो में दर्ज होते हैं , जो रिस्क लेते है |

    प्रणाम |

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  17. पोजिटिव थिंकिंग ही सफलता की चाबी है.बहुत सही कहा आपने नकारत्मक विचार ही हमें आगे बढ़ने से रोकते हैं. सार्थक चिंतन करती पोस्ट.

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  18. poornroop se sahmat aapke ise lekh dwara vykt vicharo se......

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  19. @प्रत्येक स्थिति में आप अपना निर्णय स्वयं लें और समझदारी का तकाजा तो ये है कि जो काम हमें अधिक कठिन लगे उस काम को हम चौलेन्ज मानकर सबसे पहले करने का न सिर्फ ईमानदार प्रयास करें बल्कि उसमें सफलता प्राप्त करके ही अपने आप को दिखावें ।

    प्रेरक आलेख। हमें हर अच्छे काम को, भले ही वो कठिन लगे, करने का प्रयास करना चाहिए।

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  20. सकारात्मक , अच्छी प्रस्तुति।

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  21. प्रेरणादायक पोस्ट........बस सोच पाज़िटिव रखनी चाहिये।

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  22. प्रेरणादायक आलेख. आभार.

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  23. मुझे लगता है आलस्य इसका एक बड़ा कारण है ... साथ साथ आत्मविश्वास की कमी भी एक कारण है ....
    बहुत ही सजग पोस्ट है आपकी ... विचारणीय ...

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  24. मैंने भी अपनी लाइफ में इस तरह के 2 कार्य किये जिसे लोगो ने और मेरी पत्नी ने करने में सावधान रहने को कहा क्योकि उस कार्य को करने का मेरे पास एक्सपेरिएंस नहीं था मैंने अपनी लगभग पूरी जमा पूंजी उस कार्य में ४ साल पहले लगा दी और मेरी सोच के वीरोद्ध परिणाम हाथ लगा और मैंने कुछ भी नहीं कमाया केवल गवाया वो भी पूरा पैसा. आप जरूर जानना चाहेंगे वो कार्य था वेबसाइट से पैसा कमाना और दूसरा कार्य था शेयर मार्केट. लेकिन मैंने इस आसफ्लता से बहुत कुछ सीखा

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आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं के लिये धन्यवाद...

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