8.6.11

क्या व्यर्थ है टिप्पणियों की मशक्कत....!


        हमारे रोजमर्रा के भोजन में दाल के महत्व से हम सभी बखूबी परिचित हैं । किसी को ये दाल तडके के बगैर अधूरी लगती है तो किसी को कोथमीर के बगैर । लेकिन महत्व तो दाल का ही होता है । मैंने एक परिचित महिला को कभी यह कहते सुना था कि कोथमीर के बगैर दाल ऐसी लगती है जैसे विधवा की मांग । ठीक यही स्थिति हमारे हिन्दी ब्लाग जगत में किसी भी पोस्ट के सन्दर्भ में टिप्पणियों के बाबद इस रुप में देखने में आती है कि यदि किसी पोस्ट के नीचे टिप्पणियां नहीं दिख रही है तो न लेखक को मजा आता है और न ही पाठक को । दोनों को ही एक प्रकार के अधूरेपन का एहसास होता है । पाठक तो फिर भी पढकर निकल जाते हैं किन्तु लेखक को लगता है जैसे मेरी तो सारी मेहनत ही व्यर्थ हो गई, मैंने इतने जतन से लिखा और किसी भी पाठक की ओर से कोई प्रतिक्रिया ही नहीं मिली ।

            मैं अंग्रेजी ब्लाग्स के अधिक सम्पर्क में नहीं आया हूँ इसलिये कह नहीं सकता कि वहाँ इन टिप्पणियों का क्या और कितना महत्व है किन्तु हिन्दी ब्लाग जगत में तो करीब-करीब हम सभी ब्लागर साथियों की अधिकांश उर्जा अपने ब्लाग व पोस्ट पर टिप्पणियों की मात्रा बढवाने में ही अक्सर उपयोग में आते देखी जाती है । क्या वाकई ये टिप्पणियां हमारी इस ब्लाग-यात्रा को गतिमान बनाये रखने के लिये इतनी ही आवश्यक है जितनी प्रायः हम ब्लागर समुदाय के मध्य देखी, सुनी व पढी जाती है । शायद नहीं...  ये कुछ उदाहरण इस बात को समझ पाने में शायद माध्यम बन सकें ।

            1. परिकल्पना ब्लाग में श्री रविन्द्र प्रतापजी की किसी पोस्ट में कुछ समय पूर्व किसी ब्लाग के सन्दर्भ में यह पढा था कि उन ब्लागर ने अपने ब्लाग पर टिप्पणियों का विकल्प ही बन्द किया हुआ है फिर भी उनका ब्लाग सफलतापूर्वक चल रहा है । ये पोस्ट तारीख के हिसाब से मेरे ध्यान में नहीं आ पाने के कारण मैं उस पोस्ट की लिंक यहाँ नहीं दे पा रहा हूँ । अतः क्षमा...

            2. किसी भी ब्लाग में लोकप्रिय पोस्ट का निर्धारण हम नहीं करते बल्कि हम तो लोकप्रिय पोस्ट का गूगल का बना-बनाया विजेड अपने ब्लाग पर लगा देते हैं फिर पाठक संख्या के आधार पर लोकप्रिय पोस्ट का निर्धारण वह विजेड स्वयं ही करता रहता है । इस मापदण्ड पर मेरे ब्लाग स्वास्थ्य-सुख में सर्वाधिक पढी जा रही टाप 7 पोस्ट में तीसरे क्रम पर मौजूद पोस्ट "सुखी जीवन के सरल सूत्र" को देखकर भी लगाया जा सकता है जिसमें उसके प्रकाशन दि. 16 नवम्बर 2010 से लगाकर आज तक एक भी टिप्पणी नहीं आई है किन्तु वह पोस्ट लोकप्रियता की दौड में निरन्तर उपर की यात्रा तय करते हुए उस ब्लाग पर तीसरे क्रम पर शोभायमान हो रही है ।

            3. हिन्दी ब्लाग-जगत के अधिकांश ब्लागर साथियों के निर्विवाद रुप से सर्वाधिक लोकप्रिय मित्र ब्लागर भाई श्री सतीश सक्सेना जिनकी किसी भी पोस्ट पर औसतन 70 से लगाकर 85-90 व कभी-कभी इससे भी ज्यादा तक की मात्रा में टिप्पणियां अब तक देखी जाती रही हैं उनके ब्लाग मेरे गीत की पिछली दो पोस्ट मैं इस अनुरोध के साथ देख चुका हूँ कि -
अनुरोध  : आपके आने का आभार ...आगे सेमेरे गीत पर कमेन्ट न करने का अनुरोध है , आशा है मान रखेंगे  !  तो क्या हमें यह मान लेना चाहिये कि उनके ब्लाग से पाठक कम हो गये होंगे ?

           शायद ब्लाग्स का प्रोफार्म बनाते समय इसके निर्माताओं ने यह सोचकर टिप्पणी के इस माध्यम के लिये स्थान आरक्षित किया होगा कि यदि किसी पाठक के मन में सम्बन्धित ब्लाग-पोस्ट को पढकर उसके विषय में कोई प्रतिक्रिया यदि उपजे तो वो इस टिप्पणी बाक्स के माध्यम से उसे आसानी से अभिव्यक्त कर उसके लेखक तक अपनी बात पहुँचा सके । जबकि हम इस टिप्पणी बाक्स का उपयोग अक्सर यह दिखाने के लिये करते हैं कि मैंने आपकी पोस्ट पढ ली है अतः आप भी कृपया मेरी पोस्ट पढकर अपनी उपस्थिति का प्रमाण इस टिप्पणी बाक्स के माध्यम से मेरे ब्लाग पर भी दर्ज करें, अथवा मैं किसी की पोस्ट पढूं या न पढूं किन्तु शुरु व आखिर के पैरेग्राफ पर नजर डालकर जैसे भी बने अपनी टिप्पणी अधिक से अधिक ब्लाग्स पर छोड आऊँ जिससे कि मेरे ब्लाग पर भी अधिक से अधिक पाठकों की टिप्पणियां दिखती रह सकें, अथवा अपने ब्लाग पर प्रकाशित पोस्ट की लिंक इस टिप्पणी बाक्स के माध्यम से दूसरे ब्लाग पर छोड आऊँ जिससे कि अधिकतम पाठक उस लिंक के द्वारा मेरे ब्लाग पर आते रह सकें, अथवा ये तेरी मेरी यारी की प्रथा को जीवित रखने के लिये टिप्पणियों की आवक-जावक के क्रम को मैनेज रखने के माध्यम के रुप में इसे पल्लवित-पोषित करता चलूँ ।

           हम किसी भी रुप में टिप्पणियों के इस क्रम को जीवित रखें इसमें कहीं कोई विरोधाभास नहीं है किन्तु यदि दो बातों का इस सन्दर्भ में हम ध्यान रखकर चल सकें तो हमारी बहुत सी उर्जा व तनाव बचाया जा सकता है पहली यह कि सिर्फ टिप्पणी करने के लिये टिप्पणी न करें बल्कि वास्तव में टिप्पणी के माध्यम से उस पोस्ट के सन्दर्भ में लेखक तक कोई बात यदि पहुँचाना हो तो टिप्पणी अवश्य करें और दूसरी यह कि मैंने तो फलां ब्लाग पर टिप्पणी की किन्तु सामने वाले ने मेरे ब्लाग पर टिप्पणी नहीं की इस भावना से किसी भी ब्लाग पर टिप्पणी न करें ।

           वैसे भी टिप्पणी प्रायः पोस्ट प्रकाशित होने के पहले व दूसरे दिन ही अधिकतर चलती है जबकि वह पोस्ट सदा-सर्वदा तब तक जीवित रहती है जब तक कि हम स्वयं उसे हटा न दें जो कि बिना किसी विशेष कारण के कोई भी ब्लागर कभी भी नहीं हटाता, और जैसे हम किसी दुकान पर कुछ खरीदने जाते हैं और वहाँ कुछ और सामग्री भी अपने उपयोग की देखकर खरीदकर ले आते हैं उसी प्रकार किसी भी एग्रीगेटर अथवा सर्च इंजिन के माध्यम से आने वाले पाठक यदि रुचिकर या उपयोगी समझते हैं तो आपके ब्लाग की अन्य पोस्ट भी अवश्य पढते हैं और सर्च इंजिन के माध्यम से आते रहने वाले पाठक तो कभी टिप्पणी लिखने के झमेले में पडते दिखते ही नहीं हैं जबकि जितने ज्यादा पाठक हमारे ब्लाग पर आकर हमारी पोस्ट पढते हैं लोकप्रियता के मापदंड पर हमारा ब्लाग उतना ही आगे आते दिखता चलता है । अतः हम टिप्पणियां अवश्य करें किन्तु उन टिप्पणियों को ही सबकुछ समझकर अपनी तमाम उर्जा उधर ही न लगाते हुए अपनी पोस्ट की सामग्री को अधिक से अधिक रुचिकर व जनोपयोगी बनाये रखने के प्रयास में अपनी उसी उर्जा का उपयोग यदि करते रहें तो भी हमारे ब्लाग की लोकप्रियता को अपना बहुत सा समय व टिप्पणी नहीं मिली के अनावश्यक तनाव से बचाकर भी न सिर्फ लम्बे समय तक जीवन्त बनाये रख सकते हैं बल्कि इस लोकप्रियता को ब्लाग पर आने वाले पाठकों के आंकडों के माध्यम से निरन्तर जांचते हुए भी अपनी इस ब्लाग-यात्रा की निरन्तरता को तुलनात्मक रुप से कम समय में भी सफलतापूर्वक बनाये रख सकते हैं ।

4.6.11

उपलब्धियां : एक अनाडी ब्लागर की....


          इसी ब्लाग पर दि. 4 अप्रेल 2011 को भारत के क्रिकेट वर्ल्डकप में विश्र्वविजेता बनने वाली बधाईयों वाली पोस्ट में "अपना ब्लाग" एग्रीगेटर के श्री योगेन्द्रजी पाल सा. ने मुझे टिप्पणी के मार्फत सूचित किया कि- "आपके लेख चुराए जा रहे हैं, मुझे लगा कि शायद आपको पता ना हो इसलिए जानकारी देने आ गया |" आगे आपने मेरे लिये वो लिंक भी प्रस्तुत की जिस पर इन्होंने मेरी ब्लागपोस्ट को देखा था http://maiaurmerisoch.blogspot.com/2011/04/blog-post_04.html मैंने श्री योगेन्द्रजी को धन्यवाद देते हुए इस लिंक पर जाकर देखा तो पाया कि श्री शशांक मेहताजी ने अपने ब्लाग 'मैं और मेरी सोच' पर मेरे 'नजरिया' ब्लाग पर दि. 3-2-2011 को प्रकाशित मेरी पोस्ट "कच्ची उम्र के ये शरीर सम्बन्ध"  हुबहू चित्र व शीर्षक से साथ शब्दषः प्रकाशित कर रखी थी । मैंने इनके टिप्पणी बाक्स में मेरा विरोध व नाराजी दर्ज की और आकर श्री योगेन्द्रजी को धन्यवाद देकर व अपने ब्लाग से कापी-पेस्ट की सुविधा बाधित कर चुपचाप अपने अगले काम में लग गया । दूसरे दिन मेरे इसी ब्लाग पोस्ट पर श्री शशांक मेहताजी की ये टिप्पणी दर्ज हुई "सुशीलजी सबसे पहले तो मैं अपनी भूल के लिये क्षमा चाहता हूँ. मैं ब्लाग जगत के नियमों से अनजान था इसलिये मुझसे भूल हो गई................"  इसके साथ ही श्री शशांक मेहताजी ने मेरी उस पोस्ट को अपने ब्लाग से डिलीट भी कर दिया था ।

          अब मैं सोचता हूँ कि कितना नासमझ था मैं जो मुश्किल से उपलब्ध ऐसे दुर्लभ अवसर को कुल्लड में गुड फोडने जैसे इस गुपचुप तरीके से उस परिस्थिति में अपने स्तर पर ही इतने सस्ते में निपटा दिया । मैं भी उस समय यदि किसी रौब-दाब वाले स्वयं से वरिष्ठ ब्लागर साथी को अपना निःशुल्क वकील बना लेता तो बाकायदा इस ब्लाग जगत में अच्छा-खासा बवाल भी मचता और समस्त ब्लागर समुदाय पूरी उत्सुकता से देखता समझता कि आखिर माजरा क्या है और मुझे भी सबकी सहानुभूति से उपजे स्नेह सहित कुछ और अतिरिक्त पब्लिसिटी यहाँ मुफ्त में ही मिल जाती, किन्तु मैंने तो इसे यहाँ जाने-अन्जाने सब तरफ घट रही छोटी सी सामान्य घटना मानकर ससुरी पूरी समस्या को ही जंगल में मोर नाचा किसने देखा कि शैली में सारी बात वहीं समाप्त कर दी । यह जुदा बात हे कि वही शशांक मेहताजी अब मेरे तीन में से दो ब्लाग के फालोअर भी हैं ।

          इस ब्लाग जगत में आने के बाद स्वयं की रुचि के अनुकुल मेरी यहाँ कुछ ऐसी धुनी रम गई कि मेरे लिये घर, समाज, उद्यम व दुनिया की समस्त गतिविधियाँ करीब-करीब थम सी गई और कम से कम 5 महिने नियमित रुप से 12 से 15 घंटे रोजाना सिर्फ और सिर्फ इस ब्लागिंग अभियान को गति देने में ही निरन्तर गुजरे । पिछले मई माह में एक शारीरिक समस्या मेरे समक्ष यह आई कि मैं जब भी खडा होकर चलना शुरु करुँ मुझे चक्कर आना प्रारम्भ हो जाएँ, अपने स्तर पर सब प्रयास करके देख लिये लेकिन चक्कर आना बन्द नहीं हुए । फिर इतनी लम्बी अवधि से प्रतिदिन इतने घण्टे रोज इस ब्लागिंग अभियान में हथेली माऊस ही घुमाती रही, नतीजा दाँए हाथ की कलाई में असहजता महसूस होने लगी । दिमाग में ये विचार पुख्ता प्रमाण के रुप में सामने आने लगा कि लेपटाप की चुंधियाती रोशनी से अपनी आँखें बमुश्किल 15"-18" इंच की दूरी पर निरन्तर चल रही है उसके कारण चक्कर आने लगे हैं और सीधे हाथ की कलाई जो एक ऊँगली से 90% टंकण कार्य और यही हथेली जो लगातार माऊस का संचालन कर रही है उसके कारण दाँई हथेली की ये समस्या सामने आने लगी है । तब तक 30 माह सकुशल गुजार सकने वाली HCL Me के नये माडल के मेरे लेपटाप की बैटरी भी बमुश्किल 10 महिने भी गुजारे बगैर काल कवलित हो गई । इस दौरान जितना समय इस लेपटाप के समक्ष कम से कम गुजरा उससे बगैर किसी अतिरिक्त प्रयास के चक्कर आना भी बन्द हो गये और कलाई में भी स्वमेव ही राहतपूर्ण स्थिति स्वयं को महसूस होने लगी ।

          इसी अवधि में इस ब्लाग स्नेह से जुडी कुछ और उपलब्धियां और भी अलग किस्म की सामने आती रही - जैसे-जैसे मेरे नजरिया ब्लाग पर फालोअर्स की संख्या बढती गई वैसे-वैसे इस ब्लाग-जगत के मेरे कुछ शुभचिंतक मित्र मुझसे कन्नी काटते चले गये । शायद उनके दिमाग में एक ही भावना रही हो कि हम तो इतने वर्षों से यहाँ इतने उत्कृष्ट शैली के लेखन में लगे हैं हमारे ब्लाग पर अब तक जितने फालोअर्स नहीं हुए उससे ज्यादा इतना कामचलाऊ लिखने वाले इस बन्दे के ब्लाग पर फालोअर्स इतने कम महिनों में कैसे बढ गये, और ऐसे सभी साथियों के दिमाग में इसका उत्तर भी मौजूद की ब्लागर बनने से सम्बन्धित वो सभी छोटी-छोटी आवश्यकताएँ जिन्हें यहाँ आने वाला हर ब्लागर करीब-करीब जानता ही है को कुछ लच्छेदार शैली में प्रकाशित कर नये ब्लागर मित्रों को बरगलाकर व उन्हें बेवकूफ बनाकर ही मैं अपने ब्लाग पर ये फालोअर्स बढा रहा हूँ, और जबरन सबके सामने मूंछों पर ताव देता दिख रहा हूँ, फिर अब तो हद हो गई एलेक्सा रेंकिंग जैसे श्रेष्ठतम मापदंड पर दसवें क्रम पर इसका ये ब्लाग भी दिखने लगा, तो कहीं तो ये रोष मन में उमडते-घुमडते और कहीं खुलकर अभिव्यक्त होते मेरे सामने आता चल रहा है । कहते हुए सभी पाठक बन्धुओं से क्षमा चाहता हूँ लेकिन सीमित अनुपात में ही सही इस ब्लाग-जगत में अपने कुछ साथियों को मैंने पूर्वागृह के इस दायरे में ही निरन्तर महसूस किया है ।

          एक और समस्या अपने से अधिक बुजुर्ग और नये ब्लागर साथियों में स्वयं के प्रति ये महसूस की कि हम तो असहाय अवस्था में अपनी पोस्ट प्रकाशित कर रहे हैं और टिप्पणियां करना हमारे तो बस में नहीं है, किन्तु मैं उनके ब्लाग पर टिप्पणी क्यों नहीं कर रहा हूँ । जबकि 1500 टिप्पणियां इस नजरिया ब्लाग पर देने की संख्या तक के मेरे सैकडों ब्लागर्स साथियों के ब्लाग-लिंक को मैंने तीन हिस्सों में विभाजित कर अपने तीनों ब्लाग नजरिया, जिन्दगी के रंग और स्वास्थ्य-सुख पर 'मेरे ब्लाग लिंक' माध्यम से सेट करके एक भगीरथी अभियान इस रुप में भी पूर्ण किया है कि मेरे किसी भी टिप्पणीकार साथी की कोई भी पोस्ट प्रकाशित होते ही तत्काल से लगाकर मेरे न पढ पाने की अन्तिम सीमा तक मेरी जानकारी में रहे और मैं अपने ब्लाग पर टिप्पणी देने वाले किसी भी ब्लागर साथी की पोस्ट पर टिप्पणी देकर उनका उत्साहवर्द्धन करना भूल न सकूँ । 
  
          इस दरम्यान इस ब्लाग स्नेह के कारण आर्थिक मोर्चे पर होने वाले मेरे नुकसानों की चर्चा तो मैं न ही करुँ तो बेहतर है जबकि सामाजिक स्तर पर मेरे इस ब्लाग स्नेह का खामियाजा अपने अत्यन्त नजदीकी रिश्तों में आवश्यकता के समय अपनी मौजूदगी वहाँ दर्ज नहीं करवा पाने की नाराजगी के रुप में मुझे अलग से भुगतना पडा । इसके अतिरिक्त इसी ब्लाग-स्नेह के पूर्व मेरी प्रातःकालीन घूमने व योग वगैरह कर लेने की जो स्वास्थ्यप्रद गतिविधियां अनियमित क्रम में ही सही किन्तु चलती रहती थी उस पर भी पूरी तरह से विराम लग गया । 
  
          तो इस ब्लाग-स्नेह की ये कीमतें सामूहिक रुप से पिछले महीनों में लगातार मैंने  चुकाई हैं और बदले में अपने ब्लाग-जगत के मित्रों के पर्याप्त स्नेह के बावजूद भी कुछ प्रतिशत मित्रों से इस आधार पर बन रही इन अनजान दूरियों को भी मानसिक स्तर पर  निरन्तर भुगता है अतः मस्तिष्क इस दिशा में स्वयं को ये सोचकर अधिक सहज महसूस कर रहा है कि -
और नहीं बस और नहीं....

          किन्तु रुकिये, पूर्व इसके कि आप मेरी इस पोस्ट को इस हिन्दी ब्लाग जगत से मेरे  स्थायी सन्यास के घोषणा-पत्र के रुप में समझें मैं ये स्पष्ट कर दूँ कि अपने स्वान्त सुखाय के चलते जहाँ मैंने अपने हजारों घंटे लगातार गुजारे हों वहाँ स्थायी सन्यास भी ऐसी ही चाहत उपजने पर भले ही ले लूँ, फिलहाल तो ये सन्यास इतना ही रहेगा कि अब तक जहाँ ये ब्लागिंग मेरे लिये सबसे पहली पायदान पर और शेष दुनिया की समस्त आवश्यकताएँ बाद के क्रमों में चल रही थीं वहीं अब समस्त दुनियावी आवश्यकताओं को प्राथमिक क्रम पर रखने के बाद ही  बचा हुआ समय मैं इस ब्लाग स्नेह को देना चाहूँगा जिससे न सिर्फ उपरोक्त सभी समस्याओं का क्रमशः निदान होता चला जावेगा, बल्कि ऩए फालोअर्स के बढते रहने का क्रम थम जाने के साथ ही एलेक्सा रेंकिंग से भी मेरे उस समर्पण की कमी के कारण जिसके चलते मेरा ये ब्लाग वहाँ भी दिखने लगा है, वहाँ से भी स्वमेव ही ये खिसकते-खिसकते बाहर हो जाएगा । इस प्रकार अपने ऐसे साथियों के मन में मेरे प्रति उपजते इस अबोलेपन की महसूसियत से भी मुझे मुक्ति मिलती चली जावेगी । यद्यपि तब भी मुझे अप्रत्यक्ष रुप से यह तो सुनना ही है कि देखा- जोड-तोड करके ऊपर पहुँच जाना अलग बात थी और बगैर किसी योग्यता के वहाँ लगातार टिके रहना बिल्कुल अलग । किन्तु ऐसे आरोप का भी मैं सामना कर लूंगा ।
  
          चलते-चलते अपनी आदत के मुताबिक एक निवेदनात्मक सुझाव और भी-    
          वे सभी ब्लागर साथी जो ये मानते हों कि इस ब्लाग-जगत में ऐसी उपलब्धियों पर पहला हक हमारा बनता है, मेरा छोटा सा सुझाव मात्र यही है कि वे भी अपने इस ब्लाग-स्नेह अभियान में पूरी तरह डूबकरसमस्त दीन-दुनिया को भुलाकर उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते अपने ब्लाग की नई पोस्ट के लिये निरन्तर जनरुचि के मुताबिक विषय तलाशते हुए, उन्हें रुचिकर शैली में सहजगम्य रुप से प्रकाशित करने रहने के साथ ही, टिप्पणियों के रुप में स्वयं को अधिक से अधिक ब्लागर साथियों से रुबरु करवाते हुए, हर सम्भव तरीके से अपने ब्लाग पर ट्रेफिक बढवाते रहने का ईमानदार प्रयास यदि कर पाएँ तो मेरा विश्वास है कि वे भी अपने ब्लाग पर फालोअर्स की बडी संख्या के साथ ही किसी भी रेंकिंग मापदण्डों पर  अपने ब्लाग सहित शायद मुझसे भी कम समय में ऐसे दुरुह दिख सकने वाले लक्ष्यों को सहज ही प्राप्त कर लेंगे । अतः ऐसे सभी इच्छुक साथी हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम की शैली में इस अनवरत अभियान में तत्काल जुट जावें । निश्चित रुप से हिम्मते मर्दा मददे खुदा के ब्रह्म सूत्र पर वे भी शीघ्रातिशीघ्र लक्ष्यविजेता के रुप में स्वयं को सहज ही देख सकेंगे । 

          शेष मेरे सभी पाठकों के मेरे प्रति अब तक के स्नेहिल व्यवहार के लिये अनेकों धन्यवाद सहित... 

31.5.11

आशीर्वाद दिवस...


 मंगलवार 31 मई 2011

हमारे पोते आर्जव का प्रथम






तुम जियो हजारों साल




साल के दिन हों पचास हजार...



शुभाशीष प्रदाता-

दादा-दादी, पापा-मम्मी, बडे पापा-मम्मी, भूआ-फूफाजी, 

और बडे भईया-

हर्षल सक्षम

शुभकामना समारोह में आप भी नन्हें मुन्नों के साथ सादर आमन्त्रित हैं... 


27.5.11

जल्दबाजी का भूत...!


          कंवर सा. कल शाम को अपन एक सप्ताह की यात्रा पर चल रहे हैं, 18 सीटर मेटाडोर का मैंने इन्तजाम कर लिया है, 14 टिकिट आपके परिवार को मिलाकर सामने हैं यदि और कोई चलने वाला आपकी नजर में हो तो उसे भी ले लेना, मैं भी मेरी तरफ से देख लेता हूँ नहीं तो अपने परिवार के 14 लोग ही आराम से चलेंगे । कोई प्री-प्लानिंग नहीं, पहले से कोई सूचना नहीं बस आप तो चलो । मैं उनकी इस जल्दबाज शैली से तब तक बखूबी परिचित हो चुका था, और मार्केटिंग स्तर पर स्वयं अपना काम  करने के कारण कहीं छुट्टी लेने जैसी कोई समस्या भी नहीं थी लिहाजा बच्चों के स्कूल में आवश्यक एप्लीकेशन देकर व अपने दो-चार क्लाईन्ट्स को उनके काम के प्रति आश्वस्त कर उनके साथ निकलने के लिये समयानुसार सपरिवार तैयार हो गया । ये परिचित शख्स मुझसे उम्र में थोडे ही बडे मेरे काका श्वसुर थे । उस समय हमारे साथ 10 से भी अधिक छोटे बच्चे उस यात्रा में थे ।

           नीयत समय पर सब यात्रा के लिये निकल पडे । कहीं 12, कहीं 15 तो कहीं 20-20 घंटे की त्रस्त कर देने वाली यात्रा करके ग्रुप कहीं भी पहुँचें और पहुँचते ही उनका जल्दी का टेप चालू हो जावे । चलो जल्दी करो, आगे वहाँ चलना है । तीसरे-चौथे दिन तक तो उनकी उस जल्दबाज शैली से सभी हलकान हो उठे । आखिर बच्चों ने शिकायत के लिये मुझे ही पकडा - जीजाजी आप पापा को बोलो कि जहाँ भी आएँ वहाँ तसल्ली से घूमने-फिरने तो दें । जब मैंने भी बेहद विरोधसूचक शैली में सभी बच्चों व महिलाओं की भावनाओं से उन्हें अवगत करवाते हुए उनकी उस जल्दबाज शैली का विरोध किया तो मजबूरी में वे ये कहते हुए मान तो गए कि - कंवर सा. मैं तो ये सोच रहा था कि अपन दो-चार जगह और इसी समय में घूम लेंगे लेकिन बेहद अनमनेपन से वे आगे की यात्रा में सभी यात्रियों की भावना के अनुरुप समय तक रुक पाए ।

            इन साहब का मण्डी में दलाली का काम था और हर समय जल्दी की मानसिक गिरफ्त में रहने के कारण इनकी सहज मलत्याग की प्रवृत्ति बाधित होते-होते ये पहले कब्ज की गिरफ्त में आकर बाद में ब्लड-प्रेशर की समस्या से घिरे हुए थे । प्रतिदिन ब्लडप्रेशर कन्ट्रोल में रखने की गोली लेना इनकी बाध्यता थी, एक दिन गोली लेने के आधे घण्टे में स्वयं को सहज नहीं महसूस कर पाने के कारण एक गोली और ले ली जिसके कारण दो-चार घण्टे बाद हास्पीटल में एडमिट होना पडा, जहाँ पता चला कि रोजाना बढ जाने वाला उनका ब्लड-प्रेशर (इसके बारे में विस्तृत जानकारी यदि आप लेना चाहें तो हाई ब्लड-प्रेशर (उच्च रक्तचाप) से बचाव ये पोस्ट माउस क्लिक करके देखें) उस दिन वैसे ही घटा हुआ था और अपनी जल्दबाज प्रवृत्ति के चलते ये एक नहीं बल्कि दो-दो गोली ब्लड प्रेशर घटाने की और ले चुके थे । अतः उस दिन का सूरज उनकी जिन्दगी में देखा जाने वाला अन्तिम सूरज साबित हुआ और महज 48 वर्ष की उम्र में जितनी जल्दी उन्हे हमेशा रहती थी उतनी ही जल्दी वे इस दुनिया से कूच भी कर गये ।

      एक अन्य रिश्तेदार जो अजमेर में रहते हैं उन्हें भी मैंने अक्सर बेहद जल्दबाजी में ही देखा । एक दिन खबर आई कि उनकी कार का एक्सीडेंट हो गया है और उनका चौथे नम्बर का छोटा भाई जो उनके साथ आगे की सीट पर बैठा था उस एक्सीडेंट में वह अपनी विद्यार्थी उम्र में ही कण्टक्टर साईड से होने वाले उस एक्सीडेंट की भेंट चढकर शहीद हो गया था । उनके अंतिम संस्कार में मैं ही अजमेर जब पहुँचा तो उस ह्रदयविदारक शोकसंतप्त माहौल में वे रह-रहकर उस मृतक भाई को याद करके चिल्लाते दिख रहे थे हाए सुशील (संयोगवश उस भाई का यही नाम था) मेरे कारण तेरी जान चली गई । ईश्वर ही जाने अभी उनकी वो मानसिक जल्दबाजी समाप्त हुई या घटी या नहीं.
          मल्टीलेबल मार्केटिंग कम्पनी में कार्यरत मेरे एक अति महत्वाकांक्षी साथी भी इस समय मेरे जेहन में आ रहे हैं जिन्हें उन्नति करने की ऐसी ही जल्दबाजी रहती थी । जब ये कम्पनी हमारी अपेक्षाओं को पूर्ण नहीं कर पाई तो इन्होंने पहले लोडिंग रिक्शा खरीदा, फिर अपने सम्पर्कों के चलते एक और लोडिंग रिक्शा खरीदकर किराये पर चलवा दिया और फिर जल्दी ही दोनों रिक्शा किराये पर सौंपकर और अधिक लाभ के लिये बडी मेटाडोर खरीदकर उस पर दिन रात अधिक से अधिक दौड लगाने लगे. निरन्तर काम का बढता दबाव और पर्याप्त नींद न ले पाने के कारण एक रात 2.30 बजे के लगभग उज्जैन से इन्दौर आते समय एक्सीडेण्ट कर बैठे और उनकी जीवन-यात्रा भी फिर उससे आगे नहीं बढ सकी ।

          जल्दबाजी के ये और इस जैसे अनेक उदाहरण तो वे हुए जिनसे मेरा वास्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से पडता रहा और इसके दुष्परिणाम समय-समय पर मेरे देखने में आते रहे । लेकिन सार्वजनिक रुप से जल्दी से जल्दी किले फतह करने वाले कुछ और उदाहरणों की यदि हम बात करें तो शेअर बाजार में जल्दी से जल्दी सही गलत सभी हथकण्डे अपनाकर सारी दुनिया की दौलत अपने कब्जे में कर लेने की सोच रखने वाले हर्षद मेहता का उल्लेख किया जा सकता है जिसके कारनामों के कारण उस पर भरोसा करने वाले पदाधिकारियों की दो बैकें एक समय फैल हो गई थी और लाखों लोग अपनी बैंक जमा राशि से भी हाथ धो बैठे थे । यद्यपि बीच में इनकी कारों का काफिला और घीरुभाई अंबानी के आफिस की बिल्डिंग में ही मौजूद इनका बडा सा आफिस घीरुभाई अंबानी से भी अधिक ऐश्वर्यपूर्ण लगने लगा था । किन्तु अपनी जल्दबाज उपलब्धियों के चपेटे में बैंक व शेअर बाजार के अनेकों ग्राहकों को अकाल फाँसी लगवा देने वाले यही हर्षद मेहता शीघ्र ही कानून की गिरफ्त में फंसकर और बीमारियों के आक्रमण से घिरकर 45-50 वर्ष की मध्य उम्र में ही दुनिया से रुखसत हो लिये थे ।

           फिर हमारे देश की महान राजनैतिक पार्टी रही कांग्रेस आई की अन्तर्राष्ट्रीय शख्सियत संजय गांधी जिन्हें सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे का वाली शैली में देश की जनसंख्या और देश के अल्पसंख्यक वर्ग को जल्दी से जल्दी देश से खदेड देने का जुनून चढा था जिसके चलते 1975-77 के इमरजेंसी काल में हजारों लोगों की जबरिया नसबन्दी करवा देने और रातों रात उस अल्पसंख्यक वर्ग की पचासों बस्तियों पर बुलडोजर चलवा देने की महारथ के चलते वे भी अपनी जल्दबाज शैली के मुताबिक ही प्लेन में बैठकर जल्दी से दुनिया से रुखसत हो लिये थे । हमारे क्षेत्र में इसी पार्टी के इनके एक परम अनुयायी नेता जिनके नाम का मैं उल्लेख नहीं कर रहा हूँ उनका भी यही रेकार्ड रहा - साम, दाम, दण्ड, भेद की नीतियों पर चलते अपने सामने दिखने वाली हर खुबसूरत लडकी को अपनी अंकशयिनी बनालूँ, दसों दिशाओं से अपने सामने दिख सकने वाली सारी दौलत अपने कब्जे में करलूँ, और अपने राजनैतिक आकाओं को हर समय प्रसन्न भी रख लूँ कि फटाफट शैली में जल्दी-जल्दी पार्षद व विधायकगिरी की यात्रा तय करते हुए संजय गांधी की दुनिया से रुखसतगी के बमुश्किल चंद दिनों बाद ही एक मोटरसायकल एक्सीडेंट में ये भी चपेटे में आ गये और लगभग एक सप्ताह जीवन-मृत्यु के बीच कोमा में संघर्षरत रहकर ये भी अपने आका से मिलने उनके पास ही पहुँच गये । क्षेत्र की जनता तो "मरने वालो कसो भी थो पन गरीबां के तो वो नी सतायो" की शैली में उनकी याद करके रह गई पर सुनते हैं उन्हें उपर भी अपने आका संजय गांधी से इसलिये डांट खानी पडी की क्यों रे भैया यहाँ तक आने में इतनी देर कैसे करदी ? जिसका जवाब उन्होंने बडी मासूमियत से अपने आका को यही दिया कि दादा आप तो प्लेन से आ गये थे, मैं मोटर सायकल से आया हूँ तो इतनी देर लगना तो लाजमी था ही । 

          कभी दो कहानियाँ मेरे पढने में आई थी - एक में दो लकडहारे थे जिन्हें पेड काटने का काम पडता रहता था, इनमें से एक काम दिखते ही पेड काटने में भिड जाता था और पसीना बहाते-बहाते जितना भी समय लगे अपने काम में पिला रहता था जबकि दूसरा लकडहारा आठ घण्टे का काम जब सामने देखता तो इत्मिनान से छः घण्टे अपनी कुल्हाडी की धार तेज करने में लगाता और शेष दो घण्टे में उस तीक्ष्ण धारदार कुल्हाडी से सामने मौजूद वृक्ष को काट लेता था । दूसरे सफल व्यक्ति के उदाहरण में जब पत्रकारों नें उससे पूछा कि आपने इतने कम समय में इतनी सफलता हासिल की इसका राज क्या है ? तब उस व्यक्ति का जवाब था कि मैं लक्ष्य सामने रखकर आवश्यकता के मुताबिक दौड लगाता हूँ फिर इत्मिनान से सुस्ताते हुए अपनी उपलब्धियों का जायजा लेता हूँ और यदि मुझे अपनी कार्यप्रणाली में कहीं कोई बदलाव आवश्यक लगता है तो उसकी रुपरेखा का निर्धारण भी उस सुस्ताने के क्रम में ही कर लेता हूँ तत्पश्चात् फिर दौड लगाने लगता हूँ । 

         
कुछ नहीं से सब कुछ पाने तक की अपनी इस जीवनयात्रा (जिसमें स्वयं का स्थायित्व, विवाह बाद की जिम्मेदारियां, तीन बच्चों का लालन-पालन, उनकी शिक्षा, विवाह व उनके स्थायित्व से सम्बन्धित अपना योगदान, इस दरम्यान स्वयं का मकान, दोपहिया व चार पहिया वाहन व जीवन के लिये आवश्यक अन्य भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति) में भले ही मुझे भी 15-15 घंटे से अधिक व्यस्त रहना पडा हो किन्तु अनावश्यक जल्दबाजी कभी मस्तिष्क पर हावी नहीं हुई बल्कि ये सोच सदा रही कि जिस काम में जो समय लगना है वो तो लगना ही है । उसके बाद भी मुझे ये कभी नहीं लगा कि समय की कमी के कारण जो कुछ मैंने पाना चाहा हो उसे मैं हासिल नहीं कर पाया हूँ जबकि इसके विपरीत इन जल्दबाज व्यक्तियों की न सिर्फ उपलब्धियों का दायरा असीमित होते हुए भी सीमित दिखा, बल्कि न ये अपनी जिन्दगी सुकून से जी पाए और न ही स्वयं के कमाये हुए धन व साधनों का स्वयं के लिये कोई आनन्द या उपभोग कर पाये । 

         
ऐसे में यह प्रश्न तो सहज रुप से मन में उठता है कि  लगभग हर चौथे-पांचवें व्यक्ति में देखी जाने वाली ये जल्दबाजी क्या वास्तव में आवश्यक है ?

24.5.11

रफ्तार का जुनून...?

            स्कूटर पर आने-जाने वाले बैंक आफिसर पिता और स्कूटी की मदद से इमीटेशन ज्वेलरी का कारोबार करने वाली माता ने अपने मकान के नवीनीकरण अभियान में अपने इकलौती सन्तान 22 वर्षीय पुत्र की वैवाहिक तैयारियों के अनुसार उसकी भावी आवश्यकताओं की सभी स्थितियों को ध्यान में रखते हुए मकान की उपरी मंजिल पर सबकुछ समय की आवश्यकता के साथ ही बच्चे की इच्छापूर्ति के मुताबिक सर्वश्रेष्ठ निर्माण कार्य अत्याधुनिक इन्टीरियर के द्वारा करवा लिया था । परिवार के स्टेटस के मुताबिक घर में कार भी थी जिसका उपयोग या तो पूरा परिवार एक साथ कहीं जाने के समय काम में लेते थे या फिर शौकिया तौर पर उनका ये बालक अपने दोस्तों के साथ कर लिया करता था ।

        होनहार पुत्र कालेज में ग्रेजुएशन की परीक्षा में उच्चतम अंकों से पास हुआ तो प्रसन्नता के दौर में माँ-पिता ने बच्चे की इच्छापूर्ति हेतु उसकी मनपसन्द मोटर बाईक भी तोहफे में उसे दिलवा दी । वैसे भी माँ-पिता दोनों की उस बालक के प्रति सोच यह रहती थी कि हमारा सबकुछ इसी का तो है । इसलिये यदि इसकी चाहत बाईक के इस मेक व माडल की है तो यही बाईक इसे हम क्यों न दिलवाएँ ।

        बाईक खरीदें एक माह भी नहीं हुआ होगा कि पास ही के गांव में रहने वाले बालक के मित्र की शादी का संयोग बन गया । पिता ने बालक को निर्देशित भी कर दिया कि तुम अपने इस मित्र की शादी में बाईक से नहीं जाओगे । तुम्हे जितनी बार भी आना-जाना करना है कार के द्वारा ही करना है जिसे उपरी तौर पर तो बालक ने मान लिया किन्तु मन से नहीं मान पाया । सुबह पिता के समक्ष कार लेकर निकला वह बालक दूसरी बार घर आने पर पिता की गैरमौजूदगी में अपनी नई बाईक लेकर ही निकला । शादी के घर में दूल्हे के कपडे लांड्री से लाने का काम बाकि था जिसकी जिम्मेदारी इसी बालक ने दूसरे दोस्त के लांड्री के नजदीक रहने के बावजूद स्वयं ले ली और अपनी नई मोटर बाईक से लांड्री से कपडे लेकर वहीं नजदीक रहने वाले मित्र के साथ वापस शादी वाले घर की ओर दोनों मित्र चल पडे । दूसरा मित्र भी अपनी स्वयं की मोटर बाईक पर ही चल रहा था । रास्ते में अनजाने ही दोनों में रेस चालू हो गई और अपनी नई बाईक की रफ्तार का कौशल दिखाने में एक मोड पर तेजी से टर्न लेने में बालक गाडी का बेलेन्स कन्ट्रोल नहीं कर पाया और लगभग 8 फीट गहरे बडे से गड्ढे में बाईक के साथ जो गिरा तो बालक नीचे और बाईक उसके उपर जा गिरी । जब तक पीछे से दूसरा मित्र वहाँ पहुँचा और दो-चार लोगों को रोककर उस बालक को गड्ढे में से निकाला तब तक उसके प्राण पखेरु उड चुके थे । इन दम्पत्ति के साथ यही बालक हमारी बैंकाक-पटाया की स्वप्न-यात्रा में हमारे साथ भी कुछ समय बिता चुका था ।

        यह बालक तो अकाल मृत्यु के द्वारा दुनिया से रुखसत हो गया और माँ-पिता की आगे की शेष पूरी जिन्दगी उजाड हो गई । नसीब से ये एक सन्तान मिलने वाले रिटायरमेंट के करीब पहुँच रहे पिता व माता की उम्र ऐसी भी नहीं रह गई थी कि वे इस दुर्घटना के बाद दूसरी सन्तान को जन्म देकर अपनी सामर्थ्य के दौर में उसे आत्मनिर्भर बनता देख पाते । प्रायः इसमें की घटना में लोग सोचते हैं कि लडकियों को इम्प्रेस करने के चक्कर में नवयुवक ऐसी दुर्घटनाएँ कर बैठते हैं किन्तु यहाँ ऐसा कोई चक्कर नहीं था यदि कुछ था तो नई उम्र और नई बाईक के साथ कहीं न कहीं हवा में उडने जैसा जुनून था । लगभग तीन साल पहले घटने वाली इस घटना का यहाँ उल्लेख क्यों हो गया अब उसका कारण भी देखें-
  
पिछले दिनों में अखबारो में छपने वाली एक नहीं दो घटनाएँ...
  
          एक बाईक पर दो लडके हाईवे पर ऐसी ही तेज गति से जा रहे थे दूसरी ओर से एक गेहूँ काटने वाली मशीन चली आ रही थी । अचानक बाईक चलाने वाले लडके का पल भर के लिये ध्यान हटा और बाईक उस मशीन से जा टकराई । बाईक चलाने वाले को तो गम्भीर चोटें आई किन्तु पीछे बैठा लडका इस टक्कर से उछलकर उस मशीन में लगे दांतों से टकरा गया जो इतने नुकीले थे कि उस लडके के सीने को चीरते हुए आर-पार हो गए । जब आस पास के लोग वहाँ पहुँचे वो लडका दर्द से छटपटा रहा था । लोगों ने सामूहिक प्रयासों से कोशिश करके उसे उन नुकीले दांतों से अलग किया किन्तु उसकी जिन्दगी नहीं बचाई जा सकी ।
  
          दूसरी घटना में तेज रफ्तार से जा रही बाईक उसके आगे चल रहे टाटा मेजिक वाहन के अचानक ब्रेक लगा देने से उससे तेजी से टकराई जिससे बाईक चलाने वाला लडका सडक के बीच में गिर गया और दूसरी ओर से आते हुए ट्रक का अगला पहिया उसकी कमर के निचले हिस्से को रौंदता हुआ निकल गया । कुछ देर पानी-पानी की गुहार लगाते हुए उस लडके ने भी वहीं दम तोड दिया ।
  
          इन दोनों हादसों में भी मरने वाले युवकों की उम्र 20 और 25 वर्ष के मध्य ही थी और बाईक की गति हद से ज्यादा तेज तो थी ही । ऐसी कितनी ही घटनाएँ हम सभी अपने-अपने क्षेत्रों में अक्सर घटते हुए देख रहे हैं । जिनमें बाईक सवार बाईक को चलाकर नहीं उडाकर निकलते दिखने की कोशिश करते दिखते हैं और अंततः इन आकस्मिक स्थितियों की चपेट में आकर या तो शेष जीवन के लिये अपाहिज होकर रह जाते हैं या फिर दुनिया से रुखसत होकर अपने माता-पिता को जिन्दगी भर के लिये किश्तों में रोते रहने की सौगात दे जाते हैं । 
  
           क्या वास्तव में उन्हें इतनी जल्दी रहती है जबकि इससे कई गुना अधिक समय इन्हीं युवकों का मोबाईल पर SMS भेजते रहने में और इन्टरनेट पर फेसबुक या इस जैसी अन्य सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर अनावश्यक चेटिंग करने में गुजर जाता है, या फिर हालीवुड-बालीवुड की फिल्मों के ऐसे दृश्य देखकर रफ्तार का ये जुनून उनके दिलो-दिमाग में इस सीमा तक छाया रहता है, या जैसी कि आम धारणा रहती है कि लडकियों को इम्प्रेस करने के चक्कर में इस गति से ये खुली सडक दिखते ही इतनी अनियंत्रित बाईक चलाना प्रारम्भ कर देते हैं । कारण चाहे जो हो परिणाम तो आप भी डूबे, देश भी डूबे, जनता को भी ले डूबे वाला ही बनता है । 

          आखिर विज्ञान की आधुनिकतम उपलब्धियों का पूरा रोमांच प्राप्त करने की ये कीमत इस रुप में कब तक ?

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