अभी-अभी एक रिश्तेदारी में शादी
की 25वीं सालगिरह का भोजन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । उस दिन सुबह से
ही दोनों बहुओं में चर्चा चल रही थी कि उन्होंने इस विशेष अवसर पर अपनी पत्नि को 50 तोला सोने के आभूषण का सेट
उपहार में दिया है । मैं इन दोनों एक से बढकर एक पति-पत्नि को पहले से जानता हूँ, इसलिये मेरे सामने चल रही इस 50 तोला सोने के आभूषणों की गिफ्ट
की बात पर मैं मात्र मुस्करा के रह गया, क्योंकि ये तोहफा घर में रखे
पैसों को सोने जैसे सुरक्षित माध्यम में इन्वेस्ट कर देने से ज्यादा क्या हुआ ?
इन
दम्पत्ति की एक ही फूल सी कोमल व सुन्दर पुत्री है और एक ही लडका है । धंधा चाहे
जो हो किन्तु लक्ष्मीजी का वरदहस्त झकाझक दिखाई देता है । अभी-अभी अपना पुराना
मकान बेचें बगैर घर का नया मकान खरीदने के साथ ही टवेरा जैसी दो गाडियां भी
इन्होंने खरीदी हैं जिसे ये किराये पर भी चलवा लेते हैं और वास्तविक व्यवसाय से
होने वाली चलते रस्ते हीरे-पन्ने के आभूषण खरीद सकने की क्षमता वाली आमदनी का
वास्तविक स्त्रोत या तो वे स्वयं जानें या फिर उपर वाले रामजी । तो माता
लक्ष्मीजी की ऐसी कृपा होने के बावजूद उस इकलौती पुत्री की शादी इन्होंने छोटे
गांव में इन शर्तों के साथ ही सम्पन्न की कि हमारे पास 8-10 तोला सोने से अधिक, एकाध लाख नगद से अधिक, और इस रेंज में आने वाली इन 12-15 साडियों से अधिक लगाने के लिये
कुछ नहीं है । लडके वालों को तो ऐसे अवसरों पर लडकी से मतलब होता है तो राजी-खुशी
उसकी शादी की जिम्मेदारी से भी ये दम्पत्ति बरी हो लिये ।
अब ऐसे
श्रीसम्पन्न दम्पत्ति की मेमोरेबल 25वीं शादी की सालगिरह की पार्टी
की बानगी देखिये- मुख्य शहर से 15 से भी अधिक किलोमीटर दूर एक
धार्मिक स्थल पर जहाँ 55/- रु. प्रति थाली के मान से दाल-बाफले-लड्डू का भोजन उपलब्ध
रहता हो वहाँ इन्होंने स्वयं यही मीनू अपने महाराज से बनवाया जिससे की और जो भी
बचत हो सके वो हो जावे । फिर ऐसा जीर्ण-शीर्ण हाल जिसमें 50 साल से भी अधिक पुरानी
टूटी-फूटी हरी फर्शियां और उपर टीन शेड की मौसम की मार से काली और जीर्ण-शीर्ण
तपतपाती हुई छत मौजूद थी उसे नाम-मात्र के किराये पर जुगाडकर मेहमानों को उसमें
बुलाया । भोजन की सर्विस के नाम पर ऐसे कोई सेवक-नौकर नहीं जो 200-250 मेहमानों को साफ-सुथरे माहौल
में खाना खिला सकें । आप अपनी टेबल स्वयं साफ करो, अपनी थाली स्वयं उठाकर मांजने
में रखो और अपने आप जाकर पानी पी लो और भेंटस्वरुप लिफाफे जो हर मेहमान अपनी
हैसियत के मुताबिक दे रहे थे उसमें ही इस पार्टी के कुल खर्चे से कहीं ज्यादा
आमदनी का स्कोप भी उनके लिये बखूबी बनता जा रहा था । पत्नि जरुर नई साडी और उस
तथाकथित सोने के सेट को पहने घूमते हुए दिख रही थी किन्तु पति महोदय का तो पेन्ट
भी पांयचे के नीचे से किनारे उधडते हुए उस समारोह में भी अलग ही नजर आ रहा था ।
एक ओर
जहाँ सामान्यजन की सोच ये रहती हो कि यदि हम मेहमानों को अपने यहाँ भोजन पर बुला
रहे हों तो भले ही अपने घर में कैसे भी काम चला लेते हों किन्तु उन्हें अच्छे से
अच्छा भोजन, अच्छे से
अच्छा वातावरण और उन्हें कोई परेशानी न हो ऐसी सेवा पहले उपलब्ध करवाएँ क्योंकि
इन्हीं से तो हमारी सार्वजनिक मेहमाननवाजी की छवि अपने परिचितों व समाज में बनती
है वहीं इनकी ये महाकंजूस सोच इस रुप में कदम-कदम पर सामने दिख रही थी ।
अभी दो
दिन पूर्व ही नया सवेरा ब्लाग पर भी भूख से कुलबुलाते हुए हजारों रुपये हर जेब में
अलग-अलग रखें एक सूटेड-बूटेड साहब की 2/- रु. की मूंगफली खरीदकर वह भी
वापस कर देने और मुफ्त में उस गरीब खोमचेवाले की 2-5 मूंगफली चखने के नाम पर खाने का
भी एक किस्सा पढा ही था । तो ऐसे कंजूस हममें से लगभग सभी को अपने दैनंदिनी के
जीवन में कदम-कदम पर टकराते हुए दिखते ही हैं और इनकी इस कंजूस मनोवृत्ति के कारण
वे सभी लोग जो इनके सम्पर्क में आते हैं उन्हें निरन्तर तकलीफें उठाना पडती हैं
जिससे इन्हें कोई फर्क नहीं पडता ।
एक बार
ऐसे ही किसी डेड स्याणे के यहाँ चोरी हो गई । वे महोदय धाडे मार-मारकर रोते हुए
विलाप कर रहे थे कि हाए मेरा तो सब कुछ लूट गया । तभी एक सन्यासी उधर से निकले, उन्होंने उस कंजूस से पूछा कि
भई आखिर क्या हुआ ? तब उस
कंजूस ने बताया कि मेरी तिजोरी में से चोर 2 किलो सोने का वो ढेला उठाकर ले
गये जो मेरे पिताजी के मरने के बाद से मेरे पास सुरक्षित रखा था और जिसे मैंने
पिछले 30-35 वर्षों से ऐसे ही सहेजकर रखा हुआ था । तब उन सन्यासी ने
आसपास देखकर सडक से लगभग उतना ही वजनदार पत्थर उठाकर उस व्यक्ति को देते हुए कहा
कि तेरी तिजोरी में उस सोने के ढेले की जगह इस ढेले को रखदे और समझले कि तेरा माल
सुरक्षित रखा हुआ है, फिर तो
उस कंजूस को बहुत गुस्सा आया और वो उस सन्यासी से बोला कि आपका दिमाग तो खराब नहीं
हो गया है जो सोने के ढेले की बजाय ये पत्थर का ढेला रखवाकर मुझे समझा रहे हो कि इसे ही
सोना समझकर पडा रहने दूँ । सन्यासी ने उसे मुस्कराते हुए समझाया कि तेरे पिताजी के
जमाने से तू इसकी सुरक्षा कर रहा है । न तूने इसका कोई उपयोग आज तक किया और न आगे
तेरा ऐसा कोई इरादा है तो फिर क्या फर्क पडना है कि तेरी तिजोरी में सोने का ढेला
रखा है या पत्थर का । भले ही ये अतिशयोक्ति वाली बात हो किन्तु इन जैसे कंजूसों के
लिये ही महाकवि तुलसीदास रचित एक श्लोक अपने शिक्षण काल में शायद सभी ने पढा होगा
कि-
कृपणेन समो दाता न भूतौ न
भविष्यति,
अस्पृसन्नैव वित्तानी य परेभ्य
प्रयच्छति ।
अर्थात्
कंजूस के समान दानी इस पृथ्वी पर न कभी हुआ है और न होगा । क्योंकि जीतेजी वो अपना
धन न स्वयं खाता है और न किसी को खाने देता है और मरने के बाद वो सारा धन समाज के
लिये छोड जाता है ।
आपका भी
ऐसे कंजूसों से वास्ता पडता है या नहीं ?





