15.2.11

दानवीर कंजूस...!

       अभी-अभी एक रिश्तेदारी में शादी की 25वीं सालगिरह का भोजन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । उस दिन सुबह से ही दोनों बहुओं में चर्चा चल रही थी कि उन्होंने इस विशेष अवसर पर अपनी पत्नि को 50 तोला सोने के आभूषण का सेट उपहार में दिया है । मैं इन दोनों एक से बढकर एक पति-पत्नि को पहले से जानता हूँ, इसलिये मेरे सामने चल रही इस 50 तोला सोने के आभूषणों की गिफ्ट की बात पर मैं मात्र मुस्करा के रह गया, क्योंकि ये तोहफा घर में रखे पैसों को सोने जैसे सुरक्षित माध्यम में इन्वेस्ट कर देने से ज्यादा क्या हुआ ?

           इन दम्पत्ति की एक ही फूल सी कोमल व सुन्दर पुत्री है और एक ही लडका है । धंधा चाहे जो हो किन्तु लक्ष्मीजी का वरदहस्त झकाझक दिखाई देता है । अभी-अभी अपना पुराना मकान बेचें बगैर घर का नया मकान खरीदने के साथ ही टवेरा जैसी दो गाडियां भी इन्होंने खरीदी हैं जिसे ये किराये पर भी चलवा लेते हैं और वास्तविक व्यवसाय से होने वाली चलते रस्ते हीरे-पन्ने के आभूषण खरीद सकने की क्षमता वाली आमदनी का वास्तविक  स्त्रोत या तो वे स्वयं जानें या फिर उपर वाले रामजी । तो माता लक्ष्मीजी की ऐसी कृपा होने के बावजूद उस इकलौती पुत्री की शादी इन्होंने छोटे गांव में इन शर्तों के साथ ही सम्पन्न की कि हमारे पास 8-10 तोला सोने से अधिक, एकाध लाख नगद से अधिक, और इस रेंज में आने वाली इन 12-15 साडियों से अधिक लगाने के लिये कुछ नहीं है । लडके वालों को तो ऐसे अवसरों पर लडकी से मतलब होता है तो राजी-खुशी उसकी शादी की जिम्मेदारी से भी ये दम्पत्ति बरी हो लिये ।

          अब ऐसे श्रीसम्पन्न दम्पत्ति की मेमोरेबल 25वीं शादी की सालगिरह की पार्टी की बानगी देखिये- मुख्य शहर से 15 से भी अधिक किलोमीटर दूर एक धार्मिक स्थल पर जहाँ 55/- रु. प्रति थाली के मान से दाल-बाफले-लड्डू का भोजन उपलब्ध रहता हो वहाँ इन्होंने स्वयं यही मीनू अपने महाराज से बनवाया जिससे की और जो भी बचत हो सके वो हो जावे । फिर ऐसा जीर्ण-शीर्ण हाल जिसमें 50 साल से भी अधिक पुरानी टूटी-फूटी हरी फर्शियां और उपर टीन शेड की मौसम की मार से काली और जीर्ण-शीर्ण तपतपाती हुई छत मौजूद थी उसे नाम-मात्र के किराये पर जुगाडकर मेहमानों को उसमें बुलाया । भोजन की सर्विस के नाम पर ऐसे कोई सेवक-नौकर नहीं जो 200-250 मेहमानों को साफ-सुथरे माहौल में खाना खिला सकें । आप अपनी टेबल स्वयं साफ करो, अपनी थाली स्वयं उठाकर मांजने में रखो और अपने आप जाकर पानी पी लो और भेंटस्वरुप लिफाफे जो हर मेहमान अपनी हैसियत के मुताबिक दे रहे थे उसमें ही इस पार्टी के कुल खर्चे से कहीं ज्यादा आमदनी का स्कोप भी उनके लिये बखूबी बनता जा रहा था । पत्नि जरुर नई साडी और उस तथाकथित सोने के सेट को पहने घूमते हुए दिख रही थी किन्तु पति महोदय का तो पेन्ट भी पांयचे के नीचे से किनारे उधडते हुए उस समारोह में भी अलग ही नजर आ रहा था । 

           एक ओर जहाँ सामान्यजन की सोच ये रहती हो कि यदि हम मेहमानों को अपने यहाँ भोजन पर बुला रहे हों तो भले ही अपने घर में कैसे भी काम चला लेते हों किन्तु उन्हें अच्छे से अच्छा भोजन, अच्छे से अच्छा वातावरण और उन्हें कोई परेशानी न हो ऐसी सेवा पहले उपलब्ध करवाएँ क्योंकि इन्हीं से तो हमारी सार्वजनिक मेहमाननवाजी की छवि अपने परिचितों व समाज में बनती है वहीं इनकी ये महाकंजूस सोच इस रुप में कदम-कदम पर सामने दिख रही थी ।

           अभी दो दिन पूर्व ही नया सवेरा ब्लाग पर भी भूख से कुलबुलाते हुए हजारों रुपये हर जेब में अलग-अलग रखें एक सूटेड-बूटेड साहब की 2/- रु. की मूंगफली खरीदकर वह भी वापस कर देने और मुफ्त में उस गरीब खोमचेवाले की 2-5 मूंगफली चखने के नाम पर खाने का भी एक किस्सा पढा ही था । तो ऐसे कंजूस हममें से लगभग सभी को अपने दैनंदिनी के जीवन में कदम-कदम पर टकराते हुए दिखते ही हैं और इनकी इस कंजूस मनोवृत्ति के कारण वे सभी लोग जो इनके सम्पर्क में आते हैं उन्हें निरन्तर तकलीफें उठाना पडती हैं जिससे इन्हें कोई फर्क नहीं पडता ।

           एक बार ऐसे ही किसी डेड स्याणे के यहाँ चोरी हो गई । वे महोदय धाडे मार-मारकर रोते हुए विलाप कर रहे थे कि हाए मेरा तो सब कुछ लूट गया । तभी एक सन्यासी उधर से निकले, उन्होंने उस कंजूस से पूछा कि भई आखिर क्या हुआ ? तब उस कंजूस ने बताया कि मेरी तिजोरी में से चोर 2 किलो सोने का वो ढेला उठाकर ले गये जो मेरे पिताजी के मरने के बाद से मेरे पास सुरक्षित रखा था और जिसे मैंने पिछले 30-35 वर्षों से ऐसे ही सहेजकर रखा हुआ था । तब उन सन्यासी ने आसपास देखकर सडक से लगभग उतना ही वजनदार पत्थर उठाकर उस व्यक्ति को देते हुए कहा कि तेरी तिजोरी में उस सोने के ढेले की जगह इस ढेले को रखदे और समझले कि तेरा माल सुरक्षित रखा हुआ है, फिर तो उस कंजूस को बहुत गुस्सा आया और वो उस सन्यासी से बोला कि आपका दिमाग तो खराब नहीं हो गया है जो सोने के ढेले की बजाय ये पत्थर का ढेला रखवाकर मुझे समझा रहे हो कि इसे ही सोना समझकर पडा रहने दूँ । सन्यासी ने उसे मुस्कराते हुए समझाया कि तेरे पिताजी के जमाने से तू इसकी सुरक्षा कर रहा है । न तूने इसका कोई उपयोग आज तक किया और न आगे तेरा ऐसा कोई इरादा है तो फिर क्या फर्क पडना है कि तेरी तिजोरी में सोने का ढेला रखा है या पत्थर का । भले ही ये अतिशयोक्ति वाली बात हो किन्तु इन जैसे कंजूसों के लिये ही महाकवि तुलसीदास रचित एक श्लोक अपने शिक्षण काल में शायद सभी ने पढा होगा कि-

कृपणेन समो दाता न भूतौ न भविष्यति,
अस्पृसन्नैव वित्तानी य परेभ्य प्रयच्छति ।

         अर्थात् कंजूस के समान दानी इस पृथ्वी पर न कभी हुआ है और न होगा । क्योंकि जीतेजी वो अपना धन न स्वयं खाता है और न किसी को खाने देता है और मरने के बाद वो सारा धन समाज के लिये छोड जाता है ।

        आपका भी ऐसे कंजूसों से वास्ता पडता है या नहीं ?

11.2.11

आत्म-विश्वास

                 
        चौराहे पर विशाल धार्मिक जुलूस निकल रहा था । कई वाद्य-यंत्रों के साथ हजारों की भीड बडे-बडे बैनर लेकर पचासों गाडियों के साथ चल रही थी । ढोल-ताशों व लाउड स्पीकरों के शोर के बीच एक नवयुवक जो पिछले माह ही एक दुर्घटना में अपना एक पैर गंवा चुका था वह एक हाथ में बैसाखी पकडे बार-बार सडक पार करने की कोशिश कर रहा था । जैसे ही वह थोडी भी जगह देखकर आगे बढने की कोशिश करता तभी भीड का एक नया रैला या रैली का कोई वाहन फिर सामने आ जाता । एक पैर और नई बैसाखी जिसका वह अब तक पूरी तरह अभ्यस्त भी नहीं हुआ था पर अपना संतुलन बनाए वह शीघ्र रोड पार करने के प्रयास में पसीने-पसीने हो रहा था किन्तु उस भीड व वाहनों की रैली में से निकल पाने में सफल नहीं हो पा रहा था ।

          तभी उसे अपने करीब उस भीड को पार कर सडक के दूसरी ओर जाने की कोशिश करती आंखों पर काला चश्मा लगाए एक 25-26 वर्षीय अंधी युवती की याचना सुनाई दी जो कह रही थी कि मुझे सडक पार करवाने में कोई मेरी मदद करो, जैसे ही वह युवती अपनी याचना करते हुए उस अपाहिज युवक से टकराई तो वह युवक जो अभी तक सडक पार करने की बार-बार असफल कोशिश कर रहा था उसने तत्काल उस युवती का हाथ पकडा और एक हाथ से अपनी बैसाखी सम्हालकर भीड में जगह बनाते हुए उस युवती को सडक के दूसरी ओर ले गया ।

          जब वे दोनों सडक के दूसरी ओर सुरक्षित पहुँच गये तब वह युवती अपनी आंख पर से काला चश्मा हटाते हुए उस युवक से बोली- मैं बडी देर से देख रही थी कि तुम बार-बार कोशिश करके भी उस भीड में से रास्ता बनाकर सडक पार  करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हो और तुम्हारा आत्म-विश्वास खत्म होता जा रहा है । मैं तुम्हारी मदद करना चाह रही थी लेकिन या तो वो मदद तुम्हें गवारा नहीं होती या फिर तुम अपने आपको और भी बेबस समझते इसलिये मैं अंधी बनकर तुम्हारे पास आई जिससे तुम्हें अपने अपाहिज होने की कमी न लगे और तुम मेरी मदद करने के उद्देश्य से ही सही स्वयं तेजी से सडक पार कर सको । अतः झूठ बोलने के लिये तुमसे माफी चाहती हूँ ।

          और जब तक वह युवक सारी स्थिति को समझकर उस युवती से कुछ बोल पाता तब तक वो युवती तेजी से अपने रास्ते पर चली गई ।


7.2.11

सबसे अनमोल क्या...?

            
      जीवन में अनेकों बार एकान्त में या सामूहिक चिन्तन के दौर में ये प्रश्न जब भी सामने आता है तो तात्कालिक सोच या लक्ष्य के मुताबिक प्रायः अलग-अलग उत्तर जो मिलते हैं वे कितने सही हो पाते हैं ये पडताल करने के उद्देश्य से- 
  
           एक बार सम्राट अकबर ने अपने दरबार में यह प्रश्न सभी विद्वानों से पूछा कि जीवन में सबसे अनमोल क्या होता है ? तब किसी ने कहा- जीवन में धन सबसे अनमोल होता हैइन्सान सारा ज्ञान इसीके लिये हासिल करता है और इसीके लिये जीवन भर नाना प्रकार के उद्योग-धंधे करता है ।  किसी ने कहा- ज्ञान सबसे अनमोल होता है, इसी से समाज में इज्जत मिलती है और धन कमाने की योग्यता भी इसीसे मिल पाती है ।  किसी ने कहा- इज्जत सबसे अनमोल होती है, यदि वह चली जावे तो धनी या ज्ञानी होने का क्या मतलब ? किसी ने कहा कि जीवन में लक्ष्य सबसे अनमोल होता है, लक्ष्यहीन जीवन बिना पतवार की नाव के समान ही रहता है । अंततः जब यही प्रश्न अकबर बादशाह ने बीरबल से पूछा कि बीरबल तुम बताओ जीवन में सबसे अनमोल क्या होता है ? बीरबल ने उत्तर दिया- महाराज जीवन में सबसे अनमोल अपनी जान होती है ।
  
            बीरबल का ये उत्तर किसी भी दरबारी के गले नहीं उतरासबने एक स्वर में विरोध करते हुए बादशाह से शिकायती लहजे में कहा- महाराज ये भी कोई उत्तर हुआ कि सबसे अनमोल अपनी जान होती है । अरे ये तो बिल्कुल स्वार्थीपने की बात है । हम सब जानते हैं कि ये जान तो सिपाही अपने देश पर, मां-बाप अपने बच्चों पर और कई बार तो दोस्त अपने दोस्त पर हँसते-हँसते न्यौछावर कर देते हैं इसलिये सबसे अनमोल अपनी जान कैसे हो सकती है ?
  
            सभी दरबारियों के एक स्वर में उठे विरोध के स्वरों को देखकर अकबर ने बीरबल से कहा- बीरबल क्या तुम अपने इस उत्तर को साबित करके दिखा सकते हो ? जी महाराज कहते हुए बीरबल ने दुसरे दिन सुबह तक खुले मैदान में एक गहरा व बडा गड्ढा खुदवाया जिसके बीचों बीच थोडी उंचाई पर एक छोटा टीला छुडवा दिया । उसके बाद बादशाह व सभी दरबारियों की मौजूदगी में उस गहरे गड्ढे में एक बिल्ली व उसके बच्चे को छोडकर उस गड्ढे में धीमी गति से पानी भरवाना शुरु किया । जब पानी गड्ढे में इतना भर गया कि बिल्ली का बच्चा उसमें डूबने लगा तब उस बिल्ली ने अपने बच्चे को यत्नपूर्वक उस टीले पर चढा दिया और जब गड्ढे के पानी में बिल्ली भी डूबने लगी तो बिल्ली स्वयं भी प्रयत्न करके उस टीले पर चढ गई ।
  
            गड्ढे में पानी भरने का क्रम जारी रहा । जब पानी टीले पर भी इतना आ गया कि बच्चा वहाँ भी उस पानी में डूबने लगा तो बिल्ली ने अपने बच्चे को प्रयत्नपूर्वक अपने हाथों में उठाकर अपने सिर से उपर कर बच्चे को पानी से उपर उठा दिया । पानी बदस्तूर उसी गति से गड्ढे में बढता रहा । थोडी देर में टीले पर भी उस पानी में बिल्ली के भी डूबने की स्थिति बनने लगी । कुछ देर तक तो बिल्ली अपने बच्चे को हाथों में उठाए उचक-उचक कर अपनी व अपने बच्चे की जान बचाने की कोशिश करती रही लेकिन थक जाने पर अंततः जब स्थिति बिल्ली को काबू से बाहर लगने लगी तो बादशाह सहित सभी दरबारी आश्चर्य से देखते ही रह गये कि उस बिल्ली ने अपने बच्चे को जिसे वह शुरु से हर तरह से बचाने की लगातार कोशिश कर रही थी अचानक उसी बच्चे को टीले पर रखा और स्वयं उस बच्चे पर ही खडे होकर अपने आपको उस भरते जा रहे पानी से उपर उठा लिया । 
   
            बीरबल ने तत्काल पानी का प्रवाह बन्द करवाकर अकबर से सभी दरबारियों के सामने पूछा- महाराज साबित हुआ या नहीं कि जीवन में सबसे अनमोल सिर्फ अपनी जान ही होती है । बादशाह सहित किसी भी दरबारी के पास तब बीरबल की इस तर्कपूर्ण बात का विरोध करने का कोई कारण नहीं बचा था । 
  
           अपनी उपन्यासिका  "देख लूँ तो चलूँ"  में शिरोमणी ब्लागर श्री समीरलालजी 'समीर' भी इस तथ्य को कुछ यूं रेखांकित करते नजर आते हैं-

             "जन्म लेना और मरना हमारे हाथ में नहीं । मृत्यु एक अटल सत्य है किन्तु इन्सान उम्र के किसी भी पडाव पर हो, उसके जीने की लालसा कभी खत्म नहीं होती । इन्सान पैसा कमा-कमाकर अघा सकता है । कमाने के लिये उल्टे-सीधे हथकंडे अपनाना छोड सकता है । हलवाई मिठाई के बीच बैठा-बैठा मीठा खाने से उब सकता है । अपराधी जुर्म कर करके थक के जु्र्म की दुनिया से मुँह मोड सकता है, लेकिन जिन्दा रह रहकर भी जीने की लालसा खतम करना, कभी नहीं । यह इन्सानी स्वभाव नहीं है । 

            लालच की पराकाष्टा राजनीति तक से सारी जिन्दगी उसी दलदल में फँसे लोग एक उम्र पर निकल सकते हैं । प्रधानमंत्री रह चुके लोग भी घर बैठे राजनीति का मोह छोडकर कविता रचने लग जाते हैं लेकिन जीने का लालच, तौबा ! !  इसे छोडने की बात मत करो, यह नहीं हो पायेगा ।  बीमारी और शारीरिक व्याधियों से परेशान इन्सान लाख बोल ले कि हे भगवान ! !  अब नहीं जिया जाता, अब तो तू मुझे उठा ही ले, मगर जब मौत करीब आती है तो एकदम घबरा उठता है । जाने को तैयार ही नहीं होता ।"
  
            जबकि पानी पर खींची रेखा का जीवनकाल जितना अनिश्चित होता है उतना ही अनिश्चित जीवन भी माना जाता है और जीवन की इस क्षणभंगुरता को  समझने के बावजूद भी एक ओर जहाँ सामर्थ्यवान लोग अपने इसी जीवन की सुरक्षा के लिये अनेक बाडीगार्ड नियुक्त कर सुरक्षा घेरे में रहते हैं वहीं अपने स्वार्थ के आडे किसी भी दूसरे व्यक्ति को आते देखकर नैतिकता को दरकिनार कर नीचता की सभी हदें पार करते हुए छल-कपट से उसका जीवन छीन लेने के सभी हथकंडे अपनाने में जरा भी देर नहीं लगने देते । वर्तमान उपभोक्तावादी युग में ऐसे उदाहरणों की कोई कमी दिखती है क्या ?

3.2.11

कच्ची उम्र के ये शरीर सम्बन्ध...!

            कल एक समाचार पढने के बाद कि केन्द्र सरकार 12 से 14 वर्ष की उम्र सेक्स सम्बन्धों के लिये स्वीकार्य किये जाने का विधेयक पास करवाने की तैयारी कर रही है । मेरी स्मृतियों की दो घटनाओं को एक साथ ताजा कर गया- मेरे बडे भाई के एक मित्र जो बम्बई में रहते थे उनसे मेरा रिश्ता भी बडे भाई के मित्र याने मेरे भी बडे भाई जैसा बन चुका था । आवश्यकता व सामाजिक समारोह के अवसरों पर एक-दूसरे के यहाँ आना जाना भी अनवरत होता ही रहता था और जैसी बम्बई की वर्षों पूर्व से स्थिति रही है कि सामान्य लोगों के पास यदि एक कमरा भी मौजूद है तो वो किसी उपलब्धि से कम नहीं था । इसलिये किसी भी किस्म की पर्दादारी बहुत मुश्किल ही रह पाती थी । उन्हीं भाई साहब की लडकी लगभग इतनी ही छोटी उम्र की हमारे देखने में आती रहती थी और साल छ महिने में बम्बई का चक्कर लगते रहने के कारण उनके परिवार से सम्पर्क भी बना ही रहता था ।

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       अचानक अगले एक प्रवास में उनके यहाँ वह लडकी नहीं दिखाई दी । पूछने पर पता चला कि उसने तो शादी करली । बडा आश्चर्य हुआ कि कुल जमा 15 वर्ष की भी उसकी उम्र नहीं थी और शादी करली ? कोई खबर भी नहीं हुई । तो मालूम पडा कि शादी उसने स्वयं घर से भागकर की इसलिये पूर्व खबर जैसी कोई संभावना थी ही नहीं । बात आई-गई हो गई, हम अपने काम-धंधे में लग गये । संयोगवश अगले वर्ष फिर बम्बई जाना हुआ । अब वो लडकी भी घर पर दिख रही थी और दो-पांच माह का एक नवजात शिशु भी जो उसी लडकी का था उस घर में दिखाई दे रहा था । उस समय का वो बम्बई प्रवास लगभग एक सप्ताह का था और रोजाना उनके घर का चक्कर अनिवार्य रुप से लग रहा था । करीब-करीब सभी दिन वो लडकी और उसका नवजात शिशु घर पर ही दिखते, किन्तु कभी भी उस शिशु के पिता याने उस लडकी के पति को देख पाने का मौका नहीं मिला । मैंने जब इस बारे में अपने बडे भाई से पूछा तो पता चला कि वो तो कभी का उस लडकी को छोड भागा और ये लडकी तो अब स्थाई रुप से अपने मां-बाप के पास अपने उस बच्चे के साथ ही रहती है । भले ही वहाँ के माहौल में सामाजिक प्रतिष्ठा जैसा कोई सरोकार न रहा हो किन्तु उस गरीब परिवार में गरीबी में आटा गीला होने वाली स्थिति तो पूरी तरह से और स्थाई रुप से बढी हुई समस्या के रुप में सामने दिखने लगी । मैं बस अवाक् ही रह गया ।
      
          दूसरी घटना मेरे ही परिचितों में अपने ही शहर में देखी । मेरे एक परिचित शादी कर चुकने के बाद परिवार पालने जैसी आवश्कता पूर्ति की आर्थिक व्यवस्था अपनी आरामतलबी और नशे की जरुरत के चलते नहीं जुटा पाते थे । एक लडकी सहित दो बच्चे परिवार में बढ भी चुके थे और परिवार के पालन-पोषण हेतु आवश्यक अर्थोपार्जन भी उनकी पत्नि ही छोटे-छोटे कार्यों के द्वारा करते रहने की जद्दोजहद में दिखती रहती थी । उन परिचित की उस अकर्मण्यता का खामियाजा उनके बच्चों को आवश्यक शिक्षा से वंचित रहकर भी भुगतना ही पडा था । लडकी 15-16 वर्ष के आसपास की उम्र की थी और देखने में आकर्षक भी । एक समारोह में मालूम हुआ कि उस लडकी ने अपने माता-पिता को ये समझाते हुए कि अभी सम्पन्न परिवार का ये लडका मेरे लिये उपलब्ध दिख रहा है जो यदि छूट गया तो आगे आप मेरे लिये कर भी क्या पाओगे स्वयं ही उसने शादी करली । 
            कुछ समय बाद वहाँ भी वही स्थिति सामने आई कि जिस भी लडके से उसने शादी की वो कहाँ गया मालूम नहीं । लडकी लेकिन फिर से अपने मां-बाप के साथ उनके घर में स्थाई रुप से रहती दिख रही है । यहाँ एक बात जो गनीमत के रुप में दिखी वो ये कि इस लडकी के साथ कोई नवजात शिशु नहीं जुडा ।
  
अभी दिनांक 24-01-2011 को अपने इसी ब्लाग की पोस्ट एक समाचार - एक विचार में मैंने इस खबर का भी उल्लेख किया था कि होटल के सेक्स रैकेट में पुलिस द्वारा पकडी गई 7 युवतियों में एक लडकी हायर सेकन्ड्री की छात्रा थी । याने-

 बात इस उम्र के नौनिहालों द्वारा स्वयं शादी का आवरण ओढाकर इस आवश्यकता की पूर्ति करते हुए या प्रेम सम्बन्धों की आड में एकान्त में इस सुख का चोरी-छुपे लाभ उठाते हुए या फिर और कोई माध्यम न जुडने पर देह-व्यापार के घिसे हुए खुर्राटों के चंगुल में फंसकर ही इस सुख को पाने का प्रयास करते हुए इन्हें देखा जावे किन्तु टी.वी., इन्टरनेट जैसे दृश्य मीडिया के खुलेपन के इस वातावरण में यह तो दिखने लगा है कि या तो बच्चों को संस्कारित रुप से इतना मजबूत रखने के शुरु से प्रयास उनके पालकों द्वारा किये जावें कि वे गुण-दोषों के आधार पर स्वयं को ऐसे कमजोर कर सकने वाले क्षणों में मजबूती से बचा पावें जो कि असम्भव नहीं तो भी वर्तमान माहौल में अत्यधिक कठिन दिखता है 

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सुख की तलाश...!
सिर्फ सेक्स पॉवर ही नहीं बढाती सफेद मूसली
कैसी भी विपरीत परिस्थिति में हमेशा हमारा मददगार – माय हीरो.
  
 तो क्या उनकी वयस्कता की उम्र का नये सिरे से आकलन किया जाए व  यदि आवश्यक लगे तो सामाजिक रुप से उनका समय पूर्व ही विवाह करवा दिया जाए जिससे कि इस किस्म के स्व-निर्णय से किये गये विवाह के बाद ये लडकियां वापस अपने मां-पिता के घर स्थाई रुप से बोझ बनकर न आ पावें ।

1.2.11

लालच का अंत ?

      किसी गांव में एक समय चार मित्र बेहतर भविष्य की तलाश में भोजन-पानी की आवश्यक तैयारी के साथ शहर की ओर निकले । रास्ते में विश्राम के समय एक सन्यासी से मुलाकात के बाद उन्होंने अपना मकसद उन सन्यासी को बताया, तब सन्यासी ने उन्हें चार बत्तीयां देते हुए कहा कि सामने दिख रही पहाडी पर तुम जाओ । जहाँ भी कोई बत्ती गिरे वहीं थोडी खुदाई करने पर तुम्हें तुम्हारे उद्देश्य की पूर्ति जितना धन प्राप्त हो जावेगा । सभी ने आपस में विचार-विमर्श कर सन्यासीजी को धन्यवाद दिया और पहाडी की ओर चढना प्रारम्भ किया ।


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               कुछ दूर चढने पर एक बत्ती गिर गई । सबने वहाँ खुदाई की तो अन्दर लोहा ही लोहा दिखने लगा । एक मित्र ने कहा कि अपना मकसद इस लोहे को बेचकर पूरा हो सकता है । किन्तु बाकि तीनों मित्रों को उसकी बात समझ में नहीं आई । तब वह मित्र वहीं रुककर अपने लिये उस लोहे के भण्डार को ले जाने की व्यवस्था में लग गया और शेष तीनों मित्र आगे निकल गये ।
  
           और थोडी चढाई चढने पर फिर एक बत्ती गिरी । वहाँ तीनों ने खुदाई की तो भरपूर तांबा वहाँ मौजूद पाया । उनमें से फिर एक मित्र बोला ये उस लोहे की तुलना में कहीं अधिक बेहतर विकल्प है और इसमें हम तीनों का भविष्य बन सकता है । तब बाकि दो मित्रों को उसकी बात सही नहीं लगी और वह मित्र तांबे के द्वारा अपना भविष्य संवारने वहीं रुक गया व शेष दोनों मित्र फिर आगे चढने लगे । 
  
            कुछ और उपर चढने पर एक बत्ती फिर गिरी । दोनों मित्रों ने वहाँ खुदाई करके देखा तो वहाँ चांदी की ढेरों सिल्लीयां निकली । तब दोनों में से एक मित्र की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा । उसने दूसरे से कहा- वे दोनों तो लोहे और तांबे में ही रह गये यहाँ तो इतनी चांदी मौजूद है कि हमें अब जीवन में कोई कमी ही नहीं रहेगी । किन्तु दूसरे मित्र ने कहा कि ये चांदी तुम ले जाओ मैं अभी और आगे जाऊंगा । तब संतुष्ट मित्र चांदी ले जाने की व्यवस्था में लग गया और दूसरा फिर उपर की ओर
निकल गया 

        वह थोडा ही और उपर पहुंचा कि चौथी बत्ती भी गिरी । उसने वहाँ खुदाई की तो उसकी उम्मीद के मुताबिक वहाँ सोने का खजाना दिखने लगा । अब तो उसकी प्रसन्नता की सीमा न रही । उसने उपर की ओर देखा तो पहाडी की चोटी थोडी ही दूरी पर दिख रही थी । तब उसने सोचा कि ये पहाड तो बहुमूल्य संपदाओं से भरा पडा है और ये बत्तियां तो उन स्वामीजी ने प्रतीक रुप में ही दी हैं । इस सोने पर तो मेरे अलावा अब और किसी का कोई हिस्सा भी नहीं बचा है किन्तु जिस तरह इस पहाड पर लोहा, तांबा, चांदी व सोना मिला है ऐसे ही इस पहाडी की चोटी पर हीरे-जवाहरात भी अवश्य ही मौजूद होंगे । लगे हाथों मैं उस चोटी पर भी देख लूं ।


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           यह सोचकर वह व्यक्ति उस पहाडी की चोटी पर पहुंचा, लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से उसे वहाँ एक ऐसा आदमी दिखा जो हिल-डुल भी नहीं पा रहा था और उसके सिर पर एक बडा सा चक्र धंसा हुआ था जो निरन्तर घूम रहा था । बडे आश्चर्य़ के साथ उसने उस चक्र वाले व्यक्ति से पूछा- आप कौन हैं और आपके सिर में ये चक्र कैसे फंसा घूम रहा है ? उसके इतना पूछते ही चमत्कारिक तरीके से वह चक्र पहले से मौजूद व्यक्ति के सिर से उतरकर पहाड चढने वाले उस अन्तिम चौथे मित्र की सिर में धंस गया । मुक्त होने वाला व्यक्ति उससे बोला- धन्यवाद तुम्हारा जो अपने लालच के कारण तुम उपर तक आगए । अब न तुम्हें कभी भूख-प्यास लगेगी और न ही ये चक्र तुम्हारे सिर से हटेगा । हाँ यदि कोई तुमसे बडा लालची तुम्हारी किस्मत से यहाँ तक आ जावेगा तभी तुम अपनी मुक्ति का कामना कर सकते हो । मैं तो अब इस बोझ से मुक्त होकर जा रहा हूँ ।
  
            पुरातन काल की ये कथा कितनी सत्य या असत्य है ये तो शायद कोई भी नहीं जानता किन्तु लालच का भूत तो ऐसा ही है जिसकी गिरफ्त में देश-दुनिया की नामी-गिरामी शख्सियतें भी सर पर ये चक्र धंसवाए भोजन-पानी कि चिन्ता से कहीं अधिक और बडे भण्डार की तलाश में घूम रही हैं, और भ्रष्टाचार  व विध्वंस के नये-नये तरीके इजाद भी करवा रही हैं ।  पका क्या ख्याल है ?


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