28.4.11

टोपी पहनाने की कला...



        पिछले 3-4 माह से लगभग हर दूसरे रोज एक समाचार स्थान व पीडित स्त्री-पुरुषों के नाम बदल-बदलकर लगातार पढने-देखने में आ रहा है कि किसी भी अकेले जा रहे स्त्री-पुरुष को दो-तीन सादी अथवा नकली पुलिस वेषभूषा में मौजूद लोग रोककर कह रहे हैं- मां साहेब,  भाई साहेब, आगे मर्डर हो गया है और आप इधर से ये सोने की चैन-अंगूठी, चूडियां या जेवरात पहनकर कहाँ जा रहे हैं ? इन्हें उतारकर रुमाल में या डिब्बी में रख लें । पैसे भी अपने पर्स में न रखें उन्हें भी अपने इसी रुमाल-डिब्बी में सम्हालकर रखलें । सम्बन्धित व्यक्ति उनके सामने ही जब अपने पास की जोखम को रुमाल में रखने का प्रयास करता है तो ये भाई लोग स्वयं हस्तक्षेप करते हुए उनके हाथ से जेवर नगदी लेकर उनके सामने उनके ही रुमाल नहीं तो कागज में बांधकर सम्हालकर रखने की हिदायत देते हुए उसे सुरक्षित जाने का कहकर वहाँ से बिदा कर देते हैं और वह स्त्री-पुरुष कुछ आगे या अपने घर जाकर जब अपना रुमाल या पुडिया खोलता है तो रुपये की जगह तह किये गये कागज और जेवर की जगह कांच की चूडियां या पथरीले टुकडे रुमाल, डिब्बी या उस पुडिया में से निकलते हैं । फिर रोना-धोना, पुलिस कम्प्लेन्ट, पेपर न्यूज और बस । दूसरे दिन नहीं तो तीसरे दिन फिर यही वाकया अखबारों में, और अभी तो हद हो गई है सिर्फ दो दिन में तीन वारदात इसी पेटर्न पर हमारे इन्दौर शहर में फिर हो गई । बार-बार लगातार एक ही प्रकार का रीपिटेशन । समझ में नहीं आता कि लोग अखबार नहीं पढते या उस परिस्थिति में इतने भोले कैसे हो जाते हैं ? और ये टोपी पहनाने वाले कलाकार...  इन्हें तो फार्मूला बदलने तक की जरुरत भी पडते नहीं दिखती ।

        तालाब के पास से गुजरते हुए एक लडकी ने एक ऐसे लडके को देखा जो तालाब के स्थिर पानी में एक ही जगह कांच का चिलका स्थिर रखने का बडी तन्मयता से अभ्यास करते दिख रहा था । जिज्ञासावश लडकी ने उस लडके से पूछा- ये तुम क्या कर रहे हो ?  मछलियां फंसा रहा हूँ, लडके ने जवाब दिया । अरे वाह... क्या ये तरीका मुझे भी सिखाओगे लडकी ने उस लडके से पूछा ? हाँ सिखा तो दूँगा लेकिन सौ रुपये लगेंगे लडके ने जवाब दिया । लडकी ने तत्काल पर्स खोलकर सौ रुपये का नोट निकालकर लडके को देते हुए कहा- लो अब सिखाओ । सामने बैठ जाओ और गौर से देखते रहो लडके ने रुपये लेते हुए लडकी से कहा । लडकी सामने बैठकर गौर से देखने लगी । जब बहुत देर तक कुछ न हुआ तो लडकी उकताकर बोली- कोई फंस तो रही नहीं है । क्यों ? तुम्हारे सहित तीन फंसी तो लडके का जवाब था ।
        
        अपने बचपन में जब लखपतियों की हैसियत वर्तमान करोडपतियों से कई गुना मजबूत हुआ करती थी एक किस्सा सुना- "रातों-रात लखपति बनने के अचूक नुस्खे" नामक पुस्तिका मूल्य सिर्फ 2/- रु. बाजार में तीनों तरफ स्टीचिंग की हुई बिकने आई और देश भर में लाखों प्रतियां बिक गई । अन्दर हर पेज पर सिर्फ एक ही बात लिखी हुई थी जो मैंने किया वह आप भी करलें ।

        एक वाकया मुझसे सम्बन्धित- हमारे बडे डा. भाई साहब के साथ पढने वाले उनके एक घनिष्ट मित्र जिनके पिता नामी ज्योतिष रहे थे उनसे डाक्टरी की कठिन पढाई नहीं हो पाई तो अपने स्वर्गीय पिता की गादी सम्हालकर ज्योतिषी का काम करने लगे । घर पर कई बार डाक्टर भाई साहेब से मिलने आने के कारण और नजदीक ही रहने के कारण मैं भी उन्हें भाई साहब ही पुकारता था जो बाद में गुरुजी के सम्बोधन में आ गये । मेरी शादी को लगभग डेढ वर्ष हो चुका था । सन्तान तब तक हुई नहीं थी और कुछ ही समय पूर्व "जितेन्द्र, मौसमी चटर्जी, विनोद मेहरा, शबाना आजमी व चलते फिरते टोपीबाज की विशेष भूमिका में संजीव कुमार अभिनीत फिल्म स्वर्ग-नर्क" चलकर टाकीजों से उतर चुकी थी । सायंकालीन ठंडाई के मेरे फिक्स टाईम पर एक दिन ये दादा भी मुझसे वहीं टकरा गये । आदर सहित मैंने उनके लिये विशेष ठंडाई बनवाते हुए उन्हे पेश की जिसे स्वीकारते हुए उन्होंने मुझसे पूछा- और सुशील कैसी गुजर रही है सुनीता के साथ ? बढिया गुजर रही है गुरुजी मैंने उन्हें जवाब दिया । हाँ बढिया तो गुजरेगी लेकिन...  कहते हुए प्रश्नवाचक मुद्रा में मुझे लाकर वे चुप हो गये । तब मैंने पूछा इस लेकिन का मतलब क्या हुआ ? अपने स्कूटर के करीब आते हुए वो मुझसे बोले- संतान पैदा करके दिखाओ तो जानें और उसमें भी लडका पैदा करके बताओ तो । कहते हुए स्टार्ट स्कूटर पर बैठकर वे उडन-छू हो लिये । जाते-जाते मेरे लिये नींद चौपट करने का पक्का इंतजाम कर गये ।
 
        डेढ-पौने दो वर्ष की अवधि में खुशखबरी बन सकने जैसा योग तब तक हमारे दाम्पत्य में बन भी नहीं पाया था और जिन मित्रों की हम सगाई में शामिल हुए थे उनके परिवार को संतान सुख से पूरित देख चुके थे, लिहाजा उनकी उस चुनौतियुक्त बात का सार समझने मैं उनके कार्यालय पहुँचा और उनसे पूछा कि आपने इतनी बडी बात किस आधार पर कही । थोडे-बहुत हीले-हवाले करते हुए वो मुझसे बोले- तुम सुशील हो और पत्नी तुम्हारी सुनीता समराशि होने के कारण तुम दोनों की जोडी में नाडी दोष है जिसके चलते तुम्हारे लिये ये स्थिति बनती है । ठीक है यदि ऐसा भी है तो अब इसका उपाय क्या ? जब मैंने उनसे पूछा तो वे बोले- देखो भई सुशील यदि मैं इसका उपाय बताउंगा तो तुम्हें स्वर्ग-नर्क का संजीव कुमार लगने लगूंगा । जब मैंने कहा आप बताओ तो । तब वे मुझसे बोले तुम्हें मुझको 500/-रु. देना होंगे और यह पूछें बगैर की मैंने क्या उपाय किया वर्ना तुम्हारे पैसे व्यर्थ चले जाएँगे । 


         1980 का समय । सोने का मूल्य तब 600/- प्रति 10 ग्राम चला करता था । उनके कर्मकांड में उलझने की बजाय तब मैं पहली बार अपनी पत्नी के साथ एक लेडी डाक्टर से मिला । उन्होंने आवश्यक जांच करके पत्नी का छोटा सा DNC आपरेशन किया और अगले वर्ष पुत्र का गृहआगमन हो गया जिसका नामकरण मैंने सुशील व सुनीता को जोडकर सुनील रखा और पुत्रजन्म के उपलक्ष में पार्टी आयोजित कर उसके निमन्त्रण कार्ड छपवाकर सबसे पहला कार्ड उन्हीं गुरुजी को देने गया जो चैलेन्ज कर चुके थे कि संतान (विशेष रुप से पुत्र) पैदा करके दिखाओ तो जानें । कहने की आवश्यकता ही नहीं है कि उस समय मेरे सामने वह कार्ड पढते हुए उनकी प्रतिक्रिया कैसी रही होगी । 


        ठग सम्राट चार्ल्स शोभराज जो एक जमाने में वर्षों पुलिस व जनता को ठेंगा बताते हुए अपनी जालसाजी के कार्यक्रमों को निर्विघ्न अमली जामा पहनाता रहा । संयोगवश उसके कानूनी गिरफ्त में आने के बाद पुलिस के एक उच्च अधिकारी ने उससे दोस्ताना अंदाज में जब पूछा कि इतने बडे-बडे कारनामों को तुमने इतनी आसानी से इतने लम्बे समय तक कैसे चला लिया ? शोभराज उन अधिकारी से बोला बडी लम्बी गाथा है साहेब । गला पहले ही सूख रहा है, पानी ही नहीं सिगरेट भी पीने की इच्छा हो रही है । उन अधिकरी महोदय ने तत्काल अपने मातहत से पानी मंगवाते हुए शोभराज को पिलवाया और अपनी जैब से सिगरेट का पैकेट निकालकर शोभराज के हाथ में रख दिया । बडे ठाठ से सिगरेट सुलगाते हुए शोभराज ने उन अधिकारी महोदय के समक्ष अपने हुनर का राज बताया- जैसे मैंने आपसे सिगरेट मांगी और आपने स्वयं अपने हाथ से निकालकर मुझे दे दी बस ऐसे ही मैं लोगों से रुपये, जेवर व गाडियां मांग लेता हूँ और वे मुझे दे देते हैं । अब इसमें जालसाजी कहाँ से आ गई ।

          तो जनाब, समय कितना ही बदलता जावे टोपियां पहनाने वाले नये-नये फार्मुलों के साथ सामने आते रहे हैं और आते ही रहेंगे । उन टोपीयों के लिये नये सिर तलाशने में इन्हें कभी निराश भी नहीं होना पडता । दस के आगे चारा डालो एक-दो भी फंसे तो गाडी चलती रहे वाले फार्मुले पर ये मजे में जीवन गुजार लेते हैं और इसी लिये इन जैसों की ही इजाद की हुई ये कहावत हम लगातर सुनते रहते हैं कि जब तक बेवकूफ लोग जिन्दा हैं बुद्धिमान भूखे कैसे मर सकते हैं ?

        अब ये हमारे उपर है कि अपने सिर को कैसे सुरछित रखें । वर्ना तो अब समानता के इस युग में लडकियां भी इस हुनर को छोटे या बडे पैमाने पर काम में लाने में पीछे नहीं दिख रही हैं । स्कीन सुरक्षित रखने के नाम पर जैसी नकाब ये घारण करके घूमती हैं उस स्थिति में अपने पर्स में एक जोडी कपडे अतिरिक्त रखकर व मित्र के सहयोग से परिधान बदलकर उस नकाब के साथ अपने भाई व पिता से भी स्वयं को सुरक्षित बचाकर रखते हुए अपने पुरुष मित्रों के साथ निर्विघ्न घूमने फिरने की इनकी ये वर्तमान सुविधा भी इसी विधा के दायरे में आते दिख रही है ।


39 टिप्पणियाँ:

Vaanbhatt ने कहा…

इन्ही विधाओं में एक नाम जहरखुरानी का भी बढ़ गया है...इसकी टोपी वैसे भी उसके सर होती रहती है...

Deepak Saini ने कहा…

ye nakab wali baat bi khoob rahi

मनोज कुमार ने कहा…

सही कहा आपने। सतर्कता तो स्वयं बरतनी होगी।

: केवल राम : ने कहा…

हालत यूँ ही हैं दुनिया मतलब के लिए कुछ भी कर सकती है .....!

सतीश सक्सेना ने कहा…

बहुत आवश्यक पोस्ट है मगर लोग बिना स्वयं अनुभव किये समझेंगे नहीं ! शुभकामनायें आपको !!

सुज्ञ ने कहा…

कोई न कोई प्रलोभन ही उन्हें इस चालाकी में सफ़लता दिलाता है।

_____________________

निरामिष: अहिंसा का शुभारंभ आहार से, अहिंसक आहार शाकाहार से
सुज्ञ: ईश्वर हमारे काम नहीं करता…

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत रोचक और जागरूक करने वाली पोस्ट ....

राज भाटिय़ा ने कहा…

इस साई ने तो कितनो को ही टोपी पहना दी

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

अंतिम पंक्तियों में भरपूर पंच था...

Udan Tashtari ने कहा…

रोचक...कुछ तो लालच है जो टोपी पहनाने वाले पहना कर निकल लेते हैं.

Shah Nawaz ने कहा…

सही कहा... जब तक टोपी पहनने वाले इस दुनिया में हैं.. टोपियाँ पहनाने वाले यूँ ही टोपियाँ पहनते रहेंगे..... आपका संस्मरण भी खूब रहा...

Khushdeep Sehgal ने कहा…

टोपी पहनाने की कला...

कोई नीरा राडिया से सीखे...

जय हिंद...

ajit gupta ने कहा…

टोपी पहनाना एक कला है और यह हर आदमी के बस का नहीं। दुनिया में सभी तरह के लोग है इसलिए ही इसमें इतने रंग है। बस ध्‍यान रखिए कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

BAHUT KHOOB....

............
ब्लॉ ग समीक्षा की 12वीं कड़ी।
अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं का अपमान!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जब कोई बेवकूफ बनने को तैयार बैठा हो तो बनाने वाले भी मिल जाते हैं।

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (30.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

वन्दना ने कहा…

बेहद सशक्त और जागरुक करती पोस्ट्…।

kase kahun? ने कहा…

sahi hai jitani jalsaji ki ghatnaye aajkal indore me ho rahi hai vakai hairani hoti hai...logo ki laparvahi hi iske liye jimmedar hai ab dekhiye log bag me lakhon rupaye ya jevar rakhe hone ke bavjood bhi apne pan khane 'chai peene'raste se saman lene ko tal nahi sakte aur unka bag chori ho jata hai...chintan karne yogya bat...

Patali-The-Village ने कहा…

सही कहा आपने। सतर्कता तो स्वयं बरतनी होगी। धन्यवाद|

Suman ने कहा…

badhiya post vakai..........

Minakshi Pant ने कहा…

टोपी पहनाना भी एक कला ही है उसके लिए भी काफी मुश्कत करनी पड़ती होगी तो हमे खुद ही सतर्कता बरतनी होगी | जागरूक करती पोस्ट |
शुक्रिया |

Dr Varsha Singh ने कहा…

टोपी पहनाने की कला...
बहुत दिलचस्प ....

वाणी गीत ने कहा…

लालच में अंधे लोग विवेक शून्य हो जाते हैं ...
टोपी पहनाने वालों को ऐसे ही लोगों की जरुरत होती है ...
अच्छी पोस्ट!

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

दोस्तों, क्या सबसे बकवास पोस्ट पर टिप्पणी करोंगे. मत करना,वरना.........
भारत देश के किसी थाने में आपके खिलाफ फर्जी देशद्रोह या किसी अन्य धारा के तहत केस दर्ज हो जायेगा. क्या कहा आपको डर नहीं लगता? फिर दिखाओ सब अपनी-अपनी हिम्मत का नमूना और यह रहा उसका लिंक प्यार करने वाले जीते हैं शान से, मरते हैं शान से (http://sach-ka-saamana.blogspot.com/2011/04/blog-post_29.html )

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

जागरूक करने वाला बढ़िया लेख ...

स्वयं सतर्क रहना बहुत जरूरी है |

Roshi ने कहा…

topi pehnane ki kala ka bahut hi sunder tareke se aapne chitran kiya hai

Apanatva ने कहा…

bahut badiya post jee......
jhansaa dene aur khane walo kee kamee nahee.......
satarkta jarooree hai jee .
sarthak post
aap to Indore ke hai mere jeejajee Dr J K Bakliwal jee ko bhee jante honge avashy ?

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

टोपी पहनाने की कला बताते-बताते आपने अंत में अपनी शंका भी बता दिया।
..अच्छी लगी पोस्ट।

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

Apnatvaji (अपनत्वजी)

आपके जीजाजी डा. जे. के. बाकलीवाल मेरे सगे बडे भाई हैं और इसी पोस्ट में मुझसे सम्बन्धित संस्मरण में डा. भाई सा. के रुप में उन्हीं का उल्लेख मेरे द्वारा किया गया है । अब आप कृपया अपना विस्तृत परिचय दें । धन्यवाद...

Apanatva ने कहा…

namaskarjee. kusum jeejee meree badee bhooaajee (banddkuee) kee bitiya hai aur mai sarita unke bade mamajee kee bitiya.......duniya bahut chotee hai jee.

Arunesh c dave ने कहा…

समय खराब हो तो आदमी मामूली से झांसे मे भी आ जाता है

mahendra verma ने कहा…

टोपी पहनाने वालों से सावधान रहना होगा।
जागरूक करती प्रस्तुति।

veerubhai ने कहा…

mere ek nazdiki sambndhi ye kaam baa -khoobee kar rhen hain ,apno pe bhi haath saaf karten hain ye zanaab .chaandi koot rahen hain ,aur main taa -umr andhvishvaashon se jhujhtaa inki vigyaan sammat kaat pe utraa zaroor hoon lekin jeet unki hi hoti rhi hai kyonki be -vakoofi jyaadaa bikti hai .
veerubhai ."topi pahnaanaa ek kalaa hai "

Vivek Jain ने कहा…

सावधानी जरूरी है!
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

दर्शन कौर धनोए ने कहा…

Aek jagruk post !par jab tak svnm par n ho koi dhyan nhi deta .

सदा ने कहा…

बेहद सशक्‍त एवं सार्थक प्रस्‍तुति ।

कविता रावत ने कहा…

टोपी पहनाने वालों से सतर्क रहने में ही भलाई है ...
बहुत बढ़िया जागरूकता भरी पोस्ट के लिए धन्यवाद

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

बहुत ही उपयोगी और हममें चेतना जगाता आलेख|

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

Ek chetawani dene wali post. Abhar aapka is samyik post ke liye.

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आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं के लिये धन्यवाद...

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