3.4.11

धोनी के धुरंधरों ने आखिर इतिहास रच ही दिया...!



दे घुमाके...



सिर्फ 4 दिनों में दो बार दीपावली का उत्साह... 
       


   

सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी...


                  





        इस दुर्लभ विजय के साथ ही टीम के सभी खिलाडियों ने रिटायरमेंट के पूर्व सचिन तेन्दुलकर को इस वर्ल्डकप की जीत का अभूतपूर्व तोहफा भी दे दिया और समस्त देशवासियों की हजारों-हजार मन्नतों के साथ ही सुश्री लता मंगेशकर का आज का उपवास भी सार्थक हो गया ।              
 एक बार फिर क्रिकेट इतिहास में 1983 के कपिलदेव के साथ ही 2011 के महेन्द्रसिंह धोनी का नाम भी दर्ज हो गया ।

बधाई सभी देशवासियों को...
धन्यवाद  टीम इंडिया को... 
                                           

1.4.11

भ्रष्टाचार की जड

 
       आज के दौर में बहुसंख्यक लोग येन-केन-प्रकारेण पैसे के पीछे एक ही प्रकार की अन्धी दौड में दौडे चले जा रहे है । जेब भर जावे तो तिजोरी भरना है, तिजोरी भर जावे तो बैंक में भर देना है, और बैंक में आयकर के चपेटे में आ जाने का अंदेशा बनने लगे तो फिर स्विस बैंक तो है ही । इनकी एक ही सोच, एक ही जीवन दर्शन दिखता है-
       
ऐसा हो, वैसा हो, फिर चाहे जैसा हो, पर हाथ में पैसा हो.

          जबकि खाना यही रोटी है जो पेट भरने के बाद उस वक्त तो किसी काम की नहीं बचतीपहनना यही एक जोडी कपडे हैं जो अल्मारीयों में भले ही सैकडों जोडे भर लिये जावें किन्तु एक बार में एक से अधिक किसी काम नहीं आते, घूमने के लिये एक वाहन भी बहुत होता है, फिर चाहे वाहनों के जखीरे ही क्यों ना खडे कर दिये जावें, और रहना  भी एक ही घर में है फिर चाहे हर कालोनी, हर शहर में अपने अनेकों घर क्यों न बना लिये जावें ।

          मेरी इस बात का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि यदि आप अपनी योग्यता के बल पर ये पैसा कमा रहे हैं तो इसे न कमावें । बल्कि ये है कि जब हमारा कल सुरक्षित लगने लगे तो कम से कम इस पैसे को जोडने की होड में किसी भी प्रकार के भ्रष्ट तरीके अपनाने की दौड में शामिल न रहें ।

          मैंरे तो अपने अभी तक के जीवन में अधिकांश उदाहरण ऐसे ही देखने में आए हैं कि यदि पिता ने अपनी योग्यता, प्रतिभा या किस्मत के बल पर धन के अंबार जमा कर दिये तो उनके पुत्रों ने फिर अपने जीवन में उस धन को उजाड तो दिया किन्तु अपनी प्रतिभा का विकास कर स्वयं उस धन को कमा पाने की कभी जहमत नहीं उठा पाये । चाहे फिल्म जगत में हम देखें, राजनीति के क्षेत्र में देखें या फिर किसी भी और क्षेत्र में देखलें । कहीं किस्मत के बल पर अपवाद देखने में भले ही आ जावे किन्तु अधिकांश उदाहरणों में तो यही देखने में आता रहा है ।
         पैसा तो अपने पूर्वज भी कमाते थे और बडे-बडे सेठ साहूकारों में उनके नाम भी गिने जाते थे, किन्तु उनमें बेईमानी के द्वारा पैसे जोडने की आदत बिरले ही कहीं देखने में आती थी , बल्कि समाज से कमाये गये उस पैसे को प्रायः प्याऊ, धर्मशाला व मन्दिर जैसे रुप में इस्तेमाल कर उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा समाज के उपयोग के लिये ही छोड भी जाते थे जबकि आज मैं और मेरे बाद से आगे की सोच देखने में आती ही नहीं है और हम सभी और अभी, और अभी की होड में इस पैसे को जोडते चले जाने की दिशा में न दिन का चैन देख रहे हैं और ना ही रात का आराम । पहले स्वास्थ्य को खर्च करके धन बचा रहे हैं और फिर उस धन को डाक्टरों व अस्पतालों में खर्च करके स्वास्थ्य बचाने का प्रयास कर रहे हैं । कहाँ ले जा रही है यह अन्धी दौड इस मानव समाज को ? जबकि हम लगातार यह सुनते चले आ रहे हैं कि  
         पूत कपूत तो क्यों धन संचय और पूत सपूत तो क्यों धन संचय.

        क्या हमारे पुरखों का ये जीवन दर्शन सही नहीं था कि-
        सांई इतना दीजिये जामे कुटुंब समाय, मैं भी भूखो ना रहूँ साधु न भूखो जाय.




          निवेदन-   
यह पोस्ट  जिन्दगी के रंग ब्लाग में 
 21-1-2011 को प्रकाशित हो चुकी है और छोटा 
 प्लेटफार्म होने के बावजूद तब से अब तक इस पोस्ट में 
 दिखी जनरुचि में यह चिन्तन चल ही रहा था कि इसे 
इस नजरिया ब्लाग के थोडे बडे प्लेटफार्म पर लाया जावे तभी आज अचानक हमारे चिर-परिचित श्री 
 अजय कुमार झा जी की एक पोस्ट से ये जानने में आया कि 
मेरी ये ही पोस्ट दि. 31-3-2011 के दैनिक जागरण 
 के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित की गई है और इसे 
जिन्दगी के रंग के रेफरेन्स से प्रकाशित करने के 
 बजाय इस नजरिया ब्लाग के रेफरेन्स से ही प्रकाशित 
 किया है तो मुझे लगा कि ये अधिक सही समय हो 
 सकता है जब ये लोकप्रिय पोस्ट  इस ब्लाग पर आपके 
सामने आवे । अतः जिन्दगी के रंग ब्लाग पर कुछ 
पाठक मित्रों द्वारा यह पूर्व पढी हुई लग सकती है । ऐसे 
सभी मित्रों से असुविधा के लिये अग्रिम क्षमा सहित...


29.3.11

तरुणाई की ये राह...?


          चार दोस्त ! सभी 20 से 22 वर्ष की मध्य उम्र के, एक के पिता बडे प्रापर्टी ब्रोकर, एक के कारोबारी और शेष दो के माता-पिता का प्रदेश की राजनीति में पक्ष और विपक्ष  से जीवन्त जुडाव । कुल मिलाकर सभी के पेरेन्ट्स नाम व नावां कमाने की धुन में मगन । बच्चे क्या कर रहे हैं जैसे इन्हें कोई लेना देना ही नहीं । एक के पिता ने अपने बेटे को होस्टल व एटीएम की सुविधा दिलवाकर इन्दौर में पढने के लिये भेज दिया । इसी के होस्टल के कमरे में इनमें से ही एक और दोस्त साथ में रहने लगा । शराब के दौर साथ में चलने के साथ दोनों का रोमान्स भी एक ही लडकी से हो गया । लडकी भी शायद दोनों को बराबरी से चारा डालती रही । ऐसी ही एक नशीली सी सीटिंग में जहाँ एक मित्र अपने किसी और मित्र के साथ होस्टल के इसी कमरे में बैठकर नशे की मदहोशी में उस लडकी के बारे में बात कर रहा था तो वह दोस्त जो वास्तव में उस कमरे का मालिक भी था उसने अपने इस दोस्त को उसके दोस्त के साथ कमरे से बाहर निकाल दिया ।

          अपमान की ज्वाला के साथ ही अपने पैरेन्ट्स के पैसे व पावर का रौब । अपमानित मित्र ने अपने उपरोक्त दोस्तों की मदद से उस पहले मित्र को अगले दो एक दिन में रात्रि 10 बजे काफी पिलवाने के बहाने बुलवाया और इन्हीं दोनों दोस्तों के साथ उसे अगवा कर उसके घर वालों से 5 लाख रु. की फिरौति की मांग कर राजस्थान के किसी सीमावर्ती गांव में पहले सिर पर घातक प्रहार व फिर गले में तार कसकर उस चौथे मित्र की हत्या कर देने के बाद उसकी पहचान छुपाने की नियत से किसी निर्जन खेत के गड्ढे में पहले पत्थरों से उसका चेहरा कुचलकर व उसके शव को टायरों पर लिटाकर उपर से पेट्रोल छिडककर उसे जला भी दिया । आरोपियों को देर-सवेर पकड में आना ही था । इस दरम्यान इनके गिरफ्त में आने तक पुलिस ने इनके पेरेन्ट्स को अपनी कस्टडी में रखा । जिससे इन्हें मुक्ति अपने इन नौनिहालों के पुलिस गिरफ्त में आने के बाद ही मिल सकी । अन्दर की खबर ये भी रही कि इस घटनाक्रम के समय सभी दोस्तों ने 13-13 पैग ड्रिंक ले रखी थी ।

       इधर रात्रि में अलग-अलग क्षेत्र में नागरिक जब सोकर उठें तो पावें कि उस पूरे मौहल्ले में सडक पर खडी सारी कारों के कांच उपद्रवी तत्व तोडकर भाग गये ।

          
रास्ते चलते राहगीर से रात के निर्जन प्रहर में रोककर नशे के लिये पैसे मांगे और मना करने पर चाकू के घातक वारों से उस निरपराध नागरिक की बेरहमी से वहीं हत्या कर दी ।

         
जलती होली में दुश्मनी निकालने के लिये नशे की झोंक में किसी की पूरी मोटरसायकल ही उठाकर होली के सुपुर्द कर दी । और

        
दुकान के शटर पर लघुशंका से रोकने के जुर्म में चाकू मार-मारकर दुकान मालिक की इहलीला वहीं समाप्त कर दी ।

         ये और ताजे उदाहरण हैं जो अभी-अभी घटित अपराधों के रुप में सामने आ रहे हैं । यहाँ भी इनमें से अधिकांश के आरोपी पुलिस की गिरफ्त में  हैं। सभी औसतन 25 वर्ष से कम उम्र के हैं और अधिकांश ने वारदात के समय नाईट्रावेट या इस जैसी ही किसी भयंकर मादक गोलियों का सेवन किया हुआ था और उस मादक गोली के तीव्रतम नशे के दौर में ही इन घटनाओं ने जन्म लिया ।
       
           और अब आखिर में नगर के एक धनाढ्य व्यवसायी के 18-19 वर्षीय पुत्र का इसके दो घनिष्ठ मित्रों ने अपहरण कर लेने के बाद एक ओर जहाँ अगले ही घंटे उसकी हत्या कर दी वहीं अगले दो दिनों तक उसके पैरेन्ट्स से लाख रु. और हथिया लेने की जुगत में भी लगे रहे । यहाँ भी अन्दर की खबर ये सुनी गई कि घटनाक्रम की जड में  ऐसा कोई प्रेम-प्रसंग ही रहा है जो मृतक मित्र को पसन्द नहीं था और इसीलिये इस घटना में भी दोस्ती की कीमत भरोसे में जान देकर चुकानी पडी ।
  
          इन सभी उदाहरणों में अलग-अलग क्षेत्रों के अलग-अलग पात्र नजर आ रहे हैं किन्तु इन सबमें एक बात जो कामन दिख रही है वह है इस उम्रवर्ग के ही आरोपियों की इन अपराधों में संलिप्तता । और दूसरी कामन बात जो इन सभी घटनाओं में दिख रही है वह है इन बच्चों के पैरेन्ट्स द्वारा अपने बच्चों को साधन-सुविधाएँ और पैसों की अनवरत पूर्ति करते रहने के बावजूद ये बच्चे क्या कर रहे हैं ? इनके मित्र वर्ग में किस-किस तरह के दोस्त जुड रहे हैं ? और घर पर होने की स्थिति में उस बच्चे के व्यवहार में क्या असमानता लग रही है ? इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर इनके माता-पिता अपनी जिम्मेदारी के प्रति उदासीन ही लगे हैं ।
  
          सभी घटनाओं में नशा प्रमुख रुप से शामिल रहा है । शराब का नशा,  मादक प्रतिबन्धित गोलियों का नशा और शीशा पार्लर का नशा । फिर विपरीत सेक्स से जुडाव के साथ ही अत्युत्तम क्वालिटी के वाहन व मोबाईल के शौक की सामान्य चाहत और इन सबमें लगने वाला बेहिसाब खर्च । ये बच्चे अपने ही दोस्तों को, अपने माता-पिता को, अपने दादा-दादी को अपना आसान शिकार बनाकर इस अनाप-शनाप खर्चे को जुटाने की राह पर चल रहे हैं । 
              
           एक और कारण जिसका उल्लेख ये माता-पिता अब मजबूरी में करते दिख रहे हैं वो है इन बच्चों के द्वारा माता-पिता को इस धमकी के दबाव में रखना कि मेरे दोस्तों के बारे में यदि कुछ कहा तो घर छोडकर चला जाऊँगा । बच्चे वैसे ही इकलौते से रह गये हैं, यदि बच्चा भावावेश में घर छोडकर चला जावे, या किसी तरीके से अपनी जान ही दे दे तो ? इससे बेहतर है जो जैसा चल रहा है चलता रहने दो की उनकी भावना । लेकिन चलता रहने दो की ये समझौतावादी प्रवृत्ति भी आखिर इन्हीं बच्चों के लिये कहाँ तक उपयोगी साबित हो पाई ? शायद आगे चलकर ये माता पिता जोड-जुगाड लगवाकर अपने इन बच्चों को कानून के शिकंजे से मुक्त भी करवा लेंगे । लेकिन...
  
           क्या यहाँ ये आवश्यक नहीं लगता कि माता-पिता अपनी तरुणवय संतानों की समस्त गतिविधियों पर अनिवार्य रुप से पैनी नजर रखें । उसके खर्चों को कभी भी अनियंत्रित दायरे में न जाने दे और यदि बच्चा ऐसे समय किसी भी किस्म की धौंस या धमकी अपनी बात मनवाने के लिये माता-पिता को देता दिखे तो उस समय हथियार डाल देने की बजाय बच्चे के उस बदले रवैये का सख्ती से सामना करें ।
  
        
अब भी तो इनमें से अधिकांश बच्चे अनिश्चित समय के लिये घर से दूर होकर कानून की गिरफ्त में फँस गये हैं । क्या अन्तर पड जाता यदि बच्चा धमकी देकर घर छोड जाता । बल्कि उस स्थिति में उसे स्वयं के जिन्दा रहने के साधन जुटाना सीखना भी आ सकता था जो उसके भावी जीवन में उपयोगी होता । अभी तो ये बच्चे अपने माँ-बाप को पुलिस कस्टडी में रखवाने के जिम्मेदार भी बने हुए हैं । 

          और अब तो ये सभी बच्चे पैसों की कितनी भी बडी इकाई को बिना कमाये ही इस्तेमाल करने की मानसिकता से भी जुड गये हैं, और छोटी या बडी कैसी भी सजा के दौर में कानून की गिरफ्त में फंसे और भी बडे-बडे उस्तादों से होने वाली इनकी दोस्ती  जो इन्हें जीवन में आसान रास्ते तलाशने के नये-नये ज्ञान अब बिना मांगे ही उपलब्ध करवा देंगी । इन स्थितियों में रहते  वर्षों बाद कानून की गिरफ्त से छूटने वाले ये इकलौते से बच्चे अपनी आगे की जिन्दगी कैसे गुजारेंगे यह सोच सामाजिक रुप से पर्याप्त चिंतन मांगता दिख रहा है ।

(सभी चित्र गूगल सौजन्य से)    

26.3.11

क्या ठीक है ये सोच - मुझसे नहीं होगा...!

          हममें से बहुतों के सोचने के तरीके में किसी भी नये काम के सामने आने पर अक्सर एक नकारात्मक प्रवृत्ति सामने आ जाती है और वो होती है काम सामने आते ही हथियार डाल देने की प्रवृत्ति- मुझसे नहीं होगा । जब भी कोई थोडा भी कठिन दिखाई देने वाला कोई कार्य हमारे सामने आता है तो प्रायः हमारा दिमाग उसकी पूर्ति की राह में कितनी-कितनी रुकावटें कैसे-कैसे सामने आ सकती हैं, उसे पहले ही सोचकर तत्काल इस नतीजे पर पहुँच जाता है कि ये काम तो मुझसे नहीं होगा और जब ये नकारात्मकता शुरु से ही हमारे दिमाग में घर बनाने लगे और फिर भी किसी भी कारण से यदि उसी कार्य को हमें करना भी पडे तो आधी-अधूरी चाह के साथ किये जाने वाले ऐसे किसी भी कार्य़ के परिणामों का भी नकारात्मक ही मिल पाना पहले से ही तय हो जाता है । हमारे मस्तिष्क के अचेतन से मिलने वाले ये नकारात्मक संकेत अपना असर ऐसे ही दिखाते हैं जैसे साइकल चलाना सीखने के दौर में प्रायः घबराहट में हमारा दिमाग ये सोचने लगे कि अरे सामने ये खंभा या ये झाड आ गया और मैं इससे टकरा न जाऊं, मैं इससे टकरा न जाऊं, और फिर देखते ही देखते अंततः हम उससे टकरा कर गिर भी जाते हैं ।


  हममें से कोई भी व्यक्ति किसी भी कार्य़ में पूर्ण पारंगत तो शायद कभी भी नहीं होता है और नवीनता के दौर में तो हर कोई अपनी अज्ञानता या अल्पज्ञानता के कारण वैसे ही असमंजस वाली मनोदशा से भरा होता है किन्तु हमारी ये अल्पज्ञ सी सीमित समझ घोर अन्धकार में जंगल में चलते हुए हमारे हाथ के उस कंडील के समान तो होती ही है जिसकी रोशनी पांच कदम से अधिक दूर नहीं जा पाती । अब यदि हम ये सोचकर रुक जावें कि मेरी क्षमता तो पांच कदम की ही है और रास्ता जो मुझे तय करना है वह पांच कोस तक भी पूरा होने वाला नहीं है इसलिये मेरा इस राह पर जाना संभव नहीं लगता तो सोचिये कि क्या हमारा यह निर्णय सही होगा ? ये सही है कि हमारी जानकारी का दायरा पांच कदम का ही है लेकिन ये पांच कदम आगे तक की जानकारी तो हमें लगातार हमारे कितना भी आगे चले जाने तक भी हमारे हर बढे कदम के साथ कंडील की उस रोशनी की तरह हमसे आगे चलती ही रहती है, तो फिर हमें अपने सीमित ज्ञान या साधनों से डरकर पहले से ही हार मान लेने का विचार या सोच कितना सही या गलत हो सकता है इसका निर्णय हमें अपने मन में नये सिरे से करने की आवश्यकता उस नकारात्मकता की स्थिति में समझना चाहिये ।
              
        हम कभी भी किसी खाली बोरी को खडा नहीं कर सकतेयदि बोरी को खडा करना है तो पहले उसे सामान से भरना ही होगा । ऐसे ही हमें अपने नकारात्मकताओं के खालीपन से स्वयं को बचाये रखने के लिये आत्मविश्वास के विचारों से स्वयं को भरकर रखना भी आवश्यक होता है । नकारात्मकता निःसंदेह सुखद लगती है क्योंकि वो हमें आरामप्रद स्थिति में रखते दिखती है और हमारा मन भी प्रायः उस आरामप्रदता को ही अधिक पसन्द करता है तभी तो दौडने वाले लोग चलने वालों से हमेशा कम ही दिखते हैं, और चलने वाले लोग भी बैठने वालों से कम ही देखने में आते हैं । किन्तु जो आराम या सुख हमें अपने निष्क्रिय बैठे रहने से हासिल होता है उसे हम काम किये बगैर कब तक हासिल कर सकते हैं, और निष्क्रिय अवस्था में बैठे रहकर भी हम कब तक संतुष्ट रह सकते हैं ? तो जब हर तरह से हमारा काम में लगे रहना आवश्यक है ही तो फिर हम किसी भी काम को मजबूरी में ही करना क्यों स्वीकार करें ? क्यों न किसी भी नये कार्य के सामने आते ही हम तत्काल ये सोचते हुए कि इससे हमें क्या-क्या लाभ हो सकते हैं और इसे कर लेने का सर्वश्रेष्ठ तरीका कौनसा हो सकता है ये मन्थन करते हुए हम उस काम को एक चुनौति के समान स्वीकार करते हुए उसमें भी अपने श्रेष्ठतम परिणाम लाकर अपने आप को क्यों न दिखावें ।
       
       हर महत्वपूर्ण कार्य के दौरान प्रायः हमारा वास्ता दो किस्म के व्यक्तियों से पडता है- पहले वो जो हमारे शुभचिन्तक होने के कारण हमें यह समझाने की कोशिश कर रहे होते हैं कि कहाँ आप अपने को इस बेकार के झमेले में डाल रहे हो, भगवान की दया से सब कुछ तो व्यवस्थित चल रहा है (दूसरे शब्दों में रोटी तो मिल ही रही है)और दूसरे वो जो आपको ये समझाने की कोशिश कर रहे होते हैं कि जो कुछ भी आप करने की सोच रहे हो उसे कर पाना कोई खालाजी का खेल नहीं है, आपके पहले ही इसमें न जाने कितने लोग असफल हो चुके हैं । वास्तव में ये दूसरे किस्म के लोग ही वे होते हैं जो आपके लक्ष्य से हटते ही आपके प्रति ये कहना भी चालू कर देते हैं कि देखलो एक और सीधा-सादा काम इनसे नहीं हो पाया, याने यदि आप काम करने की धुन के साथ चलते रहें तो गिनाने में वो काम कठिन और काम का ध्यान हटा दें तो फिर वही काम सामान्य । अतः प्रत्येक स्थिति में आप अपना निर्णय स्वयं लें और समझदारी का तकाजा तो ये है कि जो काम हमें अधिक कठिन लगे उस काम को हम चैलेन्ज मानकर सबसे पहले करने का न सिर्फ ईमानदार प्रयास करें बल्कि उसमें सफलता प्राप्त करके ही अपने आप को दिखावें । 

        हमें हमेशा यह याद रखने की आवश्यकता है कि आसान काम तो सभी लोग अपने-अपने स्तर पर कर ही रहे हैं, किन्तु जीवन में उपलब्धियां हमेशा उनकी ही मायने रखती दिखती हैं जो आसान या सामान्य से हटकर कठिन दिखाई देने वाले कामों में भी पूरे मनोयोग से जुटे रहकर तब तक चैन नहीं लेते जब तक सफलता आगे बढकर उनका अभिनंदन नहीं कर लेती । ऐसे किसी भी कठिन लगने वाले कार्य में सफलता को हासिल कर सकने का एक ही मूलमंत्र है जिसे हम निरन्तरता के सिद्धान्त का नाम भी दे सकते हैं और अपनी सामर्थ्य के मुताबिक निरन्तरता के चमत्कारिक परिणाम देखने के लिये इस लिंक पर प्रस्तुत लघुकथा के चमत्कारिक परिणामों को अपने मस्तिष्क में बैठाकर बडे से बडे और कठिन से कठिन कार्य भी हम इस मूलमंत्र के द्वारा सम्पादित कर अपने अपनों को दिखा सकते हैं कि-

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों, कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं हो सकता.

21.3.11

पहले शुक्रिया... फिर शिकायत...!



        होली के पूर्व दो महत्वपूर्ण अवसर लगातार ऐसे सामने आ गये जिन्हें आपके समक्ष लाने के प्रयास में दोनों दिन एक-एक जानकारीसूचक पोस्ट तैयार हो गई । शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ उन सभी मित्रों का जिन्होंने इस अवसर पर मुझे अपनी हार्दिक बधाईयों के साथ ही शुभकामनाएँ प्रदान कीं । पहला विशेष अवसर था इस नजरिया ब्लाग का सिर्फ 110 दिनों की यात्रा में 200 फालोअर्स की संख्या पार कर देने का जिसकी सूचनार्थ पोस्ट ब्लागराग : क्या मैं खुश हो सकता हूँ ? पर निम्न ब्लागर साथियों ने अपनी दिली शुभकामनाएँ व्यक्त कीं- 
       

आप सभी शुभचिंतक साथियों को बहुत-बहुत धन्यवाद. 
और श्री सत्यम शिवम जी को इसे चर्चामंच पर स्थान देने हेतु विशेष धन्यवाद...



साथ ही मेरी ये शिकायत भी-

         सबसे पहले ई-मेल सेक्शन में...

        1.  कुछ ब्लागर बंधु अपनी नई पोस्ट की जानकारी ई-मेल से ऐसे भेजते हैं जिनमें उपर 150-200 ई-मेल ID और नीचे भी 100-150 ई-मेल ID भरे होते हैं दिन भर में 10-12 ऐसे ई-मेल मुझे रोजाना प्राप्त होते हैं, और यह सम्भव नहीं हो सकता कि आप इन पोस्ट को पढें ही, इनमें से 10-15% पाठक भी वास्तव में इनकी पोस्ट तक पहुँच पाते हों ऐसा मैं नहीं समझता । अलबत्ता जिन प्राप्तकर्ताओं को भी ये ई-मेल पहुँचते हैं उन्हें इनको लगातार डीलिट करते रहने का एक काम और बढता जाता है । तो प्लीज आप मेहरबानी करके ऐसे कोई भी थोक ई-मेल ID वाले मेल भेजकर दूसरों का काम न बढावें ।


            2.  ई-मेल से ही सम्बन्धित दूसरी शिकायत उन जानकारों से भी जो अपनी पोस्ट या अन्य कोई जानकारी ई-मेल से भेजते तो हैं, लेकिन उनका ई-मेल इतनी पेचीदगियों से भरा होता है कि आप अपना नाम, ई-मेल ID, अपना जन्म दिनांक व अन्य सम्बन्धित जानकारी बार-बार फीड करते रहो फिर भी उनकी मेल तक पहुँच पाना आसान नहीं होता, और ऐसे में जब इन्हें अपने मेल का प्रत्युत्तर नहीं मिल पाता तो इनकी नाराजी भी स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है । ऐसे सभी ई-मेल भेजने वाले ब्लागर साथियों से भी मेरा यह विनम्र अनुरोध है कि यदि आपका ई-मेल आसानी से खुलने वाला नहीं है तो कृपया ऐसे मेल न भेजें । उसकी बनिस्बत अपने ई-मेल आप तभी भेजें जब आप आश्वस्त हों कि बिना किसी अतिरिक्त लिखा-पढी के आपका मेल संदेश प्राप्तकर्त्ता पढ भी सकते हैं और चाहें तो अपना उत्तर भी दे सकते हैं ।
   
 और अब समस्या फेसबुक से-
          
         कुछ ब्लागर साथी अपनी पोस्ट या रचना या चित्रावली जिसे वे  अपने स्वयं की वाल पर पोस्ट करके भी अपने पाठकों को दिखा सकते हैं वे उसके लिये मेरी  वाल प्रोफाईल का प्रयोग न जाने क्यूं करते हैं ? हालांकि इससे मुझे विशेष कुछ परेशानी न है और न ही होना चाहिये, किन्तु समस्या यहाँ भी वही बनती है कि उन मित्रों की उस पोस्ट या चित्र या जो कुछ भी वे मेरे वाल से प्रसारित करते हैं उस पर समूचे फेसबुक जगत से जितनी भी प्रतिक्रियाएँ आती हैं वो सब मेरे ई-मेल खाते पर जमा होती जाती हैं और उन सभी ई-मेल को डीलिट करते रहने का एक अनावश्यक कार्य मेरे लिये निरन्तर पैदा होता रहता है । यहाँ मैं किसी का भी नाम नहीं लूंगा, लेकिन ये चाहूँगा कि वे दो-चार मित्र जो अपनी पोस्ट, रचना, चित्र आदि मेरे वाल से फेसबुक के साथियों को दिखा रहे हैं वे जब तक मेरा उससे कोई सीधा सम्बन्ध ना हो तब तक वे अपनी उस प्रस्तुति को अपने ही वाल से पोस्ट करें । निश्चय ही तब भी वो मुझ सहित सभी पाठकों तक पहुँच सकेगी और मेरे लिये अनावश्यक ई-मेल डीलिट करने का व्यर्थ कार्य नहीं उपजेगा ।    

           मैं उम्मीद करता हूँ कि जिन तीन श्रेणियों की शिकायतें मैं यहाँ आप सभीको दिखा रहा हूँ उनसे यदि आपका भी कोई जुडाव रहा हो तो आप मेरी समस्या को समझते हुए इस पर ध्यान देंगे और भविष्य में मुझे ही नहीं किसी भी अन्य ब्लागर साथियों को इस प्रकार अनावश्यक धर्मसंकट में डालकर शिकायतों का मौका न देंगे ।

                                                   पुनः आप सभी को अनेकानेक धन्यवाद सहित...


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