26.10.19

स्वहित में बुरे विचारों से बचें...


              बाबु मोशाय... कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी आदमी ने हमारा कोई भला नहीं किया लेकिन वो हमें अच्छा लगता है । हाँ...  और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी आदमी ने हमारा कोई बुरा नहीं किया, लेकिन वो हमें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता । जी हाँ ! आप इस संवाद को अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना की अपने समय की सुपर हिट फिल्म "आनन्द"  में देख व सुन चुके होंगे ।
 
            लेकिन वास्तविक जीवन में इसके कई बार तत्काल सकारात्मक या नकारात्मक परिणाम सामने आ जाते हैे । पिछले दिनों मेरा एक मित्र स्कूटर पर अपनी किसी धुन में जा रहा था । सामने से आने वाले वाहन चालक के हाॅर्न बजाते हुए बचते-बचते भी हल्की टक्कर हो ही गई । यद्यपि सामने वाले वाहन चालक की कोई गल्ति नहीं थी, लेकिन उसके प्रति बेहद रोष दिमाग में भरकर मेरा मित्र वहाँ से निकला और उसी आक्रोशित अवस्था में और भी बडा एक्सीडेंट करवाकर अपने हाथ-पांव व वाहन को क्षतिग्रस्त स्थिति में लेकर ही घर पहुँच पाया ।

        यह विज्युलाईजेशन (टेलीपैथी) इतना सटीक काम करती है कि तत्काल वो ही नकारात्मकता सामने वाले के मन-मस्तिष्क तक पहुँच जाती है जो हमारे मन में उसके प्रति होती है ।

         एक चिर-परिचित कथा के मुताबिक जब एक वृद्धा सर पे पोटली रखें गांव से नजदीक के शहर आ रही थी तो उधर से गुजरने वाले घुडसवार से बोली- भैया, ये पोटली लेकर पास ही शहर के मुहाने पर उस गुमटी-ठेले तक छोड दो । सवार ने पहले उस गरीब सी लगने वाली वृद्धा को व फिर उसकी मैली सी पोटली को देखा और तिरस्कृत नजरों से उसे देखते हुए आगे निकल गया ।

         कुछ दूर जाकर उस घुडसवार ने सोचा कि न जाने उस पोटली में क्या कुछ कीमती सामान रहा होगा, यदि मैं उसकी पोटली लेकर भाग जाता तो कोई मेरा क्या कर लेता । यह सोचते हुए उसने तत्काल अपना घोडा मोडा और उस वृद्धा तक पहुँचकर उससे बोला- ला माई, तेरी पोटली पहुँचा दूँ । तब उस वृद्धा ने कहा-  भैया रहने दो, अपनी पोटली मैं खुद ही ले आऊंगी । क्यों माई ? अभी तो तुम कह रही थी कि मैं ये पोटली तुम्हारे ठिकाने तक पहुँचा दूँ, तब वृद्धा बोली हाँ भैया- लेकिन उसके बाद जिसने तुम्हें कुछ कहा, उसी ने मुझसे भी कुछ कह दिया । इसलिये मेरी पोटली तो मैं ही ले जाऊँगी । ऐसे काम करती है ये टेलीपैथी ।

       जब विचारों में किसी के प्रति भी व किसी भी कारण से यह नकारात्मकता आती है तो ये हमारा ऐसा मानसिक कर्म हो जाता है जिसके किये बगैर ही उसके दूरगामी दुष्परिणाम हम पर आ जाते हैं ।

      एक राजा ब्राह्मणों को महल के आँगन में लंगर में भोजन करा रहा था । रसोईया भी खुले आँगन में भोजन पका रहा था । उसी समय एक चील अपने पंजे में एक जिंदा साँप को लेकर महल के उपर से गुजरी । चील के पँजों में दबे साँप ने आत्म-रक्षा में अपने फन से ज़हर निकाला और नीचे ब्राह्मणों के लिए पक रहे लंगर के उस भोजन में साँप के मुख से निकली जहर की कुछ बूँदें गिर गई । किसी को कुछ पता नहीं चला, लेकिन वह ब्राह्मण जो भोजन करने आये थे उन सब की जहरीला खाना खाते ही मृत्यु हो गई । जब राजा को सारे ब्राह्मणों की मृत्यु का पता चला तो अनजाने ही ब्रह्म-हत्या का अपराध हो जाने से उसे बहुत दुःख हुआ ।
 
       इस स्थिति में यमराज के लिए भी यह फैसला लेना कठिन हो गया कि इस पाप-कर्म का फल किसके खाते में जायेगा ? राजा- जिसको पता ही नहीं था कि खाना जहरीला हो गया है, या रसोईया- जिसे भी ये मालूम ही नहीं पडा कि खाना बनाते समय ही जहरीला हो गया है या वह चील जो जहरीला साँप लिए राजा के महल से गुजरी या फिर वह साँप जिसने अपनी आत्म-रक्षा में ज़हर निकाला ।
  
         बहुत दिनों तक यह मामला यमराज की अदालत में पेंडिंग रहा ।. कुछ समय बाद कुछ अन्य ब्राह्मण राजा से मिलने उस राज्य मे आए और उन्होंने एक महिला से महल का रास्ता पूछा । उस महिला ने महल का रास्ता तो बता दिया पर उन ब्राह्मणों से ये भी कह दिया कि "देखो भाई.... जरा ध्यान रखना.... वह राजा आप जैसे ब्राह्मणों को खाने में जहर देकर मार देता है ।"
 
         जैसे ही उस महिला ने ये शब्द कहे,  उसी समय यमराज ने फैसला कर लिया कि उन मृत ब्राह्मणों की मृत्यु के पाप का फल उस महिला को ही भुगतना होगा ।

         यमराज के दूतों ने पूछा - प्रभु ऐसा क्यों ? जब कि उन मृत ब्राह्मणों की हत्या में उस महिला की कोई भूमिका ही नहीं है । तब यमराज ने कहा- जब कोई व्यक्ति पाप करता है तो उसे बड़ा आनन्द मिलता हैं । पर उन मृत ब्राह्मणों की हत्या से ना तो राजा को आनंद मिला, ना उस रसोइये को आनंद मिला, ना उस साँप को आनंद मिला, और ना ही उस चील को आनंद मिला । पर उस पाप-कर्म की घटना का बुराई करने के भाव से बखान कर उस महिला को जरूर आनन्द मिला । इसलिये राजा के उस अनजाने पाप-कर्म का फल अब इस महिला के खाते में ही जायेगा ।

          जीवन में कई बार ऐसे अवसर आते हैं जब हम सोचते हैं कि हमने तो ऐसा कोई पाप नहीं किया, फिर भी हमारे जीवन में इतना कष्ट क्यों आया ? क्या ये सम्भव नहीं कि ये फल जाने-अन्जाने दूसरों के प्रति बैर-भाव व संकटग्रस्त लोगों की बुराई करने के मनोभावों के कारण हुए उन पाप-कर्मो से आया होता है जो इस बुराई के होते ही हमारे खाते में ट्रांसफर हो जाता है ।

          इसलिये सावधान रहें... जिस प्रकार सडक पर चलते समय हम इस बात का ध्यान रखते हैं कि कोई हमसे ही नहीं हम भी किसी से टकरा न जाएँ, ऐसे ही किसी के भी प्रति ऐसे नकारात्मक भाव रुपी इस प्रज्ञापराध से हमें स्वयं को निरन्तर बचाने हुए ही अपना जीवन व्यतीत करने की आदत डाल लेना चाहिये । क्योंकि-

         हमारे शब्द, हमारे कार्य, हमारी भावनायें, हमारी गतिविधियाँ ये विचार ही हमारे कर्म हैं, इसलिये इन कर्मों से डरें, ईश्वर तो माफ कर सकते हैं पर कर्म नहीं, जैसे बछड़ा सौ गायों में भी अपनी मां को ढूंढ लेता है, वैसे ही कर्म भी अपने कर्ता को ढूंढ ही लेते हैं ।

       

24.10.19

अपनी नौकरी खुद करें...


           एक चिड़िया का घोंसला एक किसान के खेत में था । एक दिन शाम को जब चिड़िया घोंसले में आयी तो उसके बच्चों ने डरते हुए बताया कि आज किसान और उसका बेटा आपस में बात कर रहे थे कि वह अपने रिश्तेदारों की मदद से कल इस खेत को पूरा काटकर जमीन को समतल कर देंगे और हल चलाकर इसमें बीज भी बो देंगे, फिर वह डरते हुए अपनी मां से बोले कि हमें जल्द ही इस खेत से चला जाना चाहिए । 

          तब उनकी मां हंसते हुए बोली- चिंता की कोई बात नहीं, आराम से सो जाओ कल खेत नहीं कटेगा, अगले दिन हुआ भी ऐसा ही फिर उसी शाम जब चिड़िया वापस लौटी तो फिर उसे बच्चों ने बताया कि किसान अपने बेटे से बात कर रहा था कि कल पक्का अपने खेत की फसल अपने पड़ोसियों की मदद से काट लेंगे, फिर से यह बात सुनकर चिड़िया मुस्कुरायी और बोली- डरो मत, कल भी वे अपनी फसल नहीं काट पाएंगे और आराम से सो गई ।

          अगली सुबह फिर वह दाना लेने के लिए उड़ गई व शाम को आयी तो उस दिन उसके बच्चों ने बोला कि आज किसान अपने बेटे से कह रहा था कि हम खुद ही बिना किसी की मदद के कल सुबह खेत की फसल को काटेंगे और इसमें बीज बो लेंगे, यह सुनते ही चिड़िया गंभीर स्वर में बोली तब तो हमें आज रात ही इस खेत को छोड़कर दूसरे खेत में जाकर रहना होगा और उसी रात अपने बच्चों सहित उस खेत को छोड़कर पास वाले खेत में उसने अपना घोंसला बना लिया और वे सभी वहाँ रहने चले गये ।

          दूसरे दिन उन्होंने देखा कि किसान और उसके बेटे ने बिना किसी दूसरे की मदद के अपने खेत की फसलें काट ली और उसमें हल चलाने लगे ।  यह देखकर उन बच्चों ने आश्चर्य से अपनी मां से पूछा- मां तुम्हें कैसे पता चला कि ये लोग आज फसल काट ही लेंगे तब उस चिड़िया ने उन्हें समझाया कि बेटा जब कोई आदमी किसी दूसरे के भरोसे रह कर अपना काम करवाना चाहता है तो वह काम कभी समय पर नहीं हो पाता, लेकिन जब कोई किसी और पर निर्भर न रहे तो वह अपना कोई भी काम किसी भी समय कर सकता है । अपने काम के लिये दूसरे पर निर्भर रहने वाले का काम कभी भी समय पर नहीं हो पाता और वह हमेशा दुखी ही रहता हैलेकिन जब वह खुद अपने काम को करने की सोच ले तो कठिनाईयों के बाद भी वह अपना काम कर ही लेता है ।

           एक और उदाहरण पिता की मृत्यु के बाद बंटवारे में प्राप्त सम्पत्ति का दो भाईयों में बंटवारा होने के बाद देखने में आया, जब एक भाई अपना सारा खेतों का काम नौकरों पर छोडकर कहता था कि जाओ काम करो, और दूसरा भाई अपने नौकरों के साथ स्वयं खेत पर जाकर कहता था कि आओ काम करें । कहने की आवश्यकता ही नहीं है कि नौकरों को साथ लेकर जो भाई स्वयं काम कर रहा था उसका काम और सम्पत्ति निरन्तर बढी, जबकि नौकरों पर काम छोडकर जो भाई कहता था कि जाओ काम करो उसका काम और सम्पत्ति दोनों उसके हाथ से निकलती ही चली गई ।

          इसलिये मुद्दे की बात ये है कि यदि आप ठान लें और अपनी पूरी मेहनत और लगन से कोई भी काम करें तो आप असंभव काम को भी पूरा कर सकते हैं, क्योंकि असंभव में ही संभव छुपा हुआ है लेकिन यदि आप दूसरों के भरोसे रहेंगे तो आपका कोई भी काम कभी भी समय पर तो पूरा हो ही नहीं पाएगा, जितने भी लोग इस दुनिया में सफल हुए हैं वह सभी किसी और के भरोसे नहीं बल्कि खुद के दम पर ही सफल हुए हैं, इसलिए हमें सदैव किसी आकस्मिक सुविधा या दूसरों के भरोसे रहने के बजाय अपना काम खुद ही करना चाहिए तब यदि आपकी कोई इच्छा है और उसे अपनी ही मेहनत के बल पर पूरा करने की सोच है तो अवश्य ही वह पूरी होकर रहेगी ।

          यही एकमात्र सिद्धांत जीवन भर किसी के लिये भी सफलता की एकमात्र कुंजी के रुप में काम करता है । 


22.10.19

स्वाभिमान की रखवाली – बेटियां...



      शादी के बाद विदाई का समय था,  नेहा अपनी माँ से मिलने के बाद अपने पिता से लिपट कर रो रही थी  वहाँ मौजूद सब लोगों की आंखें नम थी  नेहा ने घूँघट निकाला हुआ थावह अपनी छोटी बहन के साथ सजाई गयी गाड़ी के नज़दीक आ गयी थी 

      दूल्हा अविनाश अपने खास मित्र विकास के साथ बातें कर रहा था 

      विकास - यार अविनाश... सबसे पहले घर पहुंचते ही होटल अमृतबाग चलकर बढ़िया खाना खाएंगे  यहाँ तेरी ससुराल में तो खाने का मज़ा नहीं आया । तभी पास में खड़ा अविनाश का छोटा भाई राकेश बोला- हाँ यार..पनीर कुछ ठीक नहीं था और रसमलाई में तो रस ही नहीं था । यह कहकर वह ही-ही कर जोर से हंसने लगा । खुद अविनाश भी पीछे नही रहा, वह बोला- अरे तो हम लोग अमृतबाग चले चलेंगेजो भी खाना है वहीं खा लेना । मुझे भी यहाँ खाने में मज़ा नहीं आया, रोटियां तक तो गर्म नहीं थी ।

      अपने पति के मुँह से यह शब्द सुनते ही नेहा जो घूँघट में गाड़ी में बैठने ही जा रही थी वापस मुड़ीगाड़ी के फाटक को जोर से बन्द किया और घूँघट हटा कर अपने पापा के पास पहुंची ।

      अपने पापा का हाथ अपने हाथ में लेकर बोली-  "मैं ससुराल नहीं जा रही पापा..." मुझे यह शादी मंजूर नहीं । यह शब्द उसने इतनी जोर से कहे कि सब लोग हक्के बक्के रह गए...!

          सभी नज़दीक आ गए और नेहा के ससुराल वालों पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा ।

       मामला क्या था यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था । तभी नेहा के ससुर राधेश्यामजी ने आगे बढ़कर नेहा से पूछा - "लेकिन बात क्या है बहू ?" शादी हो गयी है, विदाई का समय है, अचानक क्या हो गया कि तुम शादी को नामंजूर कर रही हो ?

      उधर अविनाश की तो मानो दुनिया लूटने जा रही थी, वह भी नेहा के पास आ गया और उसका भाई व दोस्त भी । सभी यह जानना चाह रहे थे कि आखिर एन वक़्त पर ऐसा क्या हो गया जिससे कि दुल्हन ससुराल जाने से मना कर रही है ।

      नेहा ने अपने पिता दयाशंकरजी का हाथ पकड़ रखा था । उसने अपने ससुर से कहा- "बाबूजी मेरे माता-पिता ने अपने सपनों को मारकर हम बहनों को पढ़ाया-लिखाया व काबिल बनाया है ।" आप जानते है एक बाप के लिए बेटी क्या मायने रखती है ? आप व आपका बेटा नहीं जान सकते, क्योंकि आपकी कोई बेटी नहीं है । नेहा रोती हुई बोले जा रही थी, आप जानते है मेरी शादी के लिए व शादी में बारातियों की आवाभगत में कोई कमी न  रह जाये इसलिए मेरे पिताजी पिछले तीन महिनों से रात को 2-3 बजे तक जागकर मेरी माँ के साथ योजना बनाते रहते थे । खाने में क्या बनेगा ?  रसोइया कौन होगा ?  पिछले एक साल में मेरी माँ ने अपने लिये नई साड़ी नही खरीदी जिससे कि मेरी शादी में कहीं कोई कमी न रह जाये, और आज भी दुनिया को दिखाने केलिए अपनी बहन की साड़ी पहन कर मेरी माँ यहाँ खड़ी है ।

          मेरे पिता की इस चार सौ रुपये की नई शर्ट के पीछे बनियान में न जाने कितने छेद हैं"मेरे माता-पिता ने अपने कितने सपनों को मारा होगा, न अच्छा खाया न अच्छा पहना, बस एक ही ख्वाहिश थी दोनों की, कि मेरी शादी में कोई कमी न रह जाये ।"

        आपके बेटे को रोटियां ठंडी लगीं, उनके दोस्तों को पनीर में मजा नहीं आया व मेरे देवर को रसमलाई में रस नहीं मिला । इनका खिलखिलाकर हँसना मेरे पिता के अभिमान को ठेस पहुंचाने के समान है । यह कहते हुए नेहा हांफ रही थी ।

      नेहा के पिता ने रोते हुए कहा- लेकिन बेटी इतनी छोटी सी बातनेहा ने उनकी बात बीच मे काटी और बोली- यह छोटी सी बात नहीं है पापा,  मेरे पति के मन में मेरे पिता की इज्जत नहीं,  रोटी क्या आपने बनाई रसमलाई, पनीर यह सब केटरर्स का काम था । आपने तो दिल खोलकर व हैसियत से बढ़कर खर्च किया, यदि कुछ कमी रही तो वह केटरर्स की तरफ से थी,  आप तो अपने दिल का टुकड़ा अपनी गुड़िया रानी को विदा कर रहे हैं, इसके बाद आप कितनी रातें रोयेंगे क्या मुझे पता नहीं ?  पिछले लंबे समय से  माँ कभी मेरे बिना घर से बाहर नही निकली,  कल से वह बाज़ार अकेली जाएगी,  जा पाएगी  ?

      ये लोग जो पत्नी या बहू लेने आये हैं वह खाने में कमियां निकाल रहे हैं ।  मुझमे कोई कमी आपने नहीं रखी,  यह बात इनकी समझ में नही आई  ?

      दयाशंकर जी ने नेहा के सर पर हाथ फिराया और बोले- अरे पगली, बात का बतंगड़ बना रही है । मुझे तुझ पर गर्व है कि तू मेरी बेटी है, लेकिन बेटी इन्हें माफ कर दे । तुझे मेरी कसम,  शांत हो जा ।

       तभी अविनाश ने आकर दयाशंकर जी के हाथ पकड़ लिए और बोला- "मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी..."मुझसे गलती हो गयी, मैं ...मैं उसका गला बैठ गया था । रो पड़ा था वह...

      तभी राधेश्यामजी ने आगे बढ़कर नेहा के सर पर हाथ रखा, बोले- मैं तो बहू लेने आया था लेकिन ईश्वर बहुत कृपालु है उसने मुझे बेटी दे दी... व बेटी की अहमियत भी समझा दी ।

         मुझे ईश्वर ने बेटी नहीं दी शायद इसलिए कि तेरे जैसी बेटी मेरी नसीब में थी..., अब बेटी इन नालायकों को माफ कर दें... मैं हाथ जोड़ता हूँ तेरे सामने..."मेरी बेटी नेहा मुझे लौटा दे और राधेश्यामजी ने सचमुच हाथ जोड़ दिए व नेहा के सामने सर झुका दिया ।

      नेहा ने अपने ससुर के हाथ पकड़ लिए...'बाबूजी । राधेश्यामजी ने कहा- "बाबूजी नहीं..पापा बोल बेटी ।" नेहा भी भावुक होकर राधेश्याम जी से लिपट गयी थी ।

      दयाशंकरजी ऐसी बेटी पाकर गौरव की अनुभूति कर रहे थे । सभी सम्बन्धितों द्वारा अपनी गल्ति मान लेने पर नेहा भी अब राजी-खुशी अपने ससुराल रवाना हो गयी थी । पीछे छोड़ गयी थी आंसुओं से भीगी अपने माँ-पिताजी की आंखें  अपने पिता का वह आँगन जिस पर कल तक वह चहकती थी.. आज से इस आँगन की चिड़िया उड़ गई थी किसी दूर प्रदेश में.. किसी और पेड़ पर अपना घरौंदा बनाने ।

      यह कहानी लिखते वक्त मैं उस व्यक्ति के बारे में सोच रहा था जिसने बेटी को सर्वप्रथम "पराया धन" की संज्ञा दी होगी । बेटी माँ-बाप का अभिमान व अनमोल धन होता है- "पराया धन नहीं ।"

      कभी हम शादी में जायें तो ध्यान रखें कि पनीर की सब्ज़ी बनाने में एक पिता ने कितना कुछ खोया होगा व कितना और खोएगा, अपना आँगन उजाड़ कर दूसरे के आंगन को महकाना कोई छोटी बात नहीं ।

       इसलिये कृपया वहाँ खाने में कमियां न निकालें क्योंकि बेटी की शादी में बनने वाले पनीररोटी या रसमलाई पकने में उतना समय लगता है जितनी लड़की की उम्र होती है । वह भोजन सिर्फ भोजन नहीं बल्कि एक पिता के अरमान व जीवन का सपना होता है । बेटी की शादी में बनने वाले पकवानों में स्वाद कई सपनों के कुचलने के बाद आता है व उन्हें पकने में सालों लग जाते है । अतः किसी की भी बेटी की शादी में बनने वाले खाने की कद्र करें ।

      मुझे भी यह कहानी मेरे किसी परिचित ने What’sApp पर भेजी थी जिसे एक बेटी का पापा होने व अन्तर्मन को छू सकने की इसकी काबिलियत के कारण मैंने अपनी शैली में संशोधित कर इसे आप तक पहुँचाया है ।


3.10.19

+55 की उम्र में...



              यदि आपकी उम्र +55 हो चुकी है तो ये समझना आपके ही लिये सबसे अधिक आवश्यक है कि आपकी आगे की जिन्दगी शांत और आनंददायक तरीके से कैसे बीते-


          अपने वर्किंग जीवन में आपका पद या ओहदा चाहे कुछ भी क्यों न रहा हो, रिटायरमेंट के करीब या बाद के जीवन में बहू-बेटों की अनावश्यक बातों को नजरअन्दाज करना प्रारम्भ कर दें । जितना भी आप उनकी आपस की बातों में दखल देने का प्रयास करेंगे, उतना ही उनके द्वारा आपका अनादर हो सकने की सम्भावना बढती जावेगी जिससे अंततः आपको दुःख ही होगा । इसलिये छोटे-बडे, बेटे-बहू, बेटी-जंवाई, नाती-पोतों सभी को उनके हिसाब से ही जीने दें । विशेष रुप से तब जबकी उनके किसी भी खर्चे का आप पर कोई दारोमदार न आ रहा हो । 

          जब तक वे आपसे कुछ राय-मशवरा न करना चाहें उन्हें कभी भी कुछ भी सिखाने- समझाने की कोशिश न करें । यदि कभी वे आपके सामने भी किसी काम को गलत तरीके से कर रहे हैं तब भी अपने दिल पर पत्थर रखकर देखते रहें, समय भले ही अधिक लगेगा लेकिन गलती के परिणामों को देखने व भुगतने के बाद वे स्वयं ही किसी भी काम को सही करना भी अपने-आप सीख जावेंगे ।

         पोती-पोतों के साथ भी अपनी बहुओं के स्वभाव के मुताबिक ही प्यार-स्नेह के रिश्तों को निभाएं । उन्हे भी अपनी ओर से आगे बढकर ज्ञान या शिक्षा देने का प्रयास न करें । कई बार इस कोशिश में आपको अपना मन मारने का दुःख भी महसूस करना पड सकता है, किंतु फिर भी अपने उस दुःख को अभिव्यक्त करने की कोशिश ना करें, इससे आप मेले-झमेले जैसे माहौल में भी अपने मन की आत्मिक शांति को बरकरार रखते हुए अपना शेष जीवन जी सकते हैं । 

          बहुत ज्यादा न सही लेकिन एक-दो या अधिक आत्मीय मित्रों के साथ दिन में थोडा-बहुत समय अवश्य बिताएं, इससे भी आपका मन प्रसन्न व संतुष्ट रहेगा । इसके लिये आप अपने नजदीक के पार्क-बगीचे जैसे स्थान पर रोजाना सुबह के समय घूमने अथवा हल्के-फुल्के सामूहिक योग के कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं इससे न सिर्फ आपका स्वास्थ्य सुदृढ रहेगा बल्कि मित्रवर्ग में बढोतरी होने के साथ ही आपके समय का भी रचनात्मक उपयोग बना रहेगा । यदि आप स्वीमिंग में रुचि रखते हों और आपके पहुंच के दायरे जितनी दूरी पर स्वीमिंग-पूल हो तो आप उसे भी अवश्य जॉईन करें आपके आनन्द और स्वास्थ्य दोनों लक्ष्य आसानी से पूर्ण हो सकेंगे ।

          बेशक इस समय में आप अपने वर्किंग जीवन जैसे खुले हाथों खर्च कर सकने की सुविधाजनक स्थिति में नहीं होंगे, अतः अब अपनी प्रवत्ति थोडे खर्चे में अपने मन-मुताबिक जीवन जीने  की बना लेना ही आपके लिये सर्वाधिक उपयोगी व किसी सीमा तक आवश्यक ही रहेगा । अतः स्वयं को इस अनुसार तेजी से ढाल लेने का प्रयास करें

          अपने जीवन-साथी की कद्र करते हुए अपना अधिक समय उसके साथ व उसकी रुचियों के अनुरुप ही गुजारने की कोशिश करें क्योंकि यही एकमात्र वो रिश्ता है जिसके साथ आपकी अब तक की जिन्दगी का भी सबसे अधिक समय  गुजरा है और मृत्यु-पर्यंत भी जिसकी मौजूदगी और गैर मौजूदगी दोनें ही आपके अपने अस्तित्व के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण है । 

          इसके अलावा पठन-पाठन में अपनी रुचि बढाना भी आपके लिये एक उत्तम विकल्प है जिससे आपको नई-नई जानकारियां और समय के अनुसार नवीनतम ज्ञान भी मिलता रह सकेगा । यदि इन तरीकों से आप अपने को तटस्थ व संतुष्ट रख सकेंगे तभी आपके लिये आगामी बुढापे का समय वाह बुढापा ! करते बीत सकेगा, अन्यथा आह बुढापा ! जिसे हमारे अनेकों बुजुर्ग ढो रहे हैं वह तो है ही ।

          इसलिये कुल-मिलाकर अपने शेष जीवन का यही एकमात्र लक्ष्य रखें कि-
जिन्दगी जो शेष है, बस वही विशेष है...



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