4.5.16

बुलेट ट्रेन V/s बहुसंख्यक सुविधा ट्रेन

               
         जैसे ही ट्रेन रवाना होने को हुई, एक औरत और उसका पति एक ट्रंक लिए डिब्बे में घुस पडे़ । दरवाजे के पास ही औरत तो बैठ गई पर आदमी चिंतातुर खड़ा था । जानता था कि उसके पास जनरल टिकट है और ये रिज़र्वेशन डिब्बा है ।
 
         टीसी को टिकट दिखाते उसने हाथ जोड़ दिए । "ये जनरल टिकिट है, अगले स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चले जाना । वरना आठ सौ की रसीद बनेगी ।" कहते हुए टीसी आगे चला गया।
 
         पति-पत्नी दोनों बेटी को पहला बेटा होने पर उसे देखने जा रहे थे । सेठ ने बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी और सात सौ रुपये एडवांस दिए थे । बीबी और लोहे की पेटी के साथ जनरल बोगी में बहुत कोशिश की पर घुस नहीं पाए थे । लाचार हो स्लिपर क्लास में आ गए थे।
 
          "साब, बीबी और सामान के साथ जनरल डिब्बे में चढ़ नहीं सकते । हम यहीं कोने में खड़े रहेंगे । बड़ी मेहरबानी होगी ।" टीसी की ओर सौ का नोट बढ़ाते हुए कहा।
 
          "सौ में कुछ नहीं होता । आठ सौ निकालो वरना उतर जाओ।"
 
         "आठ सौ तो गुड्डो की डिलिवरी में भी नहीं लगे थे साब । नाती को देखने जा रहे हैं । गरीब लोग हैं, जाने दो न साब ।" अबकि बार पत्नी ने कहा- "तो फिर ऐसा करो, चार सौ निकालो । एक की रसीद बना देता हूँ,  दोनों बैठे रहो ।"
 
          "ये लो साब,  रसीद रहने दो । दो सौ रुपये बढ़ाते हुए आदमी बोला ।

         "नहीं-नहीं रसीद तो बनानी ही पड़ेगी । देश में बुलेट ट्रेन जो आ रही है । एक लाख करोड़ का खर्च है । कहाँ से आयेगा इतना पैसा ?  रसीद बना-बनाकर ही तो जमा करना है ।  ऊपर से आर्डर है, रसीद तो बनेगी ही  ।

          चलो, जल्दी चार सौ निकालो । वरना स्टेशन आ रहा है, उतरकर जनरल बोगी में चले जाओ ।" इस बार कुछ कठोर लहजे में डांटते हुए टीसी बोला ।

          आदमी ने चार सौ रुपए ऐसे दिए मानो अपना कलेजा निकालकर दे रहा हो । पास ही खड़े दो यात्री बतिया रहे थे।"  ये बुलेट ट्रेन क्या बला है  ?

          "बला नहीं जादू है जादू ।  बिना पासपोर्ट के जापान की सैर । जमीन पर चलने वाला हवाई जहाज है, और इसका किराया भी हवाई सफ़र के बराबर होगा, "बिना रिजर्वेशन उसे देख भी लो तो चालान हो जाएगा । एक लाख करोड़ का प्रोजेक्ट है । राजा हरिश्चंद्र को भी ठेका मिले तो बिना एक पैसा खाये खाते में करोड़ों जमा हो जाए ।"

          सुना है, "अच्छे दिन"  इसी ट्रेन में बैठकर आनेवाले हैं ।"

          उनकी इन बातों पर आसपास के लोग मजा ले रहे थे । मगर वे दोनों पति-पत्नी उदास रुआंसे ऐसे बैठे थे मानो नाती के पैदा होने पर नहीं उसके शोक में जा रहे हो । कैसे एडजस्ट करेंगे ये चार सौ रुपए ? क्या वापसी की टिकट के लिए समधी से पैसे मांगना होगा ? नहीं-नहीं, आखिर में पति बोला- "सौ-डेढ़ सौ तो मैं ज्यादा लाया ही था । गुड्डो के घर पैदल ही चलेंगे । शाम को खाना नहीं खायेंगे । दो सौ तो एडजस्ट हो जाएंगे और आते वक्त पैसिंजर से आ जायेंगे । सौ रूपए बचेंगे । एक दिन जरूर ज्यादा लगेगा । सेठ भी चिल्लायेगा, मुन्ने के लिए सब सह लूंगा । मगर फिर भी ये तो तीन सौ ही हुए ।"

          "ऐसा करते हैं, नाना-नानी की तरफ से जो हम सौ-सौ देनेवाले थे न, अब दोनों मिलकर सौ देंगे । हम अलग थोड़े ही हैं । हो गए न चार सौ एडजस्ट ।" पत्नी के कहा "मगर मुन्ने के कम करना...."

         और पति की आँख छलक पड़ी ।

        "मन क्यूँ भारी करते हो जी । गुड्डो जब मुन्ना को लेकर घर आयेंगी; तब दो सौ ज्यादा दे देंगे ।" कहते हुए उसकी आँख भी छलक उठी ।

       फिर आँख पोंछते हुए बोली- "अगर मुझे कहीं मोदीजी मिले तो कहूंगी- "इतने पैसों की बुलेट ट्रेन चलाने के बजाय, तो हर ट्रेन में चार-चार जनरल बोगी लगा दो, जिससे न तो हम जैसों को टिकट होते हुए भी जलील होना पड़े और ना ही हमारे मुन्ने के सौ रुपये कम हो ।" उसकी आँख फिर छलके पड़ी ।

          "अरे पगली, हम गरीब लोग हैं,  हमें मोदीजी को वोट देने का तो अधिकार है, पर सलाह देने का नहीं ।  रो मत.

          क्या हमें ये उम्मीद करनी चाहिये कि रेल मंत्रालय देश में जनरल बोगियों की परिस्थितियों को भी समझ सके । जिसमे सफर करने वाला एक गरीब तबका भी इसी देश का निवासी है जिसका शोषण चिरकाल से होता आया है, और आगे भी होता ही रहेगा ।

          प्रश्न निरुत्तर रह ही जाता है कि देश के लिये ज्यादा जरूरी क्या है । अल्पसंख्यकों की सुविधा के लिये बुलेट ट्रेन जो  फिलहाल तो मध्यम वर्ग की क्रयशक्ति के दायरे में भी नहीं दिखती या फिर बहुसंख्यक निम्न व मध्यमवर्ग तबके की क्रयशक्ति के अनुपात में  वर्तमान ट्रेनों में आवश्यक बोगियों की संख्या  ?

          निःसंदेह राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के विकास हेतु बुलेट ट्रेन जैसी सुविधा हमारे देश में भी दिखे ये अच्छी बात है किंतु वर्तमान सुविधाओं की सामान्य मतदाता की क्रयशक्ति के दायरे में होने वाली वृद्धि भी क्या उतनी ही या उससे भी अधिक आवश्यक नहीं  है  ?
  

3 टिप्पणियाँ:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विलुप्त होते दौर में - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

J.L. Singh Singh ने कहा…

बहुत अच्छा ! यह आम आदमी, गरीब आदमी के विचार हैं! मीडिया को यह बात सरकार तक पहुंचानी चाहिए

arvindanabha ने कहा…

बहुत सुन्दर कथा है| परिस्थितियों के आड़े-तिरछेपन को कुशलता के साथ उकेरा है| बहुत बधाई!
- http://arvindanabha.blogspot.in/

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