17.12.19

वृद्धावस्था में खुश रहने और सुखी जीवन बिताने का रहस्य...

        एक बार यूनान के मशहूर दार्शनिक सुकरात भ्रमण करते हुए एक नगर में गये । वहां उनकी मुलाकात एक वृद्ध सज्जन से हुई ।  दोनों आपस में काफी घुल मिल गये ।

           वृद्ध सज्जन आग्रहपूर्वक सुकरात को अपने निवास पर ले गये । भरा-पूरा परिवार था उनका, घर में बहु- बेटे, पौत्र-पौत्रियां सभी थे ।
       
           सुकरात ने वृद्ध से पूछा- “आपके घर में तो सुख-समृद्धि का वास है । वैसे अब आप करते क्या हैं ?" इस पर वृद्ध ने कहा- “अब मुझे कुछ नहीं करना पड़ता । ईश्वर की दया से हमारा अच्छा कारोबार है, जिसकी सारी जिम्मेदारियां अब बेटों को सौंप दी हैं । घर की व्यवस्था हमारी बहुएँ संभालती हैं ।  इसी तरह जीवन चल रहा है ।"

           यह सुनकर सुकरात बोले- "किन्तु इस वृद्धावस्था में भी आपको कुछ तो करना ही पड़ता होगा । आप बताइये कि बुढ़ापे में आपके इस सुखी जीवन का रहस्य क्या है ?"

          
वह वृद्ध सज्जन मुस्कुराये और बोले- “मैंने अपने जीवन के इस मोड़ पर एक ही नीति को अपनाया है कि दूसरों से अधिक अपेक्षायें मत पालो और जो मिले,  उसमें संतुष्ट रहो ।  मैं और मेरी पत्नी अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व अपने बेटे-बहुओं को सौंपकर निश्चिंत हैं । अब वे जो कहते हैं, वह मैं कर देता हूं और जो कुछ भी खिलाते हैं, खा लेता हूं । अपने पौत्र- पौत्रियों के साथ हंसता-खेलता हूं । मेरे बच्चे जब कुछ भूल करते हैं  तब भी मैं चुप रहता हूं ।  मैं उनके किसी कार्य में बाधक नहीं बनता ।

           पर जब कभी वे मेरे पास सलाह-मशविरे के लिए आते हैं तो मैं अपने जीवन के सारे अनुभवों को उनके सामने रखते हुए उनके द्वारा की गई भूल से उत्पन्न् दुष्परिणामों की ओर सचेत कर देता हूं । अब वे मेरी सलाह पर कितना अमल करते या नहीं करते हैं, यह देखना और अपना मन व्यथित करना मेरा काम नहीं है । वे मेरे निर्देशों पर चलें ही, मेरा यह आग्रह नहीं होता ।  परामर्श देने के बाद भी यदि वे भूल करते हैं तो मैं चिंतित नहीं होता ।  उस पर भी यदि वे मेरे पास पुन: आते हैं तो मैं पुन: सही सलाह देकर उन्हें विदा करता हूं ।

          बुजुर्ग सज्जन की यह बात सुन कर सुकरात बहुत प्रसन्न हुये । उन्होंने कहा- “इस आयु में जीवन कैसे जिया जाए, यह आपने सम्यक समझ लिया है ।

          
यह कहानी सबके लिए है । अगर आज आप बूढ़े नही हैं तो कल अवश्य होंगे । इसलिए आज बुज़ुर्गों की 'इज़्ज़त' और 'मदद' करें जिससे कल कोई आपकी भी 'मदद' और 'इज़्ज़त' करे ।

          
याद रखें जो ---- जो आज दिया जाता है वही कल प्राप्त होता है ।

         
अपनी वाणी में सुई भले ही रखो, पर उसमें धागा भी जरूर डालकर रखो,  ताकि सुई केवल छेद ही न करे आपस में माला की तरह जोडकर भी रखे ।

          
वरिष्ठ नागरिक घर में वानप्रस्थी बनकर रहने का अभ्यास करें ।
                      
           ”जीवन में खुशी का अर्थ लड़ाइयाँ लड़ना नहीं, बल्कि उन से बचना है । कुशलतापूर्वक पीछे हटना भी अपने आप में एक जीत ही है ।”


2.12.19

रहस्यमय अग्निकांड...


बांद्रा स्टेशन की झोपडपट्टी में प्रतिवर्ष आग का रहस्य !


           (बांद्रा चुनावक्षेत्र हिंदुओं का गढ़ हैं! इसी में शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे जी का निवास हैं, अब ये गढ़ ढह गया हैं, विधानसभा चुनाव में अब मुस्लिम विधायक चुनकर आया हैं, जहां पहले हिंदू ही चुनकर आता था !) 

      सबसे पहले कुछ पंक्तियाँ उन पाठकों के लिए, जिन्हें बांद्रा स्टेशन के बारे में जानकारी नहीं है. मुंबई में स्थित बांद्रा रेलवे स्टेशन, दादर एवं मुंबई सेन्ट्रल स्टेशन पर पड़ने वाले ट्रेनों के दबाव को कम करने के लिए एक अतिरिक्त टर्मिनस स्टेशन के रूप में विकसित किया गया था, यह स्टेशन पश्चिम रेलवे के अंतर्गत आता है.

      ठीक इसी प्रकार का एक टर्मिनस स्टेशन कुर्ला नामक स्थान पर भी है, जो कि छत्रपति शिवाजी टर्मिनस जैसे मुख्य स्टेशन का दबाव कम करता है. बांद्रा और कुर्ला इन दोनों स्टेशनों से कई ट्रेने आरम्भ और समाप्त होती हैं. बांद्रा स्टेशन के आसपास चारों तरफ गहरी-घनी और गंदगी से लबरेज कई झोपडपट्टी मौजूद हैं, जिनमें से अधिकाँश का नाम “नवाज़ नगर”, “गरीब नगर”, “संजय गांधी नगर”, “इंदिरा गांधी नगर” वगैरह है. आप सोचेंगे इसमें ऐसी क्या ख़ास बात है, ऐसा तो भारत के कई रेलवे स्टेशनों के आसपास होता होगा…

     बांद्रा की इन झोपडपट्टी की ख़ास बात यह है कि इसमें प्रतिवर्ष (जी हाँ, बिलकुल बिना किसी खण्ड के, प्रतिवर्ष मतलब प्रतिवर्ष) बड़ी जोरदार आग लगती है. ऐसे अग्निकाण्ड देश की किसी भी झोपडपट्टी में “नियमित” रूप से नहीं होते. आखिर इस आगज़नी का रहस्य क्या है ? बार-बार बांद्रा स्टेशन के आसपास ही आग क्यों लगती है ?  आईये थोड़ा समझने का प्रयास करते हैं…

     पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारों ने नोट किया है कि बांद्रा झोपडपट्टी में लगने वाली यह आग हमेशा देर शाम को अथवा देर रात में ही लगती है, दिन में नहीं. ऐसी भीषण आग लगने के बाद बांद्रा स्टेशन पहुँचने वाले, वहाँ इंतज़ार करने वाले रेलवे यात्री घबराकर इधर-उधर भागने लगते हैं, डर के मारे काँपने लगते हैं. परन्तु सर्वाधिक आश्चर्य इस बात का है कि जब भी इन झोपडपट्टी में आग लगती है, तो यहाँ के निवासी बड़ी शान्ति के साथ चुपचाप खाली स्थानों, रेलवे स्टेशन के आसपास एकत्रित हो जाते हैं. उन्हें कतई भय नहीं होता, आग बुझाने की जल्दबाजी भी नहीं होती.

    स्वाभाविक रूप से इन झोपडपट्टी की गलियाँ बेहद सँकरी होने के कारण अग्निशमन (फायर ब्रिगेड) और पुलिस की गाड़ियाँ अथवा एम्बुलेंस अन्दर तक नहीं पहुँच पातीं… कुल मिलाकर बात यह कि झोपडपट्टी पूरी जल जाने तक यहाँ के “निवासी” शान्ति बनाए रखते हैं. इसके बाद एंट्री होती है टीवी कैमरों, चैनलों के संवाददाता और पत्रकारों की, जो गलियों में पैदल घुसकर तमाम फोटो खींचते हैं, चिल्ला-चिल्लाकर बताते हैं कि “देखो, देखो… गरीबों का कितना नुक्सान हो गया है…”. कुछ ही समय में (या अगले दिन कुछ महिलाएँ कैमरे के सामने अपनी छाती कूटते हुए पधारती हैं, रोना-धोना शुरू करती है और सरकार से मुआवज़े की माँग करती हैं. ज़ाहिर है की अगले दिन की ख़बरों में, समाचार पत्रों, चैनलों इत्यादि पर झोपडपट्टी के इन “गरीबों”(??) के प्रति सहानुभूति जगाते हुए लेख और चर्चाएँ शुरू हो जाती हैं. आगज़नी के कारण जिन गरीबों का नुक्सान हुआ है, जिनकी झोंपड़ियाँ जल गयी हैं, उनका पुनर्वास हो ऐसी मांगें “नेताओं” द्वारा रखी जाती हैं. कथित बुद्धिजीवी और कथित संवेदनशील लोग आँसू बहाते हुए बांद्रा की झोपडपट्टी वाले इन गरीबों के लिए सरकार से पक्के मकान की माँग भी कर डालते हैं.

     ज़ाहिर है कि इतना हंगामा मचने और छातीकूट प्रतिस्पर्धा होने के कारण सरकार भी दबाव में होती है, जबकि कुछ सरकारें तो इसी आगज़नी का इंतज़ार कर रही होती हैं. इन कथित गरीबों को सरकारी योजनाओं के तहत कुछ मकान मिल जाते हैं, कुछ लोगों को कई हजार रूपए का मुआवज़ा मिल जाता है… इस झोपडपट्टी से कई परिवार नए मकानों या सरकार द्वारा मुआवज़े के रूप में दी गयी “नई जमीन” पर शिफ्ट हो जाते हैं…

     इसके बाद शुरू होता है असली खेल! मात्र एक सप्ताह के अन्दर ही अधिकाँश “गरीबों” (?)  को आधार कार्ड, PAN कार्ड, मतदाता परिचयपत्र वगैरह मिलने शुरू हो जाते हैं ! मात्र पंद्रह दिनों के भीतर उसी जले हुए स्थान पर नई दोमंजिला झोपडपट्टी भी तैयार हो जाती है, जिसमे टीन और प्लास्टिक की नई-नकोर चद्दरें दिखाई देती हैं. कहने की जरूरत नहीं कि ऐसी झोपडपट्टी में पानी मुफ्त में ही दिया जाता है, बिजली चोरी करना भी उनका “अधिकार” होता है. झोपडपट्टी में थोड़ा गहरे अन्दर तक जाने पर पत्रकारों को केबल टीवी, हीटर, इलेक्ट्रिक सिलाई मशीनें वगैरह आराम से दिख जाता है (केवल सरकारों को नहीं दिखता.    हरवर्ष नियमानुसार एक त्यौहार की तरह होने वाली इस आगज़नी के बाद रहस्यमयी तरीके से 1500 से 2000 नए-नवेले बेघर की अगली बैच न जाने कहाँ से प्रगट हो जाती है. जली हुई झोपडपट्टी के स्थान पर नई झोपड़ियाँ खड़ी करने वाले ये “नए प्रगट हुए गरीब और बेघर” वास्तव में गरीब होते हैं.

     इन्हें नई झोंपड़ियाँ बनाने, उन झोपड़ियों को किराए पर उठाने और ब्याज पर पैसा चलाने के लिए एक “संगठित माफिया” पहले से ही इन झोपडपट्टी में मौजूद होता है. न तो सरकार, न तो पत्रकार, न तो जनता… कोई भी ये सवाल नहीं पूछता कि जब जली हुई झोपडपट्टी में रहने वाले पूर्ववर्ती लोगों को नई जगह मिल गयी, कुछ को सरकारी सस्ते मकान मिल गए, तो फिर ये “नए गरीब” कहाँ से पैदा हो गए जो वापस उसी सरकारी जमीन पर नई झोपडपट्टी बनाकर रहने लगे?? कोई नहीं पूछता… नई बन रही झोपडपट्टी में ये नए आए हुए “गरीब मेहमान” हिन्दी बोलना नहीं जानते, उनकी भाषा में बंगाली उच्चारण स्पष्ट नज़र आता है…

     ये “गरीब”(?) दिन भर मुँह में गुटका-पान दबाए होते हैं (एक पान दस रूपए का या एक तम्बाकू गुटका भी शायद दस रूपए का मिलता होगा). इस झोपडपट्टी में आने वाले प्रत्येक “गरीब” के पास चारखाने की नई लुंगी और कुरता जरूर होता है… उनका पहनावा साफ़-साफ़ बांग्लादेशी होने की चुगली करता है. नवनिर्मित झोपडपट्टी में महाराष्ट्र के अकाल-सूखा ग्रस्त क्षेत्रों का किसान कभी नहीं दिखाई देता. इन झोपडपट्टी में मराठी या हिन्दुस्तानी पहनावे वाले साधारण गरीब क्यों नहीं दिखाई देते, इसकी परवाह कोई नहीं करता. दो-चार पीढियों से कर्ज में डूबे विदर्भ का एक भी किसान बांद्रा की इन झोपडपट्टी में नहीं दिखता ?

     ऐसा क्यों है कि बांद्रा स्टेशन के आसपास एक विशिष्ट पह्नावेम विशिष्ट बोलचाल वाले बांग्लाभाषी और “बड़े भाई का कुर्ता, तथा छोटे भाई का पाजामा” पहने हुए लोग ही दिखाई देते हैं?? बांद्रा स्टेशन के आसपास चाय-नाश्ते की दुकानों, ऑटो व्यवसाय, अवैध कुली इत्यादि धंधों में एक “वर्ग विशेष” (ये धर्मनिरपेक्ष शब्द है) के लोग ही दिखाई देते हैं ?

     अब अगले साल फिर से बांद्रा की इस झोपडपट्टी में आग लगेगी… फिर से सरकार मुआवज़ा और नया स्थान देगी… फिर से कहीं से अचानक प्रगट हुए “नए गरीब” पैदा हो जाएँगे… झोपडपट्टी वहीं रहेगी… अतिक्रमण वैसा ही बना रहेगा… गुंडागर्दी और लूटपाट के किस्से वैसे ही चलते रहेंगे… लेकिन ख़बरदार जो आपने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई… आप तो चुपचाप अपना टैक्स भरिये…. वोटबैंक राजनीति की तरफ आँख मूँद लीजिए. और हाँ ! यदि आप ये सोच रहे हैं कि यह “गरीबी और आगज़नी का यह खेल” केवल बांद्रा स्टेशन के पास ही चल रहा है, तो आप वास्तव में बहुत नादान हैं… यह खेल बंगाल के कई जिलों में चल रहा है, देश के कई महानगरों में बड़े आराम से चल रहा है, एक दिन यह झोपडपट्टी खिसकते-खिसकते आपके फ़्लैट के आसपास भी आएगी, तब तक आप चादर ओढ़कर सो सकते है !

     यह कोई और नही, आजकल दुनिया के मनपसंद  रोहीगया (रोहिंग्या) शांतिदूत ही है !
WhatsApp से साभार...

29.11.19

सब खुश – सब संतुष्ट...



         
          इस बार के महाराष्ट्र विधान सभा के चुनावों के बाद सभी राजनीतिक दलों में सत्ता के लिये जो महासंग्राम हुआ, वो समूचे देश ने शताब्दी के इकलौते उदाहरण के रुप में रुचिपूर्वक देखा । अंतत: महाराष्ट्र के इस महासंग्राम में कौन कैसे संतुष्ट हुआ इसकी रोचक बानगी देखिये-

          देवेन्द्र फडणवीस इसलिये खुश हैं कि महाराष्ट्र की राजनीति में वे लगातार दो बार मुख्यमंत्री बन गये ।

          अजीत पंवार इसलिये खुश हैं कि BJP  को सपोर्ट करने के इनाम के रुप में उन पर दर्ज सभी आर्थिक अपराध समाप्त कर दिये गये ।

          शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे इसलिये खुश हैं कि अंतत: उनके नेत्रत्व में अब महाराष्ट्र में शिवसेना का शासन है ।

          कांग्रेस इसलिये खुश है कि सीटों के आधार पर महाराष्ट्र में वो सबसे निचले पायदान की पार्टी होने के बावजूद सत्ता में बराबर की भागीदारी कर रही है ।

          NCP  के शरद पंवार इसलिये खुश हैं कि वे न सिर्फ किंगमेकर के रुप में अपना लोहा मनवा चुके बल्कि सत्ता में भी हर समय सरकार को अपने दबाव में रख सकने की भूमिका में हैं ।

          राज्यपाल इसलिये खुश हैं कि उन्होंने पहला चांस BJP को सत्ता संभालने हेतु दिया और अब वे मोदीजी के साथ ही अमित शाह के खास मित्रों की सूचि में शामिल हैं ।

          मीडिया इसलिये खुश है कि इस पूरे प्रकरण में उसे कई दिनों तक हर घंटे विशेष बेकिंग न्यूज दिखाकर अपना दर्शक वर्ग बढाने का भरपूर मौका मिला ।

          मतदाता भी इसलिये खुश हो सकते हैं कि किसी रोमांचक हिन्दी फिल्म से भी अधिक रोमांच इस कथासार में पूरे सप्ताह उनके समक्ष चलते दिखा ।

          5 - 7 बडे होटल समूह इसलिये खुश हैं कि इस समूचे घटनाक्रम के चलते उन्हें अपनी होटलों से पर्याप्त आमदनी कमाने का इस दौरान मौका मिला ।

           इस प्रकार इस महासंग्राम में सभी संबंधितों को किसी न किसी रुप में खुश व संतुष्ट होने का अवसर मिल गया और शायद हमारे इस प्रजातंत्र की यही खासियत है ।


15.11.19

जाने कैसे लोग थे वो...?



     इन दिनों वॉट्सएप पर एक मैसेज दिख रहा है, जिसमें वर्षों बाद उन्नति के ऊंचे शिखर पर स्थापित एक छात्र अपने पूर्व प्रोफेसर से मिलने पर उसका धन्यवाद करते हुए कहता है कि- सर आज मैंने जो कुछ भी हासिल किया है वो आपकी उस एक दिन की उदारता का परिणाम है जब मैंने क्लास में आपके पीरियड के पूर्व कुछ विशेष मजबूर परिस्थिति में अपने एक साथी की घडी चुरा ली थी और आपको शिकायत मिलने पर आपने सभी छात्रों की आँखों पर पट्टी बंधवाकर सबकी तलाशी लेते हुए मेरी जेब से वो घडी निकालकर उस छात्र को वापस लौटा दी थी ।

          मैं अगले कुछ दिनों डर के कारण सो भी नहीं पा रहा था कि आप मेरी उस कमजोरी का जिक्र स्कूल में करवाकर मुझे बदनाम कर देंगे और तब मेरे सामने शर्म के कारण मर जाने के अलावा दूसरा कोई मार्ग नहीं बचेगा । किंतु आपने कभी किसी के भी सामने मेरी उस कमजोरी का जिक्र न करके मुझे सार्वजनिक रुप से बेइज्जत होने से बचा लिया और अपनी उसी आत्मग्लानि से पीछा छुडाने की लगातार कोशिश में मैं अपनी योग्यताएँ बढाते हुए आज यहाँ तक पहुँच पाया । मेरी जिन्दगी पर आपका ये ऐसा कर्ज है जिसकी जीते-जी मैं कभी भरपाई कर ही नहीं सकता ।

        प्रोफेसर ने उस पूर्व छात्र से पूछा – अच्छा तो क्या वह तुम थे ?  छात्र ने जब आश्चर्य से पूछा कि मेरी जेब से आपने ही वो घडी निकाली और आप पूछ रहे हैं कि क्या वो मैं था, इसका क्या  मतलब  हुआ ? तब उन प्रोफेसर ने बताया कि दरअसल उस दिन क्लास में सबकी आँखों पर पट्टी बंधवाने के बाद मैंने भी अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली थी, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरी नजरों में भी उस छात्र की जिसने न जाने किन परिस्थितियों में वो घडी चुराई होगी, उसकी इज्जत तनिक भी कम हो, और वो भूतपूर्व छात्र अपनी सारी प्रतिष्ठा भूलकर रोते हुए उन प्रोफेसर महोदय के चरणों में गिर पडा ।

       साथियों ये कहानी यहाँ मैंने क्यों उद्धृत की अब उसका भी कारण जानिये- वर्षों पूर्व मेरे अपने छात्र जीवन में मेरा एक अभिन्न मित्र जो आठ भाई-बहनों से भरे-पूरे निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में सातवें नंबर पर 13-14 वर्ष की उम्र का रहा होगा और अभावग्रस्त परिवार में रहने के कारण न सिर्फ अपने पिता से बल्कि बाकि सब बडों से भी निरन्तर प्रताडित होता रहता था, वो अपनी 6ठी या 7वीं की क्लास में मुश्किल से दिलवाई गई तीन किताबों की एक ही जिल्द बनवाकर लाया था और दुर्भाग्यवश उसकी वही सजिल्द तीन किताबों की मिश्रीत किताब स्कूल में किसी ने चुरा ली ।

        एक साथ तीनों किताबों के गुम हो जाने की खबर घर में मालूम पडने पर बहुत ही पिटाई होगी इस डर से उसने मध्यांतर में किसी दूसरे छात्र की उन तीन में से एक किताब चुरा ली अब कोढ में खाज ये कि तत्काल उस दूसरे छात्र को अपनी किताब चोरी हो जाने की जानकारी लग गई और उसने क्लास में मौजूद शिक्षक से उस किताब के चोरी हो जाने की शिकायत कर दी ।

        शिक्षक ने उसी छात्र से अन्य सभी छात्रों के स्कूल बैग व डेस्क की तलाशी लेने को कहा । मेरे अभागे मित्र के पास वो किताब बरामद हो गई और उसके बाद उन शिक्षक महोदय ने सबके सामने न सिर्फ उसकी जबर्दस्त पिटाई की बल्कि स्कूल से निकलवा देने की धमकी देकर माफ करवाने के एवज में उसे अपने पीरियड की दूसरी सभी क्लासों में लेकर गया और जहाँ-जहाँ जो-जो चोरियां हुईं वो सब भी स्कूल से न निकलवाने का लालच देते हुए उसी से कबूलवाई, उस वक्त जिनकी कोई चोरी नहीं हुई थी वे भी छात्र अपनी शिकायतें लेकर खडे होते गए और 40 से अधिक किताबों की चोरी मेरे उस मित्र के नाम करवाकर सगर्व उन शिक्षक महोदय ने उसे प्रिंसिपल के समक्ष ले जाकर खडा कर दिया ।

        प्रिंसिपल सर ने दूसरे दिन अपने पिताजी को लेकर आओ के आदेश के साथ उस मित्र को घर रवाना कर दिया, तब तक स्कूल की छुट्टी भी हो चुकी थी और बहुसंख्यक छात्रों का समूह चोर है, चोर है के नारे लगाता उस मित्र के पीछे पड गया । शर्मिंदगी के कारण वो मित्र अपने घर भी नहीं गया और मुंह छिपाकर घर से भी भाग गया ।

        आगे की कहानी बताने की आवश्यकता ही नहीं है, इसलिये कि उसके बाद उस मित्र का आगे का सारा जीवन पगडंडियों पर चलते ही बीता । इस घटना के सात वर्ष बाद पुनः उसमें आगे पढने की लालसा जागी, उसने प्रायवेट परीक्षाएं देकर अगले दो-तीन वर्ष पठाई नियमित रखने की कोशिश भी की किंतु लंगडा घोडा कहाँ तक दौड पाता । आज भी वो मित्र मिलता रहता है जिसके साथ यदि उस समय ये दुर्घटना नहीं हुई होती तो वो भी अपने भाई-बहनों के समान उच्च शिक्षित अवस्था में अपना जीवन अधिक व्यवस्थित रुप में गुजार रहा होता ।

        काश !  उस समय उस शिक्षक ने स्वयं को प्रिंसिपल के समक्ष विजेता दिखाने के लोभ से बचकर उस मासूम छात्र के साथ रहमदिली दिखाई होती । तो...

        इस कथासार की शुरुआती कहानी कई बार वॉट्सएप पर सामने से गुजरी किंतु आज जब इसी कहानी पर मशहूर प्रणेता उज्जवल पाटनी का वीडिओ भी देखा तो जेहन में उस समय की ये घटना बिजली के समान कौंध गई और उसे मैंने यहाँ प्रस्तुत कर दी । शायद किस्से-कहानियों की जिंदगी और वास्तविक जिंदगी में यही अन्तर होता है ।

10.11.19

हमारे सामान्य व्यवहार से सम्बन्धित ज्ञान ऐसे भी समझें...



       अपने सामाजिक, पारिवारिक व कारोबारी जीवन में जो हम जो कुछ भी कार्य-व्यवसाय, सम्बन्ध, सम्पत्ति बना व कमा पाते हैं उनमें हमारी बहुत सी योग्यताओं व क्षमताओं के साथ एक और योग्यता सर्वोपरी स्थान हासिल करती है वह है हमारा रवैया या व्यवहार या अंग्रेजी में कहें तो एटिट्यूड, इस एटिट्यूड का महत्व एक और दिलचस्प तरीके से हमारे सामने आया है । आप भी इसे देखें-

       जीवन के एक शानदार गणितिय सिद्धांत को यहाँ देखें,  समझें  और इसपर चिंतन करें । यदि अंग्रेजी वर्णमाला के 26 अक्षरों को हम 1 से 26 तक का क्रम दें-ऐसे

A, B, C, D, E, F, G, H, I, J, K, L, M, N, O, P, Q, R, S, T, U, V, W, X, Y, Z =
1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19, 20, 21, 22, 23, 24, 25, 26

यानी A to Z का मान इस प्रकार लें जिसमें-
A=1,  B=2,  C=3,  D=4,  E=5,  F=6,  G=7,  H=8,  I=9,  J=10,  K=11,  L=12, M=13,  N=14,  O=15,  P=16,  Q=17,  R=18,  S=19,  T=20,  U=21,  V=22, W=23, X=24, Y=25, Z=26 हो

तो...
Hard Work:
H+A+R+D+W+O+R+K=
8+1+18+4+23+15+18+11= 98%

Knowledge:
K+N+O+W+L+E+D++E=
11+14+15+23+12+5+4+7+5= 96%

Luck:
L+U+C+K=
12+21+3+11= 47%

       यानी इनमें से कोई भी 100% स्कोर नही कर सकता,  तो फिर वह क्या है जो 100% कर सकता है ?

       Money ?   नही, यह, 72% है

       Leadership ?  जी नही, यह भी सीर्फ 97% ही है ।   तब ?  

      सभी समस्याओं का समाधान करना संभव है, यदि हमारा एक परफेक्ट ATTITUDE या व्यवहार हो । जी हां,  सिर्फ हमारा ATTITUDE  ही है जो हमारे जीवन को 100% सफल कर सकता है ।

A+T+T+I+T+U+D+E=
1+20+20+9+20+21+4+5= 100 %

       अतः यदि किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति में हमें कहीं कोई रुकावट दिखे तो हमें सिर्फ अपना व्यवहार बदलने की आवश्यकता है, यकीनन तब हम अपने उद्देश्य में अवश्य ही सफल हो जायेंगे । 

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