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26.12.19

जैन समुदाय के लिये...



        वर्तमान समय में जैन लडके व लडकियों की शादी अपने सामाजिक जैन परिवार में ही हो यह आज के समय मे न सिर्फ लडके व लडकी के सुखी व सुरक्षित भावी जीवन के लिये बल्कि समाज विकास के लिये भी अत्यन्त आवश्यक हो चला है जिसका एक मुख्य कारण जैन समाज का आबादी के अनुपात में भी और सामान्य क्रम में भी जनसंख्या का प्रतिशत जो घटते क्रम में चल रहा है उसके विकासक्रम को बनाये रखने में आपके-हमारे योगदान के रुप में भी महत्वपूर्ण है ।

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        जैन का विवाह जैन परिवार में ही हो इस उद्देश्य को सामने रखकर जैन लड़के-लड़कियों की एक पृथक वेबसाइट बनाई गई है । जिसकी सेवाएँ जैन समाज के लिए फ्री मे उपलब्ध कराई जा रही है । यदि आप स्वयं अथवा आपके परिवार का कोई भी सदस्य विवाह योग्य उम्र में है तो आप आज ही अपना निशुल्क रजिस्ट्रेशन करे और अपना जीवन साथी पसंद करने हेतु इस सुविधा का लाभ अवश्य लें ।


वेबसाईट-      www.jainsathi.com

        आवश्यक सूचना-  जैन साथी की स्पेलिंग डालने से पहले सही से चैक करें (SATHI) साथी के अंदर (SA) लगेगा (SAA) नहीं लगेगा ।  
                              
        यह वेबसाइट जो सिर्फ जैन समाज के लिये ही बनाई गई हैं । इस वेबसाइट में रजिस्ट्रेशन करके आप अपना बायो-डाटा भर सकते है तथा उपलब्ध सभी लडके-लडकियों के बायो-डाटा देख सकते हैं ।


        आपसे यह भी विनम्र अनुरोध है की यह मैसेज आप अपने सभी जैन परिचितजैन संघ एवं Jain WhatsApp Groups में अवश्य भेजें ।


इसके अलावा अन्य महत्त्वपूर्ण जानकारी...
         अभी ही भारत सरकार ने  NPR  करने की घोषणा की है । इसमें हम सभी भारतीय नागरिकों की जनगणना की जायेगी । सभी नागरिकों को इसमें अपने व परिवार से सम्बन्धित जानकारी देना है ।

        अतः कृपया ध्यान रखें कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में जाति और धर्म के कालम में  दोनों जगह जैन  ही लिखें । अपना सरनेम (गौत्र) न लिखें । सिर्फ जैन  लिखें । इसका विशेष ध्यान रखें ।

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       यह जानकारी लगातार हर ग्रुप में फारवर्ड करते रहें । हर जैन के मोबाइल में यह जानकारी पहुंचनी ही चाहिए ।


        इस कार्य मे जुड़ना और सभी समाजजनों को इससे जुडने हेतु प्रेरित करना भी जिनशाशन कि प्रभावना तथा साधर्मिक भक्ति है ।  इस पोस्ट को सभी समाजजनों के समक्ष प्रसारित करने में अपना योगदान अवश्य दें ।

 जैनम जयति शाशनम...



29.6.13

रस्साकशी - मानव संग प्रकृति की.


           
          गत 16-17 जून को उत्तराखंड अंचल में हुई त्रासदी की भयावहता बयान करने जैसा नया अब कुछ नहीं बचा है किंतु उसी अवधि में दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक कविता उन पाठकों के लिये जो किसी कारण से उनकी नजरों से ना गुजरी हो हुबहू पेश है-
समाचार चैनल का संवाददाता जोर-जोर से चिल्ला रहा है,
मां गंगा को विध्वंसिनी और सुरसा बता रहा है,
प्रकृति कर रही है अपनी मनमानी,
गांव शहर और सडकों तक भर आया है बाढ का पानी,

नदियों को सीमित करने वाले तटबंध टूट रहे हैं
और पानी को देखकर प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं,
पानी की मार से जनता का जीवन दुश्वार हो रहा है,
गंगा-यमुना का पानी आपे से बाहर हो रहा है,

बैराजों के दरवाजे चरमरा रहे हैं और
टिहरी जैसे बांध भी पानी को रोकने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं,
किसी ने कहा- पानी क्या है साहब तबाही है तबाही,
प्रकृति को सुनाई नहीं देती मासूमों की दुहाई,

नदियों के इस बर्ताव से मानवता घायल हुई जाती है,
सच कहे तो बरसात के मौसम में नदियां पागल हो जाती हैं,

ये सब सुनकर माँ गंगा मुस्कराई और बयान देने जनता की अदालत में चली आई,

जब कठघरे में आकर माँ गंगा ने अपनी जुबान खोली,
तो वो करुणापूर्ण आक्रोश में कुछ यूं बोली,

मुझे भी तो अपनी जमीन छिनने का डर सालता है,
और मनुष्य मेरी निर्मल धारा में सिर्फ कूडा-करकट डालता है,
धार्मिक आस्थाओं का कचरा मुझे झेलना पडता है,
जिंदा से लेकर मुर्दों तक का अवशेष अपने भीतर ठेलना पडता है,

अरे, जब मनुष्य मेरे अमृत से जल में पोलीथिन बहाता है,
जब मरे हुए पशुओं की सडांध से मेरा जीना मुश्किल हो जाता है,
जब मेरी निर्मल धारा में आकर मिलता है
शहरी नालों का बदबूदार पानी
तब किसी को दिखाई नहीं देती मनुष्यों की मनमानी,

ये जो मेरे भीतर का जल है इसकी प्रकृति अविरल है,
किसी भी तरह की रुकावट मुझसे सहन नहीं होती है,
फिर भी तुम्हारे अत्याचार का भार धाराएं अपने ऊपर ढोती हैं
तुम निरंतर डाले जा रहे हो मुझमें औद्योगिक विकास का कबाड,
ऐसे ही थोडी आ जाती है ऐसी प्रलयंकारी बाढ.

मानव की मनमानी जब अपनी हदें लांघ देती हैं
तो प्रकृति भी अपनी सीमाओं को खूंटी पर टांग देती है,
नदियों का पानी जीवनदायी है,
इसी पानी ने युगों-युगों से खेतों को सींचकर मानव की भूख मिटाई है


पर मानव, ये तो स्वभाव से ही आततायी है,
इसने निरंतर प्रकृति का शोषण किया,
और अपने स्वार्थों का पोषण किया
नदियों की धारा को ये बांधता चला गया,
मीलों फैले मेरे पाट को कांक्रीट के दम पर पाटता गया,

सच तो ये है कि मनुष्य निरंतर नदियों की ओर बढता आया है,
नदियों की धारा को संकुचित कर इसने शहर बसाया है,
ध्यान से देखें तो आप समझ जाएंगे,
कि नदी शहर में घुसी है या शहर ही नदी में घुस आया है,

जिसे बाढ का नाम देकर मनुष्य हैरान-परेशान है,
ये तो दरअसल गंगा का नेचुरल सफाई अभियान है,
यही तो नदियों का नेचुरल सफाई अभियान है.

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