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29.6.11

एक थे शंभू महादेव राव


          वर्षों पूर्व एक फिल्म आई थी नाम था आंसू बन गये फूल. फिल्म के कलाकारों में हीरो देव मुखर्जी थे जिनका रोल एक उद्दंड कालेज छात्र का था, हीरोईन संभवतः तनूजा थी और उसी कालेज के आदर्शवादी प्रिंसीपल की भूमिका निभा रहे थे दादामुनि अशोक कुमार । इसी फिल्म का एक विशेष किरदार अत्यंत खूंखार गुंडे की भूमिका में शंभू महादेवराव नामक पात्र का था जिसके लिये फिल्म के निर्माता निर्देशक ने हिंदी फिल्मों के मशहूर खलनायक प्राण का चुनाव किया था । पूरी फिल्म किसी सफल बंगाली फिल्म का रीमेक ही थी, हिन्दी संस्करण के लिये भी पूरी टीम करीब-करीब बंगाल से जुडे कलाकारों की ही थी जिसमें प्राण जैसे इक्के-दुक्के कलाकार ही ऐसे रहे होंगे जिनका शायद बंगाली पृष्ठभूमि से कोई जुडाव नहीं रहा हो ।

          पूर्व की सफल बंगाली फिल्म जिसके रीमेक में यह फिल्म हिन्दी में बन रही थी इसके बंगाली संस्करण में शंभू महादेवराव का किरदार जिस बंगाली अभिनेता ने निभाया था उसका अभिनय ही उस फिल्म का सबसे सशक्त पक्ष रहा था अतः निर्माता-निर्देशक चाह रहे थे कि प्राण कम से कम एक बार उस बंगाली फिल्म में उस कलाकार को शंभू महादेवराव के रोल में अभिनय करते देख लें जिससे कि हिन्दी संस्करण में इस पात्र की भूमिका के साथ अभिनेता प्राण पूरा न्याय कर सकें । उनके सामूहिक आग्रह पर प्राण ने बहुत ध्यान से सोचने के बाद भी विन्रमतापूर्वक हिन्दी फिल्म के बनने से पहले उस बंगाली संस्करण की फिल्म देखने का उनका अनुरोध यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि जब आपने मुझे यह रोल दिया है तो मुझे मेरे तरीके से ही इसे करने दीजिये । निर्माता-निर्देशक ने अभिनेता प्राण के इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया । हिन्दी फिल्म आंसू बन गये फूल बनी और उस फिल्म का जो सबसे सशक्त पक्ष सामने आया वह प्राण का यही शंभू महादेवराव वाला किरदार ही रहा जिसके लिये इस फिल्म की समूची टीम ने एकमत से यह स्वीकार किया कि प्राण ने जो भूमिका इस पात्र के रुप में इस फिल्म में अभिनीत की उसके समक्ष बंगाली फिल्म के उस कलाकार का अभिनय जो इसी किरदार का उस बंगाली कलाकार ने निभाया था वह प्राण के अभिनय की उत्कृष्टता से बहुत पीछे छूट गया था ।
 
          यहाँ इस घटना का उल्लेख क्यूँ ? दरअसल हम जीवन में जिस भी क्षेत्र में जाते हैं वहाँ उस क्षेत्र के कुछ सुस्थापित सफल नाम ऐसे भी हमारे सामने आते हैं जो हमारे लिये किसी न किसी रुप में प्रेरणास्तोत्र  बन जाते हैं । वहाँ कभी ऐसा भी लगता है कि यदि हम इनकी कार्यशैली का अनुसरण करें तो हमें अधिक तेजी से सफलता मिल सकती है जबकि उनका अनुसरण कर लेने के प्रयास में हम उन जैसे तो बन नहीं पाते बल्कि अपनी स्वयं की मौलिकता और गंवा बैठते हैं । अतः जिन्दगी में हमारा कार्यक्षेत्र चाहे जो रहे हम अपने उन प्रेरणास्तोत्रों से प्रेरणा भले ही लें किन्तु स्वयं की समझ-बूझ के साथ यदि अपनी मौलिक शैली को ही कायम रखते हुए अपनी ओर से श्रेष्ठतम परिणाम देने के प्रयास के साथ ही यदि हम अपना कार्य करते रहें तो निश्चय ही किसी की नकल के बगैर भी उस क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान अधिक आसानी से बनाई जा सकती है ।

          वास्तविक जीवन में कई बार ऐसे अनुभव स्वयं भी देखने में आते हैं और इस फिल्म की भूमिका के माध्यम से अभिनेता प्राण का ये उदाहरण भी इसी तरीके को अधिक अहमियत देता दिखता  है ।
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