3.1.11

उम्मीद पे कायम दुनिया.

             देश भर में नूतन वर्ष के स्वागतम्-अभिनन्दनम् के नाम पर जनता जनार्दन द्वारा 31 दिसम्बर की मध्यरात्रि में हजारों हजार पेग गले में उंडेलते हुए, रात-रात भर मलाईका, केटरीना, राखी और ऐसी अनेकों महान नर्तकियों के 'हुस्न के लाखों रंग' टाईप के नृत्य का नामी-गिरामी होटलों में रात्रिकालीन आनन्द लुत्फ उठाते हुए व ई-मेल, एस एम एस व टेलीफोनिक माध्यमों से एक दूसरों को देश-दुनिया में करोडों की तादाद में शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते हुए आखिर आ ही पहुँचे हैं हम सब 2011 के इस नये वर्ष में ।
 
           
क्या ये सही समय हो सकता है इस बात को सोचने का कि आखिर इस 2011 में सामान्य नागरिक के पास अमन-चैन से जी पाने के नाम पर क्या कुछ नया मिल पाना है । कुछ बडी समस्याएँ जो जाने अनजाने हममें से हर किसी को प्रभावित कर  रही हैं, उन पर एक नजर-
 
            
भ्रष्टाचार-  बडे से बडे खुलते जा रहे घोटालों के साथ हम इस नूतन वर्ष में प्रविष्ट हो रहे हैं और सुधार की कोई गुंजाईश कहीं दिखती नहीं है । क्योंकि जिनके हाथों में सत्ता है उन्हे पहले वोट खरीदने, फिर सत्ता सुरक्षित रखने, फिर अपना उत्तराधिकारी सुरक्षित रखने और इन सब माध्यमों से अपना आने वाला कल इन्श्योर्ड रखने के लिये बेशुमार धन की आवश्यकता बनी ही रहनी है । इसलिये इनकी ओर से भ्रष्टाचार उन्मूलन की दिशा में कोई ठोस सुधारात्मक प्रयास हो पावें यह सोच पाना मृग-मरीचिका से ज्यादा कुछ नहीं लगता, जो छोटी-बडी मछलियां कानून के शिकंजे में आ रही हैं उनके पास भी इस विकल्प की पर्याप्त गुंजाईशें बनी ही रहनी हैं कि लेके रिश्वत पकडे गए तो देके रिश्वत छूट जा । बचे हम सामान्य देशवासी, तो हमें भी सरकारी आफिसों में अपना काम निकालने के लिये, सम्पत्तिकर, जलकर, आयकर, विक्रयकर बचाने के लिये, लम्बी-चौडी कतारों में पीछे लगकर अपना समय नष्ट होने से बचाने के लिये, अनुपलब्ध दिखाई देने वाले गेस सिलेण्डर की अपने किचन या कार के ईंधन के लिये, यात्रा में बर्थ की आसान उपलब्धि के लिये और न जाने कितने ही ऐसे छोटे-बडे प्रयोजनों के लिये आगे बढकर अहिसाबी मुद्रा के छोटे-मोटे आदान-प्रदान के लिये पहले भी बाध्य होना पडता था और आगे भी इसकी बाध्यता बनी ही रहनी है ।
 
            
आतंकवाद- जनसामान्य से अनचाहे तौर पर चिपका हुआ यह ऐसा भूत है जो पहले जिसकी रक्षा करते हुए दिखता रहा, बाद में उसी को निगलते हुए दिखता चला आ रहा है । एक समय में पंजाब समस्या के निदान के नाम पर अपने तात्कालिक मन्तव्य साधने के लिये पहले कभी इन्दिरा गांधी ने भिण्डरावालां को इसी माध्यम से अपना हथियार बनाया था और बाद में इसी कौम के उन्हींके सुरक्षाकर्मियों की गोली से विश्व की इस सर्वाधिक शक्तिशाली महिला को अपने प्राण गंवाना पडे थे । फिर तो यह सिलसिला कभी देश के तस्करों व भाईगिरी के माध्यम से हर प्रकार के अनैतिक काम के द्वारा दौलत पैदा करने की चाहत रखने वालों द्वारा राह में आने वाले अपने सभी विरोधियों व दुश्मनों को निपटाने के लिये ऐसा चला कि अनेक देश भी अपने-अपने स्वार्थ साधने की चाहत में इस खेल में पर्दे के पीछे से शामिल होते चले गये । जाहिर है आतंक फैलाकर अपना मकसद पूरा करने की चाहत रखने वाले किसी भी पक्ष के और किसी भी देश के इन प्रयोजनकर्ताओं का मुख्य शिकार राह चलते आम आदमी को पहले भी होते रहना पडा है और आगे भी होते रहना ही पडेगा ।
 
            
मंहगाई- मंहगाई में सामान्य उछाल तो साल-दर-साल सालों पहले से दिखता चला आ रहा है जिसे बढती आबादी के साथ ही जमाखोरी व मुनाफाखोरी से जोडकर भी देखा जाता रहा है किन्तु पिछले लगभग 5 वर्षों में ये मँहगाई जिस विकराल रुप से बढी है इसकी तुलना किसी भी वस्तु के तबके और अबके बाजार मूल्यों को सामने रखकर बखूबी समझी जा सकती है । सामान्यजन की सोच में इसका एक प्रमुख कारण कम्प्यूटर पर आनलाईन कमोडिटी के काल्पनिक सौदौं द्वारा धातुओं और खाद्यान्न सामग्री के वे सौदे बनते हैं जिनमें मात्र 20% पैसा जमा करने के बाद  सम्पन्न व्यापारी उस सौदे को एक महिने तक अपने अधिकार में रखकर अपनी आर्थिक ताकत के आधार पर काल्पनिक मूल्यवृद्धि करता चला जाता है और फिर सामान्य बाजार में हमें भी उन वस्तुओं को उसी बढे हुए भाव में खरीदना पडता है ।
  
           
आखिर इस कमोडिटी व्यवसाय से किसका लाभ हो रहा है और यह खेल जो बगैर जिंसों के मनमानी मात्रा में सौदे करके अति सम्पन्न वर्ग द्वारा खेला जा रहा है सरकार इस ओर से आँख मूंदकर क्यों बैठी है ? बार-बार सरकार इन सौदों की सूचि में खाद्य सामग्रियों को क्यों जुडवा रही है ? क्यों इसके सौदों में ये अनिवार्यता नहीं रखी जा सकती कि यदि सौदा किया है तो पूरा भुगतान करो और अपने माल की डिलीवरी लो ? यदि इन आनलाईन कमोडिटी सौदों की कार्यप्रणाली पर सरकार किसी ईमानदार संकल्प के साथ थोडा भी शिकंजा कसा रख सके तो मंहगाई की समस्या में बहुत कुछ आनुपातिक कमी देखने की पर्याप्त उम्मीद की जा सकती है ।
 
              
परिवहन- जनसामान्य की सार्वजनिक जीवन की एक और बडी समस्या परिवहन बनी हुई है । यहाँ सब तरफ समस्याओं का अंबार लगा दिखता है । जिस गति से जनसंख्या बढ रही है उससे भी तेज गति से देश-दुनिया की जानी-मानी आटोमोबाईल कंपनियां दिन की तीन-तीन शिफ्टों में अपना उत्पादन बढाकर बैंकों के आसान लोन की मदद से सडकों पर वाहनों का जखीरा फैलाती जा रही हैं । सडकें जो आबादी का बढता बोझ ही सहन कर पाने की स्थिति में नहीं हैं उन पर इन बेतहाशा बढते वाहनों का बोझ, खुले भ्रष्टाचार के साये में बनी सडकें जो गड्ढो के रुप में बमुश्किल अपना वजूद दिखाने की कोशिश करती नजर आती हैं इन पर चलते असुरक्षित यात्री 5, 10, 25, 50 के अनुपात में हर छोटे बडे शहरों में रोज एक्सीडेंट का शिकार होकर असमय मौत के आगोश में जा रहे हैं ।
 
             
दुनिया के कई देशों की परिवहन व्यवस्था के अनुसार किसी भी आटोमोबाईल कं. को तब तक लाईसेन्स नहीं दिया जाता जब तक कि वह कम्पनी उस देश में तयशुदा अनुपात में सडकें बनाकर देने का अनुबन्ध स्वीकार न करलें । यदि लायसेन्स राज के भ्रष्टाचार से उपर उठकर सोचा जा सके तो हमारे देश में ऐसा कोई कानून लागू क्यों नहीं किया जा सकता ?
 
             
उपर दर्शित ये असाध्य समस्याएँ जो देश के सभी नागरिकों के जीवन को समान रुप से प्रभावित कर रही हैं, इनके उन्मूलन की दिशा में कोई ठोस पहल इस नूतन वर्ष में यदि शासकिय या अशासकिय स्तर पर होने वाले प्रयास के रुप में दिख सके तो शायद ये इस वर्ष ही नहीं वरन् इस दशाब्दी की श्रेष्ठ उपलब्धि कही जा सकती है. वरना तो यही कहना है-
 
            
न बदले थेन बदलेंगे.  जहाँ थे हम वहीं होंगे,
           
समस्य़ा लाख समझो तुम, तरक्की हम तो समझेंगे.

1.1.11

कामना शुभकामना...





सुप्रभातकारी बेला में
'नजरिया' 
परिवार की ओर से
अपने सभी
पाठकों, समर्थकों, प्रचारकों व अपने
परिचित-अपरिचित साथियों को
इस नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ....

30.12.10

ये कैसा इन्साफ...!

संजू बाबा ये क्या हो रहा है ? 

        पढने मे ऐसा क्यों आ रहा है कि किसी निर्माता को आपने डेट्स  नहीं दी तो कोर्ट ने आपकी सम्पत्ति जब्त करने का फरमान ही  
सुना दिया । इससे पहले तो किसी भी स्टार के साथ ऐसा कोई अन्यायपूर्ण हादसा देखने-सुनने में नहीं आया, और फिर स्टार तो स्टार है मर्जी हो तो ही डेट देगा, बाकि ये अनुबन्ध वगैरह तो मात्र दिखावी औपचारिकताओं से ज्यादा आखिर चीज क्या हैं ?

           मुझे तो आप सितारों के इस सर्वाधिकार सुरक्षित अधिकारों के कई उदाहरण याद आ रहे हैं जब आपके पूर्ववर्ती महानायकों ने अपने इस अधिकार का अपनी सुविधानुसार उपयोग किया-

            सबसे पहले तो अपने जानी भाई राजकुमार जी का उदाहरण दिख रहा है, अरे वही जिन्होंने सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को यह कहते हुए हवा में उडा दिया था कि जानी हम किसी अमिताभ बच्चन को नहीं जानते, हम तो ये जानते हैं कि हम राजकुमार है । इन्होंने तो अपने निर्माता को सिर्फ इसलिये डेट्स देने से इन्कार कर दिया था कि जानी जो तेल अपने सिर में तुम लगाते हो उसकी खुशबू हमें पसन्द नहीं है इसलिये हम तुम्हे डेट्स नहीं दे सकते ।

            फिर अपने शम्मी कपूरजी इनकी लोकप्रियता से कौन परिचित नहीं रहा । ये एक अनार स्टार तो अपने सौ बीमार निर्माताओं से स्वयं इतने त्रस्त रहते थे कि निर्माताओं की लाईन में सिर्फ उसी निर्माता को डेट्स ये दे पाते थे जो इनके स्वनिर्मित ताजे मोरारजी जूस का सबसे पहले पान करके दिखा पाता था ।

            और अपने ची ची भईया अरे वही छोटे-मियां- गोविन्दा,  इनके बारे में तो खबरें यहाँ तक रही कि नये निर्माताओं से छोटा-मोटा डिपाजिट ले लेने के बाद ऐसे छुटभईयों को ये डेट्स देना तो बहुत दूर की बात कभी उनकी तरफ पलटकर देख भी नहीं पाते थे, टाईम ही नहीं होता था । 

            लेकिन आपके ही केस में ये ससुरा कौनसा फैसला सुनने को मिल रहा है । वैसे तो भाई हमें पूरा विश्वास है आपने मुन्नाभाई के रुप में कभी अपनी भाईगिरी से और कभी अपनी गांधीगिरी से इस देश के सामान्यजन की समस्याओं के जो थोक में निदान करवाए हैं वैसा ही कोई अचूक निदान आप यहाँ भी कर ही लेंगे ।


          किन्तु भाई फिर भी थोडी चिन्ता होना तो लाजमी है ना.


28.12.10

बचके रहना रे बाबा बचके रहना रे...

      

इन दिनों समाचार-पत्रों में एक विज्ञापन की बाढ सी आई हुई दिख रही है । बानगी देखिये-

              सभी कम्पनियों के टावर अपनी दुकान,  मकान, प्लाट, खेत, खाली जमीन पर लगवाएँ । 40,00,000/- रु. एडवांस, 40,000/- रु. प्रतिमाह किराया और 15,000/- रु. प्रतिमाह नौकरी स्थायी  रुप से पाएं. 15 साल के पक्के एग्रीमेन्ट के साथ.  सम्पर्क करें- 
                मोबाईल नं. 00000000000,  00000000000.

              2-4 नहीं 16 विज्ञापन तो आज के प्रतिष्ठित समाचार पत्र नईदुनिया में ही देखे जा सकते हैं ।

        एडवांस की रकम जो इस विज्ञापन में 40 लाख रु. दिख रही है वह अलग-अलग विज्ञापनों में 19 लाख रु. से लगाकर 75 लाख रु. तक के आफर के रुप में, मासिक किराया 35 हजार से लगाकर 70 हजार रु. प्रतिमाह, स्थायी नौकरी का आफर 10 हजार से लगाकर 20 हजार रु. प्रतिमाह व पक्का एग्रीमेन्ट 10 वर्ष से लगाकर 20 वर्ष तक सभी विज्ञापनों में अलग-अलग दिखाई दे रहे हैं ।

        एक विज्ञापन जो डोकोमो नेटवर्क सेटेलाईट के नाम से छप रहा है वो लिखता है धोखेबाजों से सावधान. सीधे कम्पनी से सम्पर्क करें.

        ज्ञानवर्द्धन के नाम पर जब इनके दिये गये मोबाईल नंबरों पर फोन किया गया तो लेडी रिशेप्सनिस्ट से उत्तर मिला कि हमारे दिये हुए बैंक A/c. में आप 4,250/- रु. जमा करवा दें व उसकी स्लिप नं. हमें बतादें । हमारे प्रतिनिधि आकर आपका स्पाट चेक कर लेंगे और अप्रूव हो जाने पर आपसे अनुबन्ध करके इस एडवांस राशि का चेक आपको चुकाते हुए टावर लगाने की कार्यवाही पूरी करदी जावेगी । जब उनसे यह पूछा गया कि यदि स्पाट अप्रूव नहीं हो पाया तो हमारे 4250/- रु. का क्या होगा ? तो उनका उत्तर था कि 4,000/- रु. आपको वापस मिल जाएंगे ।

        दूसरा फोन जो डोकोमो नेटवर्क सेटेलाईट के नाम पर लगाया गया तो उनका भी वही उत्तर था कि आप 4,250/- रु. कंपनी के मेनेजिंग डायरेक्टर श्री प्रभुदयाल के नाम से फलां-फलां बैंक में जमा करवा देंहमारे प्रतिनिधि आएंगे..............

        जब उनसे कहा गया कि हम कंपनी से अनुबंध कर रहे हैं तो पैसा भी कंपनी के नाम पर ही क्यों न जमा करवाएँ तो उनका उत्तर था कि नहीं साहब कंपनी की पालिसी के मुताबिक पैसा तो आपको मेनेजिंग डायरेक्टर के नाम पर ही जमा करवाना होगा । हमारे यह पूछने पर कि आप कहाँ से बोल रहे हैं ? उत्तर मिला- चंडीगढ से.

        अब हम इनका सारा गणित समझलें-  यदि इतने बडे देश में इस किस्म के लाखों रु. डिपाजिट, हजारों रु. प्रतिमाह का किराया और हजारों रु. प्रतिमाह की बिना काम या योग्यता की नौकरी का लालच दिखाते हुए सिर्फ 4,250/- रु. की मामूली सी धनराशि दिन भर में 100 लोगों से भी जमा करवाली तो 4 लाख रु. से अधिक का धन बैठे-बिठाये बैंक में जमा हो गया । बदले में आपको कुछ भी न मिले तो भी सिर्फ इस मोबाईल नं. और बैंक A/c. नं. के आधार पर आप कहाँ कहाँ भटक लेंगे । यदि मानलें कि इनका बताया शहर चंडीगढ सही भी है तो आने-जाने में ही इतने पैसे तो खर्च ही हो जाना है, फिर भी इनसे सम्पर्क और आपकी अग्रिम राशि की वसूली आप कर लावें ऐसी कोई सम्भावना दिख पाती है क्या ?

        इसलिये ऐसे किसी भी प्रस्ताव को आप या आपका कोई निकटतम मित्र या परिजन स्वीकार कर पाने की स्थिति में यदि हों भी तो किन पूर्व सावधानियों की आवश्यकता हो सकती है यह आप अवश्य देखलें ।


26.12.10

कैसे-कैसे महापुरुष !

     क सज्जन हैं हीरालालजी । नाम ही जब हीरालाल हो तो कुछ काम-धाम करने का तो सवाल ही नहीं बचता । लिहाजा अपने पिता की इकलौती सन्तान होने के अधिकारस्वरुप पिता के गुजरते ही उनकी जिन्दगी भर की बचत को अपने कब्जे में करने के बाद बूढी माँ को कोठरी में पटक दिया । माँ का रिश्तेदारी व समाज में आना-जाना बन्द और जो जैसा भोजन मिल जाए खालो और पडे रहो वाली स्थिति में छोडकर दिन में तो आप सट्टे में पैसा बढाने की जुगत बिठाते रहते और रात में बच्चे पैदा करने में । माँ घुट-घुटकर जल्दी मर गई और बाप का संचित पैसा भी रास्ते लग गया, लेकिन अजगर करे ना चाकरी और पंछी करे न काम वाली शैली में दिन भर मटरगश्ती करते रहने का उनका क्रम जारी रहा । तब तक पत्नि भी एक-एक करके तीन पुत्री व एक पुत्र को जन्म दे चुकी थी, और परिवार की ये सारी जिम्मेदारीयां उन हीरालालजी की बला से ।

            अब गाज गिरनी चालू हुई उनकी पत्नि पर, वो बेचारी अपने बच्चों को भूखा-प्यासा कैसे और कब तक देख पाती । लिहाजा दूसरों के घरों में छोटे-छोटे काम करके व बचे हुए समय में पापड बेलकर और शादी-ब्याह के अवसरों पर मेंहदी मांडकर जैसे-तैसे वो अपने पतिदेव सहित सारे घर का खर्चा चलाती रही । जान-पहचान के लोगों व रिश्तेदारों की मदद से जोड-जुगाड कर समय आने पर दो लडकियों की शादी भी पत्नि ने अपने बलबूते पर कामचलाऊ लडकों के साथ करवा दी । लेकिन उसकी शारीरिक मशीन भी कब तक जोर मारती, हाडतोड श्रम, पति का जिम्मेदारियों में कोई रुचि न लेना और गाहे-बगाहे अपने चाय-सिगरेट जैसे खर्चों के लिये मार पीटकर पत्नि से पैसे भी छीन लेना जैसी प्रताडनाओं से गुजरते हुए उसे भी टी. बी. की ऐसी जानलेवा बीमारी लग गई जिसने उसे प्रौढावस्था तक पहुँचने के पूर्व ही मौत के चंगुल में फंसा दिया । तब भी उसने उस बीमार अवस्था में अपने पति के लक्षणों को देखते हुए सबसे छोटी व सुन्दर लडकी जो उस समय बमुश्किल 13-14 वर्ष की रही होगी का विवाह मरते-मरते भी एक 24-25 वर्ष के जरुरतमन्द किन्तु सम्पन्न सूर्यमुखी लडके के साथ करा दिया और उस लडकी की शादी के एक महिने के अन्दर ही वह पत्नि भी इस दुनिया से कूच कर गई । 
  
         
अब बचे श्री हीरालाल और उनका तीसरे नम्बर की सन्तान के रुप में मौजूद इकलौता लडका । कुछ समय तो लडके ने छोटे-मोटे काम करके बाप-बेटे का खर्चा चलाने के लिये इधर-उधर हाथ पैर मारे, लेकिन आखिर उसकी रगों में भी अपने अकर्मण्य पिता का खून दौड रहा था, वो भी कब तक मेहनत मजदूरी कर पाता । लिहाजा कुछ काम कर पाना उसके भी बस की बात नहीं रही । तब समाज के कुछ लोगों ने उन बाप-बेटों को मन्दिर में रहने वाले असहाय वृद्ध लोगों के साथ रहने की व्यवस्था करवा दी । अब वो संड-मुसंड हीरालालजी और उनका लडका समाज पर बोझ बनी स्थिति में शान से मन्दिर में रहकर मुफ्त का खा-पी रहे हैं और उनकी भाषा में ऐश से जी रहे हैं ।

           ये तो थे मुझसे बुजुर्ग वर्ग के लोगों के अनुभव अब एक अनुभव अपने हमउम्र साथी श्री कैलाश जैन का । साईन्स की पढाई ग्रेजुएशन के बीच में ही छोडकर ये अपने लिये ऐसा कोई व्हाईट कालर जाब ढूंढने लगे, जिसमें मेहनत न करनी पडे । ऐसा जाब न मिलना था न मिला । उस दौर में कलकत्ता की एक MLM कंपनी दि पिअरलेस जनरल फाईनेन्स एन्ड इन्वेस्टमेंट कंपनी का बहुत बोलबाला था । सन् 1980 से 1984 के मध्य मैं भी उस कंपनी को अपनी सेवाएँ दे रहा था । मुझे देखकर इन्होंने भी उसमें काम करना चालू किया और लोगों से जुडने और उन्हें जोडने के काम में ये भी लग गये ।
 
         
चूंकि मेहनत इनसे होती नहीं थी और शानदार जिन्दगी जीना इनकी चाहत में शामिल था अतः ये अपने विवाह के लिये कोई ऐसी लडकी तलाशने लगे जिसका पिता इन्हें अच्छी व सुन्दर लडकी के साथ ही एकाध घरु मकान और बैंक-बैलेन्स भी दे सके । यहाँ भी बिल्ली के भाग्य का छिंका न टूटना था और न टूटा । लिहाजा इन्हीं की टीम में शामिल एक लडकी जिसका पिता मिल में नौकरी पूरी करके स्वर्गवासी हो चुका था और मां-बेटी अकेले अपना जीवन-यापन कर रहे थे उस लडकी से इन्होंने यह सोचकर शादी करली कि पिता की सारी भविष्यनिधि तो इन्हे ही मिलनी है । वहाँ यदि इन्हे थोडा कुछ मिला भी तो वो ऐसा तो कतई नहीं था जिससे तीन प्राणियों की जिन्दगी गुजर जावे । जब तक वह माँ शान्त हुई तब तक इनके भी दो बच्चे एक लडका व एक लडकी हो चुके थे । पिअरलेस का काम समस्याओं की अधिकता के कारण बन्द हो चुका था और बिना मेहनत के जिन्दगी गुजारने के अपने सिद्धान्त पर ये तब भी चल रहे थे । नतीजा आज के इस प्रतिस्पर्धी युग में इनके वे बच्चे स्कूल में प्राथमिक शिक्षण भी नहीं ले पाये । इधर अभावग्रस्त जिन्दगी और टाईमपास नशों का शौक इनके भी शरीर को जर्जर करता चला गया । तब इनकी 16 वर्ष की कन्या ने किसी परिचित युवक से इनसे यह कहते हुए शादी करली कि पापा आप तो कुछ कर पाओगे नहीं । इसलिये मैं यह रिश्ता जोड रही हूँ । 
  
       
कुछ समय बाद पता चला कि इनकी वह लडकी वापस इनके ही साथ रहने आ गई है । उसके स्वयं द्वारा निर्धारित उस वैवाहिक सम्बन्ध का क्या हुआ ? राम जाने । अब ये दोनों पति-पत्नि हड्डियों का ढांचा बने बीमारियों से जूझते हुए जिन्दा रहने की जद्दोजहद कर रहे हैं । इनकी दोनों सन्तान किस हाल में होंगी ये उन्हींसे बेहतर और कौन जान सकता है
    
          
र अन्त में बात मेरे बाद वाली पीढी की- मेरे ही एक मित्र जो दिनभर बाजार में घूमकर कठोर परिश्रम द्वारा आफिसों में उपयोगी सामग्री सप्लाय करते हुए अपनी पत्नि व दो लडकों के परिवार को पालते आ रहे हैं उनके बडे लडके की तो संयोगवश शासकीय सर्विस लग गई, उसकी शादी हो गई और बच्चे भी हो गये । किन्तु छोटा लडका-  उसने पहले साईन्स पढा, फिर उसे बीच में छोडकर PMT करने बैठ गया । फैल होने के बाद फिर PMT में बैठा, फिर फैल । तब तक आगे पढने की उम्र भी समाप्त हो गई थी । फिर अपने पिता से कहकर ज्योतिष का कोर्स किया । काम-धाम कुछ करना नहीं और सुबह 5 बजे से उठकर अपनी भाभी के कामों में मीन मेख निकालने बैठ जाना । सुबह 5 से रात्रि 11 बजे तक करीब तीन बार मंदिर जाकर 5-6 घंटे वहीं रहना और बस बाकि समय घर में बैठकर पराए घर की लडकी का जीना दूभर करना, यही इनकी कुल दिनचर्या हो गई है । बाप कमाई पर जिन्दा हैं, उम्र 30 पार हो चुकी है । मैंने जब मित्र को सुझाव दिया कि यदि किसी भी काम में इसका मन नहीं लगता तो इसे घर से क्यों नहीं निकाल देते । शरीर की भूख-प्यास और नींद की जरुरत ही सब दुनियादारी इसे अपने आप सिखा देगी । तब मेरे वे हमउम्र मित्र कहने लगे कि मेरी पत्नि इसलिये ऐसा नहीं चाहती कि अचानक उस संघर्ष का सामना न कर पाने के कारण कभी ये कुए-बावडी में कूद जावे तो ? देर-सवेर इनकी भी शादी कहीं न कहीं तो हो ही जाएगी, और आगे फिर किसी बदले हुए रुप में वही कहानियां चलेंगी जो हम उपर के उदाहरणों में देख रहे हैं ।
  
          
इन सभी अकर्मण्य पुरुषों को खाने व पहनने को तो अच्छे से अच्छा चाहिये ही इसके साथ ही स्त्री देह का सुख भी इनकी प्राथमिकता में साथ-साथ चलता है जो कि प्राकृतिक रुप से इन्सान की नैसर्गिक आवश्यकता भी है ही । लेकिन इनकी इस पुरुषार्थहीन अकर्मण्य जिन्दगी का खामियाजा किसे भुगतना पडता है ? सबसे पहले इनके मां-बाप को जिन्हे उम्र के सिद्धान्त के मुताबिक थोडे समय ही भुगतना पडता है, दूसरे नम्बर पर इनकी पत्नि को जिसका जीवन जीतेजी अभावों और फाकाकशी के कारण नर्क से भी बदतर हो जाता है, और फिर इनकी सन्तान को जो अभाव, अशिक्षा और कुण्ठा के बीच पलते हुए बडे होते हैं और जिन्दगी भर इन्हे कोसते रहते हैं ।

         
क्या पूत के पांव पालने में देखकर ऐसे बच्चों के मां-बाप को अपने माया-मोह से परे सोचकर बिल्कुल सख्त रुख अपनाते हुए समय रहते ही इन्हें पूरी तरह से घर से बेदखल करके इन्हे इनके हाल पर नहीं छोड देना चाहिये ? जिससे कि मन से या बेमन से ये स्वयं के लिये आवश्यक राशि कमाना सीखने के साथ ही कम से कम अपनी पत्नि व आने वाले एक या दो बच्चों का भरण-पोषण स्वयं के बल पर करना सीख सकें ।
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