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19.5.16

फलसफा जिंदगी का...


          एक उद्योगपति आवश्यक मीटिंग के लिये कहीं जा रहा था । अचानक रास्ते में उसकी कार बंद हो गई । रुकने का समय नहीं था अतः उसने कार की रिपेरिंग व घर पहुंचाने की जिम्मेदारी ड्रायवर पर छोडते हुए कुछ दूर खडे एक ऑटो-रिक्शा को आगे चलने के लिये प्लान किया । जब वह उस ऑटो तक पहुँचा तो उसने देखा कि उसका चालक पूरी रिलेक्स मुद्रा में अपना कोट उतारकर पैसेन्जर सीट पर पसरी हुई अवस्था में आराम करते हुए कोई फिल्मी गीत गुनगुना रहा था । उद्योगपति ने जब उसे चलने के लिये कहा तो वह 20/- रु. किराया बताते हुए उनके बैठने की जगह साफ करते हुए उठ खडा हुआ । उद्योगपति यह सोचते हुए उसकी रिक्शा में सवार हो गया कि सिर्फ 20/- रु. किराया लेकर भी उसी रिलेक्स मुद्रा में वैसे ही गीत गुनगुनाते हुए वह इतना निश्चिंत जीवन कैसे जी पा रहा है ठिकाने पर पहुँचकर उन्होंने उसे पैसे देते हुए फिर पूछा कि 15-20 मिनीट इन्तजार करके मुझे मेरे इस ठिकाने तक छोड सकोगे । चालक ने फिर 30/- रु. किराया बताया और व्यवसायी का ईशारा पाकर वहीं रुक गया । 

           वापसी में भी उस व्यवसायी ने उसे उसी निश्चिंत मुद्रा में चलते देखा । कुछ सोचकर उसने उस चालक को अपने घर भोजन करने के लिये निमंत्रित किया जिसे उस चालक ने सहर्ष स्वीकार कर लिया । घर पहुँचने पर अपने प्रमुख सेवक को उसने अपने साथ उस ऑटो चालक के लिये शाही डिनर का इंतजाम करने का ईशारे में निर्देश दिया । भोजन का समय चल ही रहा था - कुछ ही देर में डाईनिंग टेबल पर सूप, डेजर्ट, स्वीट्स व हर तरह के लजीज भोजन से डाईनिंग टेबल सज गया ।

          व्यवसायी ने उसे डाईनिंग टेबल पर निमंत्रित कर भोजन शुरु किया तो वह ये देखकर फिर हैरान हो गया कि वह ऑटो चालक बगैर किसी विशेष भाव अथवा प्रतिक्रिया के ऐसे खाना खाते दिख रहा था जैसे अपना सामान्य भोजन कर रहा हो । तब एक कदम आगे बढते हुए व्यवसायी ने उसे अपने यहाँ ही भोजन पश्चात् आराम करने का निमंत्रण दिया और उस ऑटो चालक ने वह भी मान लिया ।

         
उद्योगपति के इशारे पर उस ऑटो चालक को भोजन के बाद फाईव स्टार होटल के समकक्ष रुम में विश्राम के लिये ठहरा दिया और वहाँ भी वह व्यवसायी कुछ छुपकर उसकी प्रतिक्रिया को नोट करने लगा । घोर आश्चर्य के साथ वहाँ भी उसने देखा कि उसके चेहरे पर कहीं कोई विशेष प्रसन्नता अथवा विस्मय के भाव नहीं आये और वो वैसे ही निश्चिंत मुद्रा में आराम करते दिखा ।

          तब उस उद्योगपति ने सोचा कि अब यदि इसे अचानक इसके ऑटो पर छोड दिया जावे तो निश्चय ही इसे यहाँ के चकाचौंध भरे ये सुख-सुविधा पूर्ण साधनों की कमी महसूस होते दिखेगी । उस मुताबिक उसने अपने प्रमुख सेवक को इशारा किया और उस सेवक ने उस चालक के पास जाकर पूछा कि आप यहाँ आराम व मजे में हैं हाँ बिल्कुल, उस ऑटो चालक ने जवाब दिया, तब वह सेवक बोला कि नहीं हमारे साहब को लग रहा है कि आप यहाँ अपनी निजी जिंदगी को मिस कर रहे हैं - इसलिये आपको आपके ठिकाने पर छोड दिया जावे । कोई बात नहीं ! कहते हुए तत्काल वह ऑटो चालक उठकर चल पडने की मुद्रा में तैयार हो गया ।  

          उस ऑटो चालक को तत्काल गाडी में बैठाकर वहाँ ले जाया गया जहाँ उसका ऑटो खडा हुआ था । वह उद्योगपति भी उसकी बदली हुई प्रतिक्रिया देखने दूसरी गाडी में स्वयं को छुपाते हुए वहाँ तक पहुँचा और फिर यह देखकर चमत्कृत रह गया कि बिल्कुल सामान्य भाव से उस चालक ने अपनी सीट झटकारी और फिर से अधलेटी मुद्रा में अपना वही गीत गुनगुनाने लगा । अब तो उस उद्योगपति से रहा नहीं गया और वह उसके पास जाकर बोला - यार तुम गजब आदमी हो, मैंने तुम्हें इतने उंचे-नीचे परिवर्तन पिछले कुछ घंटों में महसूस करवाये किंतु कहीं भी तुम्हारी विस्मयकारी अथवा दुःखी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली । ऐसा कैसे ?

          तब उस ऑटो चालक का जवाब स्मरण रखने योग्य था - साहब, जिंदगी तो हर किसी की हर समय परिवर्तनों से भरी ही रहती है यदि मैं सुख में पगलाने लगूँ और फिर दुःख में विचलित रहने लगूँ तो मेरे लिये तो अनावश्यक रुप से मेरी उर्जा के अपव्यय का रोज कोई ना कोई कारण तो बना ही रहेगा और मैं कभी खुशी व कभी दुःखों के अतिरेक में अपनी स्वाभाविक जिंदगी कभी जी ही नहीं पाऊंगा ।

         
जबकि हममें से अधिकांश लोग खुशी में बौराये हुए और दुःखों में घबराये हुए ही अपनी जिंदगी गुजार रहे होते हैं और अपनी सामान्य शारीरिक उर्जा को अनावश्यक रुप से खर्चते हुए कभी भी वास्तविक रुप से सुखी नहीं रह पाते ।

         
इसलिये हमें भी जीवन का मुख्य सिद्धांत यही रखना चाहिये कि-

कर्णण्येवादिकारस्ते माफलेषु कदाचन...

व्यस्त रहो,  मस्त रहो और बदले में स्वस्थ रहो.

जियो तो ऐसे जियो जैसे सब तुम्हारा है,
मरो तो ऐसे कि जैसे तुम्हारा कुछ भी नहीं ।

26.12.10

कैसे-कैसे महापुरुष !

     क सज्जन हैं हीरालालजी । नाम ही जब हीरालाल हो तो कुछ काम-धाम करने का तो सवाल ही नहीं बचता । लिहाजा अपने पिता की इकलौती सन्तान होने के अधिकारस्वरुप पिता के गुजरते ही उनकी जिन्दगी भर की बचत को अपने कब्जे में करने के बाद बूढी माँ को कोठरी में पटक दिया । माँ का रिश्तेदारी व समाज में आना-जाना बन्द और जो जैसा भोजन मिल जाए खालो और पडे रहो वाली स्थिति में छोडकर दिन में तो आप सट्टे में पैसा बढाने की जुगत बिठाते रहते और रात में बच्चे पैदा करने में । माँ घुट-घुटकर जल्दी मर गई और बाप का संचित पैसा भी रास्ते लग गया, लेकिन अजगर करे ना चाकरी और पंछी करे न काम वाली शैली में दिन भर मटरगश्ती करते रहने का उनका क्रम जारी रहा । तब तक पत्नि भी एक-एक करके तीन पुत्री व एक पुत्र को जन्म दे चुकी थी, और परिवार की ये सारी जिम्मेदारीयां उन हीरालालजी की बला से ।

            अब गाज गिरनी चालू हुई उनकी पत्नि पर, वो बेचारी अपने बच्चों को भूखा-प्यासा कैसे और कब तक देख पाती । लिहाजा दूसरों के घरों में छोटे-छोटे काम करके व बचे हुए समय में पापड बेलकर और शादी-ब्याह के अवसरों पर मेंहदी मांडकर जैसे-तैसे वो अपने पतिदेव सहित सारे घर का खर्चा चलाती रही । जान-पहचान के लोगों व रिश्तेदारों की मदद से जोड-जुगाड कर समय आने पर दो लडकियों की शादी भी पत्नि ने अपने बलबूते पर कामचलाऊ लडकों के साथ करवा दी । लेकिन उसकी शारीरिक मशीन भी कब तक जोर मारती, हाडतोड श्रम, पति का जिम्मेदारियों में कोई रुचि न लेना और गाहे-बगाहे अपने चाय-सिगरेट जैसे खर्चों के लिये मार पीटकर पत्नि से पैसे भी छीन लेना जैसी प्रताडनाओं से गुजरते हुए उसे भी टी. बी. की ऐसी जानलेवा बीमारी लग गई जिसने उसे प्रौढावस्था तक पहुँचने के पूर्व ही मौत के चंगुल में फंसा दिया । तब भी उसने उस बीमार अवस्था में अपने पति के लक्षणों को देखते हुए सबसे छोटी व सुन्दर लडकी जो उस समय बमुश्किल 13-14 वर्ष की रही होगी का विवाह मरते-मरते भी एक 24-25 वर्ष के जरुरतमन्द किन्तु सम्पन्न सूर्यमुखी लडके के साथ करा दिया और उस लडकी की शादी के एक महिने के अन्दर ही वह पत्नि भी इस दुनिया से कूच कर गई । 
  
         
अब बचे श्री हीरालाल और उनका तीसरे नम्बर की सन्तान के रुप में मौजूद इकलौता लडका । कुछ समय तो लडके ने छोटे-मोटे काम करके बाप-बेटे का खर्चा चलाने के लिये इधर-उधर हाथ पैर मारे, लेकिन आखिर उसकी रगों में भी अपने अकर्मण्य पिता का खून दौड रहा था, वो भी कब तक मेहनत मजदूरी कर पाता । लिहाजा कुछ काम कर पाना उसके भी बस की बात नहीं रही । तब समाज के कुछ लोगों ने उन बाप-बेटों को मन्दिर में रहने वाले असहाय वृद्ध लोगों के साथ रहने की व्यवस्था करवा दी । अब वो संड-मुसंड हीरालालजी और उनका लडका समाज पर बोझ बनी स्थिति में शान से मन्दिर में रहकर मुफ्त का खा-पी रहे हैं और उनकी भाषा में ऐश से जी रहे हैं ।

           ये तो थे मुझसे बुजुर्ग वर्ग के लोगों के अनुभव अब एक अनुभव अपने हमउम्र साथी श्री कैलाश जैन का । साईन्स की पढाई ग्रेजुएशन के बीच में ही छोडकर ये अपने लिये ऐसा कोई व्हाईट कालर जाब ढूंढने लगे, जिसमें मेहनत न करनी पडे । ऐसा जाब न मिलना था न मिला । उस दौर में कलकत्ता की एक MLM कंपनी दि पिअरलेस जनरल फाईनेन्स एन्ड इन्वेस्टमेंट कंपनी का बहुत बोलबाला था । सन् 1980 से 1984 के मध्य मैं भी उस कंपनी को अपनी सेवाएँ दे रहा था । मुझे देखकर इन्होंने भी उसमें काम करना चालू किया और लोगों से जुडने और उन्हें जोडने के काम में ये भी लग गये ।
 
         
चूंकि मेहनत इनसे होती नहीं थी और शानदार जिन्दगी जीना इनकी चाहत में शामिल था अतः ये अपने विवाह के लिये कोई ऐसी लडकी तलाशने लगे जिसका पिता इन्हें अच्छी व सुन्दर लडकी के साथ ही एकाध घरु मकान और बैंक-बैलेन्स भी दे सके । यहाँ भी बिल्ली के भाग्य का छिंका न टूटना था और न टूटा । लिहाजा इन्हीं की टीम में शामिल एक लडकी जिसका पिता मिल में नौकरी पूरी करके स्वर्गवासी हो चुका था और मां-बेटी अकेले अपना जीवन-यापन कर रहे थे उस लडकी से इन्होंने यह सोचकर शादी करली कि पिता की सारी भविष्यनिधि तो इन्हे ही मिलनी है । वहाँ यदि इन्हे थोडा कुछ मिला भी तो वो ऐसा तो कतई नहीं था जिससे तीन प्राणियों की जिन्दगी गुजर जावे । जब तक वह माँ शान्त हुई तब तक इनके भी दो बच्चे एक लडका व एक लडकी हो चुके थे । पिअरलेस का काम समस्याओं की अधिकता के कारण बन्द हो चुका था और बिना मेहनत के जिन्दगी गुजारने के अपने सिद्धान्त पर ये तब भी चल रहे थे । नतीजा आज के इस प्रतिस्पर्धी युग में इनके वे बच्चे स्कूल में प्राथमिक शिक्षण भी नहीं ले पाये । इधर अभावग्रस्त जिन्दगी और टाईमपास नशों का शौक इनके भी शरीर को जर्जर करता चला गया । तब इनकी 16 वर्ष की कन्या ने किसी परिचित युवक से इनसे यह कहते हुए शादी करली कि पापा आप तो कुछ कर पाओगे नहीं । इसलिये मैं यह रिश्ता जोड रही हूँ । 
  
       
कुछ समय बाद पता चला कि इनकी वह लडकी वापस इनके ही साथ रहने आ गई है । उसके स्वयं द्वारा निर्धारित उस वैवाहिक सम्बन्ध का क्या हुआ ? राम जाने । अब ये दोनों पति-पत्नि हड्डियों का ढांचा बने बीमारियों से जूझते हुए जिन्दा रहने की जद्दोजहद कर रहे हैं । इनकी दोनों सन्तान किस हाल में होंगी ये उन्हींसे बेहतर और कौन जान सकता है
    
          
र अन्त में बात मेरे बाद वाली पीढी की- मेरे ही एक मित्र जो दिनभर बाजार में घूमकर कठोर परिश्रम द्वारा आफिसों में उपयोगी सामग्री सप्लाय करते हुए अपनी पत्नि व दो लडकों के परिवार को पालते आ रहे हैं उनके बडे लडके की तो संयोगवश शासकीय सर्विस लग गई, उसकी शादी हो गई और बच्चे भी हो गये । किन्तु छोटा लडका-  उसने पहले साईन्स पढा, फिर उसे बीच में छोडकर PMT करने बैठ गया । फैल होने के बाद फिर PMT में बैठा, फिर फैल । तब तक आगे पढने की उम्र भी समाप्त हो गई थी । फिर अपने पिता से कहकर ज्योतिष का कोर्स किया । काम-धाम कुछ करना नहीं और सुबह 5 बजे से उठकर अपनी भाभी के कामों में मीन मेख निकालने बैठ जाना । सुबह 5 से रात्रि 11 बजे तक करीब तीन बार मंदिर जाकर 5-6 घंटे वहीं रहना और बस बाकि समय घर में बैठकर पराए घर की लडकी का जीना दूभर करना, यही इनकी कुल दिनचर्या हो गई है । बाप कमाई पर जिन्दा हैं, उम्र 30 पार हो चुकी है । मैंने जब मित्र को सुझाव दिया कि यदि किसी भी काम में इसका मन नहीं लगता तो इसे घर से क्यों नहीं निकाल देते । शरीर की भूख-प्यास और नींद की जरुरत ही सब दुनियादारी इसे अपने आप सिखा देगी । तब मेरे वे हमउम्र मित्र कहने लगे कि मेरी पत्नि इसलिये ऐसा नहीं चाहती कि अचानक उस संघर्ष का सामना न कर पाने के कारण कभी ये कुए-बावडी में कूद जावे तो ? देर-सवेर इनकी भी शादी कहीं न कहीं तो हो ही जाएगी, और आगे फिर किसी बदले हुए रुप में वही कहानियां चलेंगी जो हम उपर के उदाहरणों में देख रहे हैं ।
  
          
इन सभी अकर्मण्य पुरुषों को खाने व पहनने को तो अच्छे से अच्छा चाहिये ही इसके साथ ही स्त्री देह का सुख भी इनकी प्राथमिकता में साथ-साथ चलता है जो कि प्राकृतिक रुप से इन्सान की नैसर्गिक आवश्यकता भी है ही । लेकिन इनकी इस पुरुषार्थहीन अकर्मण्य जिन्दगी का खामियाजा किसे भुगतना पडता है ? सबसे पहले इनके मां-बाप को जिन्हे उम्र के सिद्धान्त के मुताबिक थोडे समय ही भुगतना पडता है, दूसरे नम्बर पर इनकी पत्नि को जिसका जीवन जीतेजी अभावों और फाकाकशी के कारण नर्क से भी बदतर हो जाता है, और फिर इनकी सन्तान को जो अभाव, अशिक्षा और कुण्ठा के बीच पलते हुए बडे होते हैं और जिन्दगी भर इन्हे कोसते रहते हैं ।

         
क्या पूत के पांव पालने में देखकर ऐसे बच्चों के मां-बाप को अपने माया-मोह से परे सोचकर बिल्कुल सख्त रुख अपनाते हुए समय रहते ही इन्हें पूरी तरह से घर से बेदखल करके इन्हे इनके हाल पर नहीं छोड देना चाहिये ? जिससे कि मन से या बेमन से ये स्वयं के लिये आवश्यक राशि कमाना सीखने के साथ ही कम से कम अपनी पत्नि व आने वाले एक या दो बच्चों का भरण-पोषण स्वयं के बल पर करना सीख सकें ।
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