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24.4.13

सुनिये गाय का दर्द - गाय के ही श्रीमुख से...




                हमारे जन्म के बाद कुछ समय तक तो हमारी माँ हमें दूध पिलाती है किन्तु शेष सारी उम्र पौष्टिकता के लिये हम गाय के दूध पर निर्भर रहते हैं । गाय का सिर्फ दूध ही नहीं बल्कि हमारे स्वस्थ रहने के लिये गौमूत्र व गोबर भी समान रुप से उपयोगी रहता है जिसका लाभ मानव समुदाय विभिन्न तरीकों से जीवन भर लेता रहता है किन्तु हममें से ही कुछ निर्दयी लोग जैसे ही बूढी हो चुकी गाय की दूध देने की क्षमता समाप्त हो जाती है तो उसे माँस उत्पादकों के हाथ बेचकर उसके रक्त की आखरी बूंद तक निचोड लेने से भी परहेज नहीं करते ।

          इन बूढी गायों को खरीदकर कसाई लोग कुछ किलो माँस के लिये उसे बूचडखाने पर पहुँचा देते हैं और निरीह पशु वध का ये व्यवसाय इस कदर फल-फूल रहा है कि पिछले 30 वर्षों में बूचडखानों की संख्या मात्र 350 से बढते हुए 46,000 पर पहुँच गई है । बहुमत में शाकाहारी कहलाने वाले हमारे हिंदु देश में माँस निर्यात में भारत आठवें स्थान पर आ पहुँचा है और पिछले 5 वर्षों में माँस उत्पादन की दर 21% हो गई है ।
 
           इन बूचडखानों में पशुओं की पीडा मरने के बहुत पहले से शुरु हो जाती है । दूर-दूर से पशुओं को ट्रकों में भरकर बूचडखानों तक लाया जाता है । रास्ते में इन पशुओं की खाने-पीने की कोई चिंता करने का प्रश्न ही नहीं उठता । जब तक ये पशु बूचडखानों में पहुँचते हैं वे चलने-फिरने लायक भी नहीं रहते । यहाँ पर इन पशुओं की पहले पूंछ काटी जाती है और उनकी आँखों में मिर्ची पावडर डाला जाता है जिससे तडपते हुए ये बेजुबान पशु आगे की ओर दौडकर एक खुले मैदान में पहुँचते हैं वहाँ हजारों पशुओं को इकट्ठा किया जाता है । फिर इन निरीह पशुओं के पैर तोडकर इनकी आँखें फोड दी जाती हैं ऐसा करने पर ही बूचडखानों के मालिकों को इन पशुओं की उपयोगहीनता का प्रमाण-पत्र प्राप्त होता है ।

          कई दिनों की भूख के कारण पशुओं के खून का हीमोग्लोबिन उनकी चर्बी में आ जाता है और ज्यादा हीमोग्लोबिन वाला माँस ज्यादा पैसे दिलाता है । तत्पश्चात् इन पशुओं को पानी के फव्वारों के नीचे खडा कर उनकी चमडी पर खौलता हुआ पानी डाला जाता है जिससे उनकी चमडी मुलायम पड जाती है । पशु यहाँ आने तक भी सिर्फ बेहोश ही होते हैं, मरते नहीं हैं । इसके बाद एक कन्वेयर बेल्ट पर पशुओं को उल्टा लटकाया जाता है, यहाँ पशुओं की गर्दन को आधा काटा जाता है । इससे पशु का खून बहता है किन्तु पशु मरते नहीं हैं । मरने के बाद पशुओं की चमडी मोटी पडने लगती है जिसका अच्छा दाम नहीं मिलता इसलिये पशुओं को चमडी निकालने तक मरने भी नहीं दिया जाता । पशुओं के जिंदा रहते ही उनकी चमडी निकाल ली जाती है । फिर ये पशु कब मर जाते हैं यह पता ही नहीं चलता । पशुओं की चमडी निकालने के बाद पशु के शरीर को अलग-अलग बांटा जाता है और खाडी देशों को निर्यात कर दिया जाता है ।
 
          यदि हम नीचे लिखी बातों पर विचार करें तो पायेंगे कि गौ रक्षा ही हमारा परम कर्तव्य है-
 

          एक गाय अपने जीवनकाल में 4,10,440 मनुष्यों का एक समय का भोजन जुटाती है जबकि उसके माँस से केवल 50 अधम मांसाहारी लोग ही अपना पेट भर पाते हैं ।

          रासायनिक खाद से जहाँ धरती की उपजाऊ क्षमता को निरन्तर नुकसान पहुँच रहा है उसके स्थान पर यदि गोबर की कम्पोस्ट खाद का प्रयोग किया जावे तो धरती की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति बढती है ।

          गोबर से गैस मुफ्त में प्राप्त होती है । यदि गांव-गांव में गोबर गैस संयंत्र लगा दिये जाएं तो भारत में ईंधन व रसोई गैस की कमी ही न हो । गैस से निकलने वाले गोबर का उपयोग घरती की उर्वरा शक्ति को बढाने में ज्यादा समर्थ होता है और ज्यादा फर्टाईल होता है ।

          आध्यात्मिक पक्ष के मुताबिक हमारे पुराणों में कहा गया है कि जिस देश में गौ रक्त की एक बूंद भी गिरती है उस देश में किये गये योग, तप, भजन, पूजन, दान आदि शुभ कार्य निष्फल हो जाते हैं ।

कृपया इस छोटे से वीडियो को अवश्य देखें-



       सोचें कि कहीं इस क्रूर कृत्य में हमारी प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से सहमति या भागीदारी तो नहीं है ?

        हम अपने देश से माँस निर्यात पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने का अनुरोध करते हैं ।

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई - गौ माता  हम सभी की माई.




जिओ और जीने दो... 



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