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24.1.20

सर्वश्रेष्ठ प्रबंधक...?


      पिछले दिनों बहुचर्चित निर्भया केस में कोर्ट रुम के एक विशेष दृश्य के बारे में समाचारपत्रों में पढा कि मुजरिम को फांसी दी जाए या मुजरिम की फांसी को टाल दिया जाए इस विषय पर दो माताएं न्यायाधीश महोदय के समक्ष अपनी-अपनी भरी आँखों से समुचित न्याय की कामना कर रही थीं, जिनमें एक इस वीभत्स त्रासदी की शिकार हुई निर्भया की मां थी जो अपनी बेटी की युवावस्था में दुर्गति कर उसे अकाल मृत्यु की गोद में पहुंचाने वाले दरिंदो के लिये अविलंब फांसी की सजा की मांग कर रही थी जबकि दूसरी ओर उन्हीं प्रमाणित दरिंदों में से एक की मां थी जो अपने बेटे के जीवन के लिये याचना कर रही थी ।

      इस प्रकरण में हम जितना भी पलटकर पीछे तक देखें, निर्भया के हक की लडाई में जहाँ उसके माता-पिता की सार्वजनिक सक्रियता को गौर से देखा जावे तो उसके पिता से कहीं अधिक मुखर व जुझारु तौर पर उसकी मां ही लगातार अधिक सक्रिय दिखती आ रही हैं ।

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      बहुत पहले किसी कॉर्पोरेट हाउस ने मैनेजमेंट गुरुओं के एक सम्मेलन में प्रश्न पूछा गया था कि आप सफलतम प्रबंधक किसे मानते हैं ? तब विशेषज्ञों ने रोनाल्ड रेगन, नेल्सन मंडेला, चर्चिल, गांधी, टाटा, हेनरी फोर्ड, चाणक्य, बिस्मार्क व इन जैसे कई और नाम अपने उत्तर में बताये थे । किन्तु निर्णायकों के निर्धारित उत्तर था कि सर्वाधिक सफलतम प्रबंधक एक आम गृहिणी" होती है ।

      एक गृहिणी जो परिवार में किसी का भी ट्रांसफर, सस्पेंड या टर्मिनेशन नहीं कर सकती, ना ही किसी को वो अपॉइंट कर सकती है । किंतु फिर भी लगभग सभी से काम करवाने की क्षमता रखती है । किससे, क्या और कैसे करवाना है, कब प्रेम से काम करवाना है और कब झूठी-सच्ची नाराजगी दिखाकर काम निकलवाना है यह वो बखूबी जानती है और इसीलिये सफलतम प्रबंधक के रुप में उससे उपर किसी का स्थान नहीं माना जा सकता ।


      बड़े-बड़े उद्योगों में भी कभी इसलिए काम रुक जाता है कि आवश्यक संसाधन समय पर उपलब्ध नहीं हो पाए । किंतु किसी गरीब से गरीब घर भी नमक जैसी छोटी सी चीज तक भी कभी कम नहीं पड़ती । बहुत याद करने पर भी आप शायद ही कभी ऐसा कोई दिन याद कर पाएं जिस दिन आपको खाने में इसलिए कुछ न मिल पाया हो कि आज घर में बनाने को कुछ नही था या गैस खत्म हो गई थी या प्रेशर कूकर का रिंग खराब हो गया था । कमोबेश हर समस्या का विकल्प सामान्य गृहिणी बिल्कुल खामोशी से अपने घर में रखती है ।

      प्रबंधन एवं संचालन का इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है कि अचानक कोई बड़ा खर्च आ जाने पर या किसी की बीमारी पर जब सब सदस्य सोच में पड जाते हैं, तब भी वो अपने पुराने संदूक या अलमारी में छुपा कर रखे बचत के पैसे निकाल लाती है । आवश्यकता होने पर कभी कुछ गहने गिरवी रख देती है । कुछ परिचित घरों से अपनी साख के आधार पर उधार ले आती है, पर उस समय आवश्यक रकम का जुगाड कर ही लाती है । संकटकालीन अर्थ-प्रबंधन का इससे बेहतर और क्या उदाहरण मिल सकता है ?

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      निचले इलाके के घरों में बेमौसम बारिश में कभी अकस्मात पानी भर जाए, बिना खबर अचानक चार-पांच मेहमान आ जाएं । सब के लिए उसके पास आपदा प्रबंधन की योजना होती है । जबकि इन सभी इंतजाम के लिए उसके पास सिर्फ आंसू और मुस्कान ही माध्यम होते हैं और इसके साथ होता है उसकी जिजीविषा, समर्पण और प्रेम की भावना ।

      सफल गृहिणी का संबल होता है सब्र । जिसके बारे में कहते हैं कि सब्र का घूंट दूसरों को पिलाना ही आसान है, लेकिन यदि ख़ुद को पीना पडे तो एक-एक क़तरा ज़हर समान लगता है । कुशल प्रबंधन के इन नैसर्गिक गुणों से परिपूर्ण उसी गृहिणी को उसके समर्पण के अनुपात में अधिकतम परिवारों में सम्मान प्रायः नहीं मिल पाता है यह देखकर दुःख ही होता है ।


      इन विदेशी महिला का संस्कृत भाषा में मंत्रों का सटीक उच्चारण 
व मंत्रों के प्रति इनकी भावनाएं देखिये...



27.9.19

सबसे अंत में...!

         रोज़ की तरह आज फिर वो ईश्वर का नाम लेकर उठीकिचन में आई, चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाया फिर बच्चों को नींद से जगाया ताकि वे स्कूल के लिए तैयार हो सकें । कुछ ही पलों मे वो अपने सास-ससुर को चाय देकर आयी फिर बच्चों का नाश्ता तैयार किया और इस बीच उसने बच्चों को ड्रेस भी पहनाई फिर बच्चों को नाश्ता कराया ।  पति के लिए दोपहर का टिफिन बनाना भी जरूरी था । इस बीच स्कूल की बस आ गयी और वो बच्चों को बस तक छोड़ने चली गई ।  वापस आकर पति का टिफीन बनाया और फिर मेज़ से जूठे बर्तन इकठ्ठा किये । इस बीच पतिदेव की आवाज़ आई की मेरे कपङे निकाल दो ।  उनको ऑफिस जाने लिए कपङे निकाल कर दिए । 

       अभी पति के लिए उनकी पसंद का नाश्ता तैयार करके टेबिल पर लगाया ही था की छोटी ननद आई और ये कहकर गई की भाभी आज मुझे भी कॉलेज जल्दी जाना है मेरा भी नाश्ता लगा देना ।  तभी देवर की भी आवाज़ आई की भाभी नाश्ता तैयार हो गया क्या अभी लीजिये नाश्ता तैयार हैपति और देवर ने नाश्ता किया और अखबार पढ़कर अपने-अपने ऑफिस के लिए निकल गये ।  उसने मेज़ से खाली बर्तन समेटे और सास-ससुर के लिए उनका परहेज़ का नाश्ता तैयार करने लगी ।  उन दोनों को भी नाश्ता कराने के बाद फिर बर्तन इकट्ठे किये और उनको भी किचिन में लाकर धोने लगी ।  फिर उसने सारे बर्तन धोये अब बेड की चादरें वगेरा इकट्ठा करने पहुँच गयी और फिर सफाई में जुट गयी ।

         
अब तक 11 बज चुके थे, अभी वो पूरी तरह काम समेट भी ना पायी थी कि दरवाजे पर खट-खट की आवाज आई ।  दरवाज़ा खोला तो सामने बड़ी ननद और उसके पति व बच्चे खड़े थे ।  उसने ख़ुशी-ख़ुशी सभी को आदर के साथ घर में बुलाया और उनसे बातें करते-करते उनके आने से हुई ख़ुशी का इज़हार करने लगी । ननद की फ़रमाईश के मुताबिक़ नाश्ता तैयार करने के बाद अभी वो ननद के पास बेठी ही थी की सास की आवाज़ आई-- बहु आज खाने का क्या प्रोग्राम है । उसने घडी पर नज़र डाली तो 12 बज रहे थे ।  उसकी फ़िक्र बढ़ गई, जल्दी से फ्रिज की तरफ लपकी और सब्ज़ी निकाली और फिर से दोपहर के खाने की तैयारी में जुट गयी । 

      खाना बनाते-बनाते अब दोपहर के दो बज चुके थे ।  बच्चे स्कूल से आने वाले थे, लो बच्चे भी आ गये । उसने जल्दी-जल्दी बच्चों की ड्रेस उतारी और उनके मुंह-हाथ धुलवाकर उनको खाना खिलाया ।  इस बीच छोटी ननद भी कॉलेज से आगयी और देवर भी आ चुके थे ।  उसने सभी के लिए मेज़ पर खाना लगाया और खुद रोटी बनाने में लग गयी ।  खाना खाकर सब लोग फ्री हुवे तो उसने मेज़ से फिर बर्तन जमा करने शुरू कर दिये ।

         
इस वक़्त तीन बज रहे थे ।  अब उसे खुदको भी भूख का एहसास होने लगा था ।  उसने हॉटपॉट देखा तो उसमे कोई रोटी नहीं बची थी ।  उसने फिर से किचन की और रुख किया तभी पतिदेव घर में दाखिल होते हुये बोले की आज देर हो गयी, भूख बहुत लगी हे, जल्दी से खाना लगादो । उसने जल्दी-जल्दी पति के लिए खाना बनाया और मेज़ पर खाना लगा कर पति को किचन से गर्म रोटी बनाकर ला ला कर देने लगी ।  अब तक चार बज चुके थे ।  अभी वो खाना खिला ही रही थी की पतिदेव ने कहा की आ जाओ तुम भी खालो ।  उसने हैरत से पति की तरफ देखा तो उसे ख्याल  आया की आज तो मैंने सुबह से कुछ खाया ही नहीं ।  इस ख्याल के आते ही वो पति के साथ खाना खाने बैठ गयी ।

         
अभी पहला निवाला उसने मुंह में डाला ही था की आँख से आंसू निकल आयेपतिदेव ने उसके आंसू देखे तो फ़ौरन पूछा की तुम क्यों रो रही हो वो खामोश रही और सोचने लगी की इन्हें कैसे बताऊँ की ससुराल में कितनी मेहनत के बाद ये रोटी का निवाला नसीब होता हे और लोग इसे मुफ़्त की रोटी कहते हैं ।  पति के बार-बार पूछने पर उसने सिर्फ इतना कहा की कुछ नहीं बस ऐसे ही आंसू आ गये ।  पति मुस्कुराये और बोले कि तुम औरते भी बड़ी "बेवक़ूफ़" होती हो, बिना वजह रोना शुरू कर देती हो ।

         
सोचिये क्या वो रोना बेवजह था उन सभी ग्रहिणियों को नमन... जिनकी वजह से हमारे घरों में प्यार, ममता व वात्सल्य की गंगा बहती है, वाकई उनका यह समर्पण अतुलनीय है ।

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