28.1.17

वैवाहिक जीवन में साथी का महत्व...


           कॉलेज में पूर्व छात्रों का Happy married life पर एक कार्यक्रम हो रहा था,  जिसमे लगभग सभी विवाहित छात्र हिस्सा ले रहे थे । जिस समय प्रोफेसर मंच पर आए तब उन्होने देखा कि सभी छात्र पति-पत्नी व शादी सम्बंधों पर जोक कर हँस रहे थे । यह देखकर प्रोफेसर बोले कि चलो पहले  एक Game खेलते हैं,  उसके बाद  अपने विषय पर बातें करेंगे । 
 
            सभी  खुश हो गए और कहा कोनसा Game ?
 
            प्रोफ़ेसर ने एक विवाहित लड़की को खड़ा किया और कहा कि तुम ब्लेकबोर्ड पर ऐसे 25-30 लोगों के  नाम लिखो जो तुम्हें अच्छे लगते हैं...
 
            लड़की ने पहले अपने परिवार के लोगों के नाम लिखे फिर अपने सगे-सम्बन्धी,  दोस्तों, पडोसियों और सहकर्मियों के नाम लिख दिए ।
 
            तब प्रोफ़ेसर ने उनमें से कोई भी कम पसंद वाले 5 नाम मिटाने को कहा-
 
           लड़की ने अपने सहकर्मियों के नाम मिटा दिए ।
 
            प्रोफ़ेसर ने और 5 नाम मिटाने को कहा-
 
            लड़की ने थोडा सोच कर अपने पड़ोसियो के नाम मिटा दिए ।
 
            अब प्रोफ़ेसर ने उनमें से कोई भी चार को छोडकर बाकि नाम मिटाने को कहा-
 
            लड़की ने अपने सगे-सम्बन्धी और दोस्तों के नाम मिटा दिए । अब बोर्ड पर सिर्फ 4 नाम बचे थे जो उसके मम्मी-पापा, पति और बच्चे के नाम थे ।
 
            अब प्रोफ़ेसर ने कहा इसमें से और 2 नाम मिटा दो-
 
            लड़की असमंजस में पड गयी बहुत सोचने के बाद कुछ दुखी होते हुए उसने अपने मम्मी-पापा के नाम मिटा दिए ।
 
            सभी लोग स्तब्ध और शांत थे क्योंकि वे जानते थे कि यह गेम सिर्फ वो लड़की ही नहीं खेल रही थी बल्कि उनके अपने दिमाग में भी यही सब चल रहा था ।
 
            अब सिर्फ दो ही नाम बचे थे । एक उसके पति का और दूसरा उसके बेटे का...
 
            प्रोफ़ेसर ने कहा - अब और एक नाम इसमें से भी मिटा दो-
 
            अब तो वह लडकी सहमी सी रह गयी... बहुत सोचने के बाद लगभग रोती सी मनोदशा के साथ उसने अपने बेटे का नाम काट दिया । प्रोफ़ेसर ने  उस लड़की से कहा अब तुम अपनी जगह पर जाकर बैठ जाओ ।
 
            फिर सभी की तरफ गौर से देखते हुए पूछा- क्या आपमें से कोई बता सकता है कि ऐसा क्यों हुआ कि आखिर में सिर्फ पति का ही नाम बोर्ड पर रह गया।
 
            कोई जवाब नहीं दे पाया ।  सभी मुँह लटकाए बैठे थे...!  प्रोफ़ेसर ने फिर उस लड़की को खड़ा किया और पूछा -  ऐसा क्यों ? जिसने तुम्हे जन्म दिया और पाल पोस कर इतना बड़ा किया उनका नाम तुमने मिटा दिया,  और तो और अपनी कोख से जिस बच्चे को तुमने जन्म दिया उसका भी नाम मिटा दिया  ?
 
            लड़की ने जवाब दिया - मम्मी-पापा तो अब बूढ़े हो चले हैं,  कुछ साल के बाद वो मुझे और इस दुनिया को छोड़ के चले ही जायेंगे । मेरा बेटा जब बड़ा हो जायेगा तो जरूरी नहीं कि वो शादी के बाद मेरे साथ ही रहे ।
 
            लेकिन मेरे पति जब तक मेरी जान में जान है तब तक मेरा आधा शरीर बनके मेरा साथ निभायेंगे इसलिए मेरे पति ही मेरे लिये सबसे अजीज हैं ।
 
           प्रोफ़ेसर और बाकी स्टूडेंट ने तालियों की गूंज से लड़की की बात का समर्थन किया ।
 
          प्रोफ़ेसर ने कहा तुमने बिलकुल सही कहा कि तुम और सभी के बिना रह सकती हो पर अपने आधे अंग अर्थात अपने पति के बिना नहीं रह सकती ।
 
            मजाक मस्ती तक तो ठीक है पर हर इंसान का अपना जीवन साथी ही उसको सब  से ज्यादा अजीज होता है, यही सच है सभी पतियों और पत्नियों के लिये । यह कभी मत भूलना कि जिंदगी के साथ भी और  जिन्दगी के बाद भी, अंत में तो दोनों ही होंगे ।
 
            भले ही झगड़ें, गुस्सा करें, एक दूसरे पर टूट पड़ें, एक दूसरे पर दादागीरी करलें किंतु अंत में ये दोनों ही होंगे ।

            जो कहना है  वह कह लें, जो करना है वह कर लें, किंतु एक दूसरे के चश्मे और लकड़ी ढूंढने के लिये अंत में ये दोनों ही होंगे ।

            मैं रूठूँ तो तुम मना लेना, तुम रूठो तो मैं मना लूंगा, एक दूसरे को लाड़ लड़ाने के लिए अंत में दोनों ही होंगे ।

            आंखें जब धुंधली होंगी, याददाश्त जब कमजोर होगी, तब एक दूसरे को, एक दूसरे में ढूंढने के लिए अंत में ये दोनों ही होंगे ।

            घुटने जब दुखने लगेंगे,  कमर भी झुकना बंद कर देगी,  तब एक दूसरे के पांव के नाखून काटने के लिए भी अन्त में ये दोनों ही होंगे ।

            "अरे मुुझे कुछ नहीं हुआ बिल्कुल ठीक तो हूँ" ऐसा कह कर एक दूसरे को बहलाने के लिए भी अंत में ये दोनों ही होंगे ।

            साथ जब छूट जाएगा, विदाई की घड़ी जब आ जाएगी, तब एक दूसरे को माफ करने के लिए भी अंत में यह दोनों ही होंगे ।
 
           टिप्पणी : पति-पत्नी पर व्यंग्य कितने भी हों पर अकाट्य सत्य यही है और यही रहेगा ।    
 

26.1.17

सबक और आशा


            एक बेटा अपने वृद्ध पिता को रात्रि भोज के लिए एक अच्छे रेस्टॉरेंट में लेकर गया । खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया ।  रेस्टॉरेंट में बैठे दुसरे खाना खा रहे लोग वृद्ध को तिरस्कारपूर्ण नजरों से देख रहे थे, लेकिन वृद्ध का बेटा शांत था ।
 
             खाने के बाद बिना किसी शर्म के बेटा, वृद्ध को वॉश रूम ले गया,  उसके कपड़े साफ़ किये, चेहरा साफ़ किया, बालों में कंघी की, और चश्मा पहनाकर बाहर लाया । सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे । बेटे ने बिल का पेमेन्ट किया और अपने परिवार सहित बाहर जाने लगा । तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने बेटे को आवाज दी और उससे पूछा- "क्या तुम्हे नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो ?"

            बेटे ने जवाब दिया- "नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़ कर नहीं जा रहा ।"

            वृद्ध ने कहा "बेटे, तुम यहाँ छोड़ कर जा रहे हो, प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा (सबक) और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद (आशा)...

            दोस्तों आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नही करते और कहते हैं क्या करोगे आप से चला तो जाता नही, ठीक से खाया भी नही जाता । आप घर पर ही रहो वही अच्छा होगा ।

            किंतु आप यह क्यों भूल जाते हैं कि जब आप छोटे थे और आप के माता पिता आप को अपनी गोद मे उठा कर ले जाया करते थे । आप जब ठीक से खा नही पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी और खाना गिर जाने पर डाँट नही प्यार जताती थी । फिर वही माँ बाप उनके बुढापे मे भार स्वरुप क्यो लगने लगते है ?

            इस पृथ्वी पर तो माँ-बाप की तुलना भगवान से ही की गई है इसलिये उनकी सेवा कीजिये और उन्हे प्यार दीजिये, क्योकि एक दिन आप भी बूढे होंगे फिर अपने बच्चो से सेवा की उम्मीद कैसे करेंगे ? किंतु यदि इसे पढने के बाद अगर 10% लोगों में भी बदलाव आ गया तब तो यह पोस्ट अपने उद्देश्य में सार्थक है ही ।


25.1.17

शक्तिशाली कौन ?

            
            एक पिता ने अपने पुत्र की बहुत अच्छी परवरिश की । उसे अच्छी तरह से पढ़ाया, लिखाया, तथा उसकी सभी सुकामनाओ की पूर्ति की ।

            कालान्तर में वह पुत्र एक सफल इंसान बना और एक मल्टीनेशनल कंपनी में सी.ई.ओ. बन गया ।
  
            उच्च पद, अच्छा वेतन, सभी सुख सुविधांए उसे कंपनी की और से प्रदान की गई । समय गुजरता गया उसका विवाह एक सुलक्षणा कन्या से हो गया,  और उसके परिवार में एक सुन्दर कन्या भी पुत्री स्वरुप आ गई । पिता अब बूढा हो चला था । एक दिन पिता को पुत्र से मिलने की इच्छा हुई और वो पुत्र से मिलने उसके ऑफिस में गया ।


            वहां उसने देखा कि उसका पुत्र एक शानदार ऑफिस का अधिकारी बना हुआ है, उसके ऑफिस में सैंकड़ो कर्मचारी उसके अधीन कार्य कर रहे है ! ये सब देख कर पिता का सीना गर्व से फूल गया ।
    
              वो चुपके से उसके चेंबर में पीछे से जाकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया  और उसने प्यार से अपने पुत्र से पूछा - "यहाँ सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है" ?  पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा "मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी " ।
 
            पिता को इस जवाब की  आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा - पिताजी यहाँ सब से शक्तिशाली इंसान आप हैं, जिन्होंने मुझे इस योग्य बनाया ।

            उनकी आँखे छलछला आई ! वो चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे । न जाने क्या सोचकर उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा- एक बार फिर बताओ यहाँ सब से शक्तिशाली इंसान कौन है ?
   
             पुत्र ने  इस बार कहा- "पिताजी आप हैं, यहाँ सब से शक्तिशाली इंसान" । पिता सुनकर आश्चर्यचकित हो गए उन्होंने कहा "अभी तो तुम अपने आप को यहाँ सब से शक्तिशाली इंसान बता रहे थे अब तुम मुझे बता रहे हो" ?
   
              पुत्र ने हंसते हुए ससम्मान उन्हें अपने सामने बिठाते हुए कहा - "पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ हो वो पुत्र तो सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा ना, बोलिए पिताजी"  ।
 
            पिता की आँखे भर आई उन्होंने अपने पुत्र को कस कर के अपने गले लग लिया । सच ही है जिस के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ होता है, वो ही इस दुनिया में सब से शक्तिशाली इंसान होता है ।

 
            सदैव अपने बुजुर्गों का सम्मान करें । क्योंकि न सिर्फ हमारी सफलता के पीछे वे ही होते हैं बल्कि वे होते हैं तो हम होते हैं ।
 

23.1.17

आधुनिक तिमारदारी

            
         पिताजी बीमार पड़ गये, उन्हें आनन-फानन में नज़दीक के अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा । अस्पताल पहुँचते ही बेटे ने अस्पताल के बेड पर उनकी फोटो खींची और फेसबुक-वॉट्सएप पर Father ill admitted to hospital स्टेटस के साथ अपलोड कर दी ।

            फेसबुकिया यारों ने भी 'Like' मार-मार कर अपनी 'ड्यूटी' पूरी कर दी । बेटा भी अपने मोबाइल पर पिताजी की हालत 'Update' करता रहा । पिताजी व्याकुल आँखों से अपने 'व्यस्त' बेटे से बात करने को तरसते रहे...! 


            आज बेटे ने देखा कि पिताजी की हालत कुछ ज्यादा ख़राब है ! पुराना वक्त होता तो बेटा भागता हुआ डाक्टर को गुहार लगाता, पर उसने झट से 'बदहवास' पिता की एक-दो फोटो और खींच कर 'Condition critical'  के स्टेटस के साथ अपलोड कर दी,  फेसबुकिया यारों ने हर बार की तरह इस बार भी अपनी ज़िम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभा दी ।


            दो-चार घनिष्ठ मित्रों ने बेहद मार्मिक कमेंट कर अपने संवेदनशील होने का प्रमाण दिया । 'वाह ! इनकी आँख के आँसू भी साफ दिख रहे हैं । 'फोटो  कैमरे से लिया है या
मोबाइल से ?'

            तभी नर्स आई - 'आप ने पेशेंट को दवाई दी ? 

 
            दवाई ? 
 
           बिगड़ी हालत देख, नर्स ने घंटी बजाई 'इन्हें एमरजेंसी में ले जा रहे हैं !' 

            थोड़ी देर में 'बेटा' लिखता है- 'पिताजी चल बसे ! सॉरी..नो फोटो..मेरे पिताजी का अभी-अभी देहांत हो गया !  ICU में फोटो खींचनी अलाउड नहीं थी....'


            कुछ कमेंट्स आए - 'ओह, आखरी वक्त में आप फोटो भी नहीं खींच पाए !'


           'अस्पताल को अंतिम समय पर यादगार के लिए फोटो खींचने देना चाहिए थी !'


            'RIP'       'RIP'


            'अंतिम विदाई की फोटो जरूर अपलोड करना'


            पिताजी चले गए थे... पर बेटा संतुष्ट था.... इतने 'लाइक' और 'कमेंट्स' उसे पहले कभी नहीं आए थे....

 
            कुछ खास रिश्तेदार अस्पताल आ गए थे...      कुछ एक ने उसे गले लगाया...     गले लगते हुए भी बेटा मोबाइल पर कुछ लिख रहा था ।


            बेटा कितना कर्त्तव्यनिष्ठ था !  बाप के जाने के समय भी.... सबको 'थैंक्स टू ऑल' लिख रहा था...!


            रिश्ते अपना नया अर्थ खोज रहे थे !


22.1.17

विकास व मुस्कान में साथी की अहमियत...

              
            मेरी पत्नी ने कुछ दिनों पहले घर की छत पर कुछ गमले रखवा दिए और एक छोटा सा गार्डन बना लिया । पिछले दिनों मैं छत पर गया तो यह देख कर हैरान रह गया कि कई गमलों में फूल खिल गए हैं, नींबू के पौधे में दो नींबू भी लटके हुए हैं और दो चार हरी मिर्च भी लटकी हुई नज़र आई ।

            मैंने देखा कि पिछले हफ्ते उसने बांस का जो पौधा गमले में लगाया था, उस गमले को घसीट कर दूसरे गमले के पास कर रही थी । मैंने कहा तुम इस भारी गमले को क्यों घसीट रही हो ? पत्नी ने मुझसे कहा कि यहां ये बांस का पौधा सूख रहा है, इसे खिसका कर इस पौधे के पास कर देते हैं । मैं हँस पड़ा और कहा - अरे पौधा सूख रहा है तो खाद डालो, पानी डालो । इसे खिसका कर किसी और पौधे के पास कर देने से क्या होगा ? पत्नी ने तब मुस्कुराते हुए कहा ये पौधा यहां अकेला है इसलिए मुर्झा रहा है । इसे इस पौधे के पास कर देंगे तो ये फिर लहलहा उठेगा । 


            पौधे भी अकेले में सूख जाते हैं, और उन्हें अगर किसी और पौधे का साथ मिल जाए तो जी उठते हैं । यह बहुत अजीब सी बात थी। एक-एक कर कई तस्वीरें आखों के आगे बनती चली गई...


            मां की मौत के बाद पिताजी कैसे एक ही रात में बूढ़े, बहुत बूढ़े हो गए थे । हालांकि मां के जाने के बाद सोलह साल तक वो रहे, लेकिन सूखते हुए पौधे की तरह । मां के रहते हुए जिस पिताजी को मैंने कभी उदास नहीं देखा था, वो मां के जाने के बाद खामोश से हो गए थे । मुझे पत्नी के विश्वास पर पूरा विश्वास हो रहा था...  लग रहा था कि सचमुच पौधे भी अकेले में सूख जाते होंगे । 


            बचपन में एक बार
मैं बाज़ार से एक छोटी सी रंगीन मछली खरीद कर लाया था और उसे शीशे के जार में पानी भर कर रख दिया था । मछली सारा दिन गुमसुम रही । मैंने उसके लिए खाना भी डाला, लेकिन वो चुपचाप इधर-उधर पानी में अनमनी सा घूमती रही । सारा खाना जार की तलहटी में जाकर बैठ गया, मछली ने कुछ नहीं खाया । दो दिनों तक वो ऐसे ही रही, और एक सुबह मैंने देखा कि वो पानी की सतह पर उल्टी पड़ी थी । आज मुझे घर में पाली वो छोटी सी मछली याद आ रही थी । बचपन में किसी ने मुझे ये नहीं बताया था, अगर मालूम होता तो कम से कम दो- तीन या ढ़ेर सारी मछलियां खरीद लाता और मेरी वो प्यारी मछली यूं तन्हा न मर जाती । 

            बचपन में माँ से सुना था कि लोग मकान बनवाते थे तो रोशनी के लिए कमरे में दीपक रखने के दीवार में दो मोखे
इसलिए बनवाते थे क्योंकि माँ का कहना था कि बेचारा अकेला मोखा गुमसुम और उदास हो जाता है ।

            मुझे लगता है कि संसार में किसी को भी अकेलापन पसंद नहीं । आदमी हो या पौधा, हर किसी को किसी न किसी के साथ की ज़रुरत होती है ।


            आप अपने आसपास झांकिए, अगर कहीं कोई अकेला दिखे तो उसे अपना साथ दीजिए उसे मुरझाने से बचाइए और अगर आप अकेले हों, तो आप भी किसी का साथ लीजिए,  खुद को भी मुरझाने से रोकिए ।


            अकेलापन संसार में सबसे बड़ी सजा है । गमले के पौधे को तो हाथ से खींच कर दूसरे पौधे के पास किया जा सकता है, लेकिन आदमी को करीब लाने के लिए जरुरत होती है रिश्तों को समझने की, सहेजने की और समेटने की ।

 
            अगर मन के किसी कोने में आपको लगे कि ज़िंदगी का रस सूख रहा है,  जीवन मुरझा रहा है तो उस पर रिश्तों के प्यार का रस डालिए । खुश रहिए और मुस्कुराइए ।  कोई यूं ही किसी की भी गलती से आपसे दूर हो गया हो तो उसे अपने करीब लाने की कोशिश कीजिए और हो जाइए हरे-भरे ।



20.1.17

फूटा घडा

            
            एक किसान के पास दो घडे थे जिसमें पानी की समस्या के कारण उसे दूर से पानी लाना पडता था । उनमे से एक घड़ा कहीं से फूटा हुआ था जबकि दूसरा बिल्कुल सही था, इस वजह से रोज़ घर पहुँचते-पहुँचते किसान के पास डेढ़ घड़ा पानी ही बच पाता था । ऐसा दो सालों से चल रहा था ।
 
            सही घड़े को इस बात का गुरूर था कि वो पूरा का पूरा पानी घर पहुंचता है और उसके अन्दर कोई कमी नहीं है, वहीँ दूसरी तरफ फूटा घड़ा इस बात से शर्मिंदा रहता था कि वो आधा पानी ही घर तक पंहुचा पाता है और किसान की मेहनत बेकार चली जाती है । फूटा घड़ा ये सब सोच कर बहुत परेशान रहने लगा और एक दिन उससे रहा नहीं गया, उसने किसान से कहा, “ मैं खुद पर शर्मिंदा हूँ और आपसे क्षमा मांगना चाहता हूँ ?”
 
            "क्यों ?"   किसान ने पूछा - “ तुम किस बात से शर्मिंदा हो ?”

           “शायद आप नहीं जानते पर मैं एक जगह से फूटा हुआ हूँ, और पिछले दो सालों से मुझे जितना पानी घर पहुँचाना चाहिए था  उसका आधा ही पहुंचा पाया हूँ, मेरे अन्दर ये बहुत बड़ी कमी है और इस वजह से आपकी मेहनत बर्वाद होती रही है ।”  फूटे घड़े ने दुखी होते हुए कहा ।
            किसान को घड़े की बात सुनकर थोडा दुःख हुआ और वह बोला, कोई बात नहीं, मैं चाहता हूँ कि आज लौटते वक़्त तुम रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर फूलों को देखो ।”
 
            घड़े ने वैसा ही किया, वह रास्ते भर सुन्दर फूलों को देखता आया, ऐसा करने से उसकी उदासी कुछ दूर हुई पर घर पहुँचते–पहुँचते फिर उसके अन्दर से आधा पानी गिर चुका था, वो फिर मायूस हो गया और किसान से क्षमा मांगने लगा ।
 
            किसान बोला,” शायद तुमने ध्यान नहीं दिया कि पूरे रास्ते में जितने भी फूल थे वो बस तुम्हारी तरफ ही थे, सही घड़े की तरफ एक भी फूल नहीं था । ऐसा इसलिए क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारे अन्दर की कमी को जानता था, और मैंने उसका लाभ उठाया । मैंने तुम्हारे तरफ वाले रास्ते पर रंग-बिरंगे फूलों के बीज बो दिए थे, तुम रोज़ थोडा-थोडा कर के उन्हें सींचते रहे और पूरे रास्ते को इतना खूबसूरत बना दिया । आज तुम्हारी वजह से ही मैं इन फूलों को भगवान को अर्पित कर पाता हूँ और अपना घर सुन्दर बना पाता हूँ । तुम्हीं सोचो अगर तुम जैसे हो वैसे नहीं होते तो भला क्या मैं ये सब कुछ कर पाता ?”
 
            दोस्तों हम सभी के अन्दर कोई ना कोई कमी होती है, पर यही कमियां हमें अनोखा बनाती हैं । उस किसान की तरह हमें भी हर किसी को जो जैसा है वैसे ही स्वीकारना चाहिए और उसकी अच्छाई की तरफ ध्यान देना चाहिये और जब हम ऐसा करेंगे तब “फूटा घड़ा” भी मूल्यवान हो जायेगा ।

10.1.17

40 पार के बाद सुखमय वृद्धावस्था के लिए यह भी याद रखें...


        40 वर्ष से अधिक उम्र वाले सभी व्यक्ति इस सन्देश को विशेष ध्यान से पढ़ें, क्योंकि यह उनके आने वाले जीवन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है ।

        1.  जहाँ तक संभव हो अपने स्वयं के स्थायी निवास में ही रहें जिससे कि स्वतंत्र जीवन जीने का आनंद बगैर किसी बाधा के ले सकें ।  (एक कहावत है - अपना घर हंग-हंग भर, दूसरे का घर थूकने का डर)

          2.  अपना बैंक बेलेंस और भौतिक संपत्ति अपने पास रखें । परिजनों के अति प्रेम में पड़कर किसी के नाम करने की ना सोचें ।

          3.  अपने बच्चों के इस वादे पर निर्भर ना रहें कि वो वृद्धावस्था में आपकी सेवा करेंगे, क्योंकि समय बदलने के साथ उनकी प्राथमिकताएँ भी बदल जाती हैँं और कई बार चाहते हुए भी वे कुछ नहीं कर पाते ।

          4.  उन लोगों को अपने मित्र समूह में शामिल रखें जो आपके जीवन को प्रसन्न देखना चाहते हैं, यानी सच्चे हितैषी हों । 

          5.  किसी के साथ अपनी तुलना ना करें और ना ही किसी से कोई उम्मीद रखें ।

         6.  अपनी संतानों के जीवन में दखल अन्दाजी ना करें, उन्हें अपने तरीके से अपना जीवन जीने दें और आप अपने तरीके से अपना जीवन जिएँ ।

          7.  अपनी वृद्धावस्था को आधार बनाकर किसी से सेवा करवाने, सम्मान पाने का प्रयास  ना करें ।

           8.  लोगों की बातें सुनें लेकिन अपने स्वतंत्र विचारों के आधार पर निर्णय लें ।

           9.  प्रार्थना करें लेकिन भीख ना मांगे, यहाँ तक कि भगवान से भी नहीं । अगर भगवान से कुछ मांगे तो सिर्फ माफ़ी और हिम्मत ।

          10.  अपने स्वास्थ्य का स्वयं ध्यान रखें, चिकित्सीय परीक्षण के अलावा अपने आर्थिक सामर्थ्य अनुसार अच्छा पौष्टिक भोजन खाएं और यथा सम्भव अपना काम अपने हाथों से करें । छोटे कष्टों पर ध्यान ना दें, उम्र के साथ छोटी मोटी शारीरिक परेशानीयां चलती रहती हैं ।

          11.  अपने जीवन को उल्लास से जीने का प्रयत्न करें खुद प्रसन्न रहने की चेष्टा करें और दूसरों को प्रसन्न रखें ।

          12.  प्रति वर्ष  अपने जीवन  साथी केे साथ भ्रमण/ छोटी यात्रा पर एक या अधिक बार अवश्य जाएं,  इससे आपका जीने का नजरिया बदलेगा ।

          13.   किसी भी टकराव को टालें एवं तनाव रहित जीवन जिऐं ।

          14.   जीवन में स्थायी कुछ भी नहीं है चिंताएं भी नहीं इस बात का विश्वास करें ।

        15.  अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को रिटायरमेंट तक  पूरा कर लें, याद रखें जब तक आप अपने लिए जीना शुरू नहीं करते हैं तब तक आप जीवित नहीं हैं ।

 खुशनुमा जीवन की शुभकामनाओं के साथ...


7.1.17

वृद्धावस्था में खुश रहने और सुखी जीवन बिताने का रहस्य...



            एक बार यूनान के मशहूर दार्शनिक सुकरात भ्रमण करते हुए एक नगर में गये । वहां उनकी मुलाकात एक वृद्ध सज्जन से हुई ।  दोनों आपस में काफी घुल मिल गये ।


           वृद्ध सज्जन आग्रहपूर्वक सुकरात को अपने निवास पर ले गये । भरा-पूरा परिवार था उनका, घर में बहु- बेटे, पौत्र-पौत्रियां सभी थे ।
          
           सुकरात ने वृद्ध से पूछा- “आपके घर में तो सुख-समृद्धि का वास है । वैसे अब आप करते क्या हैं ?" इस पर वृद्ध ने कहा- “अब मुझे कुछ नहीं करना पड़ता । ईश्वर की दया से हमारा अच्छा कारोबार है, जिसकी सारी जिम्मेदारियां अब बेटों को सौंप दी हैं । घर की व्यवस्था हमारी बहुएँ संभालती हैं ।  इसी तरह जीवन चल रहा है ।"
           यह सुनकर सुकरात बोले- "किन्तु इस वृद्धावस्था में भी आपको कुछ तो करना ही पड़ता होगा । आप बताइये कि बुढ़ापे में आपके इस सुखी जीवन का रहस्य क्या है ?"

           वह वृद्ध सज्जन मुस्कुराये और बोले- “मैंने अपने जीवन के इस मोड़ पर एक ही नीति को अपनाया है कि दूसरों से अधिक अपेक्षायें मत पालो और जो मिले,  उसमें संतुष्ट रहो ।  मैं और मेरी पत्नी अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व अपने बेटे- बहुओं को सौंपकर निश्चिंत हैं । अब वे जो कहते हैं, वह मैं कर देता हूं और जो कुछ भी खिलाते हैं, खा लेता हूं । अपने पौत्र- पौत्रियों के साथ हंसता-खेलता हूं । मेरे बच्चे जब कुछ भूल करते हैं  तब भी मैं चुप रहता हूं ।  मैं उनके किसी कार्य में बाधक नहीं बनता ।  पर जब कभी वे मेरे पास सलाह-मशविरे के लिए आते हैं तो मैं अपने जीवन के सारे अनुभवों को उनके सामने रखते हुए उनके द्वारा की गई भूल से उत्पन्न् दुष्परिणामों की ओर सचेत कर देता हूं । अब वे मेरी सलाह पर कितना अमल करते या नहीं करते हैं, यह देखना और अपना मन व्यथित करना मेरा काम नहीं है । वे मेरे निर्देशों पर चलें ही, मेरा यह आग्रह नहीं होता ।  परामर्श देने के बाद भी यदि वे भूल करते हैं तो मैं चिंतित नहीं होता ।  उस पर भी यदि वे मेरे पास पुन: आते हैं तो मैं पुन: सही सलाह देकर उन्हें विदा करता हूं ।

          बुजुर्ग सज्जन की यह बात सुन कर सुकरात बहुत प्रसन्न हुये । उन्होंने कहा- “इस आयु में जीवन कैसे जिया जाए, यह आपने सम्यक समझ लिया है ।

           यह कहानी सबके लिए है । अगर आज आप बूढ़े नही हैं तो कल अवश्य होंगे । इसलिए आज बुज़ुर्गों की 'इज़्ज़त' और 'मदद' करें जिससे कल कोई आपकी भी 'मदद' और 'इज़्ज़त' करे ।

           याद रखें जो ---- जो आज दिया जाता है वही कल प्राप्त होता है ।

          अपनी वाणी में सुई भले ही रखो, पर उसमें धागा भी जरूर डालकर रखो,  ताकि सुई केवल छेद ही न करे आपस में माला की तरह जोडकर भी रखे ।

           वरिष्ठ नागरिक घर में वानप्रस्थी बनकर रहने का अभ्यास करें ।
                      
           ”जीवन में खुशी का अर्थ लड़ाइयाँ लड़ना नहीं, बल्कि उन से बचना है ।
           कुशलतापूर्वक पीछे हटना भी अपने आप में एक जीत है ।”

4.1.17

प्रेरणा कैसी-कैसी...


           किसी समय एक राजा था जिसे राज भोगते काफी समय हो गया था बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखा । उत्सव मे मुजरा करने वाली के साथ दूर देश के राजाओं को भी अपने गुरु के साथ बुलाया । कुछ मुद्राएँ राजा ने यह सोचकर अपने गुरु को दी कि जो बात मुजरा करने वाली की अच्छी लगेगी वहाँ गुरु स्वयं ये मुद्राएँ देंगे । 
 
           सारी रात मुजरा चलता रहा । सुबह होने वाली थीं, मुज़रा करने वाली ने देखा मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है उसको जगाने के लियें मुज़रा करने वाली ने एक दोहा पढ़ा-

"बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिहाई ।
एक पलक के कारने, ना कलंक लग जाए।"
 
           अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने-अपने अनुरूप अर्थ निकाला ।
 
           तबले वाला सतर्क होकर  बजाने लगा ।
 
           जब ये बात गुरु ने सुनी तो गुरु ने अपने पास की सारी मोहरें उस मुज़रा करने वाली को दे दी ।
 
           वही दोहा उसने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार उसे दे दिया ।
 
           जब वही दोहा नर्तकी ने फिर दोहराया तो राजा के लड़के ने अपना मुकट उतारकर दे दिया । 
 
           जब वह उस दोहे को फिर दोहराने लगी तो राजा ने कहा अब बस भी कर एक दोहे से तुने वेश्या होकर भी सबको लूट लिया है ।
 
           जब ये बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों मे जल आ गया और वो कहने लगे, "राजन् इसे तू वेश्या न कह, ये मेरी गुरू है । इसने मुझें मत दी है कि मै सारी उम्र जंगलो मे भक्ति करता रहा और आखरी समय मे मुज़रा देखने आ गया । भाई मैं तो चला ।
 
           राजा की लड़की ने कहा, "आप मेरी शादी नहीं कर रहे थे,  आज मुझे आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । इसने मुझे सुमति दी है कि कभी तो तेरी शादी होगी । क्यों अपने पिता को कलंकित करती है ?"
 
           राजा के लड़के ने कहा, "आप मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आपके सिपाहियो से मिलकर आपका क़त्ल करवा देना था । इसने समझाया है कि आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है । क्यों अपने पिता के खून का इलज़ाम अपने सर लेते हो ?
 
           जब ये बातें राजा ने सुनी तो राजा ने सोचा क्यों न मै अभी ही ये राजतिलक कर दूँ, गुरु भी मौजूद हैं । उसी समय राजकुमार का राजतिलक कर दिया और राजकुमारी से कहा बेटी, "मैं जल्दी ही आपकी शादी भी कर दूँगा।"
 
           तब नर्तकी कहने लगी, "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, पर मैं तो ना सुधरी । इसलिये आज से मैं भी अपना धंधा बंद कर प्रभु ! आज से मै भी तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।

           समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती । एक दोहे की दो लाईनों में जब इतना सामर्थ्य जुट सकता है तो बडी से बडी समस्या में भी बस थोड़ा धैर्य रखने की ज़रूरत होती है...
 
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