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9.12.10

भ्रष्टाचार पर सशक्त प्रहार


      वर्तमान समय में जब भ्रष्टाचार का दानव देश मैं अपनी पूरी विभत्सता के साथ सब तरफ तांडव करते दिख रहा है और लगभग सभी देशवासी यह मानने लगे हैं कि यह समस्या अब शिष्टाचार का रुप ले चुकी है, तब ठंडी हवा के झोंके जैसा एक उदाहरण मध्य-प्रदेश के देवास से सामने आया है । यहाँ की एक अदालत ने मार्च 2002 में शाजापुर के लोकनिर्माण विभाग के तत्कालीन उपयंत्री प्रीतमसिंह निवासी देवास को जो अपनी आय से 51 लाख रु. की अनुपातहीन सम्पत्ति अधिक रखने के दोषी पाए गए थे इन्हें विशेष प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश श्री पी. के. व्यास ने अनुकरणिय कदम उठाते हुए 5 करोड रुपये के भारी-भरकम जुर्माने के साथ ही 3 वर्ष के कठोर कारावास की सजा से दंडित करके भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की दिशा में  सख्त पहल की है ।

      अपना फैसला सुनाते हुए माननीय न्यायाधीश ने कहा कि ये भ्रष्टाचारी अपनी काली कमाई से अर्जित बेहिसाबी सम्पत्ति को इस प्रकार से रखते हैं कि उन्हे पकड पाना लगभग असंभव होता है और इसीलिये इन भ्रष्ट लोकसेवकों के मन में यह प्रबल धारणा बन जाती है कि इन्हें कोई पकड नहीं पाएगा और ये अवैद्य साधनों से ऐसे ही धन व संपत्तियां अर्जित करके ऐशो-आराम से रह सकेंगे, इसलिये इन्हें ऐसी सजा मिलना आवश्यक है जिससे कि लोकसेवक के पद पर बैठे किसी भी व्यक्ति के मन में यह भय बना रहे कि यदि किसी दिन वो पकड में आ जावेगा तो न सिर्फ ये सम्पत्ति उसके पास से छिन जावेगी बल्कि जेल में बैठकर उसके पास पछताने के सिवा कुछ भी बाकि नहीं रहेगा ।

       भ्रष्टाचार के खिलाफ मील के पत्थर जैसे उपरोक्त फैसले के आधार पर मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि वर्तमान में देशभर में चर्चारत पूर्व संचार मंत्री ए. राजा जो 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में 176 लाख करोड के घोटाले के आरोपी हैं और जिनका सिर्फ पद गया है वे, या मधु कोडा जो एक साधारण मजदूर से अपनी जोड-जुगाड के बल पर झारखंड के मुख्यमंत्री के पद तक जा पहुँचे और जिन पर 4,000 करोड रुपये की संपत्ति बनाने का आरोप चल रहा है, भले ही ये जेल गये हों लेकिन कोर्ट से अभी इन्हें कोई सजा नहीं मिली है, या कामनवेल्थ गेम्स आयोजन समिति के चेयरमेन के रुप में सुरेश कलमाडी जिन पर 8,000 करोड रुपये के भ्रष्टाचार का आरोप चल रहा है जिसके चलते अभी तक तो सिर्फ इनका कांग्रेस संसदीय सचिव का पद ही गया है, या मध्य-प्रदेश के निलंबित प्रमुख सचिव अरविन्द जोशी व टीनू जोशी दम्पत्ति जिन्होंने 300 करोड रुपये तो शेयर बाजार में ही लगा दिये थे और गिरफ्तारी के वक्त 3 करोड रुपये की अनुपातहीन संपत्ति जिनसे बरामद हुई थी इनका भी सिर्फ पद से निलंबन ही हो पाया है । ये सभी और इन जैसी और भी उल्लेखित नामवर हस्तियों को कोर्ट से क्या सजा मिलनी चाहिये ? जबकि प्रश्न यह भी दिखता हो कि   जोड-जुगाड की इस व्यवस्था में जिसके ये महारथी साबित हो चुके हैं क्या कोर्ट में इनके अपराध साबित भी हो पाएँगे ?

      भले ही इसकी संभावना नगण्य हो किन्तु फिर भी अन्धकार में उजाले की किरण जैसे उदाहरण के रुप में वो जज सामने आते हैं जिन्होंने अपनी स्वयं की शादी में शराब के नशे में दहेज मांगकर और पूर्ति न हो पाने की स्थिति में वधूपक्ष के सभी सम्बन्धित परिजनों के साथ मार-पीट करके तोड-फोड मचाई थी, उनकी अग्रिम जमानत कोर्ट ने इस कथन के साथ रद्द कर दी कि जिनके उपर व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी हो यदि वे ही इस प्रकार का अनैतिक आचरण सार्वजनिक रुप से करते पाए जाएँ तो उन्हें कडी सजा मिलना ही चाहिये, और वे जज महाशय अभी तक गिरफ्तारी के डर से इधर से उधर भागते फिर रहे हैं । दूसरे उदाहरण के रुप में हजारों करोड रुपये के स्टाम्प घोटाले के आरोपी रहे अब्दुल करीम तेलगी का नाम भी जेहन में आता है जिसकी सारी उम्र बीमारी और बेचारगी की स्थिति में जेल में गुजरी और उसके भ्रष्टाचार के शिखर के दिनों का कोई भी सम्पर्क उसके बचाव में सामने नहीं आ पाया । 

       एक बात और जो इन नामचीन हस्तियों के सन्दर्भ में देखने में आती रही है वो ये कि इनके भ्रष्टाचार के आंकडे चाहे जितने विशाल दिखें किन्तु यौवन के दिनों की इनकी शाही जीवन शैली और उपर से नीचे तक भ्रष्टाचार की गंगोत्री में सभी सम्बन्धितजनों को उनके हिस्से की रकम पहुँचाने के बाद जब संकट के दिनों का सामना करने की स्थिति आती है तब तक बमुश्किल चंद करोड रुपये भी इनके पास बचत में शायद ही सुरक्षित रह पाते होंगे । जबकि इनके सामान्य इन्सानी शरीर में रहता इनका दिल भी दसों दिशाओं से उठ रहे आरोप-प्रत्यारोपों की मार सहते-सहते इतना कमजोर भी हो जाता है कि सामान्य तौर पर ये मानव जीवन जिसे कुदरत का सर्वाधिक अमूल्य उपहार कहा जाता है इसका आनन्द लिये बगैर ही ये अतिशीघ्र दुनिया से कूच भी कर जाते हैं । क्या मेरी इस सोच के पक्ष में हजारों करोड रुपये के शेअर घोटाले के आरोपी रहे हर्षद मेहता जिसके ठाठ-बाट कभी धीरुभाई अंबानी से भी उपर दिखने लगे थे, का नाम नहीं लिया जा सकता जिसकी कारगुजारियों से न सिर्फ उस समय कई बैंकों में ताले लग गये थे बल्कि हजारों व्यक्तियों के जीवन भर की कमाई बचत भी धूल-धूसरित हो गई थी, अंततः उसे भी जेल की कोठरी में अपने ही जूतों का सिरहाना बनाकर सोना पडा था और फिर कम उम्र में ही  दुनिया से कूच भी कर जाना पडा था ?
   
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