एक पुरानी कहावत - पिता से पिटने के बाद
पिता को सामान्य मूड में देखकर पुत्र ने हिम्मत जुटाकर पूछा - पापा,
क्या
आपके पापा भी आपको ऐसे ही पीटते थे ? हाँ बिल्कुल, पिता ने जवाब दिया ।
और उनके पापा पुत्र ने फिर
पूछा ?
वे तो मेरे पिताजी को
मारते हुए बाथरुम में बन्द कर देते थे, पिता ने जवाब दिया । लेकिन तुम ये सब क्यों पूछ रहे हो इस बार पिता ने पुत्र से पूछा ? कुछ नहीं मैं तो यह
जानना चाह रहा था कि ये खानदानी गुंडागर्दी आखिर कब
तक चलेगी ?
पुत्र
ने कुछ मासूमियत से अपने पिता के प्रतिप्रश्न के उत्तर
में जवाब दिया ।
अब तो नई पीढी को अपने अभिभावकों
की इस मार-पिटाई से मुक्ति मिल गई प्रतीत होती है । क्योंकि एक या दो बच्चों के इस युग में उनकी किसी भी गल्ति पर
पिता उन्हें पीटने की सोच भी नहीं पाते और कभी
भूल से भी उन्हें ये मालूम पड जावे कि उनके बच्चे को स्कूल में किसी
शिक्षक ने हाथ भी लगाया तो समझो उस शिक्षक की शामत आना तय हो जाती है
। वे दिन गये जब स्कूल में बच्चे को भर्ती करवाते समय पालक स्कूल के
शिक्षक से बोलकर आते थे,
माटसाब
बच्चे को अच्छे से पढाना, सख्ती भी करना पडे तो
चिंता मत करना,
समझलो कि आज से इसकी हड्डी-हड्डी
मेरी और चमडी-चमडी आपकी,
और
विद्यार्थी व शिक्षार्थी सभी एक ही सिद्धांत पर
चला करते थे "छडी पडे छम्-छम, विद्या आवे धम्-धम", और विद्यार्थी को शिक्षा
प्राप्ति के दौरान प्राइमरी से लगाकर सेकन्ड्री तक मुर्गा बनते, कान पकडकर उठक-बैठक लगाते, हथेली पर स्केल या रुल की मार खाते, बैंच पर खडे होते या फिर क्लास से निकाल
दिये जाने की सजा
झेलते-झेलते
ही अपनी शिक्षा का ये दौर पूरा करना पडता था ।
विश्वप्रसिद्ध शख्सियत
अल्फ्रेड
हिचकाक को उनके पिता ने मारने-पीटने के बाद रात भर के लिये तहखाने के कबाड के
बीच बन्द कर दिया । रात भर घिग्गी सी बंधी हुई स्थिति में डर के जिस माहौल
में बालक अल्फ्रेड ने वह डरावनी रात व्यतीत की उसी डर को बडे होकर फिल्म
निर्माता बनने के बाद उसने एक से बढकर एक डरावनी फिल्मों के रुप में
सारी दुनिया के सामने लगातार प्रस्तुत किया और हाॅरर (डरावनी) फिल्मों के
निर्माण के क्षेत्र में बेताज बादशाह बनकर सारी दुनिया के समक्ष अपनी
प्रतिभा का लोहा मनवाया ।
इस स्थिति के समर्थन में आधुनिक विचारधारा के पोषक चाहे जितने तर्क दे लें किन्तु इसके दुष्परिणामों में इसी ब्लाग की मेरी पूर्व पोस्ट तरुणाई की ये राह में घर पर पेरेण्ट्स के समक्ष शेर बने रहने वाले ऐसे बच्चों में कोई अपने दोस्तों से ही पिट व मर रहा है तो कुछ बालक या तो अपने से शारीरिक या मानसिक रुप से तगडे लोगों से पिट रहे हैं या फिर कई बार तो वे पुलिस से भी जूते खा रहे होते हैं । अतः नई पीढी के पालक व बालक भले ही इस स्थिति को एक राहत के रुप में देखें किन्तु कहीं न कहीं पालकों की इस नरमदिली के चलते बालकों का दुनियावी प्रशिक्षण कुछ अधूरा तो छूट ही रहा है ।
उल्लेखनीय हस्तियों के पिटाई संस्मरण में विख्यात
अभिनेता, निर्माता, निर्देशक- राजकपूर
की पिटाई भी इसी श्रेणी में आती है । पापा पृथ्वीराज कपूर का फिल्म
इंडस्ट्री में पर्याप्त दबदबा होने के बावजूद गुरुकुल प्रथा का अनुसरण
करते हुए उन्होंने राजकपूर को फिल्मकार केदार शर्मा का सहायक बनवाया, जहाँ
राजकपूर को फिल्म के प्रत्येक शाट के पूर्व सिर्फ क्लीपिंग देने का काम
सौंपा गया था । तरुण राजकपूर कुछ अपनी उम्र व कुछ इण्डस्ट्री के
आकर्षण के वशीभूत हर शाट के बाद शीशे में अपना चेहरा देखने खडा हो जाता था जिससे
कई बार अगला शाट फिल्माने की प्रक्रिया बाधित होती थी । निर्माता केदार
शर्मा ने दो-एक बार राजकपूर को इसके लिये मना भी किया किन्तु आदत से मजबूर
राजकपूर पर उनकी समझाईश का कोई असर नहीं हुआ । अंततः अगली बार इसी
क्रम में जब शाट फिल्माने की प्रक्रिया बाधित हुई तो केदार शर्मा ने जो झन्नाटेदार
थप्पड राजकपूर को रसीद किया तो राजकपूर न
जाने कितनी दूर जाकर गिरे ।
इस घटना के परिणामस्वरुप जहाँ एक ओर केदार शर्मा को राजकपूर की इस बेजा आदत से आगे के लिये निजात मिल गई वहीं राजकपूर ने भी अनुशासन का जो सबक इससे हासिल किया उसी अनुशासन ने उस राजकपूर को सर्वोच्च श्रेणी का फिल्म निर्माता बनवाकर न सिर्फ देश भर में बल्कि दुनिया के अनेक देशों में समान रुप से लोकप्रिय बनवाया । अपने आगे के अनेकों साक्षात्कारों में राजकपूर ने इस घटना का सगर्व उल्लेख भी किया । इसी संदर्भ में यह भी देखें- बच्चों के सर्वांगीण विकास में माता-पिता की भूमिका
इस घटना के परिणामस्वरुप जहाँ एक ओर केदार शर्मा को राजकपूर की इस बेजा आदत से आगे के लिये निजात मिल गई वहीं राजकपूर ने भी अनुशासन का जो सबक इससे हासिल किया उसी अनुशासन ने उस राजकपूर को सर्वोच्च श्रेणी का फिल्म निर्माता बनवाकर न सिर्फ देश भर में बल्कि दुनिया के अनेक देशों में समान रुप से लोकप्रिय बनवाया । अपने आगे के अनेकों साक्षात्कारों में राजकपूर ने इस घटना का सगर्व उल्लेख भी किया । इसी संदर्भ में यह भी देखें- बच्चों के सर्वांगीण विकास में माता-पिता की भूमिका
पुत्र
को आत्मनिर्भर बनाने की सोच के साथ एक समय एक पिता ने अपने पुत्र को
सख्त निर्देश दिया- कल से तुम जब तक एक रुपया कमाकर नहीं
लाओगे तुम्हें खाना नहीं
मिलेगा । कल से दिन के समय तुम मुझे घर में मत दिखना । पुत्र ने माँ
को बताया कि पिताजी ने मुझे ऐसा निर्देश दिया है । माँ ने अपनी ममता के
वशीभूत हो उसे अपने पास से एक रुपया दे दिया और कहा दिन में घूम फिरकर
आ जाना और कल तो ये रुपया अपने पिता को दे देना,
पुत्र ने भी वैसा ही किया,
दिन भर इधर-उधर दोस्तों के साथ घूमकर आने के बाद पिता के हाथ में वो
रुपया रख दिया । पिता ने उसके सामने उस रुपये को जलते
चूल्हे में फेंकते हुए कहा - मुझे
बेवकूफ समझ रखा है क्या ये रुपया तू कमाकर लाया है ?
कल से कमाकर लाना ।
पुत्र ने चिंतित अवस्था में उसी शहर में रह रही अपनी विवाहित बहन को
अपनी समस्या बताई । इस बार बहन ने उसे अपने पास से रुपया देकर कहा -
ठीक है कल ये रुपया देकर देख लो । दूसरे दिन शाम को
पिता के हाथ में बहन से लिया हुआ
रुपया पुत्र ने ऐसे रख दिया जैसे मैं इसे कमाकर लाया हूँ । पिता
ने फिर उस रुपये को चलते चूल्हे में फेंकते हुए कहा । फिर वही बात
क्या तू मुझे मूर्ख समझ रहा है ।
अब तो पुत्र की हालत खराब हो गई । माँ व बहिन से लिये हुए रुपये पिता ने न जाने कैसे भांप लिये थे । तीसरे दिन पुत्र अपने दोस्त से उधार रुपया लेकर आया और शाम को पिता के हाथ में अपनी उस दिन की कमाई के रुप में रख दिया । पिता ने पल-दो पल उस रुपये को हाथ में रखा व पुत्र को गौर से देखते हुए फिर उस रुपये को जलते चूल्हे में वही कहते हुए फेंक दिया । साथ ही यह निर्देश फिर दे दिया कि कल से गल्ति मत करना और कमाकर ही लाना । अब पुत्र ने सोचा कि ऐसे तो काम नहीं चलेगा, न जाने कैसे पिताजी भांप ही लेते हैं । दूसरे दिन कुछ सोचकर पुत्र वास्तव में रुपया कमाकर लाने के लिये निकल पडा ।
दिन भर पुत्र ने कडी मेहनत की और शाम को अपने पिता के हाथ में दिन भर की मेहनत के एवज में पाया हुआ रुपया रख दिया । पिता ने पुत्र की ओर देखते हुए उस रुपये को भी तू तो मुझे बेवकूफ ही समझ रहा है कहते हुए जलते चूल्हे में फेंक दिया । पिताजी ये आप क्या कर रहे हैं ? दिन भर मैंने तपती धूप में कडी मेहनत से यह रुपया कमाया है, कहते हुए पुत्र ने दौडकर जलते चूल्हे में से उस रुपये को बाहर निकाल लिया । तो इस पिटाई या सख्ति का जो सुपरिणाम उस पीढी को मिलता था उसके कारण पिता से पिटने वाला बालक दुनिया में कहीं भी किसी से भी फिर नहीं पिट पाता था लेकिन अब ?
अब तो पुत्र की हालत खराब हो गई । माँ व बहिन से लिये हुए रुपये पिता ने न जाने कैसे भांप लिये थे । तीसरे दिन पुत्र अपने दोस्त से उधार रुपया लेकर आया और शाम को पिता के हाथ में अपनी उस दिन की कमाई के रुप में रख दिया । पिता ने पल-दो पल उस रुपये को हाथ में रखा व पुत्र को गौर से देखते हुए फिर उस रुपये को जलते चूल्हे में वही कहते हुए फेंक दिया । साथ ही यह निर्देश फिर दे दिया कि कल से गल्ति मत करना और कमाकर ही लाना । अब पुत्र ने सोचा कि ऐसे तो काम नहीं चलेगा, न जाने कैसे पिताजी भांप ही लेते हैं । दूसरे दिन कुछ सोचकर पुत्र वास्तव में रुपया कमाकर लाने के लिये निकल पडा ।
दिन भर पुत्र ने कडी मेहनत की और शाम को अपने पिता के हाथ में दिन भर की मेहनत के एवज में पाया हुआ रुपया रख दिया । पिता ने पुत्र की ओर देखते हुए उस रुपये को भी तू तो मुझे बेवकूफ ही समझ रहा है कहते हुए जलते चूल्हे में फेंक दिया । पिताजी ये आप क्या कर रहे हैं ? दिन भर मैंने तपती धूप में कडी मेहनत से यह रुपया कमाया है, कहते हुए पुत्र ने दौडकर जलते चूल्हे में से उस रुपये को बाहर निकाल लिया । तो इस पिटाई या सख्ति का जो सुपरिणाम उस पीढी को मिलता था उसके कारण पिता से पिटने वाला बालक दुनिया में कहीं भी किसी से भी फिर नहीं पिट पाता था लेकिन अब ?
श्रीमतीजी
की हमउम्र महिलाओं की गोष्ठी में एक परिचिता का दुःख कुछ यूं व्यक्त हो रहा था-
अरे सुनीता अपनी तो किस्मत ही खराब है जब बहू बनकर आए तो सास के सामने कुछ बोल
नहीं सकते थे, और अब जब सास बने तो बहू के सामने कुछ नहीं बोल
सकते ।
यही दुःख अभी एक पार्टी में एक मित्र जिनका अच्छा खासा अनाज मण्डी में गेहूँ का कारोबार है, मकान, दुकान, वाहन व इकलौते विवाहित पुत्र जैसे सभी भौतिक सुखों के बावजूद 55 वर्ष के आसपास की उम्र में ही शरीर रोगों का घर बन चुका है, उनसे कुशल-क्षेम जानने के दौरान सामने आया - मैंने पूछा - और अशोकजी कैसा क्या चल रहा है ? वे बडी मायूसी से फीकी सी मुस्कराहट के साथ बोले - बस सुशीलजी, जो और जैसी कट जावे । मैंने कहा - क्यों भाई ऐसा क्यों ? तो वे बोले - सुशीलजी बडे बदकिस्मत हैं अपन लोग । बात तब भी पूरी तरह पल्ले नहीं पडने पर कुछ और कुरेदा तो वे मुझसे सहमति भरवाते हुए बोले - अपन तो अपने पिताजी के हाथों जब तब पिटते हुए ही बडे हुए और अब अपन अपने बच्चों को तू भी बोलदो तो घर भर में तूफान सा झेलना पड जाता है । दुःख उनका जायज लग रहा था । आजकल सीमित सन्तानों के दौर में यही स्थिति हर दूसरे घर में दिखाई दे रहा है ।
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अच्छी आदत कैसे...?
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