अजी शादी में जाना है, मेरी सभी साडियां पहनी हुई लग
रही हैं, मैं क्या पहनूँगी ? ऩई साडी दिलवादो ना । श्रीमतिजी की इस मीठी सी
मनुहार को मैं सुनता रहा और मन ही मन यह सोचता भी रहा कि आलमारी में साडियां रखने
की जगह तक तो दिख नहीं रही है । दो तीन सूटकेस और पलंग के ड्राज तक में भी बंधी हुई पोटलियों में
साडियों के ढेर लगे हैं, लेकिन विरोधस्वरुप कुछ बोलना तर्कसंगत नहीं था । क्योंकि तब अच्छी
भली सुख की जान को छोटी-मोटी बहस के दुःख में डालना भी तय होता । लिहाजा साथ जाकर
श्रीमतिजी की इच्छापूर्ति करवा लाया, समस्या सुलझ गई । जबकि समस्या
क्या थी, सिर्फ ये दिखावा कि उसकी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद कैसे ?
इधर आज सुबह समाचार पत्र
में पढा- एक बिल्डर से किसी मिडिल क्लास नेताजी के मतभेद होने पर सत्तामद में चूर
नेताजी आधी रात को अपने पट्ठों को साथ लेकर बिल्डर के घर में तोडफोड करने के साथ
ही उसकी सुताई भी कर आए । बिल्डर भी अपने पैसों की ताकत में मार खाकर चुप कैसे रह
जाते । उन्होंने तुरन्त एक परिचित पुलिस अधिकारी को फोन लगाकर ओपन आफर दे दिया कि
मेरे सामने इन नेताजी को जितने भी थप्पड पडवा सकते हो उतने दस हजार रुपये नगद
दूँगा । प्रति थप्पड दस हजार रुपये का आफर पर्याप्त आकर्षक था । लिहाजा उन नेताजी
को भी रात में ही अचानक थाने लाया गया और वे कुछ समझ पाते तब तक एक छोटे अधिकारी
ने तडा-तड छः थप्पडों से नेताजी को बिल्डर के सामने नवाज दिया और तब बिल्डर ने भी
तत्काल उन अधिकारी महोदय को 60,000/- रु. का नगद भुगतान करके नेताजी को
दिखा दिया कि हम किसी से कम नहीं ।
कल आयकर विभाग के
अधिकारियों ने इन्दौर के सराफा बाजार के जिन दो बडे व्यापारियों के यहाँ दबिश दी
वे महाशय अपने धन्धे से करोडों करोड की सम्पत्ति बनाकर एक करोड की आमदनी भी नहीं
दिखा रहे थे । जबकि हमारे एक परिचित कम इन्कम के कारण अपनी आमदनी बढा-चढाकर इन्कम
टेक्स में दिखा रहे हैं । जिससे कि एक नम्बर की इन्ट्री पर उधारी दिखाते हुए दो
नम्बर वालों से निश्चित आमदनी बनाए रखी जा सके ।
इधर अमिताभ बच्चन भी ट्रेक्टर पर बैठकर फोटो-शोटो खिंचवाकर जनता व सरकार को ये दिखाने में लगे हैं कि खेती की जो जमीन मैंने खरीदी हुई है उस पर वाकई में मैं ही खेती कर रहा हूँ ।
सुबह से शाम तक हममें से प्रत्येक के सामने अनेकों उदाहरण गुजरते दिखते हैं जहाँ लोग नकली चेहरे के आधार पर सामने वालों को सिर्फ अपने दिखावे से भरमाने के प्रयास में लगे दिख रहे होते हैं । एक ही लक्ष्य कि जो हम हैं वो न दिखें, जो नहीं हैं वो दिखते रहें । क्या हमारा ये ब्लागवुड इसका अपवाद है ? शायद नहीं । क्योंकि यदि यहाँ भी दिखावे का बोलबाला न होता तो आए दिन यहाँ विरोधाभासी लेख आरोप-प्रत्यारोपों के क्यों पढने को मिल रहे होते ?
बेचारे स्व. गुरुदत्त. इस विरोधाभासी स्थिति से तालमेल न बिठा पाने के कारण ये कहते हुए इस दुनिया से रुखसत हो गए-
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ?