आज हमारे देश का 61वां गौरवपूर्ण गणतंत्र दिवस है । सोने
की चिडिया कहलाए जाने वाले हमारे देश के गुजरे कल के गौरव के चर्चे हम सभी ने
अपने-अपने स्तर पर अलग-अलग कालखंड के मुताबिक इतिहासज्ञों से, अपने पूर्वजों से व अन्य अनेकानेक
माध्यमों से बहुतायद में सुने व उम्रदराज नागरिकों ने देखे भी हैं । लेकिन मुझे इस सन्दर्भ में अपने दिल के सबसे करीब मनोज कुमार की फिल्म
पूरब और पश्चिम की महेन्द्र कपूर की आवाज में प्रस्तुत ये पंक्तियां लगती हैं
जिन्हें जब भी सुना जावे ये मन को अभिभूत सी करती महसूस होती हैं-
जब कोई व्यक्ति जवान होने पर, शादीशुदा होने पर और फिर प्रौढावस्था में आ चुकने तक भी स्वयं को बच्चा ही मानता चला जावे और उस बचपने की ढाल से अपने सामान्य आर्थिक, मानसिक व सामाजिक विकास से दूर रहने के कारण गिनाता जावे तो वह व्यक्ति प्रशंसा का हकदार तो कतई नहीं हो सकता और जब यही बात किसी राष्ट्र के संदर्भ में करें तो ? जैसे राजा वैसी प्रजा के सिद्धांतानुसार वास्तव में आज हमारे देशवासियों की सोच यह देखने में आ रही है कि आदर्श के सारे सिद्धांत मुझे छोडकर देश के दूसरे सभी नागरिकों में दिखाई देने चाहिये । यदि इस देश की समस्त जनता जिसमें राजनेता भी शामिल हों, दूसरों के कन्धों पर पैर रखकर आगे निकलने, मौका मिलते ही देश की सारी सम्पदा उल्टे-सीधे हथकंडे अपनाकर अपने कब्जे में कर लेने, वास्तविक योग्यता को दरकिनार कर भाई-भतीजावाद को प्रश्रय देने जैसी मानसिकता से परे रहकर ईमानदार पारिश्रमिक में अपने हिस्से का काम पूरी मेहनत के साथ 110% तक परिणाम देने की सोच के दायरे में रखकर कर सकेंगे तब ही हम अपने देश के उस गौरव तक पहुँचने की कल्पना कर सकेंगे जहाँ सभी देशवासी सामूहिक रुप से सगर्व यह कह सकें कि-
जब जीरो दिया मेरे
भारत ने, भारत ने मेरे
भारत ने
दुनिया को तब गिनती आई, तारों की भाषा भारत ने
दुनिया को पहले सिखलाई.
देता न दशमलव भारत तो यूं चांद पे जाना मुश्किल था
धरती और चांद की दूरी का अंदाजा लगाना मुश्किल था
सभ्यता जहाँ पहले आई, पहले जन्मी है जहाँ पे कला
अपना भारत वो
भारत है,
जिसके पीछे संसार चला
संसार चला और आगे बढा यूं आगे बढा बढता ही गया
भगवान करे ये और बढे, बढता ही रहे और फूले-फले
बढता ही रहे और फूले-फले...
लेकिन संसार को बढता रहने व फूलने-फलने
की शुभकामनाएँ देने वाले हमारे अपने भारत देश की स्थिति दुनिया के नक्शे पर इस समय
कहाँ है ? दिन-ब-दिन बदलते राजनैतिक कर्णधारों ने आजादी का जो अर्थ इस देश के
लिये लगाया है उसीका परिणाम यह दिखाई दे रहा है कि भारत में भ्रष्टाचार दुनिया के
शीर्ष 4थे देश के स्तर पर आ पहुंचा है । हमारे यहाँ की भौतिक उन्नति की
बातें चाहे जितनी की जावे किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के 64 वर्ष गुजर चुकने पर भी वास्तविकता अभी
तक यही दिखती है कि अमरीका, चीन, जापान जैसे उन्नत देशों के समकक्ष तो
हमारी उन्नति बहुत दूर की बात है, थाईलेंड जैसे छोटे से देश से भी हम
उन्नति के नाम पर सालों पीछे चल रहे हैं । सन् 1947 से शुरु आजाद भारत की विकासशील देश के
रुप में प्रारम्भ हुई यह यात्रा आजादी के 64 वर्ष व्यतीत हो चुकने पर भी हमें
विकसित देशों की श्रेणी तक नहीं ला पाई है जबकि हमारे देश की बौद्धिक मानव सम्पदा
का उपयोग कर दुनिया के अनेक देश अपना विकास अधिक तेजी से किये जा रहे हैं । हम तब
भी विकासशील थे, आज भी विकासशील हैं और शायद आगे भी विकासशील ही बने रहेंगे ।
जब कोई व्यक्ति जवान होने पर, शादीशुदा होने पर और फिर प्रौढावस्था में आ चुकने तक भी स्वयं को बच्चा ही मानता चला जावे और उस बचपने की ढाल से अपने सामान्य आर्थिक, मानसिक व सामाजिक विकास से दूर रहने के कारण गिनाता जावे तो वह व्यक्ति प्रशंसा का हकदार तो कतई नहीं हो सकता और जब यही बात किसी राष्ट्र के संदर्भ में करें तो ? जैसे राजा वैसी प्रजा के सिद्धांतानुसार वास्तव में आज हमारे देशवासियों की सोच यह देखने में आ रही है कि आदर्श के सारे सिद्धांत मुझे छोडकर देश के दूसरे सभी नागरिकों में दिखाई देने चाहिये । यदि इस देश की समस्त जनता जिसमें राजनेता भी शामिल हों, दूसरों के कन्धों पर पैर रखकर आगे निकलने, मौका मिलते ही देश की सारी सम्पदा उल्टे-सीधे हथकंडे अपनाकर अपने कब्जे में कर लेने, वास्तविक योग्यता को दरकिनार कर भाई-भतीजावाद को प्रश्रय देने जैसी मानसिकता से परे रहकर ईमानदार पारिश्रमिक में अपने हिस्से का काम पूरी मेहनत के साथ 110% तक परिणाम देने की सोच के दायरे में रखकर कर सकेंगे तब ही हम अपने देश के उस गौरव तक पहुँचने की कल्पना कर सकेंगे जहाँ सभी देशवासी सामूहिक रुप से सगर्व यह कह सकें कि-
सारे
जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा...
गणतन्त्र
दिवस पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित... जय
हिन्द.
