16.8.14

जीने की समझ...



      किसी कालेज के विशेष समारोह में पुराने छात्रों का एक ग्रुप वर्षौं बाद मिला, वे सभी अच्छे केरियर के साथ बहुत अच्छे पैसे भी कमा रहे थे । एकमत हो वे सब अपने एक पूर्व फेवरेट प्रोफेसर के घर उनसे मिलने पहुँचे ।
      प्रोफेसर साहब सभी से आत्मियता से मिलते हुए उनके वर्तमान कामकाज के विषय में जानने लगे । घीरे-धीरे बात जीवन में बढते तनाव और काम के बढते दबाव पर आ गई । इस मुद्दे पर सभी एकमत थे कि भले ही वे अब आर्थिक रुप से अच्छे-खासे मजबूत हैं किंतु जीवन में वह आनन्द तो नहीं रहा जो पहले हुआ करता था ।
      प्रोफेसर साहब बडे ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे, अचानक वे उठकर अन्दर गये और थोडी देर में वापस उनके बीच आकर बोले- डियर स्टुडेंट मैंने आप सभी के लिये गर्मागर्म काफी तैयार कर दी है । लेकिन प्लीज आप सभी अन्दर किचन में जाकर अपने-अपने कप स्वयं ले आवें ।
      लडके तेजी से अन्दर गये और अपने लिये अच्छे से अच्छा कप उठाने की आपाधापी में लग गये । किसी ने क्रिस्टल का शानदार कप उठाया, किसी ने पार्सिलेन का कप सिलेक्ट किया तो किसीने अपने लिये शीशे का कप चुना । जब सभी के हाथों में काफी आ गयी तब प्रोफेसर साहब बोले अगर आपने ध्यान दिया हो तो जो कप दिखने में अच्छे और मँहगे थे आपने उन्हें ही अपने लिये चुना और साधारण दिखने वाले कप की तरफ ध्यान भी नहीं दिया । जहाँ एक तरफ अपने लिये सबसे अच्छे की चाहत रखना एक सामान्य बात है वहीं यही चाहत हमारे जीवन में तनाव व ईर्ष्या को जन्म देती है यह भी अनिवार्य स्थिति है ।"
     मित्रों, यह तो पक्की बात है कि कप उस चाय-काफी की क्वालिटी में कोई बदलाव नहीं ला पाता । वह तो मात्र एक जरिया है जिसकी मदद से आप काफी पी रहे हैं । जो आपको चाहिये था वह तो काफी थी, कप नहीं, फिर भी आप सब सबसे अच्छे कप के पीछे ही गये और फिर अपना कप लेने के बाद दूसरे का कप निहारने लगे ।
अब इस बात को ध्यान से समझिए-
      हमारा जीवन काफी की तरह है और हमारी नौकरी, पैसा, पोजिशन ये सब कप की तरह हैं । ये हमारे जिन्दगी को जीने के साधन मात्र हैं, जिन्दगी नहीं है । अब हमारे पास कौनसा कप है ये न तो हमारी लाईफ को डिफाईन करता है और न ही उसे चेंज करता है । इसलिये हमें काफी की चिंता करना चाहिये कप की नहीं ।

          “दुनिया के सबसे खुशहाल लोग वे नहीं होते जिनके पास सबकुछ सबसे बढिया होता है, बल्कि वे होते हैं जिनके पास जो कुछ भी होता है उसका अच्छे से इस्तेमाल करते हैं ।"
फलसफा : हमारी साधन-सम्पन्नता का...
      जब तक हम जीवित रहते हैं, हमें लगता है कि हमारे पास खर्च करने हेतु पर्याप्त धन नहीं है किन्तु जब हमारी मृत्यु हो जाती है तो औसतन हमारा 70% प्रतिशत से भी अधिक धन बैंकों में ही पडा रह जाता है ।
      निरन्तर अपने काम में व्यस्त रहने वाले एक धनाढ्य व्यक्ति की जब मृत्यु हुई तब वह अपनी विधवा पत्नी के लिये 200 करोड रु. से भी अधिक की सम्पत्ति छोडकर इस दुनिया से रुखसत हुआ । उसकी विधवा पत्नी ने तब एकान्तवास से उबकर अपने ही घर के युवा नौकर से शादी करली और वह युवा नौकर सोचने लगा कि मुझे तो लगता था कि मैं जीवन भर सुबह से शाम तक अपने मालिक के लिये काम कर रहा हूँ, किन्तु वास्तव में तो मेरा मालिक मेरे ही लिये जिन्दगी भर दिन-रात काम करता रहा ।
      अतः हमें अधिक धनार्जन की बजाय अधिक स्वस्थ शरीर के साथ खुशहाल तरीके से जिन्दगी जीने का प्रयास करना चाहिये क्योंकि-
  आलीशान मकानों का 70% हिस्सा लगभग खाली पडा रहता है ।
  अत्यधिक मँहगी कारों की 70% गति का उपयोग ही नहीं हो पाता है ।
  मँहगे स्मार्ट मोबाईलों के 70% फंक्शन अनुपयोगी ही रहते हैं ।
       70%से अधिक हमारे कपडे पर्याप्त पहने बगैर अलमारी में ही पडे रहते हैं ।
   और 70% से अधिक हमारा कमाया धन दूसरों के इस्तेमाल के लिये बैंकों में ही पडा रह जाता है । 
      इसलिये उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने के लिये बच्चों के आत्मनिर्भरता के दौर में प्रवेश करने के बाद यदि हमारी आमदनी के सोर्स नियमित बने हुए हैं तो फिर धन से बढकर स्वास्थ्य व संबंधों का ध्यान रखें ।
      अपने बेहतर स्वास्थ्य हेतु सजगतापूर्वक अपना चेकअप नियमित अंतराल के साथ कराते रहें । योग-प्राणायाम व आवश्यक रुप से पैदल चलने या दौडने का प्रयास करते रहें । प्यास न हो तब भी पानी का सेवन अधिक मात्रा में करते रहें । हर समय अपने अहं को आगे न आने दें । शक्तिशाली होने पर भी सरल रहें और धनी न हों तब भी परिपूर्ण रहने का प्रयास करें ।
       इसका यह अर्थ भी बिल्कुल नहीं है कि अपने कार्य-व्यापार व जिम्मेदारियों पर ध्यान न दिया जावे बल्कि यह कि अधिक बेहतर संतुलन के साथ जिन्दगी को जीने का प्रयत्न नियमित रुप से करते रहा जावे ।
      अपने आहार-विहार व आचार-विचार के माध्यम से हम सादगी से जिएँ, सबसे प्रेम रखें और सबकी कद्र करें । गुणीजनों के अनुभवों का सुखी जीवन जीने की दिशा में यही सार देखने में आता है ।



2 टिप्पणियाँ:

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

आप सौ पैसे सही कह रहे हैं -पर आज की चकाचौंध में इन्सान की बुद्धि को ऐसा भ्रमित कर रखा है ,कि सच्चे हित की बात सबसे बाद में समझ आती है !

Sushil Bakliwal ने कहा…

प्रतिभाजी...
फिलहाल तो हम सभीके ईर्द-गिर्द जीने का यही आपाधापी वाला तरीका ही चल रहा है ।

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