10.4.13

सार्थक झूठ...


        बडे बाबू अपनी उम्र के 95 वर्ष पूरे कर चुके थे और उनकी ये जिद थी कि मैं तो 100 साल पूरे करके ही इस संसार से बिदा लूंगा और अपने-आप से उनका यह इतना प्रबल आग्रह था कि पिछले 3-4 वर्षों से तो वे किसी को पहचानते तक नहीं थे, कौनसी तारीख, कौनसा दिन, कौनसा साल कुछ भी उनकी स्मृति में बाकि नहीं बचा था, अलबत्ता नाते-रिश्तेदार, उनके पुत्र के आफिस के मित्र-परिचित जो भी घर आते और औपचारिकतावश उनसे मिलकर कुशलक्षेम पूछते तब भी उनमें से किसी को भी पहचाने बगैर वे यह कहना नहीं भूलते कि अब तो 100 साल पूरे करके ही बिदा लूंगा ।

        उनकी धर्मपत्नी तो 20 वर्ष पहले ही अपना शरीर और उनका साथ छोडकर जा चुकी थी किन्तु बडे बाबू की बात ही ओर थी । अपने कार्यकाल में सरकारी कार्यालय के मलाईदार ओहदे पर रहते हुए उन्होंने नाम और नावां दोनों कमाए थे, अच्छे-खासे लोगों से जान-पहचान और उसी अनुसार उनका रुतबा हुआ करता था । सुबह की शुरुआत कसरत, योग और दौड जैसी स्वास्थ्यप्रद गतिविधियों से होती थी और नियमित पौष्टिक भोजन की आदत उनके पिताजी के जमाने से ही चली आ रही थी, इसीलिये शरीर से भी उतने ही मजबूत रहते थे । जब उनके रिटायरमेंट का बिदाई समारोह हुआ तब हार-मालाओं से लदे, हाथ में बडा सा गुलदस्ता लिये अपने सैकडों मित्रों और सहकर्मियों के साथ पूरे जुलूस के माहौल में 3 किलोमीटर का चक्कर लगाकर बडे बाबू घर आये थे और उनके उन सभी सहकर्मी मित्रों का देर रात तक खाना-पीना और मिलने-मिलाने का दौर चलता रहा था ।

        तब उनकी पूरी गृहस्थी साथ थी बेटी व बेटे की शादियों की जिम्मेदारी से भी ताजे-ताजे ही निवृत्त हुए थे । आर्थिक समस्या भी कुछ नहीं थी लेकिन खाली वक्त भी अपने आप में समस्या होता है सो उसका समाधान भी उन्होंने पार्ट टाईम प्राईवेट जाब करके निकाल लिया था और इस प्रकार आमोद-प्रमोद सी स्थिति में अपने मन के मालिक बने रहकर बाबूजी अपनी जीवन-यात्रा उम्र के इस मुकाम तक ले आये थे, लेकिन पिछले 8-10 वर्षों से जो मीनिया उनके दिमाग में बैठ गया था कि अब तो सौ साल पूरे करके ही यहाँ से बिदा लूंगा यह सोच हर गुजरते दिन के साथ बलवती होती चली गई और अब तो स्थिति यह हो गई थी कि उनके जीवन में इस सोच के अलावा बाकि कुछ बचा ही नहीं था ।

        जर्जर हो चुकी उनकी काया को न तो नियमित नींद, भूख-प्यास लगती थी और न ही मल-मूत्र विसर्जन का कोई होश रहता था, कई-कई दिन बिस्तर पर पडे रहने से पर्याप्त साफ-सफाई के बाद भी घर के उस हिस्से में बदबू ने अपना स्थाई डेरा बना रखा था । बेटे-बहू भी एक ही पुत्री और एक पुत्र के माता-पिता थे । बेटी शादी करके बिदा हो गई थी और बेटा विदेश में रहकर अपने भविष्य की बुनियाद वहीं बना रहा था और तीन वर्ष में एक बार ही मिलने आ पा रहा था । इस बार जब बेटा घर आया और सबसे मिलने-जुलने के बाद अपनी माँ से दादाजी की कमजोरी और बेचारगी की बात करने लगा तो माँ लगभग रो पडी और उनकी ऐसी स्थिति में भी उस जिद्दी सोच के कारण
वे कितनी मुश्किलों से उनकी सार-संभाल कर पा रही हैं इसका पूरा हाल उन्होंने अपने बेटे को बताया । बेटा रात-भर सोचता रहा और दूसरे दिन अपने कुछ स्थानीय मित्रों और मिलने-जुलने वालों से मिलकर आने वाले कल की तैयारी में लग गया ।

        दूसरे दिन सुबह उठते ही दो सेविकाओं ने आकर दादाजी को अच्छे सुगंधित साबुन से नहला-धुला कर बिल्कुल नये कपडों में सजाकर साफ-सुथरे माहौल में लिटा दिया फिर उनके पोते ने आकर उन्हें फूलों का गुलदस्ता देते हुए उनके पैर छूकर कहा- बधाई हो दादाजी.. आज आप पूरे सौ साल के हो गये । उसके बाद पहले तो पूरे परिवार के लोग उन्हें फूल-मालाएँ पहना-पहनाकर उनके सौ वर्ष पूरे होने की बधाईयाँ देने लगे और फिर घर के बाहर के मित्रों और परिचितों का भी उन्हें उनके जीवन के सौ साल पूरे होने की बधाई देने का सिलसिला चल पडा । 

        उस पूरे दिन घर में बीसियों मेहमानों के लिये शानदार भोजन का आयोजन चलता रहा और दादाजी की प्रसन्नता उनके जीर्ण-शीर्ण चेहरे पर अलग ही दमदमाती रही । देर रात तक भी उस दिन घर अपने सामान्य क्रम में नहीं आ पाया और सुबह सवेरे माँ ने फिर अलसुबह ही अपने बेटे को नींद से जगाकर यह बताते हुए काम की नई जिम्मेदारियां सौंप दी की बेटा दादाजी महाप्रयाण कर गये ।

14 टिप्पणियाँ:

vandana gupta ने कहा…

chahe jhootha hi sahi magar wakai sarthak jhooth tha aur aise halaton me kai bar jaroori bhi ho jata hai .

दीपक बाबा ने कहा…

१०० साल... नहीं संभलती संभाले ये जिंदगी.

Rajendra Kumar ने कहा…

कभी कभी सार्थक झूठ भी किसी के लिए उपयोगी होता है,जैसे की वुजुर्ग की आत्मा के लिए.बेहतरीन प्रस्तुती.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

पता नहीं ये सार्थक झूठ था या ऊपर वाले के नियमावली में जोर जबरदस्ती या अपनी मजबूरियों के चलते दादाजी से जबरदस्ती ...
बारहाल ... दादा जी खुशी खुशी गए ये अच्छा रहा ...

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी यह प्रस्तुति कल के चर्चा मंच पर है
कृपया पधारें

expression ने कहा…

जाने क्यूँ मन भर आता है ऐसी पोस्ट पढ़ कर....

सादर
अनु

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
नवसम्वत्सर-२०७० की हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकार करें!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मुक्ति मिले खोखले लक्ष्यों से, तब बढ़े आनन्द जीवन का।

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

कुछ गलत नहीं किया -नये वर्ष की हार्दिक मंगल कामनाएँ !

कविता रावत ने कहा…

बुढापे में जाने क्या क्या भोगना पड़ता है ये कोई नहीं जानता ...जब भी ऐसी ही घटनाएँ कहीं देखती हूँ तो सोचती हूँ ये बुढापा आता क्यों है....
आपको पोस्ट पढ़कर अपनी आँखों से देखे ऐसे बहुत से लोगों के चेहरे सामने घुमने लगे हैं

smt. Ajit Gupta ने कहा…

जीने की जिद ऐसे ही दुख दिखाती है।

अजय कुमार झा ने कहा…

जीवन के यथार्थ को खींच दिया आपने अपनी इस पोस्ट में

घनश्याम मौर्य ने कहा…

बुढापे की क्रूर सच्‍चाई को बखूबी बयान किया है आपने।

Kailash Sharma ने कहा…

कभी खोखले उद्देश्य, जीवन में अनजाने दुःख का कारण हो जाते हैं..बहुत सार्थक प्रस्तुति...

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