16.1.12

भलमनसाहत घुस गई...

           दो छोटे लडकों के लगभग 40-42 वर्षीय पिता के ममेरे भाई के अल्प स्वरबाधित अन्डरग्रेजुएट लडके के विवाह सम्बन्ध हेतु जब प्रयास चल रहे थे तो इस युवक ने अपनी ही कालोनी में रहने वाले अपने एक पूर्व अभिन्न व आर्थिक स्थिति में कुछ कमजोर मित्र की पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही लडकी का रिश्ता उन्हें सुझाया । इस लडकी के प्रति इनका मोह शुरु से ही सामान्य से अधिक इसलिये भी था कि इनकी अपनी कोई लडकी थी नहीं और अपनी देखरेख में ये उस लडकी को अपनी ही रिश्तेदारी के आर्थिक रुप से मजबूत घर में भिजवाकर दोनों परिवारों में रिश्ते को और अधिक प्रगाढ बनाना चाह रहे थे । मन के किसी कोने में यह चाह भी चल रही थी कि मेरी तो कोई लडकी है नहीं अतः इस लडकी का सम्पूर्ण विवाह मेरे चाहे मुताबिक हो सके ।
        तत्काल वर पक्ष ने मात्र कंकू-कन्या की चाहत के साथ रिश्ता तय कर दिया और उसी समय सगाई भी कर दी । अब लडकी के पिता की व्यस्तता के चलते लडकी की वैवाहिक आवश्यकताओं की खरीददारी ये उसे अपने साथ ले जा-जाकर करवाने लगे । आधे से अधिक बार अपनी जेब का पैसा उस खरीददारी में खर्च कर खुश होते रहे किन्तु कालोनी में उनका निरन्तर इस प्रकार बाजार में साथ-साथ जाना और लगातार साथ-साथ दिखाई देना जितने मुंह उतनी बातें वाला कारण बनता चला गया । माता-पिता, पत्नी व दो पुत्रों के पालनहार इस युवक ने यह सोचते हुए कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ सही ही कर रहा हूँ अपने घर वालों को विश्वास में लेना भी जरुरी नहीं समझा जबकि इधर  निरन्तर चलती रहने वाली बातों ने न सिर्फ उनके सारे परिचितों में बल्कि उनके माता-पिता व पत्नी की नजरों में भी इन्हे ही दोषी बनवाया । उधर लडकी के भावी ससुराल वालों ने भी अप्रत्यक्ष रुप से इनकी ही लानत-मलानत की जिसके चलते खिन्न मनोदशा में अपने ही परिवार की इस शादी में वर पक्ष के घर जाने से इन्हें स्वयं को दूर कर लेना पडा । यह स्थिति भी इनके माता-पिता के लिये पर्याप्त पीडादायक साबित हुई । आखिरकार रिश्तेदारी में एक सीनियर सम्बन्धी के बहुत समझाने पर ये उस शादी में अपने माता-पिता का मन रखने की खातिर सिर्फ मुंह दिखलाने जैसी स्थिति में मात्र दस बीस मिनिट के लिये शामिल हुए और पानी तक पीये बगैर वहाँ से वापिस आ गये ।
          इस समूचे प्रकरण में लडकी को अच्छा घर मिल गया वह अपने घर चली गई । लडकी के माता-पिता हींग लगे न फिटकरी वाली स्थिति में अपनी जिम्मेदारी से निवृत्त हो लिये । ममेरे भाई के परिवार में भी अल्पशिक्षित व अल्प स्वरबाधित लडके को अपने से अधिक शिक्षित व सर्वांग स्वस्थ सुन्दर लडकी मिल गई । किन्तु सबके भले की मानसिकता से इन कडियों को जुडवाने वाले इस सूत्रधार युवक को अपनी भलमनसाहत के एवज में क्या मिला ?  घर-परिवार व पास-पडौस में इनके खिलाफ ऐसी कानाफूसी जिसका कोई वजूद था ही नहीं और रिश्तेदारी के ममेरे भाई के घर का जन्म से अब तक का सम्बन्ध जो फिलहाल तो इनके लिये खत्म सा ही हो गया । 
          बहुत नजदीकी से इन परिवारों से जुडे रहने व सबकी स्थितियों को भली प्रकार से समझने के कारण मन में यही कहावत सामने आई कि -
      भलमनसाहत घुस गई दुनियादारी के जंजाल में...

7 टिप्पणियाँ:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

लोगों का कोई क्या करे

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

ऐसा भी होता है!!

रचना ने कहा…

pehli baat yae rishta kis tarah sae ladki kae liyae achcha haen ??? apne sae kam padhae likhae ladkae sae uska vivaah karna mehaj ek shoshan hi haen

dusri baat vivaah kaa sujhaav daene vaale vyakti ko ek durii rakhni hi chahiyae thee

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

यदि समाज में सदाशयता अधिक समय तक याद म रखी जाये तो भविष्य में वह सदाशयता रूठ कर चली जाती है।

Patali-The-Village ने कहा…

दुनियांदारी निभाने के लिए बहुत कुछ सोचना पड़ता है| धन्यवाद|

Shah Nawaz ने कहा…

यह तो अक्सर होता ही है 'कर भला हो बुरा'... लेकिन मेरा तो यह ही मानना है की इससे घबराकर सत्कर्म से पीछे कभी भी नहीं हटना चाहिए..

ajit gupta ने कहा…

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