11.1.20

अनमोल रिश्ता...


            सुश्री वसुंधरा दीदी एक छोटे से शहर के  प्राथमिक स्कूल में  कक्षा 5 की शिक्षिका थीं । उनकी एक आदत थी कि वह कक्षा शुरू करने से पहले हमेशा "आई लव यू ऑल" बोला करतीं । मगर वह जानती थीं कि वह सच नहीं कहती । वह कक्षा के सभी बच्चों से उतना प्यार नहीं करती थीं । कक्षा में एक ऐसा बच्चा था जो वसुंधरा को एक आंख नहीं भाता । उसका नाम आशीष था । आशीष मैली कुचैली स्थिति में  स्कूल आ जाया करता । उसके बाल खराब होते, जूतों के बन्ध खुले, शर्ट के कॉलर पर मेल के निशान । व्याख्यान के दौरान भी उसका ध्यान कहीं और होता । वसुंधरा के डाँटने पर वह चौंक कर उन्हें देखने तो लग जाता.. मगर उसकी खाली-खाली नज़रों से उन्हें साफ पता लगता रहता कि आशीष शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित होने के बावजूद भी मानसिक रूप से गायब है ।

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            धीरे  धीरे वसुंधरा को आशीष से नफरत सी होने लगी । क्लास में घुसते ही आशीष.. वसुंधरा की आलोचना का निशाना बनने लगा । सब बुराई के उदाहरण आशीष के नाम पर किये जाते । बच्चे उस पर खिलखिला कर हंसते और वसुंधरा उसको अपमानित करके संतोष प्राप्त करतीं । आशीष ने हालांकि किसी बात का कभी कोई जवाब नहीं दिया । किन्तु वसुंधरा को वह एक बेजान पत्थर की तरह लगता जिसके अंदर अहसास जैसी कोई चीज नहीं थी । प्रत्येक डांट, व्यंग्य और सजा के जवाब में वह बस अपनी भावनाओं से खाली नज़रों से उन्हें देखता और सिर झुका लेता ।

           
वसुंधरा को अब इससे गंभीर चिढ़ हो चुकी थी । पहला सेमेस्टर समाप्त हो गया और रिपोर्ट बनाने का चरण आया तो वसुंधरा ने आशीष की प्रगति रिपोर्ट में यह सब बुरी बातें लिख मारी । प्रगति रिपोर्ट कार्ड माता-पिता को दिखाने से पहले प्रधानाध्यापिका के पास जाया करता था । उन्होंने जब आशीष की रिपोर्ट देखी तो वसुंधरा को बुला लिया । 

            "
वसुंधरा... प्रगति रिपोर्ट में कुछ तो प्रगति भी लिखनी चाहिए। आपने तो जो कुछ लिखा है इससे आशीष के पिता बिल्कुल निराश ही हो जाएंगे।"        मैं माफी चाहती हूँ, लेकिन आशीष एक बिल्कुल ही अशिष्ट और निकम्मा बच्चा है । मुझे नहीं लगता कि मैं उसकी प्रगति के बारे में कुछ भी अच्छा लिख सकती हूँ । वसुंधरा बेहद घृणित लहजे में बोलकर वहां से उठ आईं ।

           
प्रधानाध्यापिका ने एक अजीब हरकत की । उन्होंने चपरासी के  हाथ वसुंधरा की डेस्क पर आशीष की पिछले वर्षों की प्रगति रिपोर्ट रखवा दी । अगले दिन वसुंधरा ने कक्षा में प्रवेश किया तो रिपोर्ट पर नजर पड़ी । पलट कर देखा तो पता लगा कि यह आशीष की रिपोर्ट हैं । "पिछली कक्षाओं में भी उसने निश्चय ही यही गुल खिलाए होंगे ।"  उन्होंने सोचा और कक्षा 3 की रिपोर्ट खोली । रिपोर्ट में टिप्पणी पढ़कर उनकी आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उन्होंने देखा कि रिपोर्ट उसकी तारीफों से भरी पड़ी है । "आशीष जैसा बुद्धिमान बच्चा मैंने आज तक नहीं देखा ।" "बेहद संवेदनशील बच्चा है और अपने मित्रों और शिक्षकों से बेहद लगाव रखता है ।" अंतिम सेमेस्टर में भी आशीष ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है ।

            "
वसुंधरा दीदी ने अनिश्चित स्थिति में कक्षा 4 की रिपोर्ट खोली । "आशीष पर अपनी मां की बीमारी का बेहद प्रभाव पड रहा है ।  उसका  ध्यान पढ़ाई से हट रहा है ।"  "आशीष की माँ को अंतिम चरण का  कैंसर हुआ है । घर पर उसका और कोई ध्यान रखनेवाला नहीं है, जिसका गहरा प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़ा है ।"  आशीष की  माँ मर चुकी है और इसके साथ ही आशीष के जीवन की रमक और रौनक  भी । उसे बचाना होगा...इससे पहले कि  बहुत देर हो जाए । 

            "
वसुंधरा के दिमाग पर भयानक बोझ तारी हो गया । कांपते हाथों से उन्होंने प्रगति रिपोर्ट बंद की । आंसू उनकी आँखों से एक के बाद एक गिरने लगे । अगले दिन जब वसुंधरा कक्षा में दाख़िल हुईं तो उन्होंने अपनी आदत के अनुसार अपना पारंपरिक वाक्यांश "आई लव यू ऑल" दोहराया । मगर वह जानती थीं कि वह आज भी झूठ बोल रही हैं । क्योंकि इसी क्लास में बैठे एक उलझे बालों वाले बच्चे आशीष के लिए जो प्यार वह आज अपने दिल में महसूस कर रही थीं..वह कक्षा में बैठे और किसी भी बच्चे से हो ही नहीं सकता था । 

           
व्याख्यान के दौरान उन्होंने रोजाना दिनचर्या की तरह एक सवाल आशीष पर दागा और हमेशा की तरह आशीष ने सिर झुका लिया । जब कुछ देर तक वसुंधरा से कोई डांट फटकार और सहपाठी सहयोगियों से हंसी की आवाज उसके कानों में न पड़ी तो उसने गहन आश्चर्य से सिर उठाकर उनकी ओर देखा । अप्रत्याशित रुप से आज उनके माथे पर बल न थे बल्कि वह मुस्कुरा रही थीं । 

           
उन्होंने आशीष को अपने पास बुलाया और उसे सवाल का जवाब बताकर दोहराने के लिए कहा । आशीष तीन चार बार के आग्रह के बाद अंतत: बोल ही पड़ा । इसके जवाब देते ही वसुंधरा ने न सिर्फ खुद खुशान्दाज़ होकर तालियाँ बजाईं बल्कि सभी से भी बजवायी.. फिर तो यह दिनचर्या बन गयी । वसुंधरा अब हर सवाल का जवाब अपने आप बताती और फिर उसके पिछले वर्षों के रेकार्ड के साथ उसकी खूब सराहना व तारीफ करतीं ।  क्लास में अब प्रत्येक अच्छा उदाहरण आशीष के कारण दिया जाने लगा ।  धीरे-धीरे पुराना आशीष सन्नाटे की कब्र फाड़ कर बाहर आने लगा । 

           
अब वसुंधरा को सवाल के साथ जवाब बताने की जरूरत नहीं पड़ती। वह रोज बिना किसी त्रुटि के उत्तर देकर सभी को प्रभावित करता और नये-नए सवाल पूछ कर सबको हैरान भी करता । उसके बाल अब कुछ हद तक सुधरे हुए होते, कपड़े भी काफी हद तक साफ होते जिन्हें शायद वह खुद धोने लगा था । देखते ही देखते साल समाप्त हो गया और आशीष ने दूसरा स्थान हासिल कर लिया यानी दूसरी क्लास । विदाई समारोह में सभी बच्चे वसुंधरा दीदी के लिये सुंदर उपहार लेकर आए और वसुंधरा की  टेबल पर ढेर लग गया । 

            इन खूबसूरती से पैक हुए उपहारों में  पुराने अखबार में बंद सलीके से पैक हुआ एक उपहार भी पड़ा था । बच्चे उसे देखकर हंस पड़े । किसी को जानने में देर न लगी कि उपहार के नाम पर ये आशीष लाया होगा । वसुंधरा दीदी ने उपहार के इस छोटे से पहाड़ में से लपक कर उसे निकाला । खोलकर देखा तो उसके अंदर एक महिलाओं की इत्र की आधी इस्तेमाल की हुई शीशी और एक हाथ में पहनने वाला एक कड़ा था जिसके ज्यादातर मोती झड़ चुके थे । वसुंधरा ने चुपचाप उस इत्र को खुद पर छिड़का और वह कंगन अपने हाथ में पहन लिया । सभी बच्चे यह दृश्य देखकर हैरान रह गए, खुद आशीष भी । आखिर आशीष से रहा न गया और वो वसुंधरा दीदी के पास आकर खड़ा हो गया । कुछ देर बाद उसने अटक-अटक कर वसुंधरा को बताया कि "आज आप में से मेरी माँ जैसी खुशबू आ रही है ।"

           
समय पर लगाकर उड़ने लगा। दिन सप्ताह, सप्ताह महीने और महीने साल में बदलते भला कहां देर लगती है ? मगर हर साल के अंत में वसुंधरा को आशीष से एक पत्र नियमित रूप से प्राप्त होता जिसमें लिखा होता कि "इस साल कई नए टीचर्स से मिला । मगर आप जैसा कोई नहीं था ।"  फिर आशीष का स्कूल समाप्त हो गया और पत्रों  का सिलसिला भी । कई साल आगे और गुज़रे और अध्यापिका वसुंधरा अब रिटायर हो गईं । 

           
एक दिन उन्हें अपनी मेल में आशीष का पत्र मिला जिसमें लिखा था-  "इस महीने के अंत में मेरी शादी है और आपके बगैर शादी की बात मैं नहीं सोच सकता । एक और बात .. मैं जीवन में बहुत से लोगों से मिल चुका हूँ किंतु आप जैसा कोई नहीं है....डॉक्टर आशीष  । इसके साथ ही विमान का आने जाने का टिकट भी लिफाफे में मौजूद था । वसुंधरा खुद को रोक सकने की स्थिति में नहीं रह गई थी ।

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           उन्होंने अपने पति से अनुमति ली और वह दूसरे शहर के लिए रवाना हो गईं । ऐन शादी के दिन जब वह शादी की जगह पहुंची तो थोड़ी लेट हो चुकी थीं । उन्हें लगा अब तक तो समारोह समाप्त हो चुका  होगा..  मगर यह देखकर उनके आश्चर्य की सीमा  न रही कि शहर के बड़े-बडे डॉ, बिजनेसमैन और यहां तक कि वहां मौजूद फेरे कराने वाले पंडित भी इन्तजार करते करते थक गये थे. कि आखिर कौन आना बाकी है...  मगर आशीष समारोह में फेरों और विवाह के  बजाय गेट की तरफ टकटकी लगाए उनके आने का इंतजार कर रहा था । फिर सबने देखा कि जैसे ही यह पुरानी अध्यापिका वसुंधरा ने गेट से प्रवेश किया आशीष उनकी ओर तेजी से लपका और उनका वह हाथ पकड़ा जिसमें उन्होंने अब तक वह सड़ा हुआ सा कंगन पहना हुआ था और उन्हें सीधा वेदी पर ले गया ।

           
वसुंधरा का हाथ में पकड़ कर वह सभी मेहमानों से बोला "दोस्तो आप सभी हमेशा मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछा करते थे और मैं आप सबसे वादा किया करता था कि जल्द ही आप सबको अपनी माँ से मिलाऊँगा...! यही मेरी माँ  हैं !"

       मित्रों...
           
इस सुंदर कहानी को सिर्फ शिक्षक और शिष्य के रिश्ते के कारण ही मत सोचिएगाअपने आसपास देखें, आशीष जैसे कई फूल मुरझा रहे हैं जिन्हें आपका जरा सा ध्यान,  प्यार और स्नेह बिल्कुल नया जीवन भी दे सकता  है...!

परिपूर्ण जीवन यात्रा हेतु - खुशवंतसिंह...


         इन  सूत्रों को पढ़ने के बाद पता चला कि सचमुच खुशहाल ज़िंदगी के बाद शानदार मौत के लिए ये सूत्र बहुत ज़रूरी हैं... 
      
           1. अच्छा स्वास्थ्य - अगर आप पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं, तो आप कभी खुश नहीं रह सकते । बीमारी छोटी हो या बड़ी, ये आपकी खुशियां छीन लेती हैं । 
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         2. ठीक ठाक बैंक बैलेंस - अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए बहुत अमीर होना ज़रूरी नहीं । पर इतना पैसा बैंक में हो कि आप जब चाहें बाहर खाना खा पाएं, सिनेमा देख पाएं, समंदर और पहाड़ घूमने जा पाएं, तो आप खुश रह सकते हैं । उधारी में जीना आदमी को खुद की निगाहों में गिरा देता है ।

           3. अपना मकान - मकान चाहे छोटा हो या बड़ा, वो आपका अपना होना चाहिए । अगर उसमें छोटा सा बगीचा हो तो आपकी ज़िंदगी बेहद खुशहाल हो सकती है ।

           4. समझदार जीवन साथी - जिनकी ज़िंदगी में समझदार जीवन साथी होते हैं, जो एक-दूसरे को ठीक से समझते हैं, उनकी ज़िंदगी बेहद खुशहाल होती है, वर्ना ज़िंदगी में सबकुछ धरा का धरा रह जाता है, सारी खुशियां काफूर हो जाती हैं । हर वक्त कुढ़ते रहने से बेहतर है अपना अलग रास्ता चुन लेना ।

           5. दूसरों की उपलब्धियों से न जलना - कोई आपसे आगे निकल जाए, किसी के पास आपसे ज़्यादा पैसा हो जाए, तो उससे जले नहीं । दूसरों से खुद की तुलना करने से आपकी खुशियां खत्म होने लगती हैं । 

          6. गपबाजी से बचना - लोगों को गपशप के ज़रिए अपने पर हावी मत होने दीजिए । जब तक आप उनसे छुटकारा पाएंगे, आप बहुत थक चुके होंगे और दूसरों की चुगली व निंदा से आपके दिमाग में कहीं न कहीं ज़हर भर चुका होगा ।

              7.  अच्छी आदत - कोई न कोई ऐसी हॉबी विकसित करें, जिसे करने में आपको मज़ा आता हो,  मसलन गार्डेनिंग, पढ़ना, लिखना । फालतू बातों में समय बर्बाद करना ज़िंदगी के साथ किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है । कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे आपको खुशी मिले और उसे आप अपनी आदत में शुमार करके नियमित रूप से करते रह सकें ।

          8. ध्यान - रोज सुबह कम से कम दस मिनट ध्यान करना चाहिए । ये दस मिनट आपको अपने ऊपर खर्च करने चाहिए । इसी तरह शाम को भी कुछ वक्त अपने साथ गुजारें । इस तरह आप खुद को जान पाएंगे । 

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            9. क्रोध से बचना - कभी अपना गुस्सा ज़ाहिर न करें । जब कभी आपको लगे कि आपका दोस्त आपके साथ तल्ख हो रहा है, तो आप उस वक्त उससे दूर हो जाएं, बजाय इसके कि वहीं उसका हिसाब-किताब करने पर आमदा हो जाएं ।

         10. अंतिम समय - जब यमराज दस्तक दें, तो बिना किसी दु:ख, शोक या अफसोस के उनके साथ निकल पड़ना चाहिए, अंतिम यात्रा पर खुशी-खुशीशोकमोह के बंधन से मुक्त हो कर जो यहां से निकलता हैउसी का जीवन सफल होता है ।

              मुझे नहीं पता कि खुशवंतसिंह ने पीएचडी की थी या नहीं ।  पर इन्हें पढ़ने के बाद लगता है कि ज़िंदगी के डॉक्टर भी होते हैं । ऐसे डॉक्टर ज़िंदगी बेहतर बनाने का फॉर्मूला देते हैं । ये ज़िंदगी के डॉक्टर की ओर से ज़िंदगी जीने के लिए दिए गए महत्वपूर्ण नुस्खे हैं ।

ऐसे भी सुधारें हम पर्यावरण...


            सेवा के इस अनूठे आयोजन से खुद को जोडें । वर्तमान के मोसमी फल जैसे आम, जामुन, चिकू इत्यादी जिनका हममे से कोई भी उपयोग करने के बाद कृपया इनके बीज फेंके नही, बल्कि इन्हें पानी से धोकर एक प्लास्टीक की थैली में रखते चलें और जब भी आप शहर से बाहर जावें- तब जहां भी सूखी बंजर भूमि दिखे वहीं पर इन बीजों को फेंकें, अथवा सडक के ऐसे ही किसी किनारे पर फेंकें । यदि हमारे इस सुकृत्य से एक बीज भी पनप कर पेड बन जाता है तो समझें हमारा उद्देश्य सफल हो गया । यह किसी अकेले व्यक्ति का विचार नही हे बल्कि महाराष्ट्र और कर्नाटक मे बहुत से लोग इस अद्भुत मिशन से जुडे हैं । आज सुबह ही एक लेख पढने के पश्चात ऐसा लगा कि क्यों    हम सभी साथी इस मिशन से जुडें एवम् इसे अपनी एक आदत बनालें । इसके अलावा...

 जिस दिन भी हम मरेंगे...अपने साथ एक पेड़ भी लेकर जलेंगे
 इसलिये प्रकृति का जो कर्ज रहेगा हम पर  वो तो चुका दो यारों...
जीते जी दो पेड़ तो लगा दो यारों...!

            आप सबसे निवेदन है, यह मैसेज सिर्फ तीन से पांच लोगों तक जरूर भेजें... और उन लोगों से भी कहें कि यह मैसेज आगे तीन से पांच लोगों को भेजें, हम सब बलिदान ना सही पर देश के लिए इतना छोटा सा काम तो कर ही सकते है,,,

1.
कचरा सड़क पर ना फेंकें ।
2.
सड़कों, दीवारों पे ना थूकें ।
3.
नोटों, दीवारों पर ना लिखें ।
4.
गाली देना छोड़ दें ।
5.
पानी एवम् लाइट बचाएँ ।
6.
एक पौधा लगाएँ ।
7.
ट्रेफिक रूल्स ना तोडें ।
8.
रोज़ माता पिता का आशीर्वाद लें ।
9.
लड़कियों की इज्जत करें ।
10.
एम्बुलेंस को रास्ता दें ।

देश को नहीं, पहले खुद को बदलें । 
            यदि हम चाहते हैं कि हमारी संतानों को आने वाले समय में रहने को साफ व सुरक्षित माहौल मिले तो हमें इन छोटे-छोटे नियमों को अनिवार्य रुप से अपनी आदत बना लेना चाहिये वर्ना कोई भी मोदी, गांधी अथवा केजरीवाल जैसे नेता भी अकेले कुछ सुधार नहीं कर पाएंगे जब तक कि इन छोट-छोटे सामान्य नियमों को हम सभी अपनी जीवनचर्या का आवश्यक अंग ना बना लें । धन्यवाद...

असफलता या सफलता...!


            5 वर्ष की उम्र में उसके पिता का निधन हो गया । 16 वर्ष की उम्र में उसका स्कूल छूट गया । 17 वर्ष की उम्र तक वह असंतुष्ट अवस्था में 4 बार जॉब बदल चुका था । 18 वर्ष की उम्र में उसकी शादी हो गई । 18 से 22 वर्ष की उम्र में उसने रेल्वे में कंडक्टर की नौकरी में फैल रहने के बाद सेना में नौकरी करने की कोशिश की और वहाँ से भी उसे निकाल दिया गया । उसने वकालत पास करने की कोशिश की वहाँ भी वह रिजेक्ट हुआ । फिर उसने इंश्योरेंस एजेंसी में प्रयास किया और वहाँ भी असफल ही साबित हुआ । 

            पारिवारिक जीवन में 19 वर्ष की उम्र में वह एक कन्या का पिता बना किंतु 20 वर्ष की उम्र में उसकी पत्नी उस कन्या को उसके पास छोडकर किसी अन्य पुरुष के साथ चली गई । उसने एक छोटे रेस्टोरेंट में कप-प्लेट धोने से शुरु करके कुक का काम किया । उसकी पुत्री का अपहरण हो गया और उसे भी वह बचा नहीं पाया । किंतु फिर भी संयोगवश उसने अपनी पत्नी को अपने साथ रहने के लिये राजी कर लिया ।

            65
वर्ष की उम्र में वह रिटायर हो गया और उसके रिटायरमेंट पर संस्थान ने उसके पास सिर्फ 105 डॉलर का चैक इस नोट के साथ भेजा कि इससे आगे व अधिक उसकी कोई पात्रता नहीं बनती । 

            थक-हारकर उसने आत्महत्या कर लेने का निर्णय किया । लगभग सारा जीवन हर जगह असफल रहने के कारण उसका जीवन के प्रति समस्त मोह भंग हो चुका था । उसने एक पेड के नीचे अपनी वसीयतनुमा ईच्छा लिखकर जब फांसी लगाने का प्रयास किया तब अचानक उसके मन में यह विचार आया कि जीवन में बहुत कुछ ऐसा है जो उसने अभी तक नहीं किया है । 

           
अपने कुकिंग जॉब के दौरान वो यह महसूस करता था कि उसके बनाये हुए चिकन की रेसिपी को लोग पसन्द करते थे । तब उसने उस चेक को भुनवाकर 87 डॉलर इन्वेस्ट करते हुए कुछ चिकन के छोटे-छोटे पैकेट बनाकर केंचुकी फ्रॉयड चिकन के नाम से डोअर-टू-डोअर बेचने का काम फिर शुरु किया और इस बार उसे लोगों से धीरे-धीरे अच्छा प्रतिसाद मिलने लगा । 

            चलते-चलते जहाँ वह शख्स 65 वर्ष की उम्र में आत्महत्या करने को उद्धृत था वहीं 88 वर्ष की उम्र में कोलोनेल सेंडर्स का नाम फाउंडर ऑफ केंचुकी फ्रॉयड चिकन (KFC) के रुप में विश्व भर में बिलेनियर्स के रुप में स्थापित हो चुका था ।

           
कथासार यही है कि जब तक जीवन है कोई भी व्यक्ति कभी भी कहीं भी नई शुरुआत कर सकता है । प्रयास कभी भी अंतिम नहीं होते । न ही यह बात मायने रखती है कि आपने उसके लिये कितनी कठोर मेहनत की । इंसान का काम है - चलते रहना, प्रयासरत रहना, वांछित परिणाम न मिलने पर तरीकों में बदलाव करते रहने के साथ पुनः-पुनः प्रयास करते रहना । लक्ष्य व स्वप्नपूर्ति के लिये कोई भी उम्र कभी भी अंतिम नहीं होती ।
 

आरक्षण का दंश...

        एक सज्जन से एक सवाल पूछा गया कि भारत में जनरल कैटेगरी वाला होने पर आपका क्या अनुभव है तो उन्होंने जो जबाब दियाउसे पढ़िए........(हिंदी में अनुवाद)

           प्रवेश परीक्षा:
        
मेरा स्कोर :192, उसका स्कोर :92, जी हाँ हम एक ही कॉलेज में पढ़े.....

           College Fees,
        
मेरी हर सेमिस्टर की फी 30200, (मेरे परिवार की आय 5 lacs से कम है..) उसकी हर सेमिस्टर की फी 6600. (उसके माता और पिता दोनों अच्छा कमा रहे हैं......) जी हाँ हम दोनों एक ही होस्टल में रहते थे...

          Mess Fees,
        
मैं 15000/- हर सेमिस्टर के देता था.... वो भी 15000 हर सेमिस्टर के देता था, लेकिन सेमिस्टर के अंत में वो उसे रिफंड होते थे..... जी हाँ हम एक ही मेस में खाते थे....

          Pocket Money,
        
मेरा खर्चा 5000 था जो कि मैं ट्यूशन और थोड़ा बहुत अपने पिता से लेता था... वो 10000 खर्चा करता था जो कि उसे स्कॉलरशिप के मिलते थे... जी हाँ हम एक साथ पार्टी करते थे....

          CAT 2015,
       
मेरा स्कोर : 99 percentile. (किसी IIM से एक मिसकॉल का इंतज़ार रहा.) उसका स्कोर : 63 percentile. ( IIM Ahemedabad के लिए सलेक्ट हुआ) जी हाँ ऐप्टीट्यूड और रीजनिंग उसे मैंने पढ़ाया था....

          OIL Campus recruitement,
         
मैं : Rejected. (My OGPA 8.1) वो : selected. (His OGPA 6.9) जी हाँ हमने एक ही कोर्स पढ़ा था...

          GATE Score,
      
मेरा स्कोर : 39.66 (डिसक्वालीफाईड सो INR 1,68,000 की स्कॉलरशिप भी हाथ से गई) उसका स्कोर : 26 (क्वालीफाईड और INR 1,68,000 के साथ-साथ अतिरिक्त स्कॉलरशिप भी) जी हाँ हमने एक जैसे नोट्स शेयर किये थे..

           
कौन हूँ मैं ?  मैं भारत में एक जनरल कैटेगरी का छात्र हूँ...

           
दिमाग में बस कुछ सवाल हैं.....
            क्या उसके पास चलने के लिए दो पैर नहीं हैं ? क्या उसके पास लिखने या काम करने के लिए दो हाथ नहीं हैं ? क्या उसके पास बोलने के लिए मुंह नहीं है ? क्या उसके पास सोचने के लिए दिमाग नहीं है ? अगर हैं तो फिर हम दोनों को एक जैसा ट्रीटमेंट क्यों नहीं मिलता

         
ये बात राजनितिक पार्टीयो के बजाय देश के सम्माननीय न्यायालय के सभी महानुभावों तक पहुंचे तब तक forward करे ताकि देश आरक्षण की दीमक से बरबाद होने से बच जाये ।
 सोर्स - WhatsApp.

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