24.12.19

क्या हैं हम और क्या हमें होना चाहिये...?

मत बांधिए जंजीरें मेरे वतन के पैरों में,
यह एक परिंदा है इसे आजाद रहने दीजिए...
-डॉ. विमलसिंह.


       मै कल एक सोसायटी में अपने पुराने मित्र से मिलने गया, सोसायटी के चौकीदार ने मुझे रोककर रजिस्टर खोला जिसमें पहले मेरा नाम, मोबाईल नंबर, विजिट का समय,  घर का नंबर और अंत में दस्तखत करवाकर सवाल किया कहां से आए हैं ? फिर मेरे मित्र के घर फोन कर कन्फर्म किया कि अमुक भाई साहब आपसे मिलने आए हैं,  उन्हें आने दूं क्या ? मेरे मित्र की अनुमती के बाद ही उसने मुझे अंदर आने दिया । 


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     पांच  मिनिट की इस कार्यवाही के बाद मेरे मन में विचार आया कि एक सोसायटी में अपने पुराने मित्र से मिलने के लिए मुझे ये सारी जानकारी सोसायटी की सुरक्षा के लिए देनी पड़ रही है तो देश की सुरक्षा के लिये यदि देश का चौकीदार बाहर से आकर बसे लोगों से  उनसे सम्बन्धित जानकारी मांगे तो इसमें बुराई क्या है ? लेकिन वास्तव में हो क्या रहा है- 

       एक वर्ग  दंगा कर चुका  है जो अभी जारी है ।  दूसरा वर्ग  अब मानवाधिकार कार्यकर्ता बन के सामने आएगा ।  तीसरा वर्ग  मीडिया प्रमुख एनडीटीवी, रवीश कुमार, राजदीप, बरखादत्त, जैसे लोगों के विचार में इन्हें पीड़ित साबित करेंगा और चौथा वर्ग जिनमें नामी-गिरामी वकीलों की फौज कपिल सिब्बलसलमान खुर्शीदप्रशांत भूषणइंदिरा जयसिंह जैसे नाम इनके लिए कोर्ट में मुफ्त केस लड़ते दिखाई देंगें ।

       जबकि हर हिंदुस्तानी ये जानता है कि CAB  जो अब बहुत ही जरूरी बन गया है और जिसका किसी भी सूरत में भारत के वर्तमान नागरिकों से कोई सरोकार नहीं है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो बावजूद इसके इनके आक्रमण व हिंसा जारी है इसका मतलब साजिश गहरी है । अब इस साजिश और इसके सूत्रधारों को सामने लाकर इनका पक्का इलाज करना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए ।

       अभी दो दिन पहले ही देश के चौकीदार ने कहा था कि इनके कपड़ों से ही इन उपद्रवियों की पहचान हो रही है, तो अब ये बंदे नंगे होकर प्रदर्शन करते दिखने लगे । अब नंगे भी तो पकड़ में आएंगे ही । अब इस कार्यवाही में सरकार से हमें यह उम्मीद भी करना लाजमी है कि सिर्फ किसी वर्ग-विशेष को इकतरफा अपराधी मान लेने के बजाय वास्तविक अपराधियों पर ही शिकंजा कसा जाए, फिर भले ही छुद्र स्वार्थों की पूर्ति करते ये लोग किसी भी वर्ग, धर्म या रुतबे से सम्बन्धित क्यों न हों, क्योंकि जिन कंधों पर बंदूक रखकर चलाई जा रही है उसके पीछे से निशाना साधने वालों की पहचान भी सामने आना ही चाहिये ।

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       देशहित में जो भी नियम-कायदे आवश्यक है उसे होना ही चाहिये । लेकिन इस प्रक्रिया में जिनके भी आर्थिक व राजनीतिक लाभ प्रभावित हुए हैं उनकी राष्ट्रद्रोही कारगुजारियां भी देश के सभी शांतिप्रिय नागरिकों के सामने भी आना चाहिये ।

आज के समय में भारत की वास्तविक आवश्यकता क्या है उसे आप 
90 के दशक के इस वीडिओ में अवश्य देखें...


23.12.19

हम कहाँ जा रहे हैं...

      इस समय देश में जिस अफरातफरी का माहौल बना हुआ है इसमें हर उस राज्य में जहाँ BJP का शासन है वहाँ जमकर हिंसा, आगजनी, तोडफोड और जो भी सामने आए उसे नष्ट करदो का जो माहौल बनाया हुआ है क्या यह सिर्फ नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ निकाला जा रहा गुस्सा है  यकीनन नहीं क्योंकि इसकी बुनियाद तो बहुत पहले से बनाई जा रही है ।  

    
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      "तुम कितने अफजल मारोगे - हर घर से अफजल निकलेगा" ये बात हम लोग पहले से सुनते आ रहे हैं, अभी भी टी.वी./इन्टरनेट पर ना जाने कितने वीडियो घूम रहे है,  जिसमे सैकडों-हजारों अफजल भारत की अस्मिता, इसके लोकतंत्र को चुनौती दे रहे हैं । कहीं ट्रेन पर पत्थर फेंके जा रहे है, तो कहीं रेलवे प्लेटफॉर्म पर यात्रियों की सुविधा के लिए लगाई गई भारी-भरकम कुर्सियों को रेल की पटरियों पर फेंका जा रहा है ।

       कल तक जो अफजल लोकतंत्र के मंदिर पर गोलिंयां बरसा रहा था, आज वो ही अफजल देश के अलग-अलग हिस्सों में तोड़फोड़ आगजनी कर रहा है, क्या यह मात्र संयोग है ? अगर कोई सोचे कि ये अफजल CAB बिल के पारित होने  से नाराज होकर सड़क पर उतरा है तो वाकई में वह बहुत नासमझी वाली सोच ही होगी । क्योंकि अफजल तो 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद राष्ट्रवादियों की सरकार बनने से ही हैरान परेशान है, क्योकि वो अब सड़क पर खुलेआम गाय नही काट पा रहा है ।

       अफजल परेशान है, क्योंकि उसकी इच्छा के बगैर ट्रिपल तलाक को प्रतिबंधित कर दिया गया ! वो इसलिये भी गुस्से में है, क्योंकि वो चाहकर भी सुप्रीम कोर्ट के राममंदिर के पक्ष मे दिए गए निर्णय का विरोध नही कर सकता ! इसलिये अफजल के लिए CAB बिल तो सिर्फ बहाना है, असली मकसद सत्ता को अपनी धमक/ताकत दिखलाना है, वो ताकत जिससे हिन्दुस्तान ही नही विश्व की कई सरकरें डरती हैं !

        क्या मिश्र में या सीरिया मे कोई नागरिकता संसोधन बिल आया है जो वंहा तोड़फोड़ आगजनी हो रही है ? क्या देश के बंटवारे के समय किया गया खून-खराबा भी CAB का विरोध था वास्तव में अफजल इस बिल के बहाने अपने उस पुराने रसूख को पाना चाह रहा है जो उसे बाबर, औरंगजेब, मोहम्मद गौरी, इब्राहीम लोधी व जिन्ना ने दिया था, जिस रसूख के दम पर वो आजाद हिन्दुस्तान मे न्यायालय के निर्णय (शाहबानो प्रकरण) को भी बदलवाने का दम रखता था !

        अफजल जानता है नागरिकता संसोधन बिल 2019 से सच्चे देशभक्त मुसलमान की सेहत पर कोई फर्क नही पडेगा, न तो उसे हिन्दुस्तान से निकाला जाएगा और ना ही उसके रोजी-रोजगार पर कोई आंच आने वाली है । अफजल जानता है, नागरिकता संसोधन बिल के माध्यम से सिर्फ पाकिस्तान/अफगानिस्तान/बांग्लादेश के अल्पसंख्यको को ही सुरक्षित वापस स्वदेश लाया जाएगा !

       अफजल जानता है कि इन तीनो ही पडोसी देशो मे अब मुठ्ठी भर हिन्दू या अल्पसंख्यक बचे हैं, जिनके भारत आने से इनकी सेहत पर कोई असर नहीं पडने वाला है । परन्तु अफजल ये भी मानता है कि अभी नही तो कभी नही । अगर आज उसने औरंगजेब की तरह तोड़फोड़ नही मचाई तो छत्रपति शिवाजी की भूमि पर उसके आतंक की बादशाहत खत्म हो जाएगी । हिन्दुस्तान की सियासत में उसकी हैसियत खत्म हो जाएगी जबकि उसकी हिंसकवृत्ति ही उसकी ताकत है और इसी ताकत के दम पर इस लोकशाही मे वो कामयाब भी हुआ है । परन्तु यहाँ शायद अफजल ये भूल रहा है कि वो राणा प्रताप के धैर्य को भूल रहा है, वो गोधराकांड भूल रहा है ?

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       अफजल भूल रहा है कि राणा प्रताप ने बरसों घास की रोटी सिर्फ इसलिये खाई थी कि वो अकबर को उसकी औकात बता सकें । वो भूल रहा है कि गोधरा में सिर्फ "क्रिया पर ही प्रतिक्रिया" हुई थी और सबसे बड़ी भूल तो वो ये कर रहा है कि देश की बागडोर इस समय किसके हाथो में है, उसके जो इनके पिछवाड़े तोड़ने में पी.एच.डी. कर चुका है और अब तो माशाअल्लाह मोटा भाई भी आ खडे हुए हैं । हम सबने देखा है कि आते ही उन्होंने देश के विकास की सारी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली और वे उंगली दिखाने में नही बल्कि दिखाई जा रही उंगली तोड़ देने में फ्रंटफुट पर खेलने में ही विश्वाश करते हैं ।
      

17.12.19

जिंदगी के मायने...!


           एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई । जब उसे इसका आभास हुआ तो उसने देखा कि भगवान उसके समक्ष एक सूटकेस हाथ में लिये खडे हैं और उससे कह रहे हैं - चलो मेरे बच्चे, तुम्हारा समय पूरा हो गया है ।

           व्यक्ति बोला - इतनी जल्दी ! अभी तो मेरे सामने ढेरों प्लान पूरे करने के लिये बाकि हैं । भगवान बोले - नहींअब कुछ नहींतुम्हारा समय पूरा हो चुका है ।

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           व्यक्ति ने पूछा - इस सूटकेस में क्या है ?

            तुम्हारी सम्पत्ति - भगवान ने जवाब दिया ।

            आपका मतलब - मेरा सामान, कपडे, पैसे ?

            नहीं, वे तो कभी तुम्हारे थे ही नहीं । वे तो यहाँ पृथ्वी पर तुम्हारा समय गुजारने के माध्यम थे ।

            इसका मतलब मेरी यादें । व्यक्ति ने पूछा ?

            नहीं । वे सब तो समयाश्रित थी । भगवान ने फिर जवाब दिया । 

            तो फिर मेरा हुनर । व्यक्ति ने फिर पूछा ?

            ना... ना... वे तो परिस्थितियों की देन थे । भगवान ने फिर जवाब दिया ।

            अच्छा तो फिर इसमें मेरे मित्र और परिजन साथ होंगे । व्यक्ति ने फिर पूछा ?

            नहीं भाई, वे तो तुम्हारी जीवन यात्रा के राही थे । भगवान बोले ।

            तो फिर मेरी पत्नी और बच्चे । व्यक्ति ने फिर पूछा ?

            नहीं, वो तो तुम्हारे दिल में थे । भगवान ने फिर उसकी जिज्ञासा का समाधान किया । 

           
तो फिर जरुर इसमें मेरा शरीर होगा । व्यक्ति ने फिर पूछा ?

           
कैसा शरीर ? वह तो राख की अमानत है । भगवान का फिर जवाब मिला । 

           
तो निश्चय ही इसमें मेरी आत्मा होगी । बडे विश्वास के साथ उसने फिर पूछा ?

           
दुःख की बात है कि यहाँ भी तुम गलत हो,  तुम्हारी आत्मा तो मेरी देन रही है । भगवान ने फिर जवाब दिया । 

           
तब उस व्यक्ति ने आँखों में आंसू भरकर बडे दुःखी मन से ईश्वर से उस सूटकेस को खोलकर दिखाने का अनुरोध किया । ईश्वर ने जब उस सूटकेस को खोलकर दिखाया तो वह बिल्कुल खाली था ।
  
            टूटा दिल और गिरते आंसू के साथ उस व्यक्ति ने भगवान से पूछा- तो क्या इतने वर्षों में मेरा यहाँ कभी कुछ भी नहीं रहा ? हाँ- अब तुम ठीक सोच रहे हो । ऐसा कुछ भी कभी नहीं रहा जो तुम्हारा वस्तुविशेष के रुप में गिना जा सके ।

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स्वनिर्मित- सस्ता व स्वास्थ्यप्रद आंवला च्यवनप्राश.

            
तो फिर आखिर इतने वर्षों में मेरा क्या रहा व्यक्ति ने फिर पूछा ?
तुम्हारे कार्य ! तुम्हारे वे सभी कार्य जो तुमने यहाँ रहते किये, वे सभी सिर्फ तुम्हारे रहे हैं । भगवान ने जवाब दिया... 

            
इसलिये जब तक जीवित हो - जो कुछ भी अच्छे कार्य कर सकते हो, अवश्य करो । हमेशा अच्छे कार्यों के लिये सोचो और अपने प्रत्येक कार्य के लिये ईश्वर का धन्यवाद करो ।

            
हमारी जिंदगी एक सादे कागज़ के समान है, जिस पर हर इंसान को स्वयं ही चित्रकारी करनी है ।

            "
ईश्वर" ने हमें हमारे 'कर्म' की 'पेंसिल' देकर हमें चित्रकारी करने की सुविधा अवश्य दी है, परंतु सदैव ध्यान रखें...

            "
ईश्वर" ने हमें ऐसा कोई रबर नहीं दिया है, जिससे हम अपनी बनाई चित्रकारी को मिटा सकें ।

वृद्धावस्था में खुश रहने और सुखी जीवन बिताने का रहस्य...

        एक बार यूनान के मशहूर दार्शनिक सुकरात भ्रमण करते हुए एक नगर में गये । वहां उनकी मुलाकात एक वृद्ध सज्जन से हुई ।  दोनों आपस में काफी घुल मिल गये ।

           वृद्ध सज्जन आग्रहपूर्वक सुकरात को अपने निवास पर ले गये । भरा-पूरा परिवार था उनका, घर में बहु- बेटे, पौत्र-पौत्रियां सभी थे ।
       
           सुकरात ने वृद्ध से पूछा- आपके घर में तो सुख-समृद्धि का वास है । वैसे अब आप करते क्या हैं ?" इस पर वृद्ध ने कहा- अब मुझे कुछ नहीं करना पड़ता । ईश्वर की दया से हमारा अच्छा कारोबार है, जिसकी सारी जिम्मेदारियां अब बेटों को सौंप दी हैं । घर की व्यवस्था हमारी बहुएँ संभालती हैं ।  इसी तरह जीवन चल रहा है ।"

           यह सुनकर सुकरात बोले- "किन्तु इस वृद्धावस्था में भी आपको कुछ तो करना ही पड़ता होगा । आप बताइये कि बुढ़ापे में आपके इस सुखी जीवन का रहस्य क्या है ?"

          
वह वृद्ध सज्जन मुस्कुराये और बोले- मैंने अपने जीवन के इस मोड़ पर एक ही नीति को अपनाया है कि दूसरों से अधिक अपेक्षायें मत पालो और जो मिलेउसमें संतुष्ट रहो ।  मैं और मेरी पत्नी अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व अपने बेटे-बहुओं को सौंपकर निश्चिंत हैं । अब वे जो कहते हैं, वह मैं कर देता हूं और जो कुछ भी खिलाते हैं, खा लेता हूं । अपने पौत्र- पौत्रियों के साथ हंसता-खेलता हूं । मेरे बच्चे जब कुछ भूल करते हैं  तब भी मैं चुप रहता हूं ।  मैं उनके किसी कार्य में बाधक नहीं बनता ।

           पर जब कभी वे मेरे पास सलाह-मशविरे के लिए आते हैं तो मैं अपने जीवन के सारे अनुभवों को उनके सामने रखते हुए उनके द्वारा की गई भूल से उत्पन्न् दुष्परिणामों की ओर सचेत कर देता हूं । अब वे मेरी सलाह पर कितना अमल करते या नहीं करते हैं, यह देखना और अपना मन व्यथित करना मेरा काम नहीं है । वे मेरे निर्देशों पर चलें ही, मेरा यह आग्रह नहीं होता ।  परामर्श देने के बाद भी यदि वे भूल करते हैं तो मैं चिंतित नहीं होता ।  उस पर भी यदि वे मेरे पास पुन: आते हैं तो मैं पुन: सही सलाह देकर उन्हें विदा करता हूं ।

          बुजुर्ग सज्जन की यह बात सुन कर सुकरात बहुत प्रसन्न हुये । उन्होंने कहा- इस आयु में जीवन कैसे जिया जाए, यह आपने सम्यक समझ लिया है ।

          
यह कहानी सबके लिए है । अगर आज आप बूढ़े नही हैं तो कल अवश्य होंगे । इसलिए आज बुज़ुर्गों की 'इज़्ज़त' और 'मदद' करें जिससे कल कोई आपकी भी 'मदद' और 'इज़्ज़त' करे ।

          
याद रखें जो ---- जो आज दिया जाता है वही कल प्राप्त होता है ।

         
अपनी वाणी में सुई भले ही रखो, पर उसमें धागा भी जरूर डालकर रखोताकि सुई केवल छेद ही न करे आपस में माला की तरह जोडकर भी रखे ।

          
वरिष्ठ नागरिक घर में वानप्रस्थी बनकर रहने का अभ्यास करें ।
                      
           ”जीवन में खुशी का अर्थ लड़ाइयाँ लड़ना नहीं, बल्कि उन से बचना है । कुशलतापूर्वक पीछे हटना भी अपने आप में एक जीत ही है ।


2.12.19

रहस्यमय अग्निकांड...


बांद्रा स्टेशन की झोपडपट्टी में प्रतिवर्ष आग का रहस्य !


           (बांद्रा चुनावक्षेत्र हिंदुओं का गढ़ हैं! इसी में शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे जी का निवास हैं, अब ये गढ़ ढह गया हैं, विधानसभा चुनाव में अब मुस्लिम विधायक चुनकर आया हैं, जहां पहले हिंदू ही चुनकर आता था !) 

      सबसे पहले कुछ पंक्तियाँ उन पाठकों के लिए, जिन्हें बांद्रा स्टेशन के बारे में जानकारी नहीं है. मुंबई में स्थित बांद्रा रेलवे स्टेशन, दादर एवं मुंबई सेन्ट्रल स्टेशन पर पड़ने वाले ट्रेनों के दबाव को कम करने के लिए एक अतिरिक्त टर्मिनस स्टेशन के रूप में विकसित किया गया था, यह स्टेशन पश्चिम रेलवे के अंतर्गत आता है.

      ठीक इसी प्रकार का एक टर्मिनस स्टेशन कुर्ला नामक स्थान पर भी है, जो कि छत्रपति शिवाजी टर्मिनस जैसे मुख्य स्टेशन का दबाव कम करता है. बांद्रा और कुर्ला इन दोनों स्टेशनों से कई ट्रेने आरम्भ और समाप्त होती हैं. बांद्रा स्टेशन के आसपास चारों तरफ गहरी-घनी और गंदगी से लबरेज कई झोपडपट्टी मौजूद हैं, जिनमें से अधिकाँश का नाम नवाज़ नगर”, “गरीब नगर”, “संजय गांधी नगर”, “इंदिरा गांधी नगरवगैरह है. आप सोचेंगे इसमें ऐसी क्या ख़ास बात है, ऐसा तो भारत के कई रेलवे स्टेशनों के आसपास होता होगा

     बांद्रा की इन झोपडपट्टी की ख़ास बात यह है कि इसमें प्रतिवर्ष (जी हाँ, बिलकुल बिना किसी खण्ड के, प्रतिवर्ष मतलब प्रतिवर्ष) बड़ी जोरदार आग लगती है. ऐसे अग्निकाण्ड देश की किसी भी झोपडपट्टी में नियमितरूप से नहीं होते. आखिर इस आगज़नी का रहस्य क्या है ? बार-बार बांद्रा स्टेशन के आसपास ही आग क्यों लगती है ?  आईये थोड़ा समझने का प्रयास करते हैं

     पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारों ने नोट किया है कि बांद्रा झोपडपट्टी में लगने वाली यह आग हमेशा देर शाम को अथवा देर रात में ही लगती है, दिन में नहीं. ऐसी भीषण आग लगने के बाद बांद्रा स्टेशन पहुँचने वाले, वहाँ इंतज़ार करने वाले रेलवे यात्री घबराकर इधर-उधर भागने लगते हैं, डर के मारे काँपने लगते हैं. परन्तु सर्वाधिक आश्चर्य इस बात का है कि जब भी इन झोपडपट्टी में आग लगती है, तो यहाँ के निवासी बड़ी शान्ति के साथ चुपचाप खाली स्थानों, रेलवे स्टेशन के आसपास एकत्रित हो जाते हैं. उन्हें कतई भय नहीं होता, आग बुझाने की जल्दबाजी भी नहीं होती.

    स्वाभाविक रूप से इन झोपडपट्टी की गलियाँ बेहद सँकरी होने के कारण अग्निशमन (फायर ब्रिगेड) और पुलिस की गाड़ियाँ अथवा एम्बुलेंस अन्दर तक नहीं पहुँच पातींकुल मिलाकर बात यह कि झोपडपट्टी पूरी जल जाने तक यहाँ के निवासीशान्ति बनाए रखते हैं. इसके बाद एंट्री होती है टीवी कैमरों, चैनलों के संवाददाता और पत्रकारों की, जो गलियों में पैदल घुसकर तमाम फोटो खींचते हैं, चिल्ला-चिल्लाकर बताते हैं कि देखो, देखोगरीबों का कितना नुक्सान हो गया है…”. कुछ ही समय में (या अगले दिन कुछ महिलाएँ कैमरे के सामने अपनी छाती कूटते हुए पधारती हैं, रोना-धोना शुरू करती है और सरकार से मुआवज़े की माँग करती हैं. ज़ाहिर है की अगले दिन की ख़बरों में, समाचार पत्रों, चैनलों इत्यादि पर झोपडपट्टी के इन गरीबों”(??) के प्रति सहानुभूति जगाते हुए लेख और चर्चाएँ शुरू हो जाती हैं. आगज़नी के कारण जिन गरीबों का नुक्सान हुआ है, जिनकी झोंपड़ियाँ जल गयी हैं, उनका पुनर्वास हो ऐसी मांगें नेताओंद्वारा रखी जाती हैं. कथित बुद्धिजीवी और कथित संवेदनशील लोग आँसू बहाते हुए बांद्रा की झोपडपट्टी वाले इन गरीबों के लिए सरकार से पक्के मकान की माँग भी कर डालते हैं.

     ज़ाहिर है कि इतना हंगामा मचने और छातीकूट प्रतिस्पर्धा होने के कारण सरकार भी दबाव में होती है, जबकि कुछ सरकारें तो इसी आगज़नी का इंतज़ार कर रही होती हैं. इन कथित गरीबों को सरकारी योजनाओं के तहत कुछ मकान मिल जाते हैं, कुछ लोगों को कई हजार रूपए का मुआवज़ा मिल जाता हैइस झोपडपट्टी से कई परिवार नए मकानों या सरकार द्वारा मुआवज़े के रूप में दी गयी नई जमीनपर शिफ्ट हो जाते हैं

     इसके बाद शुरू होता है असली खेल! मात्र एक सप्ताह के अन्दर ही अधिकाँश गरीबों” (?)  को आधार कार्ड, PAN कार्ड, मतदाता परिचयपत्र वगैरह मिलने शुरू हो जाते हैं ! मात्र पंद्रह दिनों के भीतर उसी जले हुए स्थान पर नई दोमंजिला झोपडपट्टी भी तैयार हो जाती है, जिसमे टीन और प्लास्टिक की नई-नकोर चद्दरें दिखाई देती हैं. कहने की जरूरत नहीं कि ऐसी झोपडपट्टी में पानी मुफ्त में ही दिया जाता है, बिजली चोरी करना भी उनका अधिकारहोता है. झोपडपट्टी में थोड़ा गहरे अन्दर तक जाने पर पत्रकारों को केबल टीवी, हीटर, इलेक्ट्रिक सिलाई मशीनें वगैरह आराम से दिख जाता है (केवल सरकारों को नहीं दिखता.    हरवर्ष नियमानुसार एक त्यौहार की तरह होने वाली इस आगज़नी के बाद रहस्यमयी तरीके से 1500 से 2000 नए-नवेले बेघर की अगली बैच न जाने कहाँ से प्रगट हो जाती है. जली हुई झोपडपट्टी के स्थान पर नई झोपड़ियाँ खड़ी करने वाले ये नए प्रगट हुए गरीब और बेघरवास्तव में गरीब होते हैं.

     इन्हें नई झोंपड़ियाँ बनाने, उन झोपड़ियों को किराए पर उठाने और ब्याज पर पैसा चलाने के लिए एक संगठित माफियापहले से ही इन झोपडपट्टी में मौजूद होता है. न तो सरकार, न तो पत्रकार, न तो जनताकोई भी ये सवाल नहीं पूछता कि जब जली हुई झोपडपट्टी में रहने वाले पूर्ववर्ती लोगों को नई जगह मिल गयी, कुछ को सरकारी सस्ते मकान मिल गए, तो फिर ये नए गरीबकहाँ से पैदा हो गए जो वापस उसी सरकारी जमीन पर नई झोपडपट्टी बनाकर रहने लगे?? कोई नहीं पूछतानई बन रही झोपडपट्टी में ये नए आए हुए गरीब मेहमानहिन्दी बोलना नहीं जानते, उनकी भाषा में बंगाली उच्चारण स्पष्ट नज़र आता है

     ये गरीब”(?) दिन भर मुँह में गुटका-पान दबाए होते हैं (एक पान दस रूपए का या एक तम्बाकू गुटका भी शायद दस रूपए का मिलता होगा). इस झोपडपट्टी में आने वाले प्रत्येक गरीबके पास चारखाने की नई लुंगी और कुरता जरूर होता हैउनका पहनावा साफ़-साफ़ बांग्लादेशी होने की चुगली करता है. नवनिर्मित झोपडपट्टी में महाराष्ट्र के अकाल-सूखा ग्रस्त क्षेत्रों का किसान कभी नहीं दिखाई देता. इन झोपडपट्टी में मराठी या हिन्दुस्तानी पहनावे वाले साधारण गरीब क्यों नहीं दिखाई देते, इसकी परवाह कोई नहीं करता. दो-चार पीढियों से कर्ज में डूबे विदर्भ का एक भी किसान बांद्रा की इन झोपडपट्टी में नहीं दिखता ?

     ऐसा क्यों है कि बांद्रा स्टेशन के आसपास एक विशिष्ट पह्नावेम विशिष्ट बोलचाल वाले बांग्लाभाषी और बड़े भाई का कुर्ता, तथा छोटे भाई का पाजामापहने हुए लोग ही दिखाई देते हैं?? बांद्रा स्टेशन के आसपास चाय-नाश्ते की दुकानों, ऑटो व्यवसाय, अवैध कुली इत्यादि धंधों में एक वर्ग विशेष” (ये धर्मनिरपेक्ष शब्द है) के लोग ही दिखाई देते हैं ?

     अब अगले साल फिर से बांद्रा की इस झोपडपट्टी में आग लगेगीफिर से सरकार मुआवज़ा और नया स्थान देगी… फिर से कहीं से अचानक प्रगट हुए नए गरीबपैदा हो जाएँगेझोपडपट्टी वहीं रहेगीअतिक्रमण वैसा ही बना रहेगागुंडागर्दी और लूटपाट के किस्से वैसे ही चलते रहेंगेलेकिन ख़बरदार जो आपने इसके खिलाफ आवाज़ उठाईआप तो चुपचाप अपना टैक्स भरिये…. वोटबैंक राजनीति की तरफ आँख मूँद लीजिए. और हाँ ! यदि आप ये सोच रहे हैं कि यह गरीबी और आगज़नी का यह खेलकेवल बांद्रा स्टेशन के पास ही चल रहा है, तो आप वास्तव में बहुत नादान हैंयह खेल बंगाल के कई जिलों में चल रहा है, देश के कई महानगरों में बड़े आराम से चल रहा है, एक दिन यह झोपडपट्टी खिसकते-खिसकते आपके फ़्लैट के आसपास भी आएगी, तब तक आप चादर ओढ़कर सो सकते है !

     यह कोई और नही, आजकल दुनिया के मनपसंद  रोहीगया (रोहिंग्या) शांतिदूत ही है !
WhatsApp से साभार...
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