30.12.10

ये कैसा इन्साफ...!

संजू बाबा ये क्या हो रहा है ? 

        पढने मे ऐसा क्यों आ रहा है कि किसी निर्माता को आपने डेट्स  नहीं दी तो कोर्ट ने आपकी सम्पत्ति जब्त करने का फरमान ही  
सुना दिया । इससे पहले तो किसी भी स्टार के साथ ऐसा कोई अन्यायपूर्ण हादसा देखने-सुनने में नहीं आया, और फिर स्टार तो स्टार है मर्जी हो तो ही डेट देगा, बाकि ये अनुबन्ध वगैरह तो मात्र दिखावी औपचारिकताओं से ज्यादा आखिर चीज क्या हैं ?

           मुझे तो आप सितारों के इस सर्वाधिकार सुरक्षित अधिकारों के कई उदाहरण याद आ रहे हैं जब आपके पूर्ववर्ती महानायकों ने अपने इस अधिकार का अपनी सुविधानुसार उपयोग किया-

            सबसे पहले तो अपने जानी भाई राजकुमार जी का उदाहरण दिख रहा है, अरे वही जिन्होंने सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को यह कहते हुए हवा में उडा दिया था कि जानी हम किसी अमिताभ बच्चन को नहीं जानते, हम तो ये जानते हैं कि हम राजकुमार है । इन्होंने तो अपने निर्माता को सिर्फ इसलिये डेट्स देने से इन्कार कर दिया था कि जानी जो तेल अपने सिर में तुम लगाते हो उसकी खुशबू हमें पसन्द नहीं है इसलिये हम तुम्हे डेट्स नहीं दे सकते ।

            फिर अपने शम्मी कपूरजी इनकी लोकप्रियता से कौन परिचित नहीं रहा । ये एक अनार स्टार तो अपने सौ बीमार निर्माताओं से स्वयं इतने त्रस्त रहते थे कि निर्माताओं की लाईन में सिर्फ उसी निर्माता को डेट्स ये दे पाते थे जो इनके स्वनिर्मित ताजे मोरारजी जूस का सबसे पहले पान करके दिखा पाता था ।

            और अपने ची ची भईया अरे वही छोटे-मियां- गोविन्दा,  इनके बारे में तो खबरें यहाँ तक रही कि नये निर्माताओं से छोटा-मोटा डिपाजिट ले लेने के बाद ऐसे छुटभईयों को ये डेट्स देना तो बहुत दूर की बात कभी उनकी तरफ पलटकर देख भी नहीं पाते थे, टाईम ही नहीं होता था । 

            लेकिन आपके ही केस में ये ससुरा कौनसा फैसला सुनने को मिल रहा है । वैसे तो भाई हमें पूरा विश्वास है आपने मुन्नाभाई के रुप में कभी अपनी भाईगिरी से और कभी अपनी गांधीगिरी से इस देश के सामान्यजन की समस्याओं के जो थोक में निदान करवाए हैं वैसा ही कोई अचूक निदान आप यहाँ भी कर ही लेंगे ।


          किन्तु भाई फिर भी थोडी चिन्ता होना तो लाजमी है ना.


28.12.10

बचके रहना रे बाबा बचके रहना रे...

      
        इन दिनों समाचार-पत्रों में एक विज्ञापन की बाढ सी आई हुई दिख रही है । बानगी देखिये-

              सभी कम्पनियों के टावर अपनी दुकान, 
                मकान, प्लाट, खेत, खाली जमीन पर 
                लगवाएँ । 40,00,000/- रु. एडवांस, 
                40,000/- रु. प्रतिमाह किराया और 
                15,000/- रु. प्रतिमाह नौकरी स्थायी 
                रुप से पाएं. 15 साल के पक्के एग्रीमेन्ट 
                 के साथ.  सम्पर्क करें- 
                मोबाईल नं. 00000000000,  00000000000.

        2-4 नहीं 16 विज्ञापन तो आज के प्रतिष्ठित समाचार पत्र नईदुनिया में ही देखे जा सकते हैं ।

        एडवांस की रकम जो इस विज्ञापन में 40 लाख रु. दिख रही है वह अलग-अलग विज्ञापनों में 19 लाख रु. से लगाकर 75 लाख रु. तक के आफर के रुप में, मासिक किराया 35 हजार से लगाकर 70 हजार रु. प्रतिमाह, स्थायी नौकरी का आफर 10 हजार से लगाकर 20 हजार रु. प्रतिमाह व पक्का एग्रीमेन्ट 10 वर्ष से लगाकर 20 वर्ष तक सभी विज्ञापनों में अलग-अलग दिखाई दे रहे हैं ।

        एक विज्ञापन जो डोकोमो नेटवर्क सेटेलाईट के नाम से छप रहा है वो लिखता है धोखेबाजों से सावधान. सीधे कम्पनी से सम्पर्क करें.

        ज्ञानवर्द्धन के नाम पर जब इनके दिये गये मोबाईल नंबरों पर फोन किया गया तो लेडी रिशेप्सनिस्ट से उत्तर मिला कि हमारे दिये हुए बैंक A/c. में आप 4,250/- रु. जमा करवा दें व उसकी स्लिप नं. हमें बतादें । हमारे प्रतिनिधि आकर आपका स्पाट चेक कर लेंगे और अप्रूव हो जाने पर आपसे अनुबन्ध करके इस एडवांस राशि का चेक आपको चुकाते हुए टावर लगाने की कार्यवाही पूरी करदी जावेगी । जब उनसे यह पूछा गया कि यदि स्पाट अप्रूव नहीं हो पाया तो हमारे 4250/- रु. का क्या होगा ? तो उनका उत्तर था कि 4,000/- रु. आपको वापस मिल जाएंगे ।

        दूसरा फोन जो डोकोमो नेटवर्क सेटेलाईट के नाम पर लगाया गया तो उनका भी वही उत्तर था कि आप 4,250/- रु. कंपनी के मेनेजिंग डायरेक्टर श्री प्रभुदयाल के नाम से फलां-फलां बैंक में जमा करवा दें,  हमारे प्रतिनिधि आएंगे..............

        जब उनसे कहा गया कि हम कंपनी से अनुबंध कर रहे हैं तो पैसा भी कंपनी के नाम पर ही क्यों न जमा करवाएँ तो उनका उत्तर था कि नहीं साहब कंपनी की पालिसी के मुताबिक पैसा तो आपको मेनेजिंग डायरेक्टर के नाम पर ही जमा करवाना होगा । हमारे यह पूछने पर कि आप कहाँ से बोल रहे हैं ? उत्तर मिला- चंडीगढ से.

        अब हम इनका सारा गणित समझलें-  यदि इतने बडे देश में इस किस्म के लाखों रु. डिपाजिट, हजारों रु. प्रतिमाह का किराया और हजारों रु. प्रतिमाह की बिना काम या योग्यता की नौकरी का लालच दिखाते हुए सिर्फ 4,250/- रु. की मामूली सी धनराशि दिन भर में 100 लोगों से भी जमा करवाली तो 4 लाख रु. से अधिक का धन बैठे-बिठाये बैंक में जमा हो गया । बदले में आपको कुछ भी न मिले तो भी सिर्फ इस मोबाईल नं. और बैंक A/c. नं. के आधार पर आप कहाँ कहाँ भटक लेंगे । यदि मानलें कि इनका बताया शहर चंडीगढ सही भी है तो आने-जाने में ही इतने पैसे तो खर्च ही हो जाना है, फिर भी इनसे सम्पर्क और आपकी अग्रिम राशि की वसूली आप कर लावें ऐसी कोई सम्भावना दिख पाती है क्या ?

        इसलिये ऐसे किसी भी प्रस्ताव को आप या आपका कोई निकटतम मित्र या परिजन स्वीकार कर पाने की स्थिति में यदि हों भी तो किन पूर्व सावधानियों की आवश्यकता हो सकती है यह आप अवश्य देखलें ।

26.12.10

कैसे-कैसे महापुरुष !

    क सज्जन हैं हीरालालजी । नाम ही जब हीरालाल हो तो कुछ काम-धाम करने का तो सवाल ही नहीं बचता । लिहाजा अपने पिता की इकलौती सन्तान होने के अधिकारस्वरुप पिता के गुजरते ही उनकी जिन्दगी भर की बचत को अपने कब्जे में करने के बाद बूढी माँ को कोठरी में पटक दिया । माँ का रिश्तेदारी व समाज में आना-जाना बन्द और जो जैसा भोजन मिल जाए खालो और पडे रहो वाली स्थिति में छोडकर दिन में तो आप सट्टे में पैसा बढाने की जुगत बिठाते रहते और रात में बच्चे पैदा करने में । माँ घुट-घुटकर जल्दी मर गई और बाप का संचित पैसा भी रास्ते लग गया, लेकिन अजगर करे ना चाकरी और पंछी करे न काम वाली शैली में दिन भर मटरगश्ती करते रहने का उनका क्रम जारी रहा । तब तक पत्नि भी एक-एक करके तीन पुत्री व एक पुत्र को जन्म दे चुकी थी, और परिवार की ये सारी जिम्मेदारीयां उन हीरालालजी की बला से ।
            अब गाज गिरनी चालू हुई उनकी पत्नि पर, वो बेचारी अपने बच्चों को भूखा-प्यासा कैसे और कब तक देख पाती । लिहाजा दूसरों के घरों में छोटे-छोटे काम करके व बचे हुए समय में पापड बेलकर और शादी-ब्याह के अवसरों पर मेंहदी मांडकर जैसे-तैसे वो अपने पतिदेव सहित सारे घर का खर्चा चलाती रही । जान-पहचान के लोगों व रिश्तेदारों की मदद से जोड-जुगाड कर समय आने पर दो लडकियों की शादी भी पत्नि ने अपने बलबूते पर कामचलाऊ लडकों के साथ करवा दी । लेकिन उसकी शारीरिक मशीन भी कब तक जोर मारती, हाडतोड श्रम, पति का जिम्मेदारियों में कोई रुचि न लेना और गाहे-बगाहे अपने चाय-सिगरेट जैसे खर्चों के लिये मार पीटकर पत्नि से पैसे भी छीन लेना जैसी प्रताडनाओं से गुजरते हुए उसे भी टी. बी. की ऐसी जानलेवा बीमारी लग गई जिसने उसे प्रौढावस्था तक पहुँचने के पूर्व ही मौत के चंगुल में फंसा दिया । तब भी उसने उस बीमार अवस्था में अपने पति के लक्षणों को देखते हुए सबसे छोटी व सुन्दर लडकी जो उस समय बमुश्किल 13-14 वर्ष की रही होगी का विवाह मरते-मरते भी एक 24-25 वर्ष के जरुरतमन्द किन्तु सम्पन्न सूर्यमुखी लडके के साथ करा दिया और उस लडकी की शादी के एक महिने के अन्दर ही वह पत्नि भी इस दुनिया से कूच कर गई । 
 
          अब बचे श्री हीरालाल और उनका तीसरे नम्बर की सन्तान के रुप में मौजूद इकलौता लडका । कुछ समय तो लडके ने छोटे-मोटे काम करके बाप-बेटे का खर्चा चलाने के लिये इधर-उधर हाथ पैर मारे, लेकिन आखिर उसकी रगों में भी अपने अकर्मण्य पिता का खून दौड रहा था, वो भी कब तक मेहनत मजदूरी कर पाता । लिहाजा कुछ काम कर पाना उसके भी बस की बात नहीं रही । तब समाज के कुछ लोगों ने उन बाप-बेटों को मन्दिर में रहने वाले असहाय वृद्ध लोगों के साथ रहने की व्यवस्था करवा दी । अब वो संड-मुसंड हीरालालजी और उनका लडका समाज पर बोझ बनी स्थिति में शान से मन्दिर में रहकर मुफ्त का खा-पी रहे हैं और उनकी भाषा में ऐश से जी रहे हैं ।
 
           ये तो थे मुझसे बुजुर्ग वर्ग के लोगों के अनुभव अब एक अनुभव अपने हमउम्र साथी श्री कैलाश जैन का । साईन्स की पढाई ग्रेजुएशन के बीच में ही छोडकर ये अपने लिये ऐसा कोई व्हाईट कालर जाब ढूंढने लगे, जिसमें मेहनत न करनी पडे । ऐसा जाब न मिलना था न मिला । उस दौर में कलकत्ता की एक MLM कंपनी दि पिअरलेस जनरल फाईनेन्स एन्ड इन्वेस्टमेंट कंपनी का बहुत बोलबाला था । सन् 1980 से 1984 के मध्य मैं भी उस कंपनी को अपनी सेवाएँ दे रहा था । मुझे देखकर इन्होंने भी उसमें काम करना चालू किया और लोगों से जुडने और उन्हें जोडने के काम में ये भी लग गये ।
 
          चूंकि मेहनत इनसे होती नहीं थी और शानदार जिन्दगी जीना इनकी चाहत में शामिल था अतः ये अपने विवाह के लिये कोई ऐसी लडकी तलाशने लगे जिसका पिता इन्हें अच्छी व सुन्दर लडकी के साथ ही एकाध घरु मकान और बैंक-बैलेन्स भी दे सके । यहाँ भी बिल्ली के भाग्य का छिंका न टूटना था और न टूटा । लिहाजा इन्हीं की टीम में शामिल एक लडकी जिसका पिता मिल में नौकरी पूरी करके स्वर्गवासी हो चुका था और मां-बेटी अकेले अपना जीवन-यापन कर रहे थे उस लडकी से इन्होंने यह सोचकर शादी करली कि पिता की सारी भविष्यनिधि तो इन्हे ही मिलनी है । वहाँ यदि इन्हे थोडा कुछ मिला भी तो वो ऐसा तो कतई नहीं था जिससे तीन प्राणियों की जिन्दगी गुजर जावे । जब तक वह माँ शान्त हुई तब तक इनके भी दो बच्चे एक लडका व एक लडकी हो चुके थे । पिअरलेस का काम समस्याओं की अधिकता के कारण बन्द हो चुका था और बिना मेहनत के जिन्दगी गुजारने के अपने सिद्धान्त पर ये तब भी चल रहे थे । नतीजा आज के इस प्रतिस्पर्धी युग में इनके वे बच्चे स्कूल में प्राथमिक शिक्षण भी नहीं ले पाये । इधर अभावग्रस्त जिन्दगी और टाईमपास नशों का शौक इनके भी शरीर को जर्जर करता चला गया । तब इनकी 16 वर्ष की कन्या ने किसी परिचित युवक से इनसे यह कहते हुए शादी करली कि पापा आप तो कुछ कर पाओगे नहीं । इसलिये मैं यह रिश्ता जोड रही हूँ । 
 
        कुछ समय बाद पता चला कि इनकी वह लडकी वापस इनके ही साथ रहने आ गई है । उसके स्वयं द्वारा निर्धारित उस वैवाहिक सम्बन्ध का क्या हुआ ? राम जाने । अब ये दोनों पति-पत्नि हड्डियों का ढांचा बने बीमारियों से जूझते हुए जिन्दा रहने की जद्दोजहद कर रहे हैं । इनकी दोनों सन्तान किस हाल में होंगी ये उन्हींसे बेहतर और कौन जान सकता है ? 
   
          र अन्त में बात मेरे बाद वाली पीढी की- मेरे ही एक मित्र जो दिनभर बाजार में घूमकर कठोर परिश्रम द्वारा आफिसों में उपयोगी सामग्री सप्लाय करते हुए अपनी पत्नि व दो लडकों के परिवार को पालते आ रहे हैं उनके बडे लडके की तो संयोगवश शासकीय सर्विस लग गई, उसकी शादी हो गई और बच्चे भी हो गये । किन्तु छोटा लडका-  उसने पहले साईन्स पढा, फिर उसे बीच में छोडकर PMT करने बैठ गया । फैल होने के बाद फिर PMT में बैठा, फिर फैल । तब तक आगे पढने की उम्र भी समाप्त हो गई थी । फिर अपने पिता से कहकर ज्योतिष का कोर्स किया । काम-धाम कुछ करना नहीं और सुबह 5 बजे से उठकर अपनी भाभी के कामों में मीन मेख निकालने बैठ जाना । सुबह 5 से रात्रि 11 बजे तक करीब तीन बार मंदिर जाकर 5-6 घंटे वहीं रहना और बस बाकि समय घर में बैठकर पराए घर की लडकी का जीना दूभर करना, यही इनकी कुल दिनचर्या हो गई है । बाप कमाई पर जिन्दा हैं, उम्र 30 पार हो चुकी है । मैंने जब मित्र को सुझाव दिया कि यदि किसी भी काम में इसका मन नहीं लगता तो इसे घर से क्यों नहीं निकाल देते । शरीर की भूख-प्यास और नींद की जरुरत ही सब दुनियादारी इसे अपने आप सिखा देगी । तब मेरे वे हमउम्र मित्र कहने लगे कि मेरी पत्नि इसलिये ऐसा नहीं चाहती कि अचानक उस संघर्ष का सामना न कर पाने के कारण कभी ये कुए-बावडी में कूद जावे तो ? देर-सवेर इनकी भी शादी कहीं न कहीं तो हो ही जाएगी, और आगे फिर किसी बदले हुए रुप में वही कहानियां चलेंगी जो हम उपर के उदाहरणों में देख रहे हैं ।
 
          इन सभी अकर्मण्य पुरुषों को खाने व पहनने को तो अच्छे से अच्छा चाहिये ही इसके साथ ही स्त्री देह का सुख भी इनकी प्राथमिकता में साथ-साथ चलता है जो कि प्राकृतिक रुप से इन्सान की नैसर्गिक आवश्यकता भी है ही । लेकिन इनकी इस पुरुषार्थहीन अकर्मण्य जिन्दगी का खामियाजा किसे भुगतना पडता है ? सबसे पहले इनके मां-बाप को जिन्हे उम्र के सिद्धान्त के मुताबिक थोडे समय ही भुगतना पडता है, दूसरे नम्बर पर इनकी पत्नि को जिसका जीवन जीतेजी अभावों और फाकाकशी के कारण नर्क से भी बदतर हो जाता है, और फिर इनकी सन्तान को जो अभाव, अशिक्षा और कुण्ठा के बीच पलते हुए बडे होते हैं और जिन्दगी भर इन्हे कोसते रहते हैं ।

          क्या पूत के पांव पालने में देखकर ऐसे बच्चों के मां-बाप को अपने माया-मोह से परे सोचकर बिल्कुल सख्त रुख अपनाते हुए समय रहते ही इन्हें पूरी तरह से घर से बेदखल करके इन्हे इनके हाल पर नहीं छोड देना चाहिये ? जिससे कि मन से या बेमन से ये स्वयं के लिये आवश्यक राशि कमाना सीखने के साथ ही कम से कम अपनी पत्नि व आने वाले एक या दो बच्चों का भरण-पोषण स्वयं के बल पर करना सीख सकें ।

22.12.10

ब्लागिंग तेरे लाभ अनेक...!


सुन सुन सुन अरे बाबा सुन, इस ब्लागिंग में बडे-बडे गुण,
लाख दुःखों की एक दवा ये, आके आजमा ले आजा आजमा.
      जी हाँ ! जब हम इस ब्लाग-लेखन की लौ अपने मस्तिष्क में प्रज्जवलित कर लेते हैं तो घर में क्या चल रहा है इस स्थिति से लगभग बेखबर, हमारी नजरें अपने कम्प्यूटर स्क्रीन पर, हथेलियां अपने की बोर्ड पर और निरन्तर घूमते चिन्तनशील विचार दिमाग में ऐसे व्यस्त रहते हैं जैसे "आग लगे बस्ती में, हम तो अपनी मस्ती में" जब किसी वृहद विषय पर पोस्ट लिखी जा रही हो तबकि तो बात ही क्या, सामान्य तौर पर भी कभी टिप्पणी लिखने में, कभी अपने ब्लाग के टिप्पणीकारों से सम्पर्क में और कभी नये ब्लागलेखकों को अपने ब्लाग तक लाकर कैसे अपना पाठकवर्ग बढाया जा सके इस प्रयास में ही हम पूरी तरह से मस्त रहते हैं । याने दूसरे किसी बाहरी नशे की तब सारी गुंजाईशें अपने आप समाप्त हो जाती हैं और हम व्यसनमुक्त हो जाते हैं ।

      मेरे सन्दर्भ में बात करुं तो कुछ समय पहले तक मैं कभी-कभी भोलेबूटी के रुप में भांग की गोली ले लिया करता था जो इसके शारीरिक दुर्गुणों को देखकर मैंने छोड भी दी थी । लेकिन देवदास में जैसे चलती ट्रेन में शाहरुख को जेकीश्राफ दोस्ती का वास्ता देकर एक-दो पेग तो पिला ही देते है ठीक वैसे ही पिछले सप्ताह मेरे भी एक चुन्नीलाल मित्र ने आग्रहपूर्वक एक गोली मेरे हलक के नीचे उतरवा दी । घंटे दो घंटे तो सब ठीक रहा, लेकिन उसके बाद आंखों ने स्क्रीन पर देखने से, उंगलियों ने की-बोर्ड पर चलने से और दिमाग ने कुछ भी सोचने से हडताल करदी और मुझे अपने सब ताम-झाम एक ओर समेटकर भूखे पेट ही तान खूंटी सो जाना पडा । कहने की आवश्यकता नहीं कि मेरा ये ब्लागिंग का नशा ही दिमाग पर इतना भारी रहने लगा कि चिन्तन व लेखन के उस समय को भांगबूटी द्वारा निगल जाना मुझे कतई नहीं सुहाया । लिहाजा इस ब्लागिंग के लिये ये बिल्कुल कहा जा सकता कि- 
           "ये क्या नशा है दोस्तों, ये कौनसा खुमार है ।"

      यहाँ आप सोच सकते हैं कि ये तो मैं अपने फायदे की बात कर रहा हूँ । इसमें सबका फायदा कहाँ हुआ ? तो साहब सबके फायदे की बात भी करलें- जितने भी नियमित ब्लाग लेखकों के अनुभवों को देखा जावे तो सब अलग-अलग शब्दों में लेकिन एकमत हो यह स्वीकार करते दिखाई देते हैं कि समय मिलते ही हमारी दिमागी सृजनात्मकता अपने कम्प्यूटर के माध्यम से कुछ-न-कुछ नया सृजन करने में जुट जाती है । कोई आधी रात में अपनी पोस्ट प्रकाशित करवाने में लगा दिखता है तो कोई अपने सौवें लेख को सेलिब्रेट कर रहा होता है, कोई हजारवे चिट्ठे को दिमाग में बनाये होता है तो कोई अपने ब्लाग की पहली, तीसरी या छठी सालगिरह आनन्दपूर्वक मना रहा है, याने इधर मन रमने के बाद- 
          खाली दिमाग शैतान का घर वाली उक्ति से पूरी तरह मुक्ति ।

      बुजुर्गों की सबसे बडी समस्या यदि सुनें तो प्रायः वे ये कहते पाए जाते हैं कि क्या करें- बच्चे सब अपनी दुनिया में ही व्यस्त रहते हैं । घर में आते हैं तो खा-पीकर सब अपने कमरों में चले जाते हैं । हमारे पास बैठकर किसी को भी हमारे सुख-दुःख समझने का या खुद की चिन्ताओं के बारे में बात करने का समय ही नहीं है । यदि आगे बढकर हम बच्चों से इस बारे में बात करने की कोशिश भी करें तो प्रायः वे चिडचिडाहट वाली शैली में ही बात करते दिखाई देते हैं । यदि वे बुजुर्ग भी इस ब्लागिंग से अपनी लौ लगालें तो फिर इस किस्म की किसी चिंता की उनके पास भी कोई गुंजाईश ही नहीं रह जाएगी । फिर उनका समय घर में वैसा ही गुजरेगा जैसे जल में कमल का ।  
        जल में हैं पर जल में नहीं, घर में हैं पर घर में नहीं ।

      ब्लागिंग की दुनिया में जब हम शामिल हो जाते हैं तो अपने जैसे अधिकांश ब्लागर मित्रों से मानसिक धरातल पर हमारा अच्छा-खासा टाईम पास दोस्ती का सिलसिला भी ई-मेल व चेटिंग के द्वारा घर बैठे ही चलने लगता है । यही दोस्ती जब शारीरिक धरातल पर होती है तो कई बार अनिच्छा व रोड एक्सीडेंट के खतरों के बावजूद हमें उनसे अकेले या सपरिवार मिलने जुलने दूर-दराज में जाना भी पडता है । दोस्ती के अनवरत क्रम को जीवित रखने के लिये मंहगाई व हाजमे की समस्याओं के बावजूद उनके द्वारा जुटाई गई खाद्य सामग्री उदरस्थ भी करना पडती है और गाहे-बगाहे उनके खाने-पीने का इंतजाम भी करना पडता है । लेकिन ब्लागिंग वाली मित्रता बमुश्किल ही कभी महिनों या वर्षों में ऐसे किसी धर्मसंकट में हमें डाल पाती हो, याने समय, श्रम व अनावश्यक खर्चों से बचे रहते हुए भी दोस्ती का पूरा आनन्द आपको ये ब्लागिंग का शौक दिलवा देता है । मरहूम हास्य कलाकार मियां मेहमूद की भाषा में शायद इसी को कहते हैं-  
            खर्चा कौडी का नहीं और मण्डप फ्री.

      ब्लाग लिखने में यदि हमारी लेखन शैली पाठकों को रुचिकर लगने लगे तो हमारा नाम हींग लगे न फिटकरी वाली लागत के बावजूद पच्चीस-पचास, सौ दो सो व हजार-पन्द्रह सौ पाठकों के मध्य होते हुए हजारों-हजार पाठकों तक लोकप्रिय होकर हमें हीरो भी बना सकता है । एडसेन्स व इस जैसी अनेक कम्पनियां हमारे ब्लाग पर टी.आर.पी. के आधार पर अपने विज्ञापन लगवाकर नियमित आमदनी मुहैया करवा सकती है और अभी हाल ही में इसका एक सबसे बडा लाभ जो मेरी जानकारी में आया है वह ये कि अन्तर्जाल (इन्टरनेट) के इस माध्यम से ब्लाग्स के द्वारा जो हम अपने विचारों की लडियों को यहाँ पिरोए जा रहे हैं, सही मायनों में इस तरीके से हम इतिहास में भी स्वयं को दर्ज करते जा रहे हैं । क्योंकि देर-सवेर हमारा ये नश्वर शरीर तो इस संसार से विदा ले लेगा किन्तु अपनी वैचारिक लेखन-शैली से जो कुछ भी हम यहाँ छोडकर जा चुके होंगे वो आने वाले दशकों ही नहीं बल्कि शतकों तक भी इस पटल पर हमारे नाम के साथ जिन्दा ही रहेगा ।

      मेरी इस ब्लागिंग का सिलसिला तो मात्र अक्टूबर 2010 के माह से चालू हुआ है । यदि तीन महिने की अल्प समयावधि में मुझे इस विधा के इतने लाभ दिखने लगे हैं तो जितने सुस्थापित सीनियर ब्लागर्स इस क्षेत्र में वर्षों पूर्व से रमे हैं वे इसके कितने लाभों का सुख ले पा रहे होंगे य़े तो उनके द्वारा अपने अनुभव सार्वजनिक करने पर ही समझ में आवेगा । अलबत्ता यहाँ ये ध्यान रखना भी आवश्यक है कि शुरुआत में हमारी पहुँच अपर्याप्त दायरे में होने पर या पाठकों के बहुमत में हमारे लेखन को बचकाना मानकर सराहना करना तो दूर कोई झांकने तक भी नहीं आवे ऐसी अप्रिय स्थिति दिखाई देने पर भी यदि हम स्वान्त-सुखाय के निमित्त हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम वाली सोच के साथ अपनी लेखनी की इस प्रक्रिया को चालू रख पाते हैं तो निश्चित ही हमारे लिये भी ये क्षेत्र देर-सवेर बांहें पसारें अभिनन्दन करते नजर आ सकता है । तो फिर आप भी जुटे रहिये ब्लाग-लेखन की भगीरथी प्रक्रिया में और घर-समाज-मित्र-परिचित सभी को किसी भी परिस्थिति में स्वयं के प्रति यह कहते रहने दीजिये कि देखलो इनको-
        रोम जल रहा है और ये नीरो बांसुरी बजा रहे हैं । 
      अन्त में एक निवेदन भी- यदि आप इस लेख को पढ चुके हैं तो इसके कुछ फायदे जो आपकी जानकारी में भी आते हों उनका सार्वजनिकरण सभी पाठकवर्ग के मानसिक लाभार्थ हेतु अपनी टिप्पणी के रुप में अवश्य बताते जावें । इसके लिये आपको मेरी ओर से अग्रिम- Thankyou very much 


21.12.10

ब्लागर्स बंधुओं के उपयोग हेतु एक और जानकारी


      मेरा मोबाईल फोन डेमेज हो जाने के कारण 14 दिसम्बर को मैं नोकियाx2  मोबाईल इसलिये खरीद लाया कि इसका कैमरा 5 मेगापिक्सल का पावर दिखा रहा था और इसमें हिन्दी साफ्टवेयर के साथ आपेरा मिनी भी प्रीलोड था । इस मोबाईल फोन के लिये कीमत जो मैंने चुकाई वह थी 4900/- रु., डोकोमो की सिम होने के कारण 95/- रु. का 6GB लोडिंग केपेसिटी का 30 दिन की वेलेडिटी वाला नेट कनेक्शन लगे हाथ इसमें एक्टिवेट करवा लाया । 
     दो दिन बाद ही मुझे मेरी भतीजी की लडकी की शादी में शामिल होने के लिये मालेगांव होते हुए पूना जाना था जिसमें मेरी उपस्थिति 17 दिस. से 20 दिसम्बर तक लगातार वहाँ रुकने की तय थी । कुल मिलाकर ब्लागवुड से पूरी तरह से दूर रहने की सिचुएशन थी । जबकि "नये मुसलमान अल्लाह ही अल्लाह" की तर्ज पर दिमाग इधर ज्यादा केन्द्रित था । 

    तब वहाँ इसी मोबाईल ने ब्लागजगत से मेरी कनेक्टिविटि किस प्रकार बनाए रखी यह अनुभव मैं सभी पाठकों की जानकारी में लाना चाहता हूँ-

    *  मिनी फोन व मिनी साफ्टवेयर होने के कारण बडे चिट्ठे इससे नहीं खुल रहे थे किन्तु मेरा डेशबोर्ड लगातार खुल रहा था जिसके कारण मेरे तीनों ब्लाग्स की करण्ट सिचुएशन हर समय मेरी जानकारी में बनी रही जैसे कौन नया फालोअर्स किस ब्लाग में जुडा, किस ब्लाग में कौनसी नयी टिप्पणी जुडी और किस ब्लाग में किस दिन कितने पाठक बढे ।

    *  चूंकि डेशबोर्ड लगातार खुल रहा था तो वे सभी ब्लाग्स जिन्हें मैंने फालो किया हुआ था उनमें कब कौनसा नया चिट्ठा शामिल हो रहा है निरन्तर मेरी जानकारी में चल रहे थे । यदि फाईल कम लोड की थी तो वो चिट्ठा भी मैं सरलता से पढ पा रहा था । चिट्ठे जो उस दरम्यान इस फोन पर मैं बगैर किसी बाधा के पढ सका उनमें मुख्य रहे- 

      श्री देवेन्द्र पाण्डेय का- ऐसा क्यों होता है 
      सुश्री वन्दनाजी का- ये प्रेम के कौनसे मौड आ गये,  
     श्री सतीशजी सक्सेना का- ब्लोगवाणी संचालकों को एक पत्र ,                             एक अनुरोध के साथ,  
      श्री काजल कुमारजी का नुक्कड पर- आप ब्लागर हैं ! तो यह जानकारी आपको भी होनी ही चाहिये,  
      श्री खुशदीपजी सहगल का- मुर्गे को गुस्सा क्यों आता है...,  
      ZEAL पर- आप कल भी साथ-साथ थीं,आप आज भी करीब हैं.          श्री श्याम कोरी 'उदय' का- चमत्कारी सिक्के : लालच का फल,  
      श्री रवीन्द्र प्रभातजी का नुक्कड पर- पर्यावरण के प्रति चेतना जागृत करने हेतु आगे आएं ब्लोगर,  
      सुश्री बीनाजी का नुक्कड पर- ये चुप्पी कब टूटेगी ? और   
      श्री ज्ञानचंदजी मर्मज्ञ की कविता- आतंकवाद :भाग- 4. 

      ये सभी लेख मैंने पूना की होटल में शादी के बीच की फुर्सत के दरम्यान न सिर्फ पढ लिये बल्कि श्री काजल कुमारजी का नुक्कड पर- आप ब्लागर हैं ! तो यह जानकारी आपको भी होनी ही चाहिये और सुश्री बीनाजी का नुक्कड पर- ये चुप्पी कब टूटेगी ? लेख पर अपनी प्रतिक्रियास्वरुप इसी मोबाईल से टिप्पणी भी लिखकर पोस्ट कर दी जो 19 दिसम्बर को इनके इस लेख पर प्रकाशित भी हो गई ।
 
    *  प्रत्येक वह फाईल जो लगभग 100KB क्षमता के दायरे में रही उस तक पहुँचने में इस मोबाईल की मदद से कोई रुकावट नहीं आई । बडी फाईलें अलबत्ता ये नहीं खोल पाया । ई-मेल और फेसबुक सम्पर्क में भी कोई बाधा नहीं रही । अपना टेलीकाम सर्कल बदल जाने के बाद भी इस नेट कनेक्शन से जुडे रहने के लिये डोकोमो ने मेरे टाकिंग बेलेन्स में भी पैसे कहीं नहीं काटे ।
 
    *  अलबत्ता नोकिया जैसी सुप्रतिष्ठित कंपनी किस आधार पर इसके केमरे को 5 मेगापिक्सल बता रही है यह समझ में नहीं आया क्योंकि फोटो क्वालिटी 2 मेगापिक्सल के मोबाईल से अधिक बेहतर नहीं लगी ।
 
    फिर भी यह जानकारी आप तक पहुँचाने का मेरा उद्देश्य यही रहा है कि न्यूनतम लागत में छोटे पैमाने पर ये ऐसा चलता-फिरता जेब में रखा कम्प्यूटर ब्लागवुड के चाहने वालों के लिये साबित हो सकता है जिसकी मदद से हम अपने कम्प्यूटर या लेपटाप के बगैर भी पूरे देश में जहाँ हैं वहीं इस ब्लाग जगत से जुडे रह सकते हैं । 


12.12.10

प्रेरक प्रसंग- दरियादिली



        अभी कुछ ही समय पहले की बात है हमारे सोशल-ग्रुप के एक पूर्व मित्र जिनके परिवार में उनकी वृद्धा माताजी के अलावा पत्नि, एक पुत्र (उम्र लगभग 20वर्ष), एक पुत्री (उम्र लगभग 16-17वर्ष) और वे स्वयं इस प्रकार पूरे परिवार के पांचों सदस्य उनके कुल देवता के मंदिर के दर्शन करने घर से मन्दसौर के पास किसी स्थान की यात्रा पर क्वालिस गाडी से रवाना हुए ।

       रात्रि में करीब 11-30, 12बजे के लगभग बदनावर के आस-पास अचानक दिखे एक स्पीड-ब्रेकर पर ड्राईवर के कन्ट्रोल करते-करते भी गाडी पल्टी खा गई । जिसमें बाकि सभी सदस्य तो मामूली चोट-खरोच के दायरे में आकर बच गये किन्तु उनके उस युवा पुत्र को शरीर में अन्दरुनी तौर पर ऐसी कोई गम्भीर चोट लगी कि अधमरी स्थिति में अस्पताल लाने तक वह जीवित होते हुए भी लगभग मृत स्थिति में दिखाई देने लगा । पेशेन्ट को उस स्थिति में देखकर उपचार कर रहे डाक्टरों ने उन्हें बता भी दिया कि हम चाहे जितनी कोशिशें करलें किन्तु आपके पुत्र को बचा नहीं पावेंगे । घन्टे, दो घन्टे या इससे थोडा कुछ अधिक समय और भले ही निकल जावे किन्तु इसकी मृत्यु तो शीघ्र ही निश्चित है ।

.     अचानक हुए दुःख के इस भीषण वज्रपात के बावजूद उन मित्र दम्पत्ति ने पूरे साहस के साथ इकलौते पुत्र के मोह से उबरकर अपने एक शुभचिन्तक डाक्टर से सलाह और विचार-विमर्श के बाद शीघ्र निर्णय लेते हुए अपने उस मृत पुत्र की दोनों आंखें,  दोनों किडनी और पूरे शरीर की त्वचा को (गम्भीर रुप से जले हुए रोगियों के उपचार के लिये) अस्पताल को दान देने का निर्णय लिया और समस्त औपचारिकताओं की तत्कास पूर्ति करके मानवता के लिये प्रेरणास्पद मिसाल कायम करते हुए अपने उस सर्वाधिक शोकाकुल समय में भी ये पुनित दान देकर लगभग विभत्स अवस्था में उस मृत पुत्र के त्वचा रहित शव को लाकर उसका अन्तिम संस्कार किया ।


9.12.10

भ्रष्टाचार पर सशक्त प्रहार

       
       वर्तमान समय में जब भ्रष्टाचार का दानव देश मैं अपनी पूरी विभत्सता के साथ सब तरफ तांडव करते दिख रहा है और लगभग सभी देशवासी यह मानने लगे हैं कि यह समस्या अब शिष्टाचार का रुप ले चुकी है, तब ठंडी हवा के झोंके जैसा एक उदाहरण मध्य-प्रदेश के देवास से सामने आया है । यहाँ की एक अदालत ने मार्च 2002 में शाजापुर के लोकनिर्माण विभाग के तत्कालीन उपयंत्री प्रीतमसिंह निवासी देवास को जो अपनी आय से 51 लाख रु. की अनुपातहीन सम्पत्ति अधिक रखने के दोषी पाए गए थे इन्हें विशेष प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश श्री पी. के. व्यास ने अनुकरणिय कदम उठाते हुए 5 करोड रुपये के भारी-भरकम जुर्माने के साथ ही 3 वर्ष के कठोर कारावास की सजा से दंडित करके भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की दिशा में  सख्त पहल की है ।
      अपना फैसला सुनाते हुए माननीय न्यायाधीश ने कहा कि ये भ्रष्टाचारी अपनी काली कमाई से अर्जित बेहिसाबी सम्पत्ति को इस प्रकार से रखते हैं कि उन्हे पकड पाना लगभग असंभव होता है और इसीलिये इन भ्रष्ट लोकसेवकों के मन में यह प्रबल धारणा बन जाती है कि इन्हें कोई पकड नहीं पाएगा और ये अवैद्य साधनों से ऐसे ही धन व संपत्तियां अर्जित करके ऐशो-आराम से रह सकेंगे, इसलिये इन्हें ऐसी सजा मिलना आवश्यक है जिससे कि लोकसेवक के पद पर बैठे किसी भी व्यक्ति के मन में यह भय बना रहे कि यदि किसी दिन वो पकड में आ जावेगा तो न सिर्फ ये सम्पत्ति उसके पास से छिन जावेगी बल्कि जेल में बैठकर उसके पास पछताने के सिवा कुछ भी बाकि नहीं रहेगा ।
      भ्रष्टाचार के खिलाफ मील के पत्थर जैसे उपरोक्त फैसले के आधार पर मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि वर्तमान में देशभर में चर्चारत पूर्व संचार मंत्री ए. राजा जो 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में 176 लाख करोड के घोटाले के आरोपी हैं और जिनका सिर्फ पद गया है वे, या मधु कोडा जो एक साधारण मजदूर से अपनी जोड-जुगाड के बल पर झारखंड के मुख्यमंत्री के पद तक जा पहुँचे और जिन पर 4,000 करोड रुपये की संपत्ति बनाने का आरोप चल रहा है, भले ही ये जेल गये हों लेकिन कोर्ट से अभी इन्हें कोई सजा नहीं मिली है, या कामनवेल्थ गेम्स आयोजन समिति के चेयरमेन के रुप में सुरेश कलमाडी जिन पर 8,000 करोड रुपये के भ्रष्टाचार का आरोप चल रहा है जिसके चलते अभी तक तो सिर्फ इनका कांग्रेस संसदीय सचिव का पद ही गया है, या मध्य-प्रदेश के निलंबित प्रमुख सचिव अरविन्द जोशी व टीनू जोशी दम्पत्ति जिन्होंने 300 करोड रुपये तो शेयर बाजार में ही लगा दिये थे और गिरफ्तारी के वक्त 3 करोड रुपये की अनुपातहीन संपत्ति जिनसे बरामद हुई थी इनका भी सिर्फ पद से निलंबन ही हो पाया है । ये सभी और इन जैसी और भी उल्लेखित नामवर हस्तियों को कोर्ट से क्या सजा मिलनी चाहिये ? जबकि प्रश्न यह भी दिखता हो कि   जोड-जुगाड की इस व्यवस्था में जिसके ये महारथी साबित हो चुके हैं क्या कोर्ट में इनके अपराध साबित भी हो पाएँगे ?


       भले ही इसकी संभावना नगण्य हो किन्तु फिर भी अन्धकार में उजाले की किरण जैसे उदाहरण के रुप में वो जज सामने आते हैं जिन्होंने अपनी स्वयं की शादी में शराब के नशे में दहेज मांगकर और पूर्ति न हो पाने की स्थिति में वधूपक्ष के सभी सम्बन्धित परिजनों के साथ मार-पीट करके तोड-फोड मचाई थी, उनकी अग्रिम जमानत कोर्ट ने इस कथन के साथ रद्द कर दी कि जिनके उपर व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी हो यदि वे ही इस प्रकार का अनैतिक आचरण सार्वजनिक रुप से करते पाए जाएँ तो उन्हें कडी सजा मिलना ही चाहिये, और वे जज महाशय अभी तक गिरफ्तारी के डर से इधर से उधर भागते फिर रहे हैं । दूसरे उदाहरण के रुप में हजारों करोड रुपये के स्टाम्प घोटाले के आरोपी रहे अब्दुल करीम तेलगी का नाम भी जेहन में आता है जिसकी सारी उम्र बीमारी और बेचारगी की स्थिति में जेल में गुजरी और उसके भ्रष्टाचार के शिखर के दिनों का कोई भी सम्पर्क उसके बचाव में सामने नहीं आ पाया ।
       एक बात और जो इन नामचीन हस्तियों के सन्दर्भ में देखने में आती रही है वो ये कि इनके भ्रष्टाचार के आंकडे चाहे जितने विशाल दिखें किन्तु यौवन के दिनों की इनकी शाही जीवन शैली और उपर से नीचे तक भ्रष्टाचार की गंगोत्री में सभी सम्बन्धितजनों को उनके हिस्से की रकम पहुँचाने के बाद जब संकट के दिनों का सामना करने की स्थिति आती है तब तक बमुश्किल चंद करोड रुपये भी इनके पास बचत में शायद ही सुरक्षित रह पाते होंगे । जबकि इनके सामान्य इन्सानी शरीर में रहता इनका दिल भी दसों दिशाओं से उठ रहे आरोप-प्रत्यारोपों की मार सहते-सहते इतना कमजोर भी हो जाता है कि सामान्य तौर पर ये मानव जीवन जिसे कुदरत का सर्वाधिक अमूल्य उपहार कहा जाता है इसका आनन्द लिये बगैर ही ये अतिशीघ्र दुनिया से कूच भी कर जाते हैं । क्या मेरी इस सोच के पक्ष में हजारों करोड रुपये के शेअर घोटाले के आरोपी रहे हर्षद मेहता जिसके ठाठ-बाट कभी धीरुभाई अंबानी से भी उपर दिखने लगे थे, का नाम नहीं लिया जा सकता जिसकी कारगुजारियों से न सिर्फ उस समय कई बैंकों में ताले लग गये थे बल्कि हजारों व्यक्तियों के जीवन भर की कमाई बचत भी धूल-धूसरित हो गई थी, अंततः उसे भी जेल की कोठरी में अपने ही जूतों का सिरहाना बनाकर सोना पडा था और फिर कम उम्र में ही  दुनिया से कूच भी कर जाना पडा था ?

4.12.10

आखिर क्यों ?

       
        मेरी सास अस्पताल में भर्ती थीं । उपचार के उन सभी चरण को पार कर चुकने के बाद जो डाक्टर ने उन्हें भर्ती करते समय आवश्यक बताये थे, अब आगे क्या करना है  डाक्टर से ये समझने की जिम्मेदारी परिवार ने मुझे सौंपी । डाक्टर कहाँ से आते हैं और अस्पताल में उनके बैठने का ठिकाना कौनसा है ये कोई नहीं जानता था, लिहाजा सम्पर्क का एकमात्र माध्यम जब वो राउन्ड पर आवें तभी उनसे बात कर सकने का था । नियत समय पर मैं अस्पताल के वार्ड में जाकर बैठ गया और कोई काम नहीं होने के कारण पास के पलंग पर बैठे लडके के दो पन्ने के अखबार में से फाल्तू पडा एक पन्ना उठाकर मैं भी पढने लगा । तभी कनखियों से जो बात मेरे देखने में आई वो क्या थी ? वो पेशेन्ट महोदय जो उस अटेन्डर लडके के साथ थे और जिनके पास शेष सारा अखबार पडा हुआ था, उन्होंने उसे उठाया और अपने तकिये के नीचे रखकर वापस लेट गये, क्यों ? मेरा अखबार दूसरा कोई कैसे पढले,  उसके अक्षर घिस जाएँगे तो ?

     बसों में यात्रा के दौरान जब भी कोई स्टेशन आता है और किसी यात्री के पास बैठा यात्री अपनी यात्रा समाप्त कर सामान के साथ उतरता है तो पास बैठा यात्री तत्काल अपना बेग उसकी सीट पर रखकर उस सीट के प्रति अनजानापन दिखाते बैठ जाता है । अब वहाँ से चढने वाला यात्री जब उससे उस सीट के बारे में पूछता है तो उसका उत्तर यही रहता है कि यहाँ कोई बैठा है और वो अभी आने वाला है । वो यात्री उस सीट परसे तब तक अपना कब्जा नहीं छोडता जब तक कि बस पूरी पेक न हो जावे और बचे यात्री खडे-खडे यात्रा की स्थिति में न आ जावें । अलबत्ता इस दरम्यान यदि कोई अकेली सुन्दर सी दिखाई देने वाली महिला यात्री उससे उस सीट के बारे में पूछे तो फौरन वो अपना बेग हटाकर उस महिला को बैठा लेगा, या कभी बिल्ली के भाग्य से छिंका टूटने जैसी स्थिति में संयोगवश उसका कोई परिचित वहाँ आ जावे तो बात अलग है ।

     इन दोनों उदाहरणों में जब हम विपरित स्थिति में होते हैं तो अलग होते हैं और अधिकार वाली स्थिति में होते हैं तो अलग होते हैं । प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता धर्मेंन्द्र जब अपने संघर्षकाल में किसी प्रारम्भिक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे तो फिल्म का डायरेक्टर बात-बेबात अपनी हर बात धर्मेन्द्र को डांटते हुए ही बता और समझा रहा था । शोले की सुप्रसिद्ध मौसी लीला मिश्रा भी उस फिल्म की किसी भूमिका में वहीं मौजूद थी । जब उसने बार-बार डायरेक्टर के धर्मेन्द्र के प्रति बदमिजाजी के तेवर देखे तो यह कहते हुए उस डायरेक्टर की वहीं लू उतार दी कि क्यों रे भैया अभी तेरे सामने दिलीप कुमार काम कर रहा होता तो तू खडे-खडे दुम हिलाता दिखता और ये लडका नया है तो तू बार-बार इसपे हावी होकर अपनी डायरेक्टरी झाड रहा है । लीला मिश्रा तब भी सीनियर थी लिहाजा उस डायरेक्टर की उनपे हावी होने की हिम्मत नहीं थी । उनकी डांट खाने के बाद वो धर्मेंन्द्र से भी सलीके से ही पेश आया ।

     अभी समाचार पत्रों में एक खबर चल रही है- एक मजिस्ट्रेट महोदय अपनी स्वयं की शादी में लडकी वालों से सगाई से लगाकर बरात आने तक के रस्मो-रिवाज की पूर्ति में दो-चार लाख का माल ले चुकने व वधू पक्ष के शादी की समस्त तैयारियों के चार-पांच लाख रुपये खर्च करवा चुकने के बाद फेरे के पूर्व इस बात पर अड गये कि एक लाख रुपये नगद और एक मारुति कार पहले मुझे और दो उसके बाद ही ये शादी हो पावेगी । शादी के प्रारम्भिक चरण में वे महाशय कंकू-कन्या वाली आदर्शवादिता की बात कर रहे थे । अचानक सामने आई इस मांग से हतप्रभ लडकी वाले इस स्थिति में नहीं थे कि ये मांग भी पूरी कर पाते लिहाजा उनकी इस मांग का विरोध होना था, हुआ. और मजिस्ट्रेट महोदय वहाँ अच्छी-खासी तोडफोड करके गायब हो गये जो अभी फरार हैं । यदि उनकी कोर्ट में इसमें का कोई प्रकरण आता तो वे मजिस्ट्रेट महोदय वहाँ तब क्या होते ?

     उदाहरण एक नहीं अनेक हैं  जहाँ हम सार्वजनिक तौर पर अलग दिखते हैं लेकिन निजी तौर पर बिल्कुल अलग । वो नेतागण जो सामूहिक विवाह समारोहों में इस प्रथा को मितव्ययता के पक्ष में और दिखावे के विरोध में वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता बताते हुए मंच पर जोर-शोर से भाषण देते दिखते हैं, अपने पुत्र या पुत्री की शादी में उनका आचरण तत्काल बदल जाता है और वे अच्छे से अच्छे रईस से भी बढकर अनाप-शनाप  खर्चों का अनावश्यक दिखावा खुद के घर की शादियों में करते नजर आते हैं ।

    आखिर क्यों हम सभी के सार्वजनिक जीवन की सामान्य शैली वैसी नहीं हो  पाती जैसी हम अपने समाज या समूह के बीच निरन्तर दिखाते रहने की कोशिश में लगे रहते हैं ? क्या कथनी और करनी के लगातार बढते दिख रहे जीवनचर्या के इन सामान्य तौर-तरीकों में समानता लाकर हम अपनी जिन्दगी सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय के अधिक सहज तरीके से नहीं जी सकते ?

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